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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह3 / 94

पहला अध्याय · कथा 3

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने त्रेतायुग का प्रतिनिधित्व किया था। इनके पिता त्रिशंकु नाम के राजा थे। इन्हीं त्रिशंकु ने अपनी परम्परा का धर्म छोड़कर विश्वामित्र को गुरु धारण कर लिया था। उसे सशरीर स्वर्ग जाने का लोभ था। इसलिए अपनी परम्परा के गुरु वशिष्ठ को त्याग दिया था। विश्वामित्र को गुरु बना लिया था। विश्वामित्र ने तपस्या के तेज से त्रिशंकु को ऊपर उठाया। उधर स्वर्गवासी देवताओं ने देखा कि मृत्युलोक का दुर्गन्ध वाला प्राणी आ रहा है। देवताओं ने वापिस नीचे धकेला। विश्वामित्र ने ऊपर उठाया। त्रिशंकु न ही ऊपर जा सका और न ही नीचे आ सका। बीच में ही लटक गया।

जो अपने निजधर्म को छोड़कर दूसरों के धर्म को अपनाता है, उसकी यही गति होती है। उसी त्रिशंकु का पुत्र हरिश्चन्द्र त्रेतायुग में अपने पिता के राज्य का अधिकारी बना। हरिश्चन्द्र ने धर्मनीति से प्रजा का पालन किया।

एक समय देव, ऋषि, दानव, मानवों की विशेष धर्मसभा हुई, जिसमें विचार रखा गया कि मानवों के लिए विशेष आचार संहिता-नियम निर्धारित किये गये हैं। उन नियमों में से एक विशेष नियम है कि सत्य बोलो। इस नियम का पालन होना अतिकठिन है या ऐसे कहें कि असम्भव है। मानव होकर इस नियम का पालन कर सके, यह कहना ही असत्य कहना है। यदि इस नियम का पालन नहीं हो सके तो, आचार संहिता से यह नियम निकाल दिया जाए। ऐसी कुछ वार्ताएँ विश्वामित्र ने बड़े ही गर्व से कही। उसी सभा में वशिष्ठजी भी बैठे हुए थे। वशिष्ठ ने खड़े होकर विश्वामित्र की बात का खण्डन करते हुए कहा- हे राजर्षि! यह बात आप न करे। आपको ऐसी बात शोभा नहीं देती। मेरा शिष्य सत्यवादी हरिश्चन्द्र है, वह इस समय अयोध्या का राजा है। वह सत्य ही बोलता है। सत्य का ही पूर्णरूपेण आचरण करता है। हरिश्चन्द्र जैसे पुण्यात्मा इस धरती पर ही निवास करते हैं, जिनकी वजह से यह धरती टिकी हुई है।

विश्वामित्र कहने लगे-यह कैसे हो सकता है कि वशिष्ठ का शिष्य हरिश्चन्द्र पूर्णतया सत्य का पालन करता है। जब तक परीक्षा में पास न हो जाये, तब तक मैं कैसे स्वीकार कर सकता हूँ। जब तक सोने को तपाकर न देखें तब तक खरे-खोटे का पता नहीं चलता। इस बात को विश्वामित्र ने भरी सभा में कहा-मैं अभी जाऊंगा और हरिश्चन्द्र के सत्य की परीक्षा करूँगा। जैसे तैसे ही सत्य से डिगाऊँ गा, सोने को तपाऊँ गा। अनेकों कष्ट दूँगा। कष्टों में भी सत्य को न त्यागे, तभी मैं स्वीकार करूँगा। इससे मैं सत्यवादी की महिमा को बढ़ाऊँ गा। परम धर्म सत्य को हरिश्चन्द्र के द्वारा उजागर करूँगा, ऐसा विचार करते हुए विश्वामित्र सभा से प्रस्थान कर गये तथा वहाँ की सभा भी विसर्जित हो गयी।

राजा हरिश्चन्द्र अपने राज्य में रहते हुए नियम का पालन कर रहे थे। उसी समय ही एक सेवक समाचार लेकर आया। राजा ने आने का कारण पूछा। सेवक ने बतलाया कि आपके बगीचे में एक जंगली जानवर प्रवेश कर गया है। हमने उसे भगाने की बड़ी कोशिश की है। वह तो बड़ा ही भंयकर सूअर मालूम पड़ता है, निकलता ही नहीं है। सम्पूर्ण बाग का विध्वंश कर दिया है। आप शूरवीर शासक प्रजापालक हैं। उससे हमारी तथा आपके बगीचे की रक्षा कीजिए। हम आपकी शरण में हैं।

राजा हरिश्चन्द्र ने शस्त्र तैयार किया और घोड़े पर सवार होकर उस सूअर को अपनी सीमा से बाहर भगाने हेतु प्रस्थान किया। सुवर ने राजा को आते हुए देखकर वन में भागना प्रारम्भ किया। आगे सूअर-पीछे हरिश्चन्द्र।

वह सुअर घने वन में राजा को ले गया और स्वयं अन्तर्ध्यान हो गया। राजा ने देखा कि न तो वहाँ सुअर है और न ही अपने राज्य की सीमा, मार्ग तथा दिशा का ही ज्ञान है। घने वन में राजा अकेला हो गया। राज्य का कुछ पता नहीं है। किधर से आये और कहाँ जाये? राजा स्वयं बेहाल हो गया। भूख-प्यास भी सताने लगी। उसी समय वही सुअर जो स्वयं विश्वामित्र थे, एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में सामने प्रकट हुए। वृद्धावस्था के कारण हाथ-पैर काँप रहे थे।

हरिश्चन्द्र ने देखा कि यह दुर्बल काया वाला वृद्ध ब्राह्मण अति दीन-दुःखी है। साथ में अन्य कोई सहायक नहीं है, किन्तु एक कन्या पीछे चली आ रही है। यह बेचारी कन्या इसका क्या सहयोग करेगी?

