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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह47 / 94

सातवाँ अध्याय · कथा 47

गुरु आसन सम्भराथले

मूलो प्रोहत कह देव म श्रब मानीज मान्यारो ओगण कोई नहीं। वेद कह छः एक हाथ क पाटौ बांधे उभौ, वीसनोई कह पाटौ क्यौ बांध्यौ? साहिब सुं चोरी कीवी ज्यौ बांध्यौ। बाललो चोरयो। धीज जीतो घर माही यो ले नीसर थो। हाथ दाधौ। जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द -72 ओ३म् वेद कुराण कुमाया जालूं, भूला जीव कुजीव कुजाणी।

बसंदर नहीं नख हीरूं, धर्म पुरुष सिरजीवै पूरूं।

कलि का माया जाल फिं टाकर प्राणी, गुरु की कलम कुरांण पिछाणी।

दीन गुमान करैलो ठाली, ज्यूं कण घातै घुण हांणी।

साच सिदक शैतान चुकावों, ज्यूं तिस चुकावै पांणी।

मैं नर पूरा सरविण जो हीरा, लेसी जांके हृदय लोयण।

अन्धा रह्या इंवाणी। निरख लहो नर निरहारी, जिन चोखंड भीतर खेल पसारी।

जंपो रे जिण जंपै लाभै, रतन काया ए कहाँणी।

कांही मारूं काहीं तारूं, किरिया विहूँणा पर हथ सारूं।

शील दहूँ उबारूं ऊन्है, एकल एह कहाणी।

केवल ज्ञानी थल शिर आयो, परगट खेल पसारी।

कोड़ तेतीसों पोह रचावण हारी, ज्यूं छक आयी सारी।

सर्वोच्च कैलाश पर्वत सदृश धोरो में शिरोमणि सम्भराथल पर गुरु शिष्य एकत्रित हुए। फाल्गुन बसन्त ऋतु की अमावस्या के दिन गुग्गल घृत की महकार से चारो दिशाएँ प्रफुल्लित हो रही थी। चारों तरफ का सघन वन बसन्त के आगमन का स्वागत कर रहा था मयूर, कोयल, कबूतर, तोता अनेकों प्रकार की चिड़ियाँ आदि पक्षी भांति-भांति के गीत गा रहे थे।

वन्य पशु हरिण, लोमड़ी, सियार, खरगोश आदि जीव पूर्ण सुरक्षित हो करके आनन्द में विभोर हो कर नृत्य गान कर रहे थे। वहाँ नीरव तो केवल मानव शब्दों की थी। नाथोजी ने अपने बीते हुए दिनों का स्मरण किया और कहने लगे-

हे वील्हा! यही वह सम्भराथल है, जहाँ पर कुछ वर्ष पूर्व सदा ही मेला लगा रहता था। यहीं की ये हरी भरी कंकेहड़ी के वृक्ष धन्य हैं, जिनके नीचे घनी छाया में श्री देवजी विराजमान होते थे। यह वन साक्षी है। अब भी देवजी की सुवास से सुवासित है। ये वन्य जीव तुम देख रहे हो एक साथ ही भ्रमण कर रहे हैं। यह उन्हीं श्री देवजी का प्रभाव है।

इसी सम्भराथल की पावन धरती पर जाम्भोजी ने सत्ताईस वर्ष तक गऊएँ चराई थी। वे गऊएँ बछड़े भी धन्यवाद के पात्र हैं, वे ग्वाल बाल भी यहीं सम्भराथल पर ही भगवान् के साथ खेल खेलते थे। वे सभी धन्यवाद के पात्र हैं।

इस पवित्र स्थल पर ही बिश्नोई पन्थ की स्थापना की थी। बड़े बड़े शैतान राजा लोग यहीं आकर चरणों में झुके थे। इस स्थल को तुम प्रणाम करो। हे वील्हा! अच्छा ही हुआ कि तुम यहाँ आ गये और ज्ञान चर्चा कर के अपने जीवन को सफल बना रहे हो।

