दसवां अध्याय · कथा 68
रूपा मांझू को जल छानने का आदेश
नाथोजी उवाच- हे शिष्य! श्री देवजी ने एक समय रूपा मांझू को शिष्या बनायी थी। उसे जल छान कर पीने का आदेश दिया था, किन्तु उस बालिका ने वह महत्वपूर्ण नियम तोड़ दिया था। फिर श्री देवजी ने उसे क्षमा कर दिया था। वह किस प्रकार से हुआ यह मैं तुम्हें विस्तार से बतलाता हूँ। वील्हो उवाच- हे गुरु देव! यदि रूपा ने नियम भंग कर दिया था तो उसे दंडित करना चाहिये था, श्री देवजी ने उसे क्षमा कैसे कर दिया?
नाथोजी उवाच- जाम्भोजी तो दयालु कृपालु हैं। यदि कोई भूल से नियम तोड़ता है फिर क्षमा याचना करता है, तो उसे क्षमा कर देना, यह नियम विरुद्ध नहीं है। क्योंकि उनतीस नियमों में क्षमा कर देना भी तो एक नियम है। इस नियम का निर्वाह श्री देवजी ने किया था। तथा अन्य लोगों को भी सचेत किया था। किस प्रकार से नियमों का पालन करना है, मैं आगे तुम्हें कथा विस्तार से बताता हूँ।
एक रूपा नाम की बालिका गाँव हिमटसर में रहने वाली थी। उसका गोत्र मांझू था। इस बालिका के पूर्व जन्म के संस्कार अच्छे थे। दया, धर्म, ज्ञान, बीज रूप से विद्यमान थे। किन्तु पूर्व जन्म के संस्कार सोये हुए थे।
एक समय एक साधु गाँव हिमटसर में भिक्षा लेने के लिए आया और वह रूपा के घर जाकर बोला- भिक्षां देही “सत्य विष्णु की बाड़ी” कहते हुए भिक्षा मांगी। रूपा पात्र में भिक्षा लेकर दौड़ आयी और उस साधु को भिक्षा देने लगी तब साधु ने कहा- हे बालिके! तू भिक्षा देने आयी है। क्या तुमने गुरु धारण किया है? गुरु मंत्र लेकर सुगरी हुई या नहीं? तब रूपा ने सिर हिलाते हुए नहीं कहा- तब साधु कहने लगा- मैं तुम्हारे हाथ की भिक्षा नहीं लूँगा। मैं नुगरे की हाथ की भिक्षा नहीं लेता। यह मेरा नियम है। क्योंकि तुम्हारा तो अन्न जायेगा, मेरी भूख जायेगी, किन्तु पुण्य कुछ भी नहीं होगा। ऐसा कहते हुए साधु तो खाली हाथ ही कहीं अन्यत्र चला गया।
रूपा रोती हुई अपनी माँ नाथी के पास आयी। नाथी ने पूछा-बेटी रोती क्यों हो? तुझे किसने सताई? रूपा ने साधु द्वारा बताई हुई बात अपनी माँ को बतलाते हुए कहा- हे माँ! मैं गुरु मंत्र लूँगी, सुगरी बनकर करोड़ों जन्मों के पाप मिटाऊँ गी।
नाथी ने कहा-बेटी रो मत! कोई साधु संन्यासी पुरोहित आ जायेगा तो तेरे कान में फूँ क दिलवा दूँगी। रूपा कहने लगी-सम्भराथल पर विराजमान जाम्भोजी के पास मैं जाऊँ और उनसे गुरु मंत्र ले लूँ, यदि आपकी आज्ञा हो तो। नाथी कहने लगी-जाम्भोजी तो नियम बहुत बताते हैं। उन कठोर नियमों का पालन तेरे से होगा नहीं। रूपा बोली-मैं उन नियमों का पालन कर लूँगी। मुझे सम्भराथल जाने की आज्ञा दे दो।
दूसरे दिन प्रातः काल में रूपा ने स्नान कर के थाली में घृत, गुड़, आखा (अनाज) नारियल आदि भर कर सम्भराथल श्री देवजी के पास पहुँची और प्रार्थना करने लगी-श्री देवजी ने ओम् शब्द गुरु सुरति चेला, यह सुगरा मंत्र सुनाया तथा उनतीस नियम बतलाये। विशेष रूप से आज्ञा प्रदान करते हुए कहा-जल को छान कर के ही लेना। ब्रह्ममूहुर्त में उठना। स्नान करके संध्या करना।
रूपा ने गुरु धारण किया। पाहल ग्रहण करके प्रसाद बाँटकर घर लौट आयी। शुभ समाचार अपने माता-पिता, कुटुम्बियों को सुनाया। एक दिन रूपा अपनी सहेलियों के साथ तालाब से जल लाने के लिए गयी थी। शाम का समय था। बादल उमड़-घुमड़ करके आने लगे। उधर सूर्य अस्त होने जा रहा था। अंधकार एवं आँधी की संभावना देखकर तालाब पर पहुँची हुई उन बालाओं ने अपना घड़ा बिना छाने हुए जल से भर लिया। और एक दूसरी को उठाकर चल दी।
रूपा कहने लगी हे सखियो! आप लोग मुझे अकेली छोड़ कर क्यों जा रही हो? साथ में ही आई थी, साथ में ही जाना चाहिये। दूसरी बालाएँ कहने लगी- “तू चेली पड़पच करे, यांही पड़ज्यै रात” तू जाम्भोजी की चेली बनी है यह जल छानना- भरने का पड़पच कर रही है। हमारे तो यहीं पर ही रात्रि हो जायेगी। इसलिए हम तो जा रही हैं। रूपा ने कहा रुको! अभी मेरा घड़ा भरा नहीं है। किन्तु आधा ही हुआ है। मैं जाम्भोजी द्वारा बताये हुए नियमों के अनुसार जल छान कर के भर रही हूँ, देर तो कुछ लगेगी ही। तुमने तो बिना छाने जल भर लिया है। तुम रुक जाओ। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी। मुझे पीछे घड़ा कौन उठवायेगा?