हरिश्चन्द्र ने पूछा-हे ब्राह्मण! आप इस निर्जन वन में कहाँ से आ रहे हैं? आपके पीछे-पीछे चलने वाली यह कन्या क्या आपकी बेटी है? जो इस प्रकार वृद्धावस्था में आपको प्राप्त हुई है। क्या इसी वजह से ही आप दुःखी हो रहे हो? क्या इसके माता-भाई, बन्धु आदि नहीं है? आप ही केवल मात्र सहारे हैं।

वृद्ध ब्राह्मण ने लम्बी-लम्बी श्वासें खींचते हुए, अपने भाग्य को कोसते हुए राजा की बात को स्वीकृति प्रदान की और कहा कि- हे महाराज! मैं आप से अपने दुर्भाग्य के बारे में क्या कहूँ? मैं कंगाल हूँ, मेरे पास धन नहीं है। इस संसार में जो कंगाल की दुर्गति होती है, उसे आप नहीं जानते। आप तो राजपुत्र हो, आप क्या जानें धनहीन व्यक्ति की दुर्दशा को। इस कन्या का विवाह लग्न तय कर दिया है। विवाह का समय आ चुका है। बिना धन के मैं कन्या दान कैसे करूँ? यदि यह समय व्यतीत हो गया तो मेरी बेटी आजन्म कुंवारी ही रह जायेगी। हम तो इसी प्रयोजन हेतु आपके पास ही आ रहे थे। अच्छा हुआ कि आप यहीं मार्ग में मिल गये। अब आप जैसा चाहें वैसा करें, आप स्वयं ही समर्थ हैं।

राजा हरिश्चन्द्र ने कहा-हे याचक! अब जल्दी करो। मुझे भूख-प्यास लगी है। वापिस नगरी में भी जाना है। पहले मैं कन्यादान करूँगा, फिर अन्न जल ग्रहण करूँगा। इस विपत्ति काल में जो कुछ भी तुम माँगोगे, वही मैं तुम्हें दूँगा, ना नहीं कहूँगा। उसी समय ही विश्वामित्र तुरंत अपनी विद्या द्वारा वहीं पर दूल्हा बन गये तथा स्वयं ही पुरोहित बनकर, लकड़ियाँ चुनकर अग्निदेव को प्रज्ज्वलित किया और हवन करने के लिए बैठ गये। वेद मंत्र पढ़कर अग्नि की परिक्रमादिक सभी कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न करवा दिए।

उस पुरोहित ने कहा-अब कन्यादान की शुभ वेला है, इस समय हे राजन्! आप हमारे यजमान हैं। कन्या दान करें तथा पुण्य का भागी बनें। हरिश्चन्द्र ने स्वाभाविक रूप से कहा- यह कन्या एवं वर दोनों जो कुछ भी माँगेगे वही मैं अवश्य ही दूँगा। आप निःसंकोच होकर माँगिये। मैं अवश्य ही आपकी भावना पूरी करूँगा। मैं स्वयं न जाने क्या दूँ? आप लोग पता नहीं क्या चाहते हैं? आवश्यकता के अनुसार दिया हुआ दान ही सात्विक होता है।

उसी समय दूल्हा-दूल्हन ने राजा से छल किया और सम्पूर्ण राज्य ही माँग लिया। उन्होंने कहा-जहाँ तक आपके राज्य की सीमा है, वहाँ तक राज हमें दे दीजिए और अपने वचनों को सत्य कीजिये। हरिश्चन्द्र ने हाँ कहते हुए देना स्वीकार किया और कहा-मेरे राज्य में चलो। वहीं पर मैं भी सभी कुछ दूँगा। इस समय मैं भूख-प्यास से बेहाल हूँ। मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। वहाँ पर चलने से ही तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा। ऐसा कहते हुए उन सभी को अपने साथ अयोध्यानगरी में ले गये। वहाँ जाकर राजा ने अन्न जल ग्रहण किया। राजा सचेत हुए। किन्तु अब क्या हो सकता था? वह तो स्वप्न जैसी बात हो गयी थी।

उन पुरोहित, वृद्ध बा्रह्मण तथा वर वधू ने राजा से कहा- अब राजन् देर नहीं कीजिये। अपने वचनों को पूरा कीजिये। आप हमें अतिशीघ्र खजाने की चाबी, राजपाट सम्पूर्ण धरती, धन-धान्य है, वह सभी कुछ सौंप दीजिये अथवा अपने वचन असत्य कर दीजिये। हम ज्यादा आपकी प्रतीक्षा नहीं करेंगे। राजा ने सहर्ष राजखजाने की चाबी उनके हाथ सौंप दी और सम्पूर्ण राज्य का दान कर दिया। दान करके उनके ऋण से उऋण हो गये।

उसी समय पुरोहित ने कहा-हे राजन्! आप ही तो हमारे यजमान कन्या दानदाता हैं। इतना बड़ा दान आपके सिवाय कौन कर सकता है। आप महादानी सत्यवादी हैं। मैंने पुरोहित का कार्य किया है, किन्तु मुझे दक्षिणा नहीं मिली है। आप मुझे दक्षिणा तो अवश्य ही दोगे। क्या बिना दक्षिणा के ही पुरोहित से कार्य करवा लिया? आपसे ऐसी आशा नहीं थी। अब तक तो ज्यादा देर नहीं हुई है। क्षमा किया जा सकता है। अब आप मुझे श्रद्धानुसार दक्षिणा दीजिये।

हरिश्चन्द्र ने कहा-हे पुरोहित्! अब तो आप इस राज खजाने से ही दक्षिणा ले लें। मेरे पास तो अब देने को कुछ भी नहीं है। पुरोहित ने कहा, हे राजन्! आप जैसे धर्मज्ञ राजा को ऐसी बात नहीं करनी चाहिऐ। जब आपका राज ही नहीं रहा, तो आपको उसमें से देने का अधिकार ही क्या है? आपने स्वयं ही वर वधू को सम्पूर्ण राज दान कर दिया है। तो फिर दुबारा दान कैसे किया जा सकता है? अब तो आपको अपने पास से ही दान देना होगा। आप दोगे तो हम लेंगे, अन्यथा आप झूठे हो जाओगे। आज से आपको सत्यवादी कहलवाने का कोई हक नहीं होगा। हम तो अपना गुजारा कहीं अन्यत्र कर लेंगे, किन्तु आपके लिए यह बहुत ही अपमान जनक होगा।

हे पुरोहित! मुझे यह बतलाओ कि आपको दक्षिणा के रूप में मुझे क्या देना होगा? मैं आपकी दक्षिणा पूरी करने में समर्थ हूँ या नहीं। पुरोहित ने बतलाया कि सवा सेर सोना कम से कम आपको मुझे देना ही चाहिये। इतने सोने की मुझे आवश्यकता भी है। घबराएँ नहीं राजन्। आपने इतना बड़ा दान किया है, तो दक्षिणा भी तो उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। बड़े दान की बड़ी ही दक्षिणा।

