चौथा अध्याय · कथा 46
जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना
रावल जैतसी जैसलमेर उजवणो कियो। च्यार वरा गुरुमुखी दीन्हा। जाम्भोजी श्रीवायक कहे-
शब्द-88 ओ३म् गोरख लो गोपाल लो, लाल गवाल लो,
लाल लीलंग देवो, नश खंड पृथिवी प्रगटियो,
कोई बिरला जाणत म्हारी आद मूल का भेवों।
जाम्भोजी के समय में अनेक राजा हुए उनमें मुख्य रूप से जैसलमेर के राजा जैतसी का नाम अग्रगण्य है। जैसलमेर की राज परम्परा में जेतसी उस समय राजगद्दी पर विराजमान थे। राजा पूर्णतया धार्मिक विचारों से ओतप्रोत था। दया,दान,जरणा,युक्ति,शौच,शील,स्नान आदि नियमों का दृढ़ता से पालन करता था। पापकर्म करने से डरता था। धर्म की तरफ राजा का रुझान स्वाभाविक ही था।
रावल जेतसी ने जेतसमंद बांध का निर्माण करवाया था। जिसमें जल ठहरे और वन तथा वन्य जीव जन्तु जल पी सके। सभी का भला होवे। जैतसमंद का कार्य पूर्ण होने पर उसकी प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने जाम्भोजी को बुलाने की योजना बनायी थी। हमारे यज्ञ में श्री देवजी पधारें तो हमारा कार्य पूर्ण हो जाये। मैं उनके चरणों की रज ले सकूँ। अपने को कृतार्थ करूँ। हमारे यज्ञ में चार चाँद लग जायें।
वे मुझे जैसा आदेश देगे वैसा मैं करूँगा। यज्ञ में होने वाले अदृष्टों से मैं बच जाऊँगा। ऐसा शुभ विचार जैतसी ने किया और अपना एक विश्वासपात्र सेवक जाम्भोजी के पास भेजा।
सतगुरु सम्भराथल पर विराजमान थे। सतगुरु के पास जेतसी का भेजा हुआ दूत आया। बड़े ही आशा एवं विश्वास के साथ देवजी का दर्शन अश्रुपूर्ण नेत्रों से किया। चरणों में वंदना करके श्रीदेवजी के पास बैठा। दूत ने हाथ जोड़कर जैसा जेतसी ने निवेदन किया था, वैसा कहने लगा-
हे देव! रावलजी ने कहा है कि मैं आपका सेवक हूँ। आप जेतसमंद की प्रतिष्ठा में जैसलमेर पधारो। आपके बारे में श्रद्धा भरे वचनों से कहा है कि धन्य है कलयुग के लोग जो आपका दर्शन कर रहे हैं। हे देव! आपने सतयुग का धर्म कलयुग में प्रकट किया है। कुमार्ग पर चलते हुए लोगों को आपने सुमार्ग पर चलाया है। अज्ञानी जनों को ज्ञानी बनाया है। आपको जिसने भी पहचान लिया है उसके हृदय का ताला खुल गया है। आपने जिस पर भी कृपा की है, उन्हें रिद्धि सिद्धि सभी कुछ प्रदान की है। अब कृपा करके हमारे देश जैसलमेर भी पधारो। हम आपकी आशा में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अब हमारी आशापूर्ण होने का समय आ गया है। यदि आप यज्ञ में आ जाओ तो हमारी सभी कामना पूर्ण हो जायेगी।
देवजी ने कहा- हे दूत! आप वापिस जाओ, और रावल से पूछो कि मैं आऊँ गा, तो वहाँ पर मेरी ही बात चलेगी। किसी अन्य की नीति, वार्ता किसी भी प्रकार का जोर नहीं चलेगा। तुम्हारे वहाँ पर ठाकुर, राजा, प्रधान, योगी, संन्यासी, तपस्वी, तीर्थवासी, पण्डित, ज्योतिषी इत्यादि वहाँ पर एकत्रित होंगे। वे सभी अपनी अपनी बात चलायेंगे। यदि उनका कहना मानना है, तो मेरे का मत बुलाओ। मुझे बुलाना है तो मैं जैसा कहूँ, वैसा ही करना होगा। जैसलमेर से जो दूत आया था उसको तो देवजी ने अपने पास ही बिठा लिया और अपना दूसरा आदमी जैसलमेर के लिए रवाना किया। जो देवजी ने राजा को संदेश भेजा था वही ठीक प्रकार से कहने वाला विश्वासपात्र व्यक्ति था। वह जाम्भोजी द्वारा भेजा गया दूत जैसलमेर के राजदरबार में जैतसी को समाचार यथावत सुनाया।
