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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह92 / 94

बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 92

सन् 1857 के सैनिक विद्रोह में गो रक्षा

सन् अठारह सौ सत्तावन में अंग्रेज शासन के विरोध में भारतीय जन मानस में बहुत बड़ा उफान आया था। देश की आजादी के लिये देश भक्तों ने बिगुल बजाया था। उसमें कामयाबी तो पूर्णतया नहीं मिल सकी थी, फिर भी आजादी के बीज तो बोये जा चुके थे। वही पौधा कालांतर में फलीभूत होता हुआ सुमधुर फलदायक बना था।

उस समय जाम्भोजी के चेले वर्तमान के हरियाणा में बसते थे। जाम्भोजी ने भ्रमण काल में पूर्व ही घोषणा कर दी थी कि इधर उत्तर की तरफ किसी समय में आप बिश्नोई लोग बसेंगे। जब अठारह सौ सत्तावन की गदर मची थी तब बिश्नोई लोग हरियाणा में हिसार एवं हांसी के इलाके में बसते थे। वहाँ पर उस क्षेत्र में ही मुसलमान भी बहुतायत से रहते थे। कभी कभी हिन्दू मुसलमानों में आपसी तकरार हो जाया करती थी। किन्तु उस गदर के अवसर पर तो राजा का शासन डोल चुका था। कुछ मनचले लोग अपनी मनमानी करने लग गये थे।

मुसलमान हिन्दू धर्म को आहत करने के लिए गो हत्या जैसा घोर अपराध करने लग गये थे। उन्हें रोकने की किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। हिन्दू धर्म के रक्षक तो बिश्नोई ही हो सकते थे। असली हिन्दू धर्म के प्रहरी तो बिश्नोई ही थे। क्योंकि बिश्नोई स्वयं गोपालक स्वयं शक्तिमान जाम्भोजी की कृपा से ओत प्रोत थे। बिश्नोई गाँवो में बसते थे। वे सभी एक जुट होकर एक दूसरों के लिये भलाई करने के लिए गोपालन तथा खेती करते हुए अपने आप में समर्थ थे। अपनी रक्षा के लिये किसी के आगे जाकर रक्षा के लिये भीख माँगने की आवश्यकता नहीं थी।

आदमपुर, सदलपुर, चीदड़ा, बड़ोपल, धांगड़ आदि बिश्नोइयों के गाँव थे। उस समय चींदड़ा के तालाब पर मुसलमानों की खेड़ पलटन पड़ी थी। एक थके हुए, चिल्लाते हुए, क्रंदन करते हुए, एक सांड को मार रहे थे। और पाँच ओर भी बंधे हुए थे। यह अन्याय सहन करने योग्य कदापि नहीं था। सामो ने यह घटना आदमपुर जाकर बिश्नोइयों की जमात को सुनाई। सामों की बात सुन कर बिश्नोईयों के रोंगटे खड़े हो गये। उसी समय जो जहाँ पर था, वहीं से रवाना होकर धर्म की रक्षार्थ सांड (वृषभ) को छुड़ाने के लिए तैयार हो गये।

बिश्नोइयों की सेना जब चिंदड़ के तालाब पर पहुँची तो आगे अनेको मुसलमान एकत्रित थे। वे अपना भोजन गो हत्या द्वारा प्राप्त कर रहे थे। बिश्नोइयों ने दूर से ही उनको ललकारा और सावधान होने की चेतावनी दी। यदि आप लोगों को जीवित रहना है, जगत में जीना है, तो इन साँडों को छोड़ दीजिये। अन्यथा जैसा आप लोग इन निरीह जानवरों को मार रहे हैं, वही दशा तुम्हारी होगी।

वे मदमस्त लोग कहाँ बिश्नोइयों की चेतावनी सुनने वाले थे। दोनों और भयंकर युद्ध हुआ। आखिर में उन विधर्मियों, गो हत्यारे लोगों को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा था। धर्मो रक्षति रक्षितः धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी भी रक्षा करेगा।

वहाँ से भागकर वे मुस्लिम अपने जाति भाइयों के पास पहुँचे और अपनी दुर्दशा का वर्णन किया। उन लोगों ने जगह जगह पर कागज लिख कर भेजा और अपने जमाती लोगों को एकत्रित किया। उन विधर्मियों एवं जाम्भाणों के साथ इसी बात को लेकर सदलपुर, आदमपुर, शीशवाल आदि स्थानों पर भयंकर युद्ध हुआ। आखिर विजय जाम्भाणों की हुई थी।

आखिर में मुसलमानों को ही मैदान छोड़ कर पलायमान करना पड़ा था। इस प्रकार से वह आया हुआ विपत्ति काल धीरे धीरे शांत हुआ था। संभवतः इस घटना से प्रभावित होकर अंग्रेजो ने आदेश पत्र (परवाने) लिख कर दिये थे, जिनमें पूर्णतया बिश्नोइयों की सीमा में वन्य जीव रक्षा क्षेत्र तथा हरे वृक्ष रक्षा का केन्द्र घोषित किया था।

उन्हें मालूम था कि यह ऐसी शूरवीर कौम है, जो या तो अपने धर्म की रक्षा करने के लिए स्वयं मर जायेंगे या किसी अन्य को ही मार डालेंगे। इसीलिए ही प्रमाण पत्र लिख कर दिया तथा प्रचारित किया था। शिकारियों को बिश्नोइयों के गाँवों से दूर रहने का सख्त आदेश दिया था। वह पत्र निम्नलिखित प्रकार से है- पत्र इस प्रकार से अंग्रेजी में था उसका अनुवाद हिन्दी में इस प्रकार से है-

जनाब डिप्टी कमिश्नर साहिब बहादुर सी एम किंग एस्कवायर जिला फि रोजपुर बनाम तहसीलदार साहिब तहसील फाजिल्का। जो चिट्ठी चीफ सैक्रेटरी गवर्मेंट पंजाब मवर्खे 13 फ रवरी सन् 1896 के हवाले से है।

सरिश्ते हाजा से वजरिये तहरीर नं. 185 मवर्खे 8 जुलाई 1896 ई. आपके नाम दरबारे शिकायत रहने वाले 16 गाँव बिश्नोइयों के निश्वत मुलाजीमान फौज है कि वह अकसर दंगा फ साद को आमादा हो जाते हैं तथा मजहबी ख्यालात को सदमा पहुँचाते हैं और नजर हिकारत से देखते हैं। जिससे गाँव वालों को मौका शिकायत का होता है। इसीलिए मैं फिर से उसकी तरफ आपकी तवज्जह दिलाता हूँ कि कमिश्नर साहिब बहादुर ने आम हुकमजारी कर दिया है कि बिश्नोइयों के गाँव में चारिन्द पारिन्द जानवरों को कोई शिकार न करे। इसी प्रकार का यह दूसरा आदेश पत्र भी उपलब्ध हुआ है। इस युद्ध में विश्नोईयों के केवल तीन व्यक्ति शहीद हुए थे तथा उन विधर्मियों के तीन सौ व्यक्ति मारे गये थे।