हरिश्चन्द्र ने कहा-आप हमारे खजाने से दक्षिणा ले लीजिये। पुरोहित ने टोकते हुए कहा-हरिश्चन्द्र! यह तुम फिर भूल कर रहे हो। अब तुम्हारा खजाना भी कहाँ रहा। यह तो तुम पहले ही दान कर चुके हो। यदि तुम्हारे पास अपनी निजी कमाई से कुछ राज-खजाने में अलग रखा है, तो उसमें से दे दो। मैं अवश्य ही स्वीकार करूँगा। अन्यथा मैं तो जाता हूँ और आप सत्यवादी नियम से भ्रष्ट हो रहे हैं। यदि नियम में बंधकर रहना है, तो सत्य का पालन करें। आप झूठ बोलने का पाप मत उठायें। आप जैसे सत्यवादी से ऐसी आशा नहीं की जा सकती।

हरिश्चन्द्र ने कहा-हे पुरोहित! अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। अपना निजी तो यह शरीर ही है। आप इसे ही बेच डालिये, किन्तु झूठ बोलने के कलंक से बचाइये। मैं सत्य नहीं छोडूँगा। असत्य का कलंक नहीं लगाऊँ गा। मेरे रग-रग में सत्य-धर्म प्रवेश कर गया है। अब मैं इसे कैसे बाहर निकालूँ? प्राणों का बलिदान देकर भी सत्य धर्म की रक्षा करूँगा।

सत्य-धर्म के लिए अब मुझे प्रिय पुत्र रोहिताश्व तथा धर्मपत्नी तारादेवी को भी बेचना होगा। अन्यथा इतने सोने की दक्षिणा पूरी कैसे कर पाऊँ गा? मैं इस धर्म संकट में फंस गया हूँ। अपना स्वयं का ही बलिदान मैं दे सकता हूँ। दूसरों का जीवन अधिकार छीनने का मुझे किसी प्रकार का हक नहीं है। उनकी इच्छा के बिना मैं उन्हें कैसे बेच सकता हूँ। पहले उनसे पूछ तो लूँ वे क्या कहते हैं? अपनी धर्मपत्नी तारादेवी एवं पुत्र रोहिताश्व से हरिश्चन्द्र ने कहा-मेरा राज्य दान में चला गया है। अब मैं राजा नहीं रहा। इसलिए हे देवी! तुम रानी कैसे हो सकती हो और तुम्हारा प्रिय पुत्र राजकुमार नहीं रहा। इस समय हम सभी सामान्य प्रजा हैं। अब आप लोग मेरे से सुख की उपेक्षा न करें। मैं तुम्हें किसी प्रकार का सुख नहीं दे सका। अब तो दुःख की घड़ी आने वाली है। आपने सुख में तो मेरा साथ दिया किन्तु अब आने वाले दुःख में भी साथ दोगे या नहीं?

तारादेवी ने कहा-हे पतिदेव! आप चिन्ता न करें। मैं और मेरा बेटा रोहिताश्व आपका साथ नहीं छोड़ेंगे। सुख में तो सभी साथी होते हैं। किन्तु दुःख की घड़ी में भी साथ निभाएँ, वही सच्चे अपने होते हैं। पत्नी तो सच्चा मित्र है। दुःख की घड़ी में अपने पति के लिए ओषधि का काम करती है। सांत्वना देती है।

हे पतिदेव! आपने सत्य पालन का बीड़ा उठाया है, तो उस सत्य-नियम से हमें वंचित क्यों रखना चाहते हैं? इहलोक-परलोक दोनों ही हम भी आपका साथ देकर सुधार सकते हैं। हमें भी सत्यपंथ के पथिक बनाइये। यह अपना लाडला बेटा अपने से अलग नहीं हो सकता। इसकी आप तनिक भी चिंता न करें।

पुरोहित ने अतिशीघ्र आकर कहा-हरिश्चन्द्र क्या सोच रहें हैं? आप जैसे सत्यवादी के लिए इस प्रकार से आनाकानी नहीं करनी चाहिये। तुरंत फैसला लीजिए। हाँ या ना में उत्तर दीजिए। मुझे जल्दी जाना है। किसी दूसरे यजमान को देखना है। उदरपूर्ति के लिए कुछ तो करना ही होगा। कब तक मैं आपकी प्रतीक्षा करता रहूँगा?

हे पुरोहित! अब तुम्हीं बताओ कि मैं इस धन की व्यवस्था कहाँ से करूँ? यह अयोध्या नगर, खजाना, राज-पाट अब तो मेरे पास कुछ भी तो नहीं है। हे राजन्! अब भी आपके पास तीनों प्राणियों का शरीर तो है, इसे ही बेच डालिये और मेरी दक्षिणा दीजिये। यहाँ पर तो बेचना नहीं हो सकेगा किन्तु काशी, जो तीनों लोकों से न्यारी है, भगवान् शिव की नगरी है। उसमें जाकर अपने को बेच डालिये और मेरी इच्छा पूरी कीजिये।

पुरोहित की बात को स्वीकार करके तीनों प्राणी अयोध्या नगरी को छोड़कर चल पड़े। मार्ग में अनेकों कष्टों को सहन करते हुए तथा विश्वामित्र द्वारा दिए गए प्रलोभनों को अस्वीकार करते हुए आगे बढ़े। कई दिनों तक पैदल चलते हुए मार्ग में अनेकों कष्ट उठाते हुए सतपंथ के पथिक कुछ दिनों पश्चात् काशी पहुँच गये। दक्षिणा के लिए पुरोहित स्वयं विश्वामित्र भी साथ ही साथ चल रहे हैं। ये सत्यवादी अवश्य ही मेरी कामनापूर्ति करेंगे ही। फिर भी देखता हूँ, कहीं न कहीं तो अवश्य ही जवाब देंगे, ना कहेंगे, अधिक कष्टों में हो सकता है, सत्य को छोड़ दें।

काशी नगरी अभी अपरिचित है। यहाँ कौन जानता है कि यह अयोध्या का राजा है? यह अपने आप को तथा अपने परिवार को बेचने के लिए गली-गली में भटक रहा है। यह अपने आपको बेचने के लिए आया हुआ व्यक्ति क्या पता कितने रुपये माँग रहा है? यह हमारे काम का है या नहीं। कई दिनों का भूखा प्यासा होने से दुबला दिखता है। यह दुर्बल व्यक्ति क्या कार्य कर पायेगा? लोग भाव, मोलतोल करते हुए अनेकों शंकाएँ उठाते हैं।