रावल ने कहा-हम राजा लोग पढ़े लिखे पण्डितों की सेवा अवश्य ही करते हैं, उनके कथनानुसार चलते हैं, किन्तु अब जाम्भोजी को बुला रहे हैं, तो जैसा वो आदेश देंगे वैसा ही हम करेंगे। रावलजी ने विनती करते हुए कहा-हमारे तो गुरु चरणों की ही आर्त-इच्छा है। देवजी आयेंगे तो सर्वप्रथम पूजा उनकी ही करूँगा। मैं स्वयं जैसलमेर की सीमा तक सामने आऊँ गा और उनकी अगवानी करके स्वागत करके अपनी नगर में प्रवेश करवाऊँ गा। हमारे सद्गुरु देव पधारेंगे, तो हमारे सभी पाप नष्ट हो जायेंगे।
रावल की वार्ता उस सेवक ने सुनी, श्रद्धा का भाव देखा और समझा कि रावल वास्तव में प्रेमी आदमी है। इसके यहाँ तो जाम्भोजी का आना आवश्यक है। रावल से सीख माँगी और वापिस सम्भराथल की तरफ रवाना हुआ। कुछ ही दिनों में देवजी के पास वापिस सम्भराथल पर आ गया और रावल की भक्तिप्रेम की वार्ता विस्तार से बतलाई और कहा-
हे देव! आपको उनकी इच्छा अवश्य ही पूर्ण करनी चाहिए, अन्यथा राजा आपसे, ज्ञान,ध्यान,श्रद्धा से दूर हट जायेगा। उसका दिल टूट जायेगा। अवश्य ही आपकी आज्ञा के अनुसार ही कार्य होंगे। उन्होंने आपकी आज्ञा पूर्ण करने की प्रतिज्ञा की है। रावल ने विशेष रूप से कहा है कि हे देव! आप ही हमारी इच्छा को पूर्ण करने वाले हैं। दुःखों को मिटाने वाले हैं। तुम्हारे आने से ही हमारी लज्जा रहेगी।
जाम्भोजी ने रावल के दूत को वापिस भेजा और कहा कि मैं जेतसी के समंद प्रतिष्ठा में अपनी मण्डली सहित अवश्य ही आऊँ गा। किन्तु तुम रावल से कहना है कि मेरे स्वागत हेतु कोई बहुत बड़ी सेना या ठाकुरों के साथ लाने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जिस-जिस गाँव से सेना आएगी तो वहाँ के लोगों को कष्ट होगा। राजा स्वागत हेतु आयेगा, तो आम जनता को परेशानी उठानी पड़ेगी। अधिक घोड़ा ऊँट आयेगे तो, वे बेचारे मूक प्राणी बेवजह दुःख पायेंगे।
मैं जीवों को सताना नहीं चाहता। घोड़ों के खुरताल तथा ऊँटों के पैरो के नीचे दब कर न जाने कितने जीव मारे जायेंगे। मैं तो राजा के पाप-दोष हरण करने हेतु जा रहा हूँ। कहीं ऐसा न हो कि पाप-दोष अधिक न हो जाये। हमारा मिलन पूर्णतया निरभिमान होकर होगा। किसी प्रकार कर दिखावा या कष्ट साध्य नहीं होगा।
जम्भेश्वरजी ने जैसलमेर चलने की तैयारी की। उसी समय साथ में रहने वाले संत भक्त भी कहने लगे हम भी चलेंगे, हम भी चलेंगे। सभी चलने को तैयार थे। ऐसे अवसर को कोई हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। उनमें सभी भगवान् के भक्त ही थे। किसको पीछे छोड़े, किसको साथ में लें? इसलिये श्री देवजी ने सभी को ही चलने की आज्ञा प्रदान कर दी।
भक्तों के सिर पर टोपी, हाथ में जप माला, उज्ज्वल बागा (कुर्ता) पहने हुए, अन्तः-बाह्य शुद्ध पवित्र थे। सवारी हेतु मजबूत स्वस्थ तेज चलने वाले ऊँट साथ में लिये हुये। ऐसी मण्डली श्री देवजी के साथ चली। जैसे संत पवित्रात्मा थे वैसे ही अपनी सवारियों को भी सजाया था। देवजी ने अपनी मण्डली के साथ शोभायमान होकर जैसलमेर के लिये प्रस्थान किया।
