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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह73 / 94

दसवां अध्याय · कथा 73

मौनी बालक की कथा

एक विसनोवण एक डावड़ो ले आयी। जाम्भाजी ! ओह मोटो हुवो, अजु बोल नहीं। जाम्भोजी कह रे बालका बोल्य। डावड़ो सिध बोल। मोनी बचन - जाम्भोजी श्री वायक कहे-

शब्द-118 ओ३म् सुरगा हूँते शिंभु आयो, कहो कूंणा के काजै।

नर निरहारी एक लवाई, परगट जोत विराजै।

प्रह्लादा सूं वाचा कीवी, आयो बारां काजै।

बारा मैं सूं एक घटै तो, सू चेलो गुरु लाजै।

नाथोजी कहते हैं कि हे वील्ह ! जब श्री जाम्भेश्वर जी सम्भराथल पर विराजमान थे उस समय उनके पास में आने वालों में एक बिश्नोई महिला अपने एक छोटे से बालक को साथ लेकर सम्भराथल पर आयी। कहने लगी-हे जाम्भाजी! यह मेरा बच्चा अब बड़ा बोलने लायक हो गया है। किन्तु यह तो बोलता नहीं है। एक बार इसे बुलवा दीजिये। इससे मेरा संशय मिट जायेगा। हे देव! मुझे यह संशय है कि यह बोलना तो जानता है, किन्तु बोलता नहीं है। क्या यह बोलना नहीं जानता? यदि जानता है, तो बोलता क्यों नहीं?

श्री जाम्भोजी ने उस माता की बात सुन कर बालक से कहा- अरे! बालक! बोल! ऐसा कहते हुए चुटकी बजाई, तो बालक बोलने लगा। प्रथम वाणी का उच्चारण सिद्धों की वाणी का ही किया। प्रथम दो पंक्ति तो मौनी बालक के वचन हैं। अन्तिम दो पंक्ति याँ जाम्भोजी के वचन हैं। प्रथम तो बालक ने प्रश्न पूछे हैं। आगे जाम्भोजी ने उत्तर दिये हैं। क्योंकि वह बालक जाम्भोजी की प्रेरणा से ही बोला था इस लिए इन दो पंक्ति यों को जाम्भोजी के शब्दो में ही सम्मिलित कर लिया है। जिस प्रकार से वेद भी तो ईश्वर की प्रेरणा से ही ऋ षियों ने उच्चारण किये थे। वेद ईश्वर रचित कहे जाते है। इसलिए यह शब्द भी जाम्भोजी द्वारा रचित माना जाता है। इस शब्द द्वारा बालक ने क्या पूछा था और श्री देवजी ने क्या जवाब दिया था इसके बारे में शब्द बतलाता है।

बालक ने पूछा हे देव! आप तो स्वर्ग - बैकुण्ठ धाम में थे। मैंने आपको वहाँ पर देखा था। तथा आप तो स्वम्भू हैं। स्वतंत्र हैं। कर्मो के बंधन से परे हैं। तब यह बतलाओ कि यहाँ मृत्यु लोक में कैसे आए? किस प्रयोजन से आपका आना हुआ? बालक ने फिर से कहा- मैं आपको यहाँ बैठा देखता हूँ, आप बड़े विचित्र हैं, आप नर रूप में होते हुए भी निरहारी हैं। भोजन नहीं करते, ऐसा क्यों है?

आप इस समय अकेले ही आये है, साथ में लक्ष्मी, सीता, रुक्मिणी को क्यों नहीं लाये ? इससे पूर्व तो साथ लेकर आते थे। पूर्व अवतारों में सीता- रुक्मिणी रूप में आप के साथ थी। आप यहाँ पर प्रकट ज्योति स्वरूप से विराजमान हो। जहाँ आप बैकुण्ठ धाम में रहते हैं, तो आपकी ज्योति से ही वह लोक प्रकाशित होता है। वहाँ अन्य प्रकाश करने वाले सूर्य चन्द्रादि नहीं हैं। वही यहाँ पर विराजमान हो रहे हैं। बालक कहने लगा-मैं नहीं समझ पा रहा हूँ, यह अपूर्व आपकी लीला अद्भुत है।

आगे जाम्भोजी ने उत्तर देते हुए कहा-हे बालक! मैंने सतयुग में नृसिंह रूप धारण करके प्रह्लाद को वचन दिया था, उन वचनों को पूरा करने के लिए मेरा यहाँ आना हुआ है। उस समय मैंने प्रह्लाद भक्त से कहा था कि तुम्हारे तैतीस करोड़ साथियों का उद्धार मैं समय-समय पर करूँगा।