मुफ्त में सेवा तो सभी चाहते हैं, किन्तु नक द स्वर्णमुद्रा देने को कोई तैयार नहीं। अच्छा सेवक सभी चाहते हैं, यदि मिल जाये तो कार्य सुचारू रूप से चले। कार्यक्षेत्र का विस्तार करे। किन्तु सच्चा व्यक्ति मिलना अतिकठिन है। हरिश्चन्द्र के लिए एक ग्राहक अवश्य ही मिला, भाव-तोल किया। सवा सेर सोना मूल्य अधिक होने से लेना अस्वीकार कर दिया। वह ग्राहक आधा ही देने को तैयार था।

हरिश्चन्द्र ने पूछा कि आप कौन हैं, मुझसे क्या कार्य करवायेंगे? उस ग्राहक ने कहा-मैं श्मशान भूमि का मालिक। जाति का डूम हूँ। मुर्दों का कर वसूल करके अपना जीवन निर्वाह करता हूँ। उसी आमदनी से मैं तुझे खरीद रहा हूँ और शमशान भूमि पर रखवाली करना ही कार्य विशेष होगा। गंगा किनारे आने वाले मृतकों का जो भी संस्कार करेगा, उसे बिना कर लिए अन्तिम संस्कार नहीं करने देना। गंगा किनारे मेरा घर है। वहीं से मैं तुम्हें अन्न वस्त्रादि दूँगा, श्मशान भूमि ही तुम्हारा निवास स्थान होगा। यदि यह कार्य में तुम राजी हो, तो ले लो सोने की मुद्रा और चलो मेरे साथ।

हरिश्चन्द्र ने देखा कि अन्य खरीददार ग्राहक तो यहाँ नहीं है। यह पुरोहित ज्यादा समय देना नहीं चाहता। मैं अभी बिक जाऊँ, किन्तु अब तक तो आधी दक्षिणा ही हुई है। आधी दक्षिणा की व्यवस्था अभी और करनी होगी। हरिश्चन्द्र ने कहा- हे डूमराज! थोड़ा रुकिये। मैं अभी अपने को आपके हवाले करता है। किन्तु पहले आधे धन की व्यवस्था मुझे और भी करनी है। अपनी प्राण प्रिया एवं पुत्र द्वारा जो कुछ मिलेगा वह पुरोहित को देकर उसके ऋण से उऋण हो जाऊँ।

यह तो विचित्र आदमी है। अपने को बेचकर ऋण चुका रहा है। वह भी दक्षिणा का। लोग तो कर्ज लेकर भी नट जाते हैं। वापिस नहीं लौटाते। धन्य है यह व्यक्ति! हमें इसे खरीदने के लिए मुद्रा देनी होगी, इसे खरीदकर कार्य करवाना होगा। सच्चा आदमी अच्छा होता है। कार्य करने में कोताही नहीं करता।

वह डूम कहने लगा-अब मैंने तुम्हें धन दे दिया। तू मेरा खरीदा हुआ दास है। जल्दी चल। कोई अन्य आ जायेगा, तो व्यर्थ ही भाव बढ़ा देगा। अभी चलता हूँ, ऐसा कहते हुए हरिश्चन्द्र ने आवाज लगायी- एक विपत्ति ग्रस्त व्यक्ति, जो अपने को तो बेच चुका है। अपनी पत्नी एवं बेटे को बेचना चाहता है। कोई लेने वाला हो, तो लेलो। नगद रकम चुकाओ और ले जाओ।

उसी समय ही एक पण्डित भीड़ को चीरता हुआ आया और कहने लगा-मेरी पत्नी से गृहकार्य होता नहीं है। उसे एक नौकरानी चाहिये। क्यों न थोड़ा सा धन देकर खरीद ले जाऊँ। अपनी पत्नी को प्रसन्न कर दूँ। रोज-रोज का झगड़ा समाप्त कर दूँ। हे परदेशी! अपनी भार्या को कितनी मुद्रा मे बेचेगा? अपनी भार्या को आधा सेर से कुछ ज्यादा में दे दूँगा। किन्तु एक शर्त होगी-यह मेरी भार्या पतिव्रता है, नियम के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करेगी। साथ में यह बच्चा भी रहेगा, यदि आपको स्वीकार है तो रकम दे दीजिए और इन्हें ले जाइये।

पण्डित ने कहा हे धर्मज्ञ! मेरे घर में मैं बूढ़ा ब्राह्मण एवं ब्राह्मणी के सिवाय और कोई नहीं है। हम स्वयं धर्म के ज्ञाता हैं-हमारे घर के कार्य करने होंगे। जैसे भोजन बनाना, झाड़ू लगाना, पूजा-पाठ के लिए फूल चुनना आदि, गृहकार्य करते हुए पूजा पाठ में सहयोग प्रदान करना। बस इस कार्य हेतु हमें एक भृत्य की आवश्यकता है। मैं अभी आपकी माँग की पूर्ति करता हूँ और इसे ले जाता हूँ। हरिश्चन्द्र ने सवा सेर सोने में अपने को तथा अपनी धर्मपत्नी को बेचकर पुरोहित को सादर दक्षिणा प्रदान की तथा वहाँ से विदाई ली।

दोनों अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त हो गये। पुरोहित ने अपनी दक्षिणा ग्रहण करके वहाँ से विदाई ली। हरिश्चन्द्र श्मशान भूमि पर पहरा देते। काशी गंगा किनारे श्मशान भूमि में जहाँ पर मुर्दे आते हैं, रात-दिन का कुछ पता नहीं, कब कौन मरेगा? मरने वाला तो रात-दिन का हिसाब रखता ही नहीं है। मृतक को अपने घर कितनी देर रख पायेंगे। सभी को वहाँ पहुँचना होता है। केवल एक मृत्यु ही निश्चित है। हरिश्चन्द्र के लिए परीक्षा की घड़ी है। वह किस प्रकार से सत्य में स्थिर रह सकेगा। कभी न कभी तो थक जायेगा। सेवक धर्म को त्याग ही देगा। ऐसे समय की प्रतीक्षा विश्वामित्र कर रहे हैं। विश्वामित्र को कहीं भी कुछ भी सुराग नहीं मिल पा रहा है, जिससे धर्म से विमुख किया जा सके।

रानी तारा ब्राह्मण के घर सेवा करती है। रसोई बनाना, सफाई करना, बाग से पूजा के लिए फूल चुन करके लाना। जल लाना आदि कार्य कर रही है। हर प्रकार से अपने कार्य धर्म में अडिग है। अपने मालिक के प्रत्येक कार्य में प्रवीण है। तत्परता से सेवा में लगी रहती है। क्योंकि स्वेच्छा से यह धर्म स्वीकार किया है। सेवा करने में ही सुख मिलता है, तो भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है।