इस प्रकार से जैसलमेर जाते समय देवजी के साथ तीन सौ पच्चीस ऊँट थे। सबसे आगे देवजी का ऊँट चल रहा था। चलते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो आकाश में विमान ही उड़ते जा रहे हों। मानो स्वयं विष्णु ही देवताओ के साथ विमानों पर बैठकर स्वर्ग लोक से आ रहे हों। मार्ग में जांगलू, खींदासर, जाश्वभोलाव आदि स्थानों को पवित्र करते हुए, वहाँ के लोगों को प्रसन्न करते हुए जैसलमेर की सीमा में वासणपी गाँव पहुंँचे।
रावल जी के चाकर ने जाकर खबर सुनाई कि जाम्भोजी वासणपी आ चुके है। उनके साथ बहुत से सेवक भी आये हैं। किन्तु उन्होंने अपने आने की बात किसी को भी नहीं बताई है। इस वार्ता को सुनकर राजा सचेत हुआ।
कहने लगा-देवजी वासपणी आ गये हैं। रावल ने शीघ्र ही सामने चलने की तैयारी की। रावल जी ने कहा-चलो देवजी के सामने स्वागत हेतु चलेगे। हालांकि देशजी ने मना किया है, किन्तु हमारा कर्तव्य बनता है। रावल ने जाम्भोजी के लिये भेंट हेतु चावल, मूँग, घृत, मिठाई आटा आदि लेकर सजाया और अपने योग्य उमराओं को साथ लेकर वासणपी के लिये प्रस्थान किया। सामान आदि तो सवारियो पर रखा किन्तु रावल जी देवजी की आज्ञा को स्वीकार करते हुए जैसलमेर से पैदल ही चले। पाँच कोश वासणपी गाँव देवजी के पास अति शीघ्र ही पहुँच गये। रावल जी ने देवजी के चरणो में प्रणाम किया। देवजी रावल जी से प्रेमभाव रखते थे।
देवजी ने कहा-क्या बात है रावल! दुःखी क्यों हो रहे हो? तुम यहाँ तक सामने क्यो आये? इतने जीवों को दुखित क्यों किया? प्रतिज्ञा एवं वचन मेटे नहीं जाते, पूर्ण किये जाते हैं। इस प्रकार से हाथ जोड़े खड़े हुए रावल को एक सोने की मूण मटका प्रदान किया। यह वही मूण थी जो सोनवी नगरी से लाये थे।
जेतसी ने प्रार्थना करते हुए कहा-हे देव! आप तीनों लोको के मालिक, एक मुझ जैसे सामान्य मनुष्य के द्वारा निमन्त्रण देने पर आ गये। इससे बढकर और मेरा क्या सौभाग्य होगा? अन्य गुरु तो संसार में बहुत हैं किन्तु वे तो कुगुरु, झूठे, पाखण्डी हैं। उनकी मैं क्या शरण लूँ? आप आ गये। इससे बढकर और मेरा क्या सौभाग्य हो सकता है। यदि मैं पाँच कोश आपके सामने नहीं आऊँ तो मानव कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
रावल ने विनती की-हे देव! मैं तुच्छ भेंट ले आया हूँ, इसको आप स्वीकार करें। आपके साथ आये हुए संत संतोषी जीमेंगे तो मैं निहाल हो जाऊँगा। मेरा यज्ञ यहीं पूर्ण हो जायेगा। इसलिये आप भोजन बनाने का आदेश दें। सभी लोग प्रथम भोजन करें, फिर आगे जैसलमेर चलें। देवजी के आदेशानुसार वहीं सभी ने भोजन बनाकर प्रसाद रूप में ग्रहण किया।
देवजी ने कहा-हे रावल! आप इन लोगों को भोजन करवावो। मेरा भोजन तो सभी जीवों की तृप्ति हो जाना ही है। मैं तो स्वयं संतोषी हूँ तथा दूसरों का पालण पोषण कर्ता हूँ। हे राजन लेना-देना परोपकार करना, यही जीव की भलाई का मार्ग है। वही तुम्हें करते रहना चाहिये।
रावल जेतसी के साथ एक ग्वाल चारण भी था। उन्होंने बिश्नोइयों की जमात देखकर कहा-हे देवजी ! आप तथा आपकी बात तो समझ में आती है। किन्तु ये आपके साथ में कौन लोग हैं? किस कुल, जाति, परिवार, समाज के लोग हैं?
