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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह67 / 94

दसवां अध्याय · कथा 67

वैष्णव साधु जमात के प्रति योग उपदेश

नाथो उवाच- हे वील्ह! जब श्री देवजी सम्भराथल पर विराजमान थे, उस समय उनके पास अनेकों शंकाओं को लेकर तरह-तरह के लोग आया करते थे। उसी समय की एक वार्ता मैं तुम्हें बतलाता हूँ-

हरिद्वार से चलकर द्वारिका को अनेकों वैष्णव संतों की जमात जाया करती थी। पाँच सौ संतों की एक जमात सम्भराथल पर श्री देवजी की महिमा सुन कर आ गयी। उस जमात का महंत लाल दास बड़ा भाग्यशाली संत था। उस संतों की जमात ने पीपासर में डेरा लगाया। वहाँ पर जाम्भोजी के बारे में उनकी सिद्धि के बारे में चर्चा होने लगी। कुछ लोगों ने तो बात स्वीकार कर ली, किन्तु कुछ लोगों ने नहीं माना।

लालदास मंहत ने कहा- आप कुछ लोग सम्भराथल जाओ, और अपनी करामात दिखा आओ। यदि जाम्भोजी पाखण्डी हैं, तो उन्हें पकड़ लेना और अपने हाथ दिखाना। उनमें से कुछ लोग सम्भराथल पहुँचे। जाम्भोजी की दिनचर्या आसन आदि देखे और पूछा-आपके बिछाने के लिए आसन-बिछौना क्यों नहीं है? महंत लोगों के तो बिछाने के लिए आसन होता है। श्री देवजी ने उनके मन की भावना को जान कर शब्द सुनाया-

शब्द-107 ओ३म् सहजे शीले सेज बिछायों, उनमन रह्या उदासूं।

जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहों कहाँणी कासूं।

रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनियां भया उजासूं।

सतगुरु मिलियो सतपंथ बतायो, भ्रांत चुकाई, सुगरा भयो विश्वासूं।

जां जां जाण्यो तहां प्रवाण्यो, सहज समाणो, जिंहि के मन की पूगी आसूं।

जहाँ गुरु न चीन्हो पंथ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं।

श्री देवजी ने कहा- हे साधो! मैंने तो सहज ही में शील रूप आसन बिछा रखा है। तुम्हारी आँखें स्थूल वस्त्र के बिछौने को ही देखती हैं, किन्तु मैंने शील रूपी बिछौना बिछा रखा है। मैंने मन को उपर उठा लिया है। चित्त की एकाग्रता के कारण मैं परमात्मा से जुड़ा हुआ हूँ। इसीलिए संसार से उदासीन हूँ। मुझे सांसारिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है।

अनेकों युग व्यतीत हो चुके हैं। अनेकों सृष्टियाँ बन चुकी हैं एवं बिगड़ भी चुकी हैं, मैंने तो उस परिवर्तनशील समय को देखा है। इस समय मैं उन बीते हुए युगों की बात कहता हूँ किन्तु यहाँ सुनने वाला कोई नहीं है। किसे कहूँ? जब सूर्योदय हो जाता है, तो उल्लू अंधा हो जाता है, किन्तु दुनिया प्रकाशित हो जाती है। इसी प्रकार से जो लोग उल्लू की भांति हैं, वे तो रात्रि को ही दिन कहते हैं और दिन को रात्रि कहते हैं। उन्हें यही पता नहीं है कि सूर्योदय हो चुका। ज्ञान का प्रकाश फैल चुका है।

हे वैष्णव! वे उल्लू सदृश लोग हैं। उन्हें यह पता नहीं है कि सद्गुरु का मिलाप हुआ है। सतपंथ बता दिया है। भ्रांति मिटा दी है। किन्तु कुछ सुगरा लोग हैं, उन्हें विश्वास प्राप्त हुआ है। नुगरा लोग अश्रद्धालु कुतर्की हैं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ। जिस ने भी जाना है, उसने ही प्रमाण माना है। वह सहज में ही शरणागत हो गया है। एकता स्थापित कर ली है। तल्लीन हो गया है। उसी के मन की आशा पूर्ण हो गयी है। तथा जिन्होंने गुरु को नहीं पहचाना, सतपंथ का अनुगामी नहीं बना, उसी के गले में फांसी पड़ेगी। जन्म-मरण के बंधन में पड़ गया। चौरासी लाख जीव योनियों में भटकेगा।

इस प्रकार से शब्द को सुन कर उन वैष्णव साधु ने काह- महाराज! योग समाधि के बारे में कुछ बतलाओ। ऐसी साधना बतलाइये जिससे हमारा चंचल मन स्थिर हो सके। इन्द्रियाँ वशीभूत हो सके। किस प्रकार से हम क्या साधना करें, जिससे सुखी हो सकें। यह हम भलीभांति जानते हैं कि निज धर्म जाने बिना, आचरण किये बिना, अब तक कोई सुखी नहीं हो सका है। हम आपसे निज धर्म के बारे में जानना चाहते हैं।