विश्वामित्र से यह नहीं देखा गया। आगे अनेकों परीक्षाएँ लेने का विचार किया। एक दिन तारा जल लेने गंगाजी पहुँची थी, उसी समय हरिश्चन्द्र भी जल लेने आ गये थे। दोनों ही अधिक कष्ट सहन करने से कृशकाय हो गये थे। एक दूसरे को पहचानना भी कठिन था। हरिश्चन्द्र ने प्रार्थना की कि हे देवी! आप मुझे घड़ा उठवा दें, क्योंकि मैं दुबला हो गया हूँ। मुझमें घड़ा उठाने की भी ताकत नहीं है।

तारादेवी कहने लगी-हे पतिदेव! आप तो डूम के दास हैं, अब मेरे स्पृश्य नहीं हो। मैं एक ब्राह्मण के घर दासी हूँ। मैं घड़ा नहीं उठवा सकूँगी। मेरे मालिक ने मुझे आज्ञा दी है कि किसी से भी हमारा घड़ा का स्पर्श न होने पाये, यदि तुमने ऐसा किया तो तुम्हें कठोर दण्ड मिलेगा। इसलिए मैं घड़ा उठवाने में असमर्थ हूँ। मैं आप को एक युक्ति अवश्य ही बतला देती हूँ। आप गहरे पानी में जाइये, जिससे आपका जल से भरा हुआ घड़ा हल्का हो जायेगा और आप स्वयं ही उठा लीजिये। आप मुझे धर्म से न हटाइये। धर्मो रक्षति रक्षितः। हम धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा।

एक दिन कुँवर रोहिताश्व बगीचे में फूल तोड़ने के लिए गया था। पंडितजी ने पूजा के लिए फूल मंगवाये थे। वहाँ पर ज्यों ही रोहिताश्व ने फूल तोड़ने के लिए आगे हाथ बढ़ाया, वहीं पर स्वयं विश्वामित्र ही सर्प बन कर बैठे थे। उस सर्प ने रोहिताश्व को डस लिया। सर्प के डसते ही बालक के शरीर में विष फैल गया और अन्य बालकों के देखते ही देखते शरीर नीला पड़ गया तथा रोहिताश्व के प्राण पखेरू उड़ गये।

पंडितजी पूजा के लिए फूल लेकर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे, किन्तु आज तारा का बेटा लौटकर नहीं आया। दूसरे बालकों ने जाकर पण्डित तथा तारा को समाचार सुनाया। तुम्हारे पुत्र को तो सर्प ने डस लिया है। मृत शरीर वहीं पड़ा हुआ है। अब कभी भी फूल लेकर नहीं आयेगा। व्यर्थ में प्रतीक्षा न करें।

ऐसी अशुभ बात सुनकर तारा रोती, पीटती, चिल्लाती, विलाप करती हुई अपने पुत्र के मृत शरीर के पास पहुँची। उसे देखते ही व्याकुल होकर रोने लगी.........हे मेरे लाल! तुम कहाँ चले गये? तुम ही तो मात्र एक सहारे थे। तुम्हारे पिता ने तो हमें त्याग दिया था। तुम भी मुझे निःसहाय छोड़कर चले गये। यह बताओ पुत्र! तुमने हमें क्यों छोड़ा? तुम्हारें पिता तो धर्मभीरू थे.........या धर्म के बन्धन में बंधे हुए थे। तुम कौनसे बन्धन में बंधे हुए थे? अब तक तो तुम्हारी उमर ही कितनी सी है। अब तो तुम्हारे खेलने का समय है ना कि संसार से प्रस्थान करने का। मेरे लाल! तू सोया हुआ मालूम पड़ता है? जग जाओ। उठ जाओ, मेरे बेटे! तुम्हारी दुखिया माँ तुझे पुकार रही है। प्रतिदिन की भाँति तुम्हारे साथी-मित्र खेलने के लिए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

हे बेटा! मैंने कौन से पाप किये हैं, जिससे मुझे यह दुर्दिन देखने को मिला। माँ-बाप से पूर्व ही बेटा संसार से विदाई ले ले। यह तो बड़े ही दुःख की बात है। यह असंभव संभव कैसे हुआ? क्या मैं स्वप्न तो नहीं देख रही हूँ। यह तो कदापि नहीं हो सकता। थोड़ा सोचकर.........अभी तो उठ ही जायेगा, मुझे माँ कहकर पुकारेगा। मैं अभी अपने प्यारे पुत्र को गले से लगा लूँगी। कुछ देर प्रतीक्षा के पश्चात् भी वह नहीं उठा, तब फिर रोने लगी.......................। तू भी कैसी पगली है। क्या मरा हुआ भी कभी जिन्दा हो सकता है? उठ। अब रोने का कुछ भी प्रयोजन नहीं है। जीव तो शरीर को छोड़कर चला गया, पीछे यह देह ही यहाँ पड़ी है। मेरा इसमें क्या था? जो शरीर मेरा था, वह तो अब भी मौजूद है। केवल जीव चला गया है। क्योंकि वह जीव मेरा तेरा कुछ भी नहीं था। जो था अब भी है, फिर भी रहेगा, मर भी नहीं सकता। सदा अजर- अमर अविनाशी के लिए रोना कहाँ तक उचित्त है?

चलूँ.........अपना कर्त्तव्य निभाऊँ। इस मेरे शरीर से उत्पन्न हुआ यह शरीर पड़ा हुआ है। इसकी दुर्गति हो रही है। इसे ले जाकर गंगा में प्रवाहित कर दूँ। मेरे पुत्र के शरीर की दुर्गति हो रही है। जिसको कंधा देने वाले इस अपरिचित जगह पर कोई नहीं हैं। कौन दुःखियारी दासी के बेटे को श्मशान तक ले जाने के लिए सहयोग करेगा? ऐसी विपत्ति की घड़ी में भगवान् ही एकमात्र सहारा हैं। स्वयं ही अपने ऊपर विश्वास करूँ। ईश्वर ही मात्र अपना है। ऐसा कहते हुए मृत शरीर को कंधे पर उठाया और श्मशान भूमि पर चली।

