दसवां अध्याय · कथा 70
सेखे जाट को परचा देना
हे वील्ह! अब मैं तुम्हें कुछ अद्भुत चमत्कार की बातें बतलाना चाहता हूँ। ध्यान पूर्वक सुनो! एक समय सम्भराथल श्री श्याम धणी विराजमान थे। उस समय हम लोग भी उपस्थित थे। उधर जोधपुर की तरफ से एक जाटों की जमात सम्भराथल पर आयी। उनमें सेखो जाट प्रधान थे। उस जाट समाज के प्रधान ने आकर इस प्रकार से कहा-
जाट जमाती आय कै, गुरु के लागा पांय।
क्रिया धर्म जांणौ नहीं, थूल जू बचन सुणाय।
मूरख परचै आहि सूं, जो म्हानै परचाय।
तो सतगुरु सांचो कहूँ, ईश्वर जांणू तांहि।
जाट जमात ने स्वयं ही अपनी अज्ञता प्रकट करते हुए कहा-हे सद्गुरु ! हम आपके चरणों में शीश झुकाते हैं। बस हम तो इतना ही जानते हैं। हम लोग कुछ भी धर्म- कर्म क्रिया नहीं जानते। अधिक सूक्ष्म बातें हम नहीं समझते। हमें तो आप स्थूल बातें ही बतलायें, ताकि हम समझ सकें। जिस किसी प्रकार से मूर्ख मान जाये, वही तरीका आप अपनायें। यदि आप हम जैसे लोगों को अपनी करामात से इस पथ के पथिक बना देंगे, तभी हम मानेंगे कि आप वास्तव में ईश्वरीय अवतार ही हैं ऐसा कहने पर श्री देवजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-114 ओ३म् सुरनर तणो सन्देसो आयो, सांभलियो रे जाटो।
चांदणै थकै अंधेरै क्यूं चालो, भूल गया गुरु बाटो।
नीर थकै घट थूल क्यूं राखो, सबल बिगोबो खाटो।
मागर मणियां क्यूं हाथ बिसाहो, कांय हीरा हाथ उसाटो।
सुरनर तणों संदेशो आयो, सांभलियों रे जाटो।
हे जमात के लोगो! आप सुनो! यह मैं तुम्हें जो कह रहा हूँ यह आपके लिए संदेशा है। इस संदेशे को लेकर मैं आया हूँ। तुम लोग मुझे देख रहे हो। मैं किस रूप में हूँ? मेरा रूप देव स्वरूप है तथा नर रूप भी है। यह विचित्र रूप धारण करके मैं तुम्हें संदेशा देने के लिऐ आया हूँ।
इस समय ज्ञान का प्रकाश हो चुका है। तब आप लोग अज्ञान रूप अंधेरे में क्यों चल रहे हैं? आप लोग गुरु मार्ग भूल गये हो। जल होते हुए भी घड़ा खाली क्यों रखते हो अर्थात् ज्ञान रूपी जल तुम्हें मिल रहा है, तो बुद्धि रूपी घट खाली क्यों रखते हो? ज्ञान की प्राप्ति करो। जल रूपी ज्ञान न मिले तो मजबूरी हो सकती है।
आप लोग जानते हुए भी भूल कर रहे हो। छाछ में घी नहीं है, फिर भी आप लोग उसका मंथन कर रहे हैं। रस हीन संसार छाछ की तरह ही है। उसमें आप घृत रूपी आनंद खोज रहे हो। यही तो भूल कर रहे है। मगरे के चिड़ी मणिंया, काँच की चूड़ियाँ, आदि हाथों में धारण कर रहे हो और हाथ में आया हुआ हीरा फें क रहे हो।
इस संसार की मान-प्रतिष्ठा, अहंकार, लोभ, मोहादिक की पूर्ति हेतु कल्पित देवी-देवताओं की तो पूजा करते हैं जो काच-कथीर, मागर-मणियां सदृश ही है। और मैं आपको हाथ में ज्ञान रूपी हीरा देता हूँ। इसे आप फेंक रहे हैं।
हे लोगो! सुरनर द्वारा संदेशा आपके पास आया है। अब तो आप लोग संभल जाओ। अन्यथा तो फिर पछताना ही होगा। यह मानव जीवन हीरे जैसा प्राप्त है। इसे काच कथीर समझ लिया है। इसकी महत्ता समझो।
इस प्रकार के वचनों को श्रवण किया और सेखो श्री देवजी के चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा- हे देव! आप मुझे तन-मन-धन से दास समझिये। अब मैं आपको छोड़ कर अन्य किसी की शरण में नहीं जाऊँगा किन्तु मेरे साथ मेरे कुटुम्ब के पचास घर हैं, वे भी मेरे साथ आ जायें, ऐसा आप कोई अद्भुत परचा देवो?