श्री देवजी ने कहा- हे वैष्णव! तुमने अच्छी बात पूछी है। इस वार्ता से तुम्हारी ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा प्रगट होती है। ज्ञान के द्वारा ही जीवन की युक्ति और मुक्ति की प्राप्ति होती है। श्री देवजी की वार्ता सुन कर वह साधु वापिस अपनी मंडली में गया और कहने लगा-चलो! हम सभी मिल कर चलते हैं। वहाँ पर जाम्भोजी अकेले ही हैं। उनकी हंसी उड़ाते हुए, उन्हें अपमानित करेंगे। इस प्रकार से विचार करके साधुओं की जमात वहाँ से चल पड़ी और जाम्भोजी को चारों तरफ से घेर कर बैठ गयी और कहने लगे-

कहो आप में क्या करामात है? सत्य बोलो, लालदास महंत कहने लगा- मैंने अपना शिष्य आपके पास भेजा था। उसने आप से योग समाधि की बात पूछी थी, किन्तु आपने बतलायी नहीं। शायद आप जानते नहीं हैं? श्री जम्भेश्वरजी ने कहा-मैं तो सभी कुछ जानता हूँ यदि आप सभी कुछ सुनना चाहते हैं, तो तुम्हें सुनाऊँ, ऐसे कहते हुए शब्द सुनाया-

शब्द-108 ओ३म् हालीलो भल पालीलो, सिध पालीलो खेड़त सूना रांणो।

चन्द सूर दोय बैल रचीलो, गंग जमन दोय रासी।

सत संतोष दोय बीज बीजीलो, खेती खड़ी अकासी।

चेतन रावल पहरै बैठे, मृगा खेती चर नहीं जाई।

गुरु प्रसादे, केवल ज्ञाने, ब्रह्म ज्ञाने, सहज स्नाने।

यह घर ऋद्ध सिद्ध पाई।

हे कृषक! हे साधक! अनाज प्राप्ति हेतु खेती की जाती है। तथा समाधि प्राप्ति हेतु साधना की जाती है। जो कुछ भी करे चाहे खेती करे या साधना, उसे भली प्रकार से एकाग्र चित्त, श्रद्धा भाव से करे। तब तक करे, जब तक सिद्धि की प्राप्ति न हो जाय। अपना कर्तव्य कर्म, धर्म समझ के अपनी साधना तथा खेती करे। खेती करने वाला किसान शून्य एकांत वन में जाकर खेती करे। अन्यथा खेती पनप नहीं सकती। और साधक भी साधना रूपी खेती एकान्त शून्य देश में जाकर प्रारम्भ करे, तभी साधना से सिद्धि की प्राप्ति रूप फल मिल सकेगा।

खेत में हल चलाने के लिए दो बैलों की आवश्यकता होती है। एक बायें चलता है, दूसरा दायें चलता है। उसी प्रकार से सूर्य और चन्द्र ही दो बैल हैं। सूर्य एवं चन्द्र नाड़ी, ये दो नासिकायें। जिससे हम श्वांस अंदर लेते हैं और बाहर छोड़ते हैं। यही दो बैल हैं। गंगा और यमुना दो बैलों को काबू में करने के लिए रस्सी (जेवड़ी) हैं। साधना के लिए गंगा-यमुना-सरस्वती ये तीनों का संगम त्रिवेणी हैं। गंगा यमुना दोनों को खींचकर के सरस्वती में डालना प्राणायाम कहलाता है।

सृष्टि उत्पत्ति कर्ता ब्रह्मा रजोगुण रूप, एवं विनाश कर्ता शिव तमोगुण रूप, पालन पोषण कर्ता विष्णु सत्व रूप से विलीन हो जाना साधना की सिद्धि है। सत एवं संतोष रूपी दो बीज बोना है। सत्य की संगति यानि परमात्मा की प्राप्ति हो जाना, पहला बीज है। इसे ही बोयेंगे, तो ही सुफल की प्राप्ति होगी। दूसरा बीज संतोष है, ऐसी निर्बीज समाधि हेतु शून्य एकान्त में साधना रूपी खेती करे।