वील्हा उवाच-हे गुरुदेव! आप से बढकर इस समय मैं अन्य किसी पुरुष को प्रामाणिक पुरुष नहीं मानता, जो देवजी के साथ रहकर उनके श्री मुख से शब्द श्रवण किया हो और मुझे बतला सके। उन्होंने जो भी शब्द उच्चारण किया, उसको आपने कण्ठस्थ किया है। आपने महत्ती कृपा की, जो मुझे शब्द सुनाये। आपकी दया से मैंने सभी शब्द कण्ठस्थ भी कर लिये हैं। ये शब्द कब-कब और किस किस को सुनाये हैं। यह मैं अब तक जान गया हूँ। किन्तु अब आगे और भी जानना शेष है। कृपाकर के आगे के शब्द एवं उनके प्रसंग तथा भाव जानना चाहता हूँ।

नाथोजी उवाच-हे शिष्य! जैसा मैने तुझे अब तक जो भी प्रसंग-कथाएँ बतलाई हैं, इसी प्रकार आगे भी बतलाता हूँ। एक समय श्रीदेवजी सम्भराथल पर संत भक्तों की सभा में विराजमान थे। उसी समय ही एक पुरोहित आया। उसका नाम मूला था। पुरोहित ने सुना था कि जाम्भोजी कल्पित देवी-देवताओं को मान्यता नहीं देते। किन्तु पुरोहित इनकी पूजा में विश्वास रखता था और पूजा करता भी था।

पुरोहित ने पूछा-हे देव! सभी देवताओं की उपासना करनी चाहिये। इनकी उपासना करने में कोई दोष नहीं है, क्योकि वेद में लिखा है। वही पुरोहित हाथ के पट्टी बाँधे हुए जाम्भोजी के सामने खड़ा देखकर बिश्नोइयों ने पूछा -

पुरोहित जी! हाथ में पट्टी क्यों बाँधी है। पुरोहित ने कहा-साहब से चोरी की थी इसलिये बाँधी है। एक सोने का हार चुराया था। जब धैर्य धारण कर के घर से बाहर निकला था। तब मैंने सोचा कि चोरी में सफल हुआ किन्तु जिस हाथ से स्वर्ण हार चुराया था, वह हाथ जलने लगा। हाथ में जलन से घाव हो गया है। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ है? यह तो जाम्भोजी ही बतलायेंगे। श्रीदेवजी ने “वेद” यह शब्द सुनाया-

हे पुरोहित! हिन्दुओं का प्रमुख ग्रन्थ वेद है तथा मुसलमानों का कुरान, ये दोनों ही बड़े भारी शब्दों का जाल है। एक शब्द के अनेक अर्थ हो जाते हैं। एक प्रकार का शब्द जाल है उसमें फंसना सरल है, किन्तु निकलना कठिन है। सतगुरु ही जाल की गुत्थी को जानते हैं। वे ही जाल को तोड़कर मुक्त कर सकते हैं। किन्तु भूले हुए अहंकारी पुरोहित एवं मुल्ला दोनों ही मनमाना अर्थ करतह्य हैं। अपनी इच्छानुसार ही वेद का नाम नेकर कुमार्ग पकड़ लेते हैं। नाम वेद तथा कुरान का लेते हैं।

हीरे का नग भी चमकता है। अपनी ज्योति प्रकाशित करता है। किन्तु वह अग्नि की समानता नहीं कर सकता। हीरा तो हीरा ही है और अग्नि तो अपनी जगह अग्नि ही है। उसी प्रकार से धर्म पुरुष तो पूर्ण सचेत पुरुष है, किन्तु कुछ लोग उनकी बराबरी करके अपने को धर्म पुरुष भी घोषित करते हैं, किन्तु बराबरी नहीं हो सकती।

