बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 93
अज्ञात शहीदों का स्मरण
12 अप्रेल सन 1947 में गुड़ा मालानी गाँव के चिमनाराम पुत्र गोरखाराम ने हरिणों की रक्षा करते हुए शिकारियों द्वारा गोली के शिकार हो गये। शिकारी की गोली हरिण के नहीं लगने दी। वह गोली हंसते हुए अपनी छाती पर झेल ली। धन्य है वह वीर बिश्नोई जिन्होंने गुरु महाराज के नियमों का पालन किया और दूसरों के लिये प्रेरणा के कोत बने।
इसी प्रकार से उसी गाँव के प्रतापराम ने 12 अप्रेल 1947 में ही उसके साथ ही अपना बलिदान दिया। तथा श्री अर्जुनराम गाँव भक्तासनी ने भी 3 फ रवरी 1948 में उसी प्रकार तन मन धन सभी कुछ समर्पण किया।
श्री चूनाराम पुत्र श्री हरदान रोहिचा कलां ने भी अपने पूर्वजों का अनुसरण करते हुए सांसारिक मोह माया को तिनके की भांति तोड़ कर सदा के लिए जन्म मरण के दुख से छूटने का मार्ग अपनाया और शहीद हो गये।
भींयाराम पुत्र श्री मालाराम गाँव बनाड़ ने 17 मई 1963 को अपना सर्वस्व हरिणों के लिए व वन्य जीवों के लिये समर्पण किया। हम जियेंगे तो सभी हमारे साथी वन्यजीवों तथा मानवों, वृक्षों को साथ लेकर ही, अन्यथा दूसरों को मार कर या मरते हुए देख कर एक क्षण भी जीवित रहना अच्छा नहीं है। ऐसी भावना से स्वेच्छा से अपना प्राण शिकारियों के सामने प्रस्तुत कर दिया। उन दुष्टों ने हरिण के बदले भींयाराम को लक्ष्य बनाया। इन्हीं सभी महानुभावों को मरणोपरांत राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण जन सहयोग सम्मेलन जोधपुर ने 15 जनवरी 1987 में सम्मानित किया था।
इसी परंपरा की कड़ी में लोहावट गाँव के बिड़दाराम खीचड़ के सुपुत्र बीरबल ने भी अपने प्राणों की आहुति वन्यजीव रक्षार्थ दी थी। 17 दिसम्बर 1977 में प्रातः कालीन वेला घर में आये हुए मेहमानों की सेवा से शुद्ध हुई आत्मा ने, परमात्मा ने मिलन किया था। बीरबल को किसी ने जबरदस्ती नहीं भेजा था। वह तो हरिण को छटपटाते हुए देख कर सहसा दौड़ पड़े थे और जीव रक्षार्थ अपना बलिदान दे दिया था। गुरु महाराज के वचन हृदय में धारण कर रखे थे, “साहिल्या हुआ मरण भय