उस समय जाम्भोजी की आज्ञा से साथ में रहने वाले तेजोजी चारण जवाब देते हुए कहने लगे-प्रथम तो ये लोग जाट कुल में पैदा हुए थे। अब इन्हें सद्गुरु जाम्भोजी मिल गये हैं तो ये लोग सुगुरु सुज्ञानी बिश्नोई हो गये हैं। ये लोग ज्ञान तथा पाहल से पवित्र हो गये हैं। पूर्व कुल पलट गया है। क्योंकि उत्तम की संगति करने से पार उतर गये हैं। जिस प्रकार से लोहा लकड़ी की संगति करने से जल से पार उतर जाता है। ये लोग सतपंथ के पथिक बन गये हैं।
अब इस पंथ को छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। अपवित्र से पवित्र हो चुके हैं। पुनः अपवित्रता में प्रवेश नहीं करेंगे। पहले तो ये लोग “जी” कहना ही नहीं जानते थे। गधे, कूकर की तरह ही जो चाहे वही बोलते थे। इन्हें कोई नाम लेकर पुकारता था तो ये लोग “ हो” कहकर ही बोलते थे। किन्तु अब“ जी जी ” कहते हैं। पहले तो ये काच की तरह नकली थे, किन्तु अब कंचन बन गये हैं। काच तो सस्ता बिकता है, किन्तु सोना महँगा बिकता है। ये लोग जाट ही थे। जाटों की तरह ही रहते थे। बिना गाली के बोलते भी नहीं थे। किन्तु अब तो देवजी ने इनको बुद्धि प्रदान की है। उसी बुद्धि से ही बोल प्रकट होता है इसलिये सुवचन बोल रहे हैं।
ग्वाल चारण ने पूछा-इन लोगों ने सिर क्यों मुंडाया है? इनके कोई मर तो नहीं गया है? मरने पर तीजे दिन लोग सिर मुंडाते हैं। मुझे इस बात का पता नहीं है। इसलिये पूछता हूँ?
तेजो जी चारण ने कहा-माथो-सिर तो तीन अंगुल ही है। जिसे मस्तिष्क कहते हैं, जहाँ पर कुदरती बाल लहीं उगते । जिसका जितना ललाट चौड़ा होगा उतना ही वह बुद्धिमान होगा। जहाँ बाल नहीं उगते, वही तो सिर ही तो ज्ञान, विद्या, ज्योति का केन्द्र है। बाकी सिर में बाल उगते हैं। वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हैं जो विशेष हो सके। “ जड़ जटा धारी, लंघे न पारी” जटाएँ बढा लेना तो जड़ता (मूर्खता, अज्ञानता) का परिचायक है। ललाट की तरह ही सिर रखना बुद्धि ज्ञान का विकास करना है। इसलिये ये लोग गुरु मुखी हुए है। सिर मुंडाया है।
इन्होंने अपने प्रियजन मार दिये हैं। जो सभी को मारते हैं। जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि ये तो संसार में सभी के पीछे लगे हैं। संसार इनके पीछे लगा है, किन्तु इन भक्तों ने इन सेनाओं को मारकर सिर मुंडाया है। हे ग्वाल! ऐसी व्यर्थ की बात मत बोल। सुन्दर शब्दों का उच्चारण करो।
आगे पुनः तेजोजी ने बतलाया-मोडा (साधु) को देखकर लोग आदेश करते हैं। हाथ में माला होती है, तो राम-राम कहा जाता है। मुसलमान को सलाम कहा जाता है। सभी का अपना अपना अलग मार्ग है। अपनी-अपनी पहचान है। सभी अपने-अपने मार्ग पर चलकर तो अवश्य ही पहुँच जायेंगे। बाह्य वेशभूषा से व्यक्ति की पहचान होती है। जाम्भोजी ने इनकी अलग पहचान हेतु भी इनका सिर मुंडाया है। इन्हें साधु बनाया है। क्योकि ये लोग मोडा हैं। इन्होंने मोह को ढाह लिया है। सिर से नीचे गिरा दिया है।
कौन नुगरा? कौन सुगरा? कौन साधु? कौन असाधु? कौन भक्त? की पहचान वेशभूषा से होती है। इसी को देखकर वन्दना की जाती है मूंडत सिर भक्त का बाना है। इसलिये भक्त को प्रणाम ज्ञानी लोग करते हैं। मूंड मुंडाये हुए भक्त संतों की,भूत-प्रेत उपासक लोग निन्दा करते हैं। वे लोग पाप पुण्य को नहीं जानते। निनाणवे करोड़ राजा हुए हैं जो गुरु की शरण में जाकर सन्यास धारण किया है मूंड मूंडाये हैं। तो सिर मुंडाना कोई बुरी बात नहीं है।