पाँच करोड़ इस समय तुम्हारे साथ ही सतयुग में, सात करोड़ त्रेता युग में हरिश्चन्द्र के साथ, द्वापर युग में नौ करोड़ का युधिष्ठिर के साथ उद्धार होगा। कलयुग में मैं स्वयं ही आऊँ गा और शेष बचे हुए बारह करोड़ का उद्धार करूँगा। इस समय इस देश में वही प्रह्लाद पंथ के बिछुड़े हुए जीव जन्म लेकर आये हैं। उनका उद्धार करूँगा।

हे बालक! उन्हीं बारह करोड़ों में तुम भी एक हो। तुम्हारा समय आ चुका है। अब दुबारा तुम्हारा जन्म नहीं होगा। तुम भागे हुए चले आए हो। यही तुम्हारा प्रह्लाद पंथी होने का प्रमाण है। यदि इस समय प्रह्लाद को दिया हुआ वचन पूरा नहीं करूं तो सुचेला और गुरु दोनों को ही लज्जा लगेगी। पहले तो वचन दिया था, किन्तु अब निभा नहीं सके। इसीलिए मेरा यहाँ पर आगमन हुआ है।

हे वील्ह! बालक तथा श्री देवजी की परस्पर इस प्रकार से हुई वार्तालाप को हमने सुनी थी। जब श्री देवजी अपनी बात बता चुके थे, तब वहाँ पर उपस्थित भक्तों की भावना को देखते हुए मैंने पूछा था कि हे देव! यह बालक पहले तो मौन था, अब बोलने लगा है। यह बात स्वर्ग की करता है- आपको भलीभांति जानता भी है। इसकी-आपकी मुलाकात कहाँ पर और कैसे हुई थी? इसके बारे में तथा इस बालक का परिचय ठीक से देने की कृपा करें।

श्री जम्भेश्वर जी ने कहा-इस बालक की कथा मैं क्या बतलाऊँ गा, यह स्वयं ही बतला देगा। ऐसा कहते हुए श्री देवजी ने बालक से कहा- रे बालक! तू अपने पूर्व जन्म की कथा स्वयं ही इन लोगों को बतला दे, क्योंकि अब तू मेरे पास है। अब तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। पहले जन्म में तू बोलने से ही फंस गया था। अब तुझे डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ। देवजी की वार्ता श्रवण कर के वह बालक अपनी कथा स्वयं ही कहने लगा-

बालक बोला-मैं पूर्व जन्म में ऋषि था। लखनऊ के उत्तर दरवाजे पर तपस्या करता था। इस बात को वहाँ के लोग सभी जानते हैं। वहाँ का राजा नित्य प्रति मुझे भोजन देने आता था। वह राजा संतों का सेवक था। उसी शहर में एक भटियारी रहती थी। वह नित्य प्रति धूणी के लिए लकड़ी डाल कर जाती थी। इस प्रकार से एक राजा, दूसरी भटियारी की सेवा से मैं बारह वर्ष तक तपस्या करता रहा।

एक समय वह भटियारी मेरे सामने आकर रोने लगी। मैंने पूछा-माई क्यों रो रही हो? उस भटियारी ने कहा- महाराज! मेरे एक ही लड़का है। वह तो चोरी करता है। डाका डालता है। मेरे बेटे ने चोरी की है। उसके हाथ से एक लड़की मर गयी है। नगरी के लोग रोते-पीटते राजा के पास गये और चोर को पकड़ कर फांसी देने की बात राजा से कही। राजा ने प्रजा को शांत किया और मेरे बेटे को फांसी का आदेश दिया। मेरा बेटा पकड़ा गया है। आज ही यह राजा जो आपके पास आता है यही फांसी देगा। कृपा करके मेरे बेटे को बचाइए। अन्यथा मैं भी बेटे के वियोग में रो रो कर मर जाऊँ गी।

यह बात सुन कर मैंने कहा- हे माई! तुम चिंता मत कर! रोना बंद कर दे। मैं तेरे बेटे को बचा दूँगा। उसी समय ही राजा आया और मुझे भोजन जिमा कर वापिस जाने लगा, तो मैंने पूछा- हे राजन! आज जल्दी क्यों जा रहे हो? राजा ने कहा- हे ऋ षिवर! आज एक सख्स को फांसी देना है। इसीलिए मुझे जाना होगा। मैंने कहा- हे राजन! उस व्यक्ति को फांसी नहीं देना। एक बार तो उसके अवगुण माफ कर देना। राजा ने मेरी बात मान ली और भटियारी के बेटे को छोड़ दिया।