कुल-देवता भगवान् सूर्य भी अस्ताचल हो गये हैं अन्यथा अपने कुल की दुर्गति देखकर दो आँसू तो अवश्य ही बहाते। विश्वामित्र ने देखा-यह रानी चली है बेटे का अन्तिम संस्कार करने के लिए। देखता हूँ कि किस प्रकार से अन्तिम संस्कार कर पाती है? तारा अपने पुत्र के शरीर को कंधे पर उठाये हुए एक एक कदम आगे बढ़ी। संध्या वेला में वहाँ पर पहुँची थी। हरिश्चन्द्र पहरा दे रहे थे।

हरिश्चन्द्र आवाज लगाते हैं कि कोई भी व्यक्ति बिना कर दिए मुर्दे का संस्कार न करें। नदी में न बहाएँ। किनारे पर त्याग न करें और न ही जलायें। यहाँ का मालिक कालू स्याह है। मेरे मालिक की सख्त आज्ञा है, इसका पालन करें, अन्यथा दण्ड दिया जायेगा।

तारादेवी ने सुना कि यहाँ पर भी मृत शरीर का संस्कार करने के लिए कर चुकाना होगा। चुपके से छुपकर यदि मैं कोई अनहोनी बात करती हूँ, तो यह तो चोरी कही जाएगी। यह कार्य मेरे पतिदेव तथा हमारे कुल परिवार के लिए ही होगा। हमें अपने धर्म में अडिग रहना चाहिए। विपत्तिकाल में ही तो धर्म की परीक्षा होती है। यह आवाज देने वाला यहाँ आकर माँगे, तो मैं क्या दूँगी? मेरे पास देने को तो कुछ नहीं है।

यहाँ पर पहरेदार तो मेरे पतिदेव ही होंगे। वे क्या मेरे से पैसे माँगेगे? जैसा यह मेरा पुत्र है, वैसा इनका भी तो है। अपने ही पुत्र का स्वयं ही कर माँगे, यह कैसे हो सकता है? इस प्रकार से श्मशान भूमि में बैठी हुई तारा विचार कर रही थी।

हरिश्चन्द्र, जिनका दुबला शरीर, हाथ में डण्डा लिये हुए मात्र एक धोती पहनी हुई, खबरदार कहते हुए वहाँ आ गये। हरिश्चन्द्र ने देखा-एक महिला बैठी हुई अपने भाग्य को रो रही है। पास में लाश पड़ी हुई है। कौन होगी यह अभागिन? कौन है इसके पास? जरा पास में जाकर पता करूँ? बेचारी इस दुखिया की सहायता करूँ?

हरिश्चन्द्र ने पास में जाकर पूछा-हे देवी! तुम कौन हो? जो इस प्रकार भयंकर दुःख में पड़कर यहाँ इस समय भयंकर श्मशान भूमि में आयी हो। यहाँ तो रात्रि में भूत-प्रेत नृत्य करते हैं। जंगली जानवर रात्रि को आते हैं, बिखरी हुई हिंयाँ चबाते हैं। यहाँ का दृश्य रात्रि में भयंकर हो जाता है। अंधकार का सन्नाटा छा जाता है। यहाँ तो कोई तब ही आता है, जब इनका कोई प्रियजन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

मैं तो यहाँ रात-दिन पहरा देता हूँ। मेरे मालिक का खरीदा हुआ दास हूँ। मेरा अपना कोई स्वतंत्र जीवन नहीं है। मेरे मालिक की आज्ञानुसार मुझे जीना होता है। अब तुम अपना परिचय दो, कौन हो? यहाँ पर क्यों आयी हो? अवश्य ही तुम्हारे पास मृतक शरीर है।

यहाँ तो रोज न जाने कितने शरीर आते हैं और भस्मी भूत होते हैं। क्या इस शरीर का कोई सगा सम्बन्धी-भाई-बन्धु जन नहीं है। जिससे तुम्हें लेकर यहाँ तक आना पड़ा। देवी! अतिशीघ्र ही मुझे कर चुकाओ और बालक के शरीर को गंगा में प्रवाहित करके वापिस लौट जाओ। रात्रि घनी होती जा रही है।

तारा ने पहचान लिया कि यह मेरे पति हैं। प्रकट में कहने लगी-मेरे सर्वस्व! आप अनजान व्यक्ति जैसी बातें क्यों करते हैं? मैं तो तुम्हारी प्राणवल्लभा रानी तारामती हूँ। यह मृत पड़ा हुआ शरीर और कोई नहीं है, आपका प्यारा पुत्र रोहिताश्व है। इसको संस्कार करने के लिए गंगा किनारे लेकर आयी हूँ। इसे तो काला डस गया। देखते हो, रंग नीला हो गया है। अब आपका इकलौता बेटा संसार में नहीं है। आप मुझसे कर माँग रहे हो। मेरे पास देने को कुछ भी नहीं है, जो मैं आपके स्वामी का कर-धन दे सकूँ।

हे देव! जैसा मेरा पुत्र है, वैसा आपका भी तो यह पुत्र है। फिर भी आप मेरे से कर माँग रहे हैं। मेरे तो इसके कफन के लिए भी पैसे नहीं हैं। यह शरीर बिना कफन के ही है। हे देवी! मैंने माना कि तुम मेरी अर्द्धागिनी हो, और यह मेरा प्रिय पुत्र है। किन्तु इस समय मैं धर्म से बंधा हुआ हूँ। न तो मैं तेरा पति हूँ और न ही रोहिताश्व का पिता। मैं तो केवल दास मात्र हूँ। दास की स्वतंत्र विचार धारणा नहीं होती। जो मालिक का आदेश होगा, वही पालनीय होता है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता।

हे देवी! आप मुझे अपने धर्म से मत डिगाओ। मेरे मालिक का वचन है कि-किसी से बिना कर लिए छोड़ना मत। मुझे इस वचन का पालन करना है। चाहे मेरे प्राण भी चले जायें, तो परवाह नहीं है। धर्मो रक्षति रक्षितः हम धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म हमारी रक्षा करेगा। इसलिए अतिशीघ्र ही कर चुकाओ और अपने पुत्र का संस्कार कर दो। मेरे पास कुछ देने को नहीं है। आप बिना कुछ लिए संस्कार करने नहीं देंगे। अब क्या होगा?