सजगता, चेतनता, सदा बनी रहे, यही रावल है। इसे पहरे पर बिठा दीजिये। कहीं काम, क्रोध, लोभ रूपी मृग वन्य पशु खेती को खा न जायें। इतनी साधना स्वयं करे, तो भी सफलता मिलने में संदेह है। इसीलिए गुरु की कृपा प्रसाद भी साथ चाहिये। उसे भी प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिये अन्य सांसारिक कार्य व्यवहार से ऊपर उठकर कैवल्य ज्ञान में ही रमण करे। ब्रह्मज्ञान में ही रत रहे। सहज में ही ज्ञान गंगा में स्नान करे। ऋद्धि-सिद्धि प्राप्ति का यही घर है। यही साधन उपयुक्त है। “हालीलो” यह शब्द सुन कर वैरागी साधु ने कहा-हम तो जो आप कहते है वह तो पहले से ही जानते हैं सिद्धि को प्राप्त किया है। अलख को लख लिया है। हृदय में ध्यान करते है। इस पर जम्भदेवजी ने पुनः शब्द सुनाया-

शब्द-109 ओ३म् देखत भूली को मन मानै, सेवै बिलोवै बाझ सनाने।

देखत भूली को मन चेवै, भीतर कोरा बाहर भेवै।

देखत भूली को मन मांनै, हरि पर हर मिलियो शैताने।

देखत भूली को मन चेवै, आक बखांणे थंदे मैवे।

भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं।

जिंहि ठूंठड़िये पान न होता ते क्यूं चाहत फूलूं।

हे साधो! आप लोग जानते हुए भी भून कर रहे हो, क्योंकि तुम्हारा चंचल मन स्थिर नहीं है। जो तुम्हारा मन कहता है, वही करते हो। यह भूल तो वैसी है जैसे कोई बांझ स्त्री की सेवा करके पुत्र चाहता है तथा जैसे कोई जल में से मंथन करके मक्खन लेना चाहता हो।

देखते हुए, जानते हुए भी मन जो चाहता है, वही अनर्थ कार्य कर रहे हैं। भीतर से तो पुण्य कर्म शुद्ध भावना से शून्य है। किन्तु बाहर से पुण्यात्मा बनने का दिखावा करते है। उस पत्थर की तरह जो जल में पड़ा हुआ है। तो भी ऊपर से भीगा हुआ है, किन्तु अंदर से सूखा है।

देखते हुए, जानते हुए भी भूल करता है। स्वकीय मनमानी करता है। हरि को तो छोड़ दिया है और शैतानों से मिल गया है। हरि विष्णु पालन पोषण कर्ता जीवन का आधार है। उस जीवन के आधार को छोड़ कर शैतानों से मिल कर हरि से दूर चला गया। जीवन को नरक मय बना डाला है, तो कैसा सुखी जीवन, कैसा ज्ञान?

देखते हुए, जानते हुए भी भूल करता है, मन की वासना के पीछे दौड़ता है, बुद्धि से कार्य नहीं लेता है? आक का तो बखान बड़ाई करता है तथा मेवा की निंदा करता है। यही भूल है। परमात्मा की प्राप्ति रूप अमृत की प्राप्ति है। इसे त्याग कर विष की सराहना करता है यानि संसार के सुख को ही सुख मान लिया है।

श्री देवजी कहते हैं कि हे साधु जनो! आप भूले हुए हो तथा फिर भी जोर देकर कहूँगा कि तुम भूल हुए हो। तुम्हें सत्य असत्य का विवेक नहीं है। असत्य को ही सत्य मान लिया है। अब तो प्रकाश हो चुका है। अंधेरे में न चलो। जिस ठूँठ पर पत्ते ही नहीं हैं उसके ऊपर फूल कहाँ से आयेगा? यदि सूखे ठूँठ पर फूल चाहते हो तो यही तुम्हारी भारी भूल होगी। संसार के पदार्थ तो सूखे ठूँठ की भाँति है, वहाँ सुख कहाँ है? यदि चाहते हो तो भूल होगी।

इस प्रकार से श्री देवजी के श्री मुख से शब्द श्रवण कर के सभी साधु जन प्रसन्न हुए। जाम्भोजी के शिष्य बन गये। उस समय वे सभी पाँच सौ पैंतीस थे। सभी बिश्नोई पंथ के अनुयायी बन कर पूर्णतया उनतीस नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करने लगे। लालदास महंत को लालासर में भण्डारे का काम सौंपा गया। कुछ तो लालदास के साथ ही भंडारी बन गये, तथा कुछ गृहस्थी बन गये जिनकी गोत बरड़ बटेसर आदि हो गयी।

इस प्रकार से देवजी के पास वही लोग विशेष रूप से आ रहे थे, जो प्रह्लाद पंथी जीव थे। वे कहीं भी किसी भी देश, गोत्र, जाति में छिपे थे, वहीं से भागे चले आये। जिस प्रकार से जल सदैव ही नीचे की ओर स्वभाव से ही बहता है, सम्पूर्ण जल सृष्टि समुद्र की तरफ ही दौड़ती है। समुद्र से मिलने के लिए उतावली हो रही है। ऐसे ही लोग जान कर या अनजान में ही श्री देवजी के पास दौड़ते चले आते थे।