कलयुग में माया-जाल का पसारा अधिक है। इन्हीं पसारे से बाहर निकल कर देखे। गुरु ने जो कहा है, वही सत्य है। वही वेद कुरान है। इसे पहचानो। हे पुरोहित ! अहंकार से तुम लोग भरपूर हो। तुम्हें कुछ भी नहीं दिखता है। इस को बाहर निकालोगे, तो अन्दर खाली हो जाओगे। तब तुम्हारे भीतर ज्ञान भरेगा। जिस प्रकार से मोठ आदि अनाज में घुण (कीड़ा) अन्दर प्रवेश हो जाता है, अन्दर ही अन्दर खाता रहता है। मोठ को थोथा कर देता है। उसी प्रकार से तुम्हारे अन्दर भी, अहंकार तुम्हें खा रहा है। इसे बाहर करे।

अन्दर बैठे हुए शैतान को सत्य धर्म से बाहर निकालो। जिस प्रकार से जल पीने से प्यास बुझ जाती है। उसी प्रकार से सत्य धर्म से शैतान रूपी प्यास को मिटा डालो। तभी शांति होगी।

हे पुरोहित! मैं तो इस समय नर के रूप में पूर्ण पुरुष हूँ। आप जो चाहोगे, वही मिलेगा। कल्प वृक्ष की भाँति मैं सभी की इच्छा पूर्ण करूँगा। किन्तु प्राप्त तो वही नर करेगा, जिसके हृदय में ज्ञान के नेत्र खुले हुए हों। अन्धे लोग तो खाली ही रह जायेगे। आप ज्ञान नेत्रों से देखिये। मैं नर रूप में होते हुए भी निराहारी हूँ।

मैंने चारों दिशाओं में अपने खेल का पसारा किया है। जो कुछ खेल हो रहा है, वह मेरी प्रेरणा से ही हो रहा है। इसलिये हे लोगो! विष्णु का जप करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पदार्थों की प्राप्ति होगी। यह तुम्हारी काया, अन्य शरीरों से श्रेष्ठ है। ऐसा कहा जाता है।

मैं किसी को तो मारता हूँ और किसी को तारता भी हूँ तथा जो क्रिया रहित है, उसको दूसरो के हाथ छोड़ देता हूँ। किसी को शील देता हूँ, और उन्हे उबार लेता हूँ। इसलिये सृष्टि के कर्ता, पालक, एवं संहार कर्ता ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश रूप से मै ही हूंँ यह कार्य मैं अकेला ही करता हूँ। किन्तु तीन कार्य करने से मेरे तीन नाम पड़ गये। वही कर्ता-धर्ता कैवल्य ज्ञानी बन कर इस समय मैं सम्भराथल पर आया हूँ।

प्रकट रूप से मैंने ही खेल पसारा है मैंने प्रह्लाद भक्त को वचन दिया था। उनके तेतीस करोड़ को पार उतारना है। वही प्रह्लाद पन्थ जीवित करके इन लोगों को दिखाने के लिये मैं यहाँ पर आया हूँ। जिस प्रकार से सम्पूर्ण गायें जब जल-घास खा-पीकर बैठ जाती हैं, जुगाली करती हैं, उसी प्रकार से मैं उन प्रह्लाद के पंथी जीवो को तृप्त कर दूँगा। वे स्वंय बैकुण्ठ पहुँच जायेंगे। तभी पूर्ण तृप्त हो सकेंगे। यही कार्य हे पुरोहित! तुमने चोरी की तो तुम्हारा हाथ जला? अब तुम यहाँ पर आये हो और पूछते हो कि मेरा हाथ क्यो जला। यह तो तुम्हारे पाप की थोड़ी ही झलक है। यह तो तुम्हें सचेत करने के लिये सूचना मात्र है। हे वील्हा ! इस प्रकार से अनेकानेक लोगों को सम्भराथल पर हरी कंकेहड़ी वृक्ष के नीचे बैठे हुए शब्द सुनाया। उन्हें सचेत कर के बिश्नोई पंथ के पथिक बनाया। इस शब्द का भाव पूर्ण हुआ तो पुनः आगे के शब्द का विचार बताने लगे-