हे नाथ! आप ही हमारे धर्म की रक्षा कर सकेंगे। अब हमने तो सम्पूर्ण जीवन का भार आपके कंधे पर डाल दिया है। हे जगद् के स्वामी विष्णु! हमने अपनी ताकत को पूरी लगा दी, किन्तु विपत्ति में दिनों दिन फंसते ही गये हैं। अब तो आप ही हमारी नैया खेवणहार हो। आपके अतिरिक्त और तो कोई भी हमें सहायक दिखाई नहीं देता। सभी अपने-पराये बंधन में फंसे हुए हैं। स्वयं बंधा हुआ व्यक्ति, दूसरे के बंधन को कैसे काट सकता है? हे देव! आप ही हमारे सर्वश्रेष्ठ जीवन के आधार हैं। कृपा कीजिये? डूबती नैया को पार लंघा दीजिये।

विश्वामित्र ने देखा कि यह तारादेवी तो भगवान् विष्णु को याद कर रही है। कहीं ऐसा न हो कि भगवान् स्वयं आ जायें और इनका उद्धार कर दे तो मेरी योजना धरी की धरी रह जायेगी। अतिशीघ्र यहाँ से चलूँ और परीक्षा की अन्तिम विधि पूरी कर लूँ। ऐसा विचार करते हुए अतिशीघ्र ही काशी के राजा के पास पहुँचे और कहा-हे राजन्! तुम्हारे राज में बड़ा ही अन्याय हो रहा है। एक डायन श्मशान भूमि में बैठी हुई एक बच्चे की लाश को खा रही है, कोई भी इस अन्याय को रोकने वाला नहीं है। कितने बच्चों की माँ रोती बिलखती हैं, किन्तु यहाँ तो कोई सुनने वाला ही नहीं है। आप स्वयं चलिये, जाकर देखिये, मैं अभी देखकर आया हूँ।

राजा ने आज्ञा दी कि श्मशान भूमि का मालिक, जो वहाँ पर कर लेता है, उसे जाकर आज्ञा प्रदान करो कि उस डायन का काम तमाम कर दे। वह डायन जीवित नहीं रहनी चाहिए। यह राजाज्ञा उस डूम से जाकर कह दो। राजसेवकों ने डूमराज से राजाज्ञा कही। डूम ने तुरंत अपने दास हरिश्चन्द्र को आज्ञा दी कि....... यह मेरी आज्ञा है कि जो डायन शमशान भूमि में बैठी हुई है, उसे मार दे। अपने स्वामी की आज्ञा हरिश्चन्द्र ने सुनी और तुरंत खड्ग हाथ में लेकर तारा को मारने के लिए तैयार हो गये।

तारा ने कहा- जल्दी कीजिये! स्वामी जल्दी कीजिये! मुझ दुखियारी को मारकर अपना धर्म निभायें। मरने का मुझे कुछ भी दुःख नहीं होगा। अपना राज, पति, पुत्र सभी खोकर अब संसार में जीना नहीं चाहती। हे मेरे स्वामी! मैंने तो अब सभी संसार से नाता तोड़कर, एक ही श्रीपति लक्ष्मी भगवान् विष्णु से नाता जोड़ लिया है। अब मुझे कुछ भी भय नहीं है। मैं अपने धर्म पर अडिग रही हूँ। आप भी धर्म को मत छोड़िये।

मुझे मारने से यदि धर्म बचता है, तो आप मेरे से भी धर्म की कीमत ज्यादा समझिये। यदि आपके पास धर्म मौजूद रहेगा, तो सत की बाँधी लक्ष्मी फिर मिल जायेगी। धर्म चला गया, तो सभी कुछ चला जायेगा। मुझे खुशी है कि मैंने धर्मरक्षार्थ प्राणों का बलिदान दे दिया। वे ही नर धन्य, जो धर्म की रक्षा करते हैं। जीव तो पुनः मिल जायेगा किन्तु धर्मपालन का अवसर बार-बार नहीं मिलेगा।

आप अतिशीघ्रता कीजिये। अपने धर्म का पालन कीजिये। आप कहीं मोहित न हो जाइये। मुझे इस बात का डर है कि कहीं मोहवश होकर धर्म का त्याग ही न कर दें। इस लिए मैं शीघ्रता के लिए कह रही हूँ।

जिस समय हरिश्चन्द्र ने खड्ग उठाया कि अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करूँ। विचार किया-मैं धन्य हूँ, जो मेरे धर्म की रक्षा करने में सहायक मेरी धर्मपत्नी आज मुझे स्वयं ही धर्म रक्षा का उपदेश दे रही है। यदि मेरी पत्नी, बेटा मुझे सहयोग न देते तो मैं कभी का फेल हो गया होता। धन्य हो देवी तारा! तुमने इतने कष्ट सहन किये। मैं तुम्हें कुछ भी सुख न दे सका। मैंने अपनी पत्नी-बेटे को क्या दिया? इस देवी ने महान् से भी महान् दुःख झेला है। किन्तु कभी भी किसी प्रकार की शिकायत नहीं की। सभी कुछ अपने ही कर्मों का फल माना है। आज इस विषम परिस्थिति में मुझे डर था कि कहीं धर्म न छोड़ जाये। किन्तु अब मैं इस देवी की उदारता, धर्मपरायणता से प्रसन्न हो गया हूँ।

अब तो भगवान् ही इसकी रक्षा करें। मेरे वश की बात नहीं है। यह भयंकर खड्ग अब ही इसका जीवन छीन लेगा। एक की जगह दोनों मां-बेटों को मरा हुआ देखूँगा। कौन ऐसा बाप होगा, जो इस प्रकार का दृश्य देखकर जीवित रहेगा? भले ही मुझे जीवित न रहना पड़े, किन्तु धर्म मुझे प्राणों से भी प्यारा है। पूर्णता से धर्म पालन करने का समय अब आ चुका है। परमात्मा मेरी रक्षा करें।

ऐसा विचार करते हुए हरिश्चन्द्र ने अपनी भार्या को मारने के लिए खड्ग उठाया। वार करने की तैयारी की। ज्यों ही वार करने लगे, त्यों ही जगत के पालन-पोषण कर्ता भगवान् विष्णु अकस्मात् प्रकट हुए और हरिश्चन्द्र का हाथ पकड़ लिया।

भगवान् ने कहा-हे वत्स! ऐसा ना करो? यह तुम्हारी परीक्षा थी, पूर्ण हो गयी है। अब तुम दास नहीं रहे तथा तारा दासी नहीं रही। यदि तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है तो देखो........ तुम्हारे मृतपुत्र को मैं अभी जिन्दा कर देता हूँ। ऐसा कहते हुए भगवान् ने कमण्डल से जल लेकर रोहिताश्व पर पानी छिड़का और कहा- बेटा! खड़े हो जाओ। अब तुम्हारी निद्रा समाप्त हो चुकी है। आप तीनों ही प्राणी वापिस अपनी अयोध्या नगरी में जाओ। प्रजा आपकी प्रतीक्षा कर रही है। यह तो सभी कुछ विश्वामित्र का नाटक था। आप परीक्षा में उर्त्तीण हुए हो।