इतना कहने पर भी उन बालाओं ने रूपा की एक भी बात नहीं मानी और वहाँ से चल पड़ी। रूपा ने कहा- यदि आप लोग मेरा नियम भंग करवाना चाहें तो करें, मैं बिना छाने ही आधा घड़ा भर लेती हूँ। घर पर जाकर छान लूँगी। रूपा ने घड़ा उठाने का लालच किया और बिना छाना हुआ जल भर लिया। उनके साथ ही घड़ा सिर पर उठा कर चल पड़ी।
रूपा के मन में ग्लानि हुई। पछतावा भी किया कि आज मैंने नियम तो तोड़ ही दिया है। घड़ा उठाने का लालच किया और नियम लालच में टूटा। अब तो भगवान् ही मालिक हैं। वे सभी पनिहारिनें सिर पर घड़ा उठाये हुए बातें करती हुई जा रही थी।
उधर आकाश में बिजलियाँ चमकने लगी। गर्जना होने लगी। काली कजरारी मेघ मालाएँ सम्पूर्ण आकाश को आच्छादित करती हुई आ गयी। सभी को वापिस अपने घर जाने की शीघ्रता थी। रूपा भी उनके साथ ही साथ तेजी से चल रही थी। गाँव के बीच में पहुँची तो रूपा के ठोकर लगी और घड़ा धरती पर गिर पड़ा। घड़ा फूट गया। जल बिखर गया। रूपा रोते हुए खाली हाथ ही घर पहुँची।
माँ ने पूछा-जल नहीं 4ायी? घड़ा फूट गया, जल बिखर गया। रूपा को रोती देखकर माँ ने कहा- बेटी! कोई बात नहीं घड़ा फूट गया तो और आ जायेगा, चुप हो जाओ। रूपा कहने लगी हे माँ! मुझे घड़ा फू टने की चिंता नहीं है, किन्तु मैंने जाम्भोजी के बताये हुए नियम को तोड़ दिया। तालाब के जल में जीव थे। मैंने बिना छाने जल भर लिया था। नियम तोड़ दिया था। वे जल के जीव, जल बिना तड़प रहे थे। मेरे सामने ही बेहाल थे। मैं कुछ भी नहीं कर सकी। अब क्या होगा? कल ही तो नियम लिया था। आज मैंने तोड़ दिया। अब मेरी क्या गति होगी?