भटियारी का चोर बेटा छूट गया। मैंने तो छुड़ाया, तो उसके भले के लिए ही था। किन्तु उस चोर को तो और अधिक गर्व हो गया। पकड़े जाने पर छूटने की आशा हो गयी थी। इसीलिए उस चोर ने अबकी बार और भी ज्यादा तबाही मचा दी थी। बाजार में लूट पाट की तथा अपने साथियों सहित भटियारी के बेटे ने अनेक लोगों का खून कर दिया।

नगरी के लोग एकत्रित हो कर राजा के पास गये और कहने लगे-हे राजन्! हम तो जुल्म सहते- सहते थक गये हैं। इस बार तो चार लोगों को इस डाकू ने मार डाला है। जिस राजा के यहाँ न्याय नहीं है, वहाँ प्रजा को नहीं रहना चाहिए। हम तो तुम्हारे देश को छोड़कर परदेश चले जायेंगे। तभी हमारा क्लेश कटेगा।

प्रजा की पुकार राजा ने सुनी और कहने लगा-कल का दिन छिपने से पूर्व ही मैं इस डाकू को पकड़ कर फांसी चढ़ा दूँगा। आप लोग अब जाइए। ऐसा कहते हुए प्रजा को आश्वासन दिया। दूसरे दिन राजा भोजन लेकर ऋषि के पास चला। राजा के पहुँचने से पूर्व ही भटियारी आकर पुनः रोने लगी। ऋषि रूप में स्थित मैंने कहा- हे माई! क्यों रोती हो? वह कहने लगी- हे महाराज! क्या बताऊँ! आज मेरे बेटे का मरने का दिन आ गया है। मैंने पूर्व जन्म में कोई ऐसा पाप कर्म किया होगा, इसीलिए मैं रो रही हूँ।

ऋषि ने कहा- मैं तेरे पुत्र को मरने नहीं दूँगा। ऐसे कहते हुए भटियारी को चुप किया। यह वार्ता चल ही रही थी कि बादशाह ऋषि के लिए भोजन लेकर सदा की भांति आ गया और ऋषि को भोजन करवा कर के तुंरत वापिस चल भी पड़ा। महात्मा ने पूछा-हे राजन्! आज इतनी जल्दी क्यों जा रहे हो? रुको, कुछ वार्ता करो। बादशाह कहने लगा-आज मुझे जल्दी जाना है। उस पहले वाले डाकू को फांसी देना है, उसने खून कर दिया है।

ऋषि कहने लगा-हे राजन्! उसको फांसी नहीं देना! मेरे कहने से छोड़ देना है। बादशाह कहने लगा-महाराज! यह तो चार आदमियों का खून करने वाला है। इसको मैं कैसे छोड़ सकता हूँ। जो राजा अपराधी को दण्डित नहीं करता, वह राजा नरक का अधिकारी हैं। अब आप ही बतलाइए मैं तो जो कुछ आप कहोगे, वही करूँगा। मुझे मालूम है कि आप मुझे अधोगति में नहीं जाने देंगे।

ऋषि ने कहा-यद्यपि तुम्हारी बात सत्य है। फिर भी आप इसे छोड़ दे। ऋषि के कहने पर राजा ने उस हत्यारे को छोड़ दिया। वह भटियारी का बेटा चोर डाकुओं से जा मिला। एक रात्रि में उन डाकुओं ने मिल कर नगरी पर हमला कर दिया। शहर की जनता ने जाकर राजा के पास पुकार की। राजा ने कहा- अबकी बार मैं उस डाकू को छोड़ूँगा नहीं। चाहे कोई भी मुझे क्यों न रोके? ऐसा कहते हुए प्रजा को शांत किया और उस डाकू को पकड़ लिया। फांसी पर चढ़ाने का हुकम जारी कर दिया और राजा ने कहा-

मैं पहले ऋषि को भोजन देकर आता हूँ। वापिस आकर फांसी चढ़ा दूंँगा। इधर भटियारी भी ऋषि के पास आकर रोने लगी। तब पूछा माई क्यों रो रही हो? भटियारी कहने लगी- हे महाराज! जो कर्म करेगा उसको फल तो वही मिलेगा। आज मेरा बेटा बचेगा नहीं। ऋषि ने कहा- मैं राजा से तुम्हारे बेटे को बचाने का प्रयास करूँगा।

उसी समय राजा भी आ गया और भोजन देकर जल्दी में वापस जाने लगा- तब ऋषि ने पूछ ही लिया आज जल्दी क्यों जा रहे हो? राजा ने पुनः वही बात दोहरायी। तब पुनः ऋषि ने कहा मेरा कहना करें तो इसे फांसी नहीं देना। ऐसी वार्ता सुन राजा पुनः बैचेन हो गया। ऋषि बार-बार एक ही बात कहे जा रहे हैं। नीति कहती है कि जिस राजा के राज में कोई व्यक्ति जुल्म करे और राजा उसको दण्डित नहीं करे तो स्वयं पाप का भागी होता है। इसने तीन अपराध कर लिये हैं, किन्तु मैंने आप के कहने से माफ कर दिये हैं। अब प्रतिज्ञा पूर्ण हो गयी है। अधिक से अधिक तीन बार माफ किया जा सकता है।