कितने लोगों ने इस समय गुरु की बात को सुनकर के अपने जीवन को धन्य बनाया है। अपनी कुल परंपरा को छोड़ कर के सतपंथ के अनुगामी बने हैं। हे ग्वाल! आप मुझे ही देखिये। मैं भी तुम्हारा ही भाई चारण हूँ। मैं भी अन्य लोगों की भांति पाप कर्म में डूबा हुआ था। मैं देवजी की शरण में आया। अपने कुल को पलट दिया। सतपंथ का अनुगामी हुआ। पापों को छोड़कर असली चारण मैं अब हुआ हूँ। पहले चारण नहीं था, मारण था। किन्तु अब मारण से चारण बना हूँ। अब मैं किसी को मारता नहीं, चारता हूँ यही ज्ञान मुझे यहाँ प्राप्त हुआ है। यह सतगुरु का ही उपकार है।
उसी समय रावल जेतसी ने कहा-चंदन अपनी संगति से अन्य वृक्षों को भी सुगन्धित कर लेता है। नीम भी अपनी संगति से अपने जैसा कड़वा अन्य को बना देता है। किन्तु यदि बाँस चंदन के साथ उग जाये, तो उसे चंदन भी अपने जैसा सुवासित नहीं कर सकता, क्योंकि बांस के गाँठे होती हैं, सुगन्धी को वे गाँठे प्रवेश नहीं होने देती। यही सद्गुरु की पहचान है।
यदि कोई व्यक्ति बाँस की तरह होगा, तो सद्गुरु की संगति चंदन की भाँति कुछ नहीं कर पायेगी। पारस लोहे के साथ रखी जावे, तो वह पारस लोहे को सोना बना देती है। मीठा कड़वे के साथ रखा जावे तो मीठा कड़वे को भी मीठा बना देता है। गुरु मिलने का यही उपकार है। सभी कुछ पलट देते हैं।
ये सद्गुरु तो जल का दूध,नींमो के नारियल करते हैं। लोहे को पलट कर कंचन करते हैं, मैं तो जैसलमेर का राजा कहा जाता हूँ। झूठ-कपट, पाखण्ड में विश्वास नहीं करता। मैंने जाम्भोजी में सच्चाई देखी है। तब मैं विश्वास को प्राप्त हुआ हूँ।
ग्वाल चारण जेतसी से विनती करने लगा-मैं चारण कविता करता हूँ , किन्तु जाम्भोजी के बारे में झूठा अक्षर नहीं जोड़ पाता। मैंने कई बार प्रयत्न करके देखा भी है, किन्तु खाली ही रहा हूँ। न जाने मुझे जाम्भोजी का कोई शाप है। अब मुझ पर कृपा करेंगे। मैं अपनी भूल की क्षमा चाहता हूँ।
बहुत बात हो गयी। अब चढो-चढो कहते हुए जाम्भोजी के आदेशानुसार सेवक गण एवं रावल जी जैसलमेर के लिये रवाना हुए। रावल मन में खिन्न था कि मैंने मालिक को बहुत कष्ट पहुँचाया है। परन्तु अब मैं साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ। इस प्रकार से सहज भाव से जैसलमेर में प्रवेश किया। जैसलमेर के राज दरबार में न जाकर जैत संमद पर ही जांभोजी ने आसन लगाया। सम्पूर्ण शहर में जय जय होने लगी। प्रजागण, स्त्री पुरुष गुरु जी के चरणो में नमन करते हुए दर्शन लाभ करते हुए कृतार्थ हो रहे थे। गुरु देव की सभा देव लोक की सभा की भांति शोभायमान हो रही थी। जिसने भी देखा उन्हीं के पाप एवं संशय का विनाश हुआ। जिस प्राणी के अन्दर कभी झूठ कपट की वासना नहीं उभरती, सदा ही प्रिय हित कर बोलता है, जप तप सद्क्रिया में लीन है, ऐसे सुगुरु जन की भाट लोग बिड़दावली गाते हैं।
रावल कहने लगा-हे देव! अब मुझे आगे क्या करना है। वह आप ही आज्ञा प्रदान करें। जैसा आप कहेंगे वैसा ही मैं करूँगा। मैं आपका सेवक हूँ। जब तक आप आज्ञा प्रदान नहीं करेंगे, तब तक मेरा मन शांत नहीं होगा।