इधर सम्भराथल पर विराजमान देवजी ने रूपा पर कृपा करी और वे जलीय जीव तड़प रहे थे उन्हें मरने नहीं दिया। उनके पंख लगा कर आकाश में उड़ा दिया। हे वील्हा! उस समय पास में बैठे हुए सभी लोगों ने देखा था कि आकाश में विचित्र प्रकृति के जीव उड़ रहे हैं। वे तो उधर से सम्भराथल पर ही आ गये थे। हम तो उनके बारे में कुछ भी निर्णय नहीं कर पाये थे कि ये जीव क्या हैं? इनका भाग्य अवश्य ही खुल गया है।
श्री देवजी से हमने पूछा था कि हे देव! ये जीव कौन हैं? तब श्री देवजी ने बतलाया था- कि मैं क्या बतलाऊँ? कल ही तो एक रूपा नाम की छोकरी नियम लेकर गयी थी कि जल छान कर के लूँगी। आज ही उसनें नियम तोड़ कर बिना छाने जल भर लिया है। उसका घड़ा फूट गया है। उसमें जीव थे। वे ही जीव ये हैं। मैंने उन्हें पंख लगा कर उड़ा दिया है।
दूसरे दिन प्रातः काल ही रूपा क्षमा प्रार्थना करने के लिए सम्भराथल पर श्री देवजी के पास आयी। जाम्भोजी ने कहा- तुमने नियम तोड़ा था। कितने जीव मरते? किन्तु मैंने बचा लिया है। तुम्हें पाप के पंक से बचाया है। पुनः ऐसी गलती नहीं करना। बार-बार क्षमा नहीं होगी। इस भूल के बदले में तुम्हें अन्य नियम भी पालन करने होंगे।
तुम्हें पराई निंदा नहीं करनी चाहिये। झूठ नहीं बोलना। चोरी नहीं करना। नील वस्त्र धारण नहीं करना। विष्णु मंत्र का जाप करना। अमावस्या का व्रत रखना इत्यादि। उसी समय ही हमारे लोगों के साथ रणधीर बाबल उपस्थित थे। उन्होंने पूछा कि हे देव! जल में जीव कितने दिन पश्चात् पड़ जाते हैं? श्री देवजी ने कहा- चार प्रहर पश्चात् जल में जीव उत्पन्न हो जाते हैं। आठ प्रहर चौबीस घंटा बाद दिखाई देने लग जाते हैं। इसलिये चार प्रहर पश्चात् जल छानकर के ही पीना चाहिये। मोटे कपड़े से छानकर जीव वापिस जल में ही डालना चाहिये। जीवों को मारना नहीं चाहिये, उन्हें वापिस जल में ही डालना चाहिये। रूपा एक पैर पर हाथ जोड़े हुए खड़ी थी। उसी समय ही रूपा के पीछे-पीछे एक जाट भी आ गया था। उसने भी जाम्भोजी की वार्ता सुनी थी और कहने लगा-
हे महाराज! आप इस छोकरी को क्यों डरा रहे हैं? इसने तो कोई भी जीव नहीं मारा। यह छोकरी जहाँ तालाब से पानी भर रही थी, वहाँ तो इसने कोई जीव नहीं मारा। दो भैंसे-झोटा वहाँ जल में पड़े थे किन्तु इसने तो नहीं मारे। वे तो मैंने जंगल में जाते हुए देखा था। यदि आप इसी प्रकार से ही झूठी बात करेंगे, तो पार कैसे उतरेंगे?
श्री जम्भेश्वरजी ने कहा-हे जाट! जल में छोटे-छोटे असंख्य जीव होते हैं। उनकी तो भी हत्या होती है। जल के इन छोटे-छोटे जीवों को मारोगे तो वे भी तुम्हें मारने के लिए रूप बदल कर आयेंगे। तुम्हें भी तो जल के जीव होना पड़ेगा। बड़े जीव छोटे जीवों को खा जाता है “जीवो जीवस्य भोजनम्” जीव जीव का भोजन होता है। इसी प्रकार से तो तुम्हें चौरासी लाख जीव योनि में भटकना होगा।
वह जाट पुनः कहने लगा- हे महाराज! आप कहते है कि जल छाने बिना मुक्ति नहीं होगी तो मानलो कोई आदमी वन में प्यासा है, उन्हें किसी तालाब-बावड़ी में जल तो मिल गया, किन्तु पास में छानने के लिए कपड़ा न हो तो क्या करे? क्या वह जल सेवन न करे? प्यासा मर जाये? श्री देवजी ने कहा- मानलो कहीं विपत्ति के समय में जल छानने का कपड़ा पास में न हो तो सिर पर पगड़ी तो होगी। उससे ही छान कर जल पीये। तब वह जाट फिर से कहने लगा- यदि मान लो पगड़ी भी न हो तो क्या करे? क्या वह बिना छाने हुए जल न पीये? श्री देवजी ने कहा- यदि पास में पगड़ी न हो तो कुर्ता धोती कुछ तो होगा ही उससे ही छान कर जल पीये।
वैसे कोई यह नियम नहीं है। किन्तु विपत्ति के समय में यह भी किया जा सकता है। नियम तो शुद्ध कपड़े से ही जल छान कर लेना चाहिये। “विपत्ति काले मर्यादा नास्ति” हे जाट यदि तुम्हें नियम का पालन नहीं करना है, तो विवाद का कोई अंत नहीं है। तुम्हें नियम का पालन करना ही नहीं है। उस जाट के बात समझ में आयी और व्यर्थ का विवाद छोड़ कर सुमार्ग का अनुयायी बना।
उस जाट के अन्य कुटुम्बी भी जो तेरह घर पैंसठ स्त्री पुरुष थे वे सभी बिश्नोई पंथ के पथिक बने। हे वील्ह! इस प्रकार से प्रह्लाद की प्रतीत से पूर्व पंथ का विस्तार यहाँ कलयुग में सम्भराथल पर हुआ। पूल्हजी ने स्वर्ग अपनी आँखों से देख कर लोगों से स्वर्ग सुख वर्णन किया था। उसी के प्रभाव से अनेकानेक लोग पंथ में सम्मिलित हुए। इस प्रकार से इस पंथ का विस्तार हुआ।