बीसनोई कह, एक जोगेसर दीठो, आसण सीला थरहराय रही थी। जाम्भोजी श्री वायक कहै

शब्द-73 ओ३म् हरी कंकेहड़ी मंडप मेड़ी, जहाँ हमारा वासा।

चार चक नव दीप थर हरै, जो आपो परकासूं।

गुणियां म्हारा सुगणा चेला, म्हें सुगणा का दासूं।

सुगणा होय सैं सुरगे जास्ये, नुगरा रह्या निरासूं।

जाका थान सुहाया घर बैकुण्ठे, जाय संदेशो लायो।

अमियां ठमियां इमृत भोजन, मनसां पलंग सेज निहाल बिछायों।

जागों जोवो जोत न खोवो, छल जासी संसारूं।

भणी न भणबा, सुणी न सुणबा, कही न कहबा, खड़ी न खड़बा।

रे! भल कृषाणी, ताके करण न घातो हेलो।

कलीकाल जुग बरते जैलो, ताते नहीं सुरां सो मेलो।

हे बिश्नोइयो ! आपने एक योगी को देखा है, सिला हिलती हुइ देखी है। आपने देखा कि योगी सिला हिला रहा है, इसमें कुछ भी सिद्धि नहीं है।

श्री देवजी ने शब्द कहा-मैं यहाँ सम्भराथल पर हरी कंकेहड़ी वृक्ष के नीचे बैठा हुआ हूँ। यहाँ हमारा निवास स्थान है। ये कंकेहड़ी के वृक्ष ही हमारे मन्दिर,मठ, हवेली हैं। वह योगी तो सिला हिला रहा है, किन्तु मैं यहाँ पर बैठा हुआ यदि अपने पूर्ण रूपेण प्रकाश ज्योति को प्रकाशित कर दूँ तो चारों चक और नव द्वीपों के रूप में यह सम्पूर्ण धरती ही थर-थर काँपने लग जाये। कभी धरती में भूकम्प आता है। वह हमारी ज्योति का थोड़ा सा बढा हुआ रूप ही होता है। उससे ही धरती काँप उठती है। यदि सम्पूर्ण ज्योति पूर्ण रूपेण प्रकाशित हो जाये तो यह ब्रह्माण्ड काँप उठेगा।

योगी आसन हिलाता है, या स्वयं हिलता है? यह तो योगी के लिए ठीक नहीं है। योगी को तो स्थिर आसन होकर बैठना चाहिए। “स्थिरं सुखमासनम्” इस संसार में कुछ गुणी जन हैं। वे हमारे सुगणे चेले हैं। मैं तो एसे सुगुरों का दास हूँ। जो सुगणा शुद्ध पवित्र आत्मा हैं, वे तो स्वर्ग में जायेंगे किन्तु जो निगुरे हैं, पाखण्डी हैं, वे तो निराश ही रहेंगे। उनकी इच्छा पूर्ण नहीं होगी। ये योगी लोग बाह्य दिखावों द्वारा पाखण्ड करके, अनेक प्रकार से पेट भरने का उपाय करेंगे। ऐसे निगुरे लोग आखिर निराश ही रहेंगे।

श्री देवजी कहते हैं कि मैं बैकुण्ठ से संदेशा लेकर आया हूँ। वहाँ पर तुम्हें चलना है। वहाँ पर अमृत, मिष्ठान्न, सुमधुर फल, आदि का भोजन इच्छानुसार उपलब्ध है। शयन करने हेतु इच्छित पलंग, सेज बिछाई हुई मिलेगी। जिस पर सोने से आनंद से पूर्ण हो जाओगे। तुम्हारी भक्ति ज्ञान कर्म का फल अवश्य ही प्राप्त होगा। इसीलिए जागो, देखो, विचार करो, ज्योति का साक्षात्कार होता रहे। कहीं ज्योति खो न जाये। कहीं संसार के चक्कर में पड़कर ज्योति को भूल न जायें। यदि भूल गये तो छले जाओगे। तुम्हारे साथ धोखा हो जायेगा।

