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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह69 / 94

दसवां अध्याय · कथा 69

मुल्ला सधारी के प्रति शब्दोपदेश

मुल्ला सधारी बूझियो, जाम्भाजी सु जबाब।

सर तोरे बिन महब है, झूठ सभी खुबाब।

एक समय सम्भराथल पर श्री देवजी के पास सधारी मुल्ला आया। तथा जाम्भोजी से सवाल जवाब करने लगा तथा कहने लगा- सोरे तोरे किताब ही सत्य है। जो द्वसमें कहा है, वही ठीक है, अन्य तो सभी कल्पनाएँ हैं। झूठी ही हैं। श्री देवजी ने शब्द सुनाया-

“जंके पंथ का भांजणा” यह शब्द सुन कर मुल्ला सधारी पुनः कहने लगा-

मुल्ला सधारी यूं कहै, महमंद ही फुरमान।

रोजे रखे निवाज पढे, बंदगी करै साहब तेही भांन।

मुल्ला सधारी इस प्रकार से कहने लगा- महमंद ने हमें फरमाया है। वही हम करते हैं। जैसे रोजे रखना, नमाज पढना, साहब की बंदगी, हम इसी प्रकार से करते हैं। यही बंदगी साहब को मान्य भी है। तब श्री देवजी ने दूसरा शब्द सुनाया-

शब्द-113 ओ३म् ईमा मोमण चीमा गोयम, महमंद फुरमानी।

उरका फु रका निवाज फ रीजां, खास खबर बिनाणी।

इला रास्ती ईमा मोमन, मारफ त मुल्लाणी।

हे मुल्ला! तुम्हारे मजहब के आदि पीर महंमद ने जैसा तुम कहते हो वैसा नहीं फरमाया है। उनका कहना तो यह था कि सच्चा मानव तो वही हो सकता है, जो ईमानदारी से हृदय गुफा में छिपे हुए परमेश्वर की खोज करो, वैसे तो सर्वव्यापी परमात्मा प्रकट ही हैं, कहीं नहीं गया और न ही लंबी आवाज बांग देने से आयेगा उस घट-घट में व्यापक परमात्मा को तो शांत चित्त से ही देखा जा सकता है। नमाज या अल्ला के नाम पर तुम लोग जितना हो हल्ला मचाते हो, वह जायज नहीं है। वह तुम्हारे कंठ से निकली हुई ध्वनि को नहीं सुनता। यदि आप लोगों को वहाँ तक आवाज पहुँचानी है, तो वह हृदय के द्वारा ही पहुँचाई जा सकती। इसलिए हृदय में आवाज की स्फु रणा करो।

यही अच्छी खबर महंमद ने आप लोगों को सुनाई थी। मैं तुम्हें फिर से सचेत कर रहा हूँ। हृदय में परमात्मा का स्मरण करना, यही सच्चा मार्ग है। इसी मार्ग द्वारा ही कृपालु परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है। इन काजी एवं मुल्लाओं के मारफ त से यही बात कही जानी चाहिये। क्योंकि उन महा पुरुषों का यही आदेश है।