देवजी ने कहा-प्रथम आज्ञा तो मेरी यह है कि तुम्हारे ठाकुर, मित्र, सम्बन्धी राजा प्रजा लोग तुम्हारे से मिलने के लिये आये हैं, तुम्हारी भेंट हेतु बकरे लाये हैं, जो तम्बूओ में बन्धे खड़े हैं, ये सभी कटेंगे। ये जीव निरपराधी हैं, इन्हें छोड़ना होगा। इन जीवों को अमर करदो। यह पुण्य का कार्य करो। यह प्रथम वरदान है।
दूसरी बात यह मान्य होगी कि तुम्हारे राज्य में जहाँ पर भी भेड़-बकरियाँ बकरे को जन्म देती है उसे ये तुम्हारे लोग मार कर खा जाते हैं। उन जीवों को बचाना होगा। इसके लिये “अमर रखावै ठाट” जीवो को मरने न दे। उनका पालण पोषण करे। यह तुम्हारे लिये दूसरा नियम होगा।
तीसरी आज्ञा यह है कि जहाँ तक तुम्हारे राज्य की सीमा है, और तुम्हारी शक्ति चलती है, वहाँ तक वन्य जीव मारने वाले शिकारी से जीव जन्तुओं की रक्षा करो। जितने जीवों की रक्षा होगी, उतनी ही तुम्हारे राज्य में सम्पन्नता आयेगी। सदा खुशहाली बनी रहेगी। जीव को मारकर अपना पेट भरोगे तो वे जीव आपको सुख नहीं दे सकते। उन्हीं जीवों की तरह तड़प-तड़प कर मरोगे। यही तीसरा वरदान आज्ञा है इसे पालन करो।
चौथी आज्ञा यह है कि तुम्हारे राज्य में चोर बहुत हैं। दूसरे राज्य की सीमा से पशु चोरी कर के लेकर आते हैं और तुम्हारे राज्य की सीमा में प्रवेश करते ही चोर साहूकार हो जाता है। पीछे उनका मालिक ढूंढने आता है, किन्तु उसे कुछ भी नहीं मिलता है। यह अन्याय हो रहा है। इस अन्याय को रोकना होगा। तुम्हें जिसका पशु है, उसका वापिस दिलाना होगा। तभी न्याय होगा। प्रजा के साथ न्याय करोगे, तभी तुम सच्चे अर्थो में राजा कहलाने के अधिकारी होगे। यही चौथी आज्ञा है।
पाँचवीं आज्ञा यह है कि जो लोग बिश्नोई बन गये हैं। वे लोग आप के पास न्याय हेतु आये, तो उन्हें न्याय देना। बिश्नोइयों से जगात (कर) नहीं लेना। उन्हें माफ कर देना। क्योंकि ये लोग पूर्णतया धार्मिक हैं। ये लोग हरे वृक्ष नहीं काटते। जीवों को नहीं मारते और न ही मारने देते। खेती करते है। यज्ञ करते हैं, इससे राज्य में खुशहाली बनी रहती है। राज्य दिन दूना रात चौगुना अभी वृद्धि को प्राप्त होता है। यह पाँचवीं आज्ञा है इसका पालन करो।
इन पाँच नियमों पर चलने का जेतसी से संकल्प करवाया। देवजी ने कहा-हे राजन्! यदि तू इन नियमों का पालन करते हूए राज शासन चलायेगा तो तुम्हारा इह लोक एवं परलोक दोनों ही बन जायेंगे।
हे वील्हा! उस प्रकार से जैसलमेर गढ के अधिपति के ऊपर धर्म, न्याय एवं मर्यादा की छत्र छाया की। देवजी द्वारा जीवों की रक्षा का दिया हुआ वचन पालन किया। न जाने कितनो जीवों की रक्षा जेतसी के यज्ञ में हुई तथा आगे के लिये भी जीव रक्षा का बद्धड़ा उठाया। धन्य-धन्य है जीवा धणी। जो पापों पर प्रहार करते हैं।
जेतसी ने देवजी की आज्ञानुसार सभी जगह ढिंढोरा पिटवा दिया। आज से आगे अब कोई राज्य में जीव हत्या नहीं करेगा। कोई बावरी, शिकारी आदि जीव नहीं मारेंगे। यह घोषणा सभी ने सुनी और राजा व प्रजा दोनो ने ही बहुत-बहुत धन्यवाद किया। मरते हुए जीवो को बचाया, यह कार्य तो सद्गुरु के आने से ही संभव हो सका।