हे कृषाण! भजने योग्य तो भगवान् हैं। उसका भजन नहीं किया। सुनने योग्य भगवान् की कथा- लीला है, उसको नहीं सुना। कथन करने योग्य जो भगवान् की कथा-नाम है वह कथन नहीं किया। खेती करने योग्य खेती तो भगवान् की प्राप्ति की साधना है। तुमने नहीं की। कानों में परमात्मा की शब्द ध्वनि डालनी चाहिये थी, वह तुमने नहीं डाली। तो तुमने जन्म व्यर्थ ही खो दिया। यह समय कलयुग व्यतीत हो रहा है। इसमें सचेत नहीं हुआ। इस कलयुग में देव विष्णु से मिलन होना कठिन है। अनेकों विघ्न बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं। तुम्हारा जीवन व्यर्थ में ही न चला जाये इसीलिए गुरु देव कहते है मैं तुम्हें सचेत कर रहा हूँ।

नाथोजी उवाच-हे वील्हा! इस प्रकार से जमात एक योगी के प्रति लोगों की भावना-पाखण्ड को देखकर श्रद्धालु हो गयी थी, वह तो अन्ध श्रद्धा थी, जिससे खें में गिरने की संभावना थी। उससे लोगों को सचेत किया। तथा आगे भी योगियों के प्रति अनेकों शब्द सुनाये-

बालनाथ कंवलनाथ गुरु चैलो दौन्यो बिसनोई हुवा। कहै-जाम्भाजी म्हे अतीत करम करके पारायण हुवा। अब म्हाने अतीत को मार्ग बतावो। जाम्भोजी श्री वायक कहै-

शब्द-74 ओ३म् कड़वा मीठा भोजन भखले, भखकर देखत खीरूं।

धर आखरड़ी साथर सोवण, ओढ़ण ऊना चीरूं।

सहजे सोवण पोह का जागण, जे मन रहिबा थीरूं।

सुरग पहेंली सांभल जिवड़ा, पोह उतरबा तीरूं।

बालनाथ कंवलनाथ दोनों गुरु शिष्य भ्रमण करते हुए एक समय बिश्नोइयों के गाँवों में इधर सम्भराथल के पास ही विचरण कर रहे थे। गुरु ने तो गाँव के बाहर ही आसन लगाया और चेले को भेजा कि जाओ, भिक्षा ले आओ। चेला घूमता हुआ एक ऐसे घर में चला गया, जहाँ उस घर में किसी स्त्री पर प्रेत की छाया आयी हुई थी।

घर के लोगों ने प्रार्थना की कि महाराज ! आप यदि भूत प्रेतों को निकालने का मंत्र आदि जानते हैं तो इलाज कर दीजिये। हम आपके लिये खीर बनाते हैं। वह शिष्य अवधूत भूत प्रेतों की बाधा दूर करने के लिये कोशिश करने लगा। उसकी कोशिश से या अन्य कोई कारण से भूत प्रेत भाग गया। वह स्त्री स्वस्थ हो गयी। घरवालों ने महाराज के लिये इस खुशी में खीर बनायी और भोजन के लिये कहा -

उस योगी के चेले ने कहा-मैं अकेला यहाँ भोजन नहीं करूँगा। मेरे गुरु आसन पर हैं। पहले उनको भोजन अर्पण करके फिर मैं भोजन करूँगा। इसलिये आप मुझे और मेरे गुरु के लिये पात्र (बरतन) में खीर भरदो, मैं लेकर चला जाऊँगा। घर वालो ने पात्र खीर से भर दिया और वह वहाँ से लेकर रवाना हुआ।

अन्तर्यामी श्री जाम्भोजी देख रहे थे। जाम्भोजी ने उसकी आत्मा को पहचाना था कि यह तो सुजीव है। किन्तु भूत प्रेतों की उपासना करना और खीर खाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। इसको इस कार्य से निवृत्त करना चाहिये। अन्यथा यह भूत प्रेत ही बनेगा। इसकी दुर्गति हो जायेगी।

