बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 94
वृक्ष ही जीवन है
भागा” इस जमाने की सब से बड़ी समस्या मानव के सामने पर्यावरण प्रदूषण की है। जीवन जीने के लिए हमें श्वास चाहिये। एक क्षण भी हम बिना श्वास के नहीं जी सकते। वह श्वास हमें बाह्य वातावरण वायु से प्राप्त होता है। वायु को देवता कहा गया है। वायु हमें प्राण देता ही रहता है। उसके बदले में हम से कुछ मांगता नहीं है।
इस वायु को हमने क्या दिया? और तो कुछ भी नहीं दे सके, दुर्गन्धी तो अवश्य ही दी है। शुद्धता को तो हमने पिया है, उसके बदले में दुर्गन्ध को हमने छोड़ा है। अच्छी वस्तु को हम लोग शरीर की ऊर्जा के रूप में ग्रहण करते है। और उसे विकारमय कर के बाहर निकाल देते हैं। वही वायु में फेल जाती है। इस प्राकृतिक नियम की भी तो सीमा होती है। किन्तु इस समय सीमा से बाहर हो चुका है। इसीलिए सर्वत्र त्राहि त्राहि मची हुई है। अनेकों प्रकार की बीमारियों एवं दुष्काल आदि चारों तरफ से मानव को त्रस्त कर रहे हैं।
वृक्ष हमारे लिए इसलिए उपयोगी हैं कि बाह्य वातावरण में फैले हुए धुएँ आदि की गैस, दुर्गन्धमय वायु को ये वृक्ष स्वयं पान कर लेते हैं। उनकी तो ये खुराक हैं और इसके बदले में हमें शुद्ध वायु आँक्सीजन प्रदान करते हैं। वह हमारे लिये अत्यन्त उपयोगी है। उस शुद्ध वायु से ही हमें श्वास प्राप्त होता है। जो वायु वृक्ष छोड़ते हैं। वह तो मानव आदि जीव धारी पी जाते हैं। वह इनकी जीवन शक्ति है। और जो वायु मानव आदि छोड़ते हैं, वह वृक्ष पी जाते हैं। उनके लिये वह जीवनी शक्ति है। इस प्रकार से परस्पर सहयोग से यह जीवन चलता है। एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है।
वृक्षों का विनाश हो जायेगा तो सर्वनाश हो जायेगा। हमें मिटना नहीं है, जीना है। स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ा नहीं मारना है। यदि ऐसा किया गया तो हम स्वयं अपराधी होंगे। एक बार यह मानव शरीर प्राप्ति का अवसर मिला है। किन्तु ध्यान रहे, अपराधी को पुनः वही शरीर तो नहीं मिलेगा। उसे अपराध का दण्ड तो अवश्य ही मिलेगा। वहाँ लख चौरासी जीया योनी में भटकना ही हो सकता है। इसलिए इस समय सचेत होने की परमावश्यकता है। समाप्तो˘यं ग्रन्थः