उसी समय ही वहाँ पर विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषिगण तथा देवता-मानवादि सभी उपस्थित हुए। सभी ने भगवान् के वचनों का ही समर्थन किया। विश्वामित्र ने माफी माँगी तथा कहा-हे राजन! आप अब वापिस लौटिये? आप जैसे सत्यवादी राजा की आवश्यकता है। मैंने आपको सत्य से डिगाने के लिए अनेकों उपाय किये, किन्तु आप सत्य पर दृढ़ रहे। मैं आज से घोषणा करता हूँ कि इस मृत्युलोक में नर-नारी भी पूर्णतया सत्य का पालन करने में समर्थ हैं। सत्य नियम शाश्वत है। इसे हटाया नहीं जा सकता। पालन किया जा सकता है। यह नियम ही सभी नियमों का मूल आधार है। ऐसे आधार को त्यागा नहीं जा सकता।

भगवान् विष्णु ने कहा-हे हरिश्चन्द्र! मैं तुम्हारे पर बहुत ही प्रसन्न हूँ क्योंकि तुमने अनेकों कष्टों को सहन करते हुए भी मेरी बनाई हुए मर्यादा को भंग नहीं किया। ऐसा भक्त ही मुझे अतिप्रिय है। ऐसे भक्तों को मैं सर्वस्व देने के लिए तैयार हूँ। हे हरिश्चन्द्र! तुम कुछ मेरे से अवश्य ही माँगो? बिना कुछ दिए मुझे यहाँ आना अच्छा नहीं लगता।

हरिश्चन्द्र ने कहा- हे प्रभु! मुझे अपने धर्म के लिए कुछ भी नहीं चाहिये। आप मुझे ऐसी शक्ति प्रदान कीजिये, जिससे मैं आपकी भक्ति करते हुए धर्म मर्यादा पर अडिग रह सकूँ और यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे यहाँ आने के पश्चात् मेरी प्रजा बहुत दुःखी हो गयी है, उन्हें प्रसन्न कीजिये।

हे प्रभु! पुनः आपसे प्रार्थना है कि इस प्रकार का भयंकर दुःख किसी अन्य को मत दीजिये। वह कष्ट सहन नहीं कर पायेगा, टूट जायेगा। यदि दुःख की अधिकता है, तो सम्पूर्ण दुःख आप मुझे दे दीजिये। किन्तु मेरी प्रजा को नहीं। मैं आप से मिल सकूँ। जन्म मरण का बन्धन काट सकूँ। किन्तु अकेला नहीं। मेरी सात करोड़ प्रजा का भी उद्धार होवे, ऐसा वरदान दीजिए।

भगवान् बोले, हे राजन्! तुम्हारे में भक्तिभाव तो पूर्णरूपेण पहले से ही विद्यमान है। हे वत्स! इस भक्ति की वजह से ही तो तुमने सत्य का पालन करते हुए कष्ट उठाये हैं, किन्तु दुःखों की किंचित भी परवाह नहीं की। यह भाव आगे भी बना रहेगा। तुम्हारी कुल परम्परा में आने वाले सभी भक्त शूरवीर पैदा होंगे, जो यश कमायेंगे और प्रजा का पालन करेंगे।

हे भक्त! तुम स्वयं परोपकारी हो। दूसरे के दुःख को देकर पिघल जाते हो। यही तुम्हारी महत्ता है और बनी रहेगी। यदि तुम्हें किसी प्रकार का दुःख आयेगा तो भी तुम ज्ञानी हो, उस दुःख को दुःख ही नहीं समझते। ऐसा ज्ञान तुम्हारा सदा स्थिर रहेगा। इस समय तो तुम वापिस राज्य में जाओ। प्रजा का पालन करो। दुबारा तुम्हारा जन्म-मरण नहीं होगा। भगवान् के बैकुण्ठ लोक में मेरे पास ही निवास करोगे। अथवा भगवान् के पार्षद ही बन जाओगे या भगवान् की स्वरूपता ही ग्रहण कर लोगे।

इसकी तुम चिंता मत करो। मैं स्वयं ही तुम्हारा उद्धार करूँगा। तुम्हारी प्रजागण धीरे-धीरे सम्पूर्ण त्रेतायुग में उद्धार को प्राप्त हो जायेगी। अब तुम इस समय धर्म की स्थापना हेतु कलश की स्थापना करो। जिस-जिस को तुम मर्यादा का जल (पाहल) पिलाओगे, वे तुम्हारे अनुयायी-शिष्य हो जायेंगे। हो सकता है उन्हें-दो चार जन्म अभी और भी लेने पड़ सकते हैं। जैसी जिसकी योग्यता है वैसा ही फल मिलेगा, किन्तु मैं तुम्हें यह भरोसा दिलाता हूँ कि तुम आगे पहुँचो। तुम्हारे पीछे ये तुम्हारे अनुयायी शीघ्र ही चले आयेंगे।

राजा सदा ही अग्रगण्य होता है। यथा राजा तथा प्रजा। तुमने जिसको भी अपना बना लिया, जिसके भी सिर पर हाथ रख दिया वह निश्चित ही तुम्हारा हो जायेगा। ऐसा कहते हुए भगवान् विष्णु अन्तर्ध्यान हो गए। वहाँ का सम्पूर्ण दृश्य विलुप्त हो गया। भगवान् की आज्ञा शिरोधार्य मानकर हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी-पुत्र सहित वापिस अयोध्या पँहुचे। शरीर पुनः हष्ट-पुष्ट हो गया। पीछे की सभी बातें विस्मृत हो गयी। मात्र एक खेल था, जो पूरा हुआ। प्रजा ने अपने राजा को पाकर स्वागत किया। हरिश्चन्द्र ने ही प्रह्लाद द्वारा स्थापित कलश की त्रेतायुग में पुनः स्थापना की।

गुरु जाम्भोजी ने बतलाया कि हरिश्चन्द्र के अनुयायी, जो सात करोड़ थे, उनका उद्धार हुआ। इस प्रकार से सत त्रेता दोनों युगों में पाँच-सात मिलाकर 12 करोड़ का उद्धार हुआ। ये अद्भुत बातें, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं, गुरु जाम्भोजी ने बतलायी हैं।