ऋषि ने कहा- हे राजन! सुनो! यदि चोर अपनी आदत चोरी करना नहीं छोड़ता, तो हम साधु अपनी साधुता कैसे छोड़ सकते है? यदि अपना स्वभाव ही छोड़ दिया, तो साधुपना ही अपना व्यक्तित्व ही चला जाएगा। अब जो तुम्हारी राजनीति कहती है, वही तुम करो। जो दण्ड इसके लायक है, वही इसे प्रदान करो। मैं कुछ भी नहीं कहता। इस प्रकार से राजा ने भटियारी के बेटे फांसी चढ़ा दिया और अपना कार्य पूरा किया।

उस राजा सेरविलोल ने संत की सेवा की थी। इसका फल राजा को मिला। उसके स्वांति शाह पुत्र हुआ। यह जांभोजी का शिष्य बना था। दोजक छोड़, भिस्त की प्राप्ति की थी।

नाथोजी कहने लगे हे वील्ह! उस भटियारी ने संत की सेवा की थी। नित्य प्रति लकड़ी डाल कर जाना, झाडू बुहारी करना, यह निस्वार्थ सेवा का फल भठियारी को भी मिलना था। वह अपने पुत्र को तो नहीं बचा सकी थी। दिन-रात पुत्र के मोह में बेचैन रहती थी। एक दिन उस ऋषि ने कहा- हे माता! अब मैं संसार से चलना चाहता हूँ। मेरा समय आ गया है। मेरा जीवन पूर्ण हो गया है। अब तू मेरे से क्या चाहती है? जो कुछ माँगोगी वही मैं दूँगा। तब भठियारी कहने लगी- मैं आपके ही जैसा पुत्र चाहती हूँ। ऐसा वरदान सुन कर ऋषि चिंता में पड़ गया और कहने लगा- यह संसार कुछ भी काम का नहीं है। मेरे जैसा पुत्र तो मैं ही हो सकता हूँ। दूसरा कहाँ से लाता? इस जन्म में तो तुम्हारी पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूरी नहीं कर सकता, किन्तु दूसरा जन्म लेकर ही आना होगा। तभी इस माता का बेटा बन सकूँगा। इसकी इच्छा की पूर्ति कर सकता हूँ। इस प्रकार के वचन देकर वह ऋषि शरीर छोड़ चुका था।

संत सेवा के प्रभाव से वह भटियारी बिश्नोई के घर पर जन्म लेकर आयी है। और वह ऋषि इसका बेटा बन कर आया है। वह बालक कहने लगा- मैं अपने पुण्य के प्रताप से स्वर्ग तो गया था, किन्तु वहाँ पर मुझे कौन रहने देता? क्योंकि मैंने बेटा बनने का वचन इस माँ को दिया था। इस समय यह माता मुझे घरघर लिए डोलती है। कह रही है कि यह मेरा बेटा बोलता नहीं है। मैं बोलना तो जानता था किन्तु यह जान कर नहीं बोला था कि पूर्व जन्म में मैंने बहुत बकवास किया था, उसका फल जो मुझे मिल ही गया है। स्वर्ग लोक में पहुँचा हुआ, मुझे वापिस मृत्यु लोक में आना पड़ा। इस समय जाम्भोजी की कृपा से मैं इन्हीं की शरण में आ गया हूँ। इनकी आज्ञा से मैं बोल चुका हूँ। अब मुझे किसी भी प्रकार का भय नहीं है। अपनी जगह पर वापिस चला आया हूँ मैं तो अब यहीं रहूँगा, ऐसा कहते हुए उस योग भ्रष्ट बालक ने अपने पूर्व जनम की कथा सुनायी। और पुनः मौन हो गया।

माता ने यह सभी कुछ सुना और आश्चर्य चकित हो गयी। कहने लगी-क्या मैं पूर्व जन्म में भठियारी थी? यह जन्म मेरा बिश्नोई के घर पर हुआ है। क्या यह मेरा बेटा पूर्व जन्म में ऋषि था? इस समय अपनी स्वाभाविक गति को प्राप्त हो गया। मुझे भी इसकी साधना में फिर से विघ्न नहीं डालना है। पूर्व जन्म में मैं विघ्न बन कर आयी थी। अब विघ्न नहीं बनूँगी। ऐसा विचार करते हुए वह माता उस बच्चे को वहीं छोड़ कर वापिस चली गयी।