वील्हा उवाच-हे गुरुदेव ! सुना है कि उस समय एक कन्या का विवाह भी किया था। एक बारात का स्वागत राजा ने किस प्रकार से किया था? क्योंकि अनावश्यक प्राचीन पंरपरा के तो जाम्भोजी विरोधी थे। उन्हें तोड़ने की सलाह देते थे। जाम्भोजी का सिद्धान्त तो प्रगतिशील था। जेतसी के यहाँ नयी परंपरा कौन सी प्रारम्भ की? वह कैसी पंरपरा थी? मुझे बतलाने का कष्ट करें।
नाथोजी उवाच-हे शिष्य! जब मांसाहार का पूर्णतया त्याग करवा दिया, तब जेतसी ने बारात का स्वागत शाकाहारी भोजन से किया। अनेकों प्रकार की मिठाइयाँ, शाक-पात यही मानवाह्यचित एवं प्रिय भोजन है। यही करना उचित था। वही जेतसी ने किया। भोजन का समय होने पर मेहमानों को आमन्त्रित करके बुलाया। उन्हें पंक्ति लगा कर के बिठाया गया। अलग अलग थालियाँ रखी गयीं। भोजन वितरण करने वाले सेवको ने झूठन से बचाकर भगवान् के लगा हुआ भोग प्रसाद के रूप में प्रदान किया।
भगवान् का प्रसाद मान कर भोजन करने से उन आये हुए आगन्तुको का मन शुद्ध, पवित्र हुआ। जिस यज्ञ को श्री देवजी ने स्वयं जैत संमद की प्रतिष्ठा हेतु किया था। उनके प्रसाद का तो फिर कहना ही क्या था? जो भी भोजन करते गये, शुद्ध पवित्र होते गये। यही तो उनके चमत्कार की महिमा थी।
भोजन के पश्चात् विवाह का कार्यक्रम हुआ। मुहूर्त के अनुसार चंवरी मांडी गयी। चारों तरफ खूँटी रोप कर सूत फि राया गया। घड़ा जल का भर कर वेदी पर रखा गया। वेद मन्त्रों द्वारा कलश की स्थापना हुई। वासुदेव की वन्दना द्वारा विवाह का कार्य प्रारम्भ हुआ। अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये गोत्राचार पढा गया। हवन प्रंचड होने पर वैदिक ब्राह्मणों ने वेद मन्त्र पढ कर यज्ञ में गो घृत की आहुति दी। जैसा श्री देवजी ने बतलाया उसमें फर्क नहीं आने दिया। प्रथम ओ३म शब्द का उच्चारण किया। विप्रो ने वेद मन्त्रो का सस्वर उच्चारण किया। सुनने मे कर्ण प्रिय लगते थे। महिलाएँ सोलह शृंगार करके मंगल गीत गाने लगीं। कन्या एवं दूल्हे का हथलेवा कर शाखोचार पढकर के कन्या का विवाह राजा ने विधि पूर्वक किया। अन्त में अग्नि की परिक्रमा कर के फेरा कार्य पूर्ण किया।
अपनी शक्ति के अनुसार रावल ने कन्यादान किया। जो वहाँ उपस्थित दान देने के अधिकारी थे, उन्हें यथा योग्य दान देकर संतुष्ट किया। सभी याचकों ने सन्तुष्ट होकर जेतसी को धन्यवाद दिया। जिस प्रकार से पाण्डवों ने यज्ञ किया। पाण्डवों के यज्ञ में भगवान् कृष्ण उपस्थित थे उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे। जेत संमद की प्रतिष्ठा हुई। राव जेतसी ने अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न किया। सभी कार्य देवजी की कृपा से पूर्ण हुए।
रावलजी ने विनती करते हुए कहा-आपकी अति कृपा से मैं कृतार्थ हुआ। किन्तु मेरी एक इच्छा है कि आप अपने शिष्य बिश्नोई को मेरे राज्य में बसाओ। उनकी प्रेरणा से हमारी प्रजा भी सुखी क्रियावान हो सकेगी। हे देव! आप तो सम्भराथल चले जायेंगे, किन्तु मैं आपके शिष्य का दर्शन करके कृतार्थ हो जाऊँगा।
सद्गुरु देव ने जमात में खबर पहुँचाई कि आप में से यहाँ जैसलमेर बसने के लिये कौन तैयार है? जमात में से लक्ष्मण एवं पाण्डू गोदारा ने सद्गुरु की बात को सहर्ष स्वीकार किया। और लक्ष्मण पाण्डू को खरीगे गाँव में बसाया। धन्य हैं ऐसे भक्त जन जिन्होंनें गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके अपने जन्म को सफल कर लिया। अपनी जन्म भूमि छोड़ कर लक्ष्मण पाण्डू खरींगे गाँव में सदा सदा के लिये बस गये।