श्री देवजी ने कहा-तुम क्या चाहते हो? जो तुम चाहोगे वही मिलेगा। सेखो ने कहा-हे देव! घर में कहीं माया गड़ी हुई है। न जाने कितनी है, कहाँ पर है? आप बता दीजिये? जब धन मिल जायेगा तो मैं उस धन से एक तालाब खुदवाऊँगा। सम्पूर्ण धन आप जहाँ कहोगे, वहीं खर्च कर दूँगा। और हम सभी कुटुम्ब परिवार के लोग आपकी शरण में आ जायेंगे। बिश्नोई पंथ को स्वीकार करेंगे और ये जटाएँ उतरवा देंगे। मोडा होकर साधुमय जीवन यापन करेंगे।
श्री देवजी ने बतलाया कि तुम अपने गाँव लाम्बा जाओ। अपने घर की उत्तर की तरफ कौने में छान के नीचे तीन हाथ धरती खोदना। वहाँ पर तुम्हें एक भरा हुआ मटका मिलेगा। निकाल कर देख लेना। उसके अंदर क्या-क्या है? ऐसी वार्ता श्रवण कर सेखो अपने साथियों के साथ चल पड़ा। लांबे गाँव में अपने घर पर जाकर, जैसा देवजी ने बतलाया था, उसी प्रकार से धरती को खोदा तो फावड़ा जाकर मटके से टकराया। सेखे का संशय मिट गया। निकाल कर देखा उसमें पाँच मन चाँदी थी। तीस सेर स्वर्ण मुद्रा थी। वह सभी धन लेकर गाड़ी पर रखा और सद्गुरु के पास सेखो सात दिनों में आ पहुँचा।
सेखा अपने कुटुम्बियों को लेकर आया था। अपने परिवार तथा प्राप्त धन को श्री देवजी के चरणों में समर्पित किया था। श्री देवजी ने कलशा मंगवाया और उसी क्षण ही पाहल देकर लांबा गाँव के तीन सौ पचास घरों के लोगों को बिश्नोई पंथ में सम्मिलित किया। सभी नर नारी पन्द्रह सौ थे। वे सभी प्रह्लाद पंथी जीव थे।
उनका यहाँ देवजी के पास आना निश्चित था। सेखे ने तो केवल उनको जगाया था। बिश्नोई पंथ के पथिक बनने वाले सारण, सीवल, कसवां, लोल आदि गोत्र के जाट थे। वे सभी बिश्नोई बने।
सेखे ने प्राप्त धन से जाम्भोलाव तालाब खुदवाया था। धन का सदुपयोग होता है, तो वह इहलोक एवं परलोक दोनों में ही जीवन उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है। अन्यथा धन भी बंधन का कारण बन कर के इह लोक एवं पर लोक दोनों में ही दुःखदायी हो जाता है। सेखे ने इस प्रकार से धन का सदुपयोग किया और जीयां ने जुक्ति मूवां ने मुक्ति की प्राप्ति की।