देवजी ने कहा-हे जेतसी ! तुम्हारे राज्य में ये दो भक्त बसेंगे। जिस राज्य में भक्त निवास करते हैं, जहाँ पर क्रिया कर्म संयम आदि नियमो का पालन होता है, विष्णु का जप, यज्ञ होता है, उस राज्य में किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आयेगी। सदा खुशहाली बनी रहेगी। ऐसा धर्म का प्रभाव है। इस धर्म की नींव तुम्हारे राज्य में पड़ चुकी है।
जेतसी ने हाथ जोड़कर देवजी के आशीर्वाद को शिरोधार्य किया। कृष्ण चरित्र के प्रभाव को अपनी आँखों से देखा। स्वीकार किया कि यह जैसलमेर गढ मर्यादा में बंधा रहेगा, तो कभी पलटेगा नहीं। पुनः रावल ने हाथ जोड़कर विनती करते हुए कहा-हे देवजी! आपकी कृपा से मेरा यज्ञ सफल हुआ। मुझे किसी प्रकार का कलंक नहीं लगा। मैंने आपकी कृपा से अन्न-धन बहुत ही खर्च किया, किन्तु किसी बात की कमी नहीं आई। आपकी कृपा से दिन दूनी, रात चौगुनी बढती ही गयी। हे देव! जैसा आपने कहा वैसा ही मैंने किया। आपके दर्शनसे मेरे पाप प्रलय हो गये। क्यों न होगा। हमारा यज्ञ पूर्ण करने आदि गुरु साक्षात् विष्णु हमारे यज्ञ में पधारे हैं। मेरा भाग्य बलवान है, जो मैं आपका सेवक बना।
रावल ने एक विनती करते हुए कहा - हे देव ! इस कलयुग में जीवों का उद्धार कैसे होगा? सुना है कि कलयुग में जीवों की मुक्ति नहीं होती। यह मेरी शंका थी, उसका समाधान मुझे मिल गया। एक बार जाम्भा सरोवर का जल चलू भर पी लूँ तो मेरे सम्पूर्ण झंझट कट जायेंगे। जन्मो-जन्मो तक मुनि लोग यत्न करते हैं। धोती आसमान में अधर सुखाते हैं। कुण्डलिनी आदि जाग्रत करके योग करते हैं। कठिन तपस्या करते हैं, उनको भी युक्ति मुक्ति संभव नहीं है। किन्तु मेरा धन्य भाग है, जो मुझे मुक्ति का वरदान मिला। आवागवण मिटाकर के श्री देवजी ने स्वर्ग-मुक्ति का वरदान
दिया। रावल कहने लगा-केवल मैं ही अकेला नहीं हूँ। देवजी के कृपा पात्र दिल्ली का सिकन्दर लोदी, महमंद खां नागौरी, मेड़ते रा दूदा राव,जोधपुर नरेश सांतल, चितौड़ का सांगा राणा, बीकानेर का लूणकरण, जेतसी एवं अजमेर का महलूखान आदि अनेक राजा लोग कृपा पात्र बने।
हे वील्हा! रावल जेतसी धन्यवाद का पात्र है, जिन्होंने जाम्भोजी की आज्ञा का पालन किया, और परोपकार का कार्य जाम्भोलाव तालाब खुदवा कर किया। विष्णु का जप करते हुए मुक्ति के पथ के पथिक बने। अपने राज्य में जीव हत्या बंद करवायी। जैसलमेर में यज्ञ करवाया। अपने राज्य में धर्म की नींव रखी।
रावल जी के प्रति देवजी ने शब्द सुनाया - हे रावल ! गोरख को प्राप्त करो। वह भी साक्षात् विष्णु है। गोपाल को प्राप्त करो वह भी गोपालक विष्णु ही है। इस धरती पर बड़े-बड़े उथल-पुथल हुए है, किन्तु हम तो ज्यों के त्यों ही है? हमारे आदि मूल भेद को कौन जानते हैं? रावलजी को शब्द सुना कर श्री देवजी साथरियों सहित विदा हुए। शब्द-गोरख लो गोपाल लो।
रावल जी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से एक पलक निहारते हुए विदाई दी। पुनः दर्शन होंगे, इसी आशा से रावलजी अपने को संमयित कर के अपना कर्तव्य कर्म निभाया। श्री देवजी वापिस सम्भराथल पहुँचे साथरिया प्रसन्न चित्त हुए, सभी ने प्रणाम किया।