इस प्रकार से मर मर कर भूतों के उपासक उसी गति को प्राप्त होते रहेंगे, तो अन्त कहाँ आयेगा? इनका तो सम्प्रदाय बढता ही जायेगा। लोगों को बे वजह तंग करेगा। किसी में भूत प्रेत प्रवेश करा देना किसी में से निकाल देना, अपना कार्य बना लेना, यही तो हो रहा है। जब वह कंवलनाथ खीर लेकर जा रहा था तो जाम्भोजी ने अपना हाथ बढाकर खीर को गिरा दी। चेला गुरु के पास पहुँचा किन्तु खाली हाथ ही।

गुरु ने पूछा-चेला भिक्षा नहीं लाये? क्या कहूँ गुरुजी! भिक्षा तो बहुत ही अच्छी खीर रूप में मिली थी किन्तु मार्ग में एक हाथ दिखाई दिया था, उसने खीर गिरा दी। मैं तो कुछ भी नहीं समझा। वह किसका हाथ था? गुरु ने कहा-यह करामात तो जाम्भोजी की ही हो सकती है। चलो वही चलते हैं। दोनों गुरु चेला सम्भराथल पहुँचे।

शिष्य ने कहा-गुरुजी! जिस हाथ ने खीर गिराई थी, वह तो यही जाम्भोजी का हाथ है। मैं पहचान गया हूँ। बालनाथ ने प्रणाम करते हुए प्रार्थना की-हे जम्भेश्वर! आपने खीर क्यों गिरा दी? हम भूखे थे। भिक्षा में प्राप्त खीर आपने हमें क्यों नहीं खाने दी?

जाम्भोजी ने कहा-यदि कोई छोटा बालक सर्प को पकड़ ले तो माता पिता उसे बचाते हैं, उसी प्रकार मैंने भी आपको अधिकारी जान कर नरक में पड़ने से बचाया है। तुम लोग जीवन निर्वाह हेतु जो भी भोजन मिल जाये, उसी से ही निर्वाह करो। किन्तु अच्छे भोजन खीर आदि की प्राप्ति हेतु भूत प्रेतो की पूजा मत करो। यह तुम्हारा कार्य नहीं हैं। नहीं तो तुम्हारा जीवन बर्बाद हो जायेगा। अन्यथा अन्त मति सो गति, तुम मरकर भूत प्रेत ही बन जाओगे। ऐसा कहते हुए यह शब्द सुनाया-

हे योगी! कड़वा मीठा जो भी भोजन मिल जाये उसे अमृत तृल्य मान कर, खीर ही समझकर भोजन करले। रसना के वशीभूत होकर जीवन को अधोगति में न डालो। जब अच्छी भूख लगी हो तो भोजन करलो वही अमृत है। धरती ही सेज-पलंग है इसी पर गहरी नींद आये तब सो जाओ। गहरी नींद बिछौना नहीं माँगती। ओढने पहनने के लिये ऊन खादी का मोटा वस्त्र ही ठीक है। जब सर्दी लगे जिस वस्त्र से बचाव हो जाये वही वस्त्र ओढने पहनने योग्य है। वही मखमली चीर मानो। जो मौके पर सर्दी गर्मी का बचाव करे।

सहज में ही जब निद्रा आये, तब सो जावो। सोने का कोई नियम नहीं है। जब नींद आये तभी समय है उठने के लिये नियम है कि ब्रह्ममुहूर्त में उठे। गहरी नींद में सोए। स्वप्न आये तो उठ जाए। सूर्योदय से पूर्व ही उठे। साधना भजन करे, तभी तुम्हारा मन स्थिर होगा। यह स्वर्ग मुक्ति एक प्रकार की पहेली ही है। वहाँ पर पहुँचना इतना सरल नहीं है। जितना तुम समझते हो। यदि मार्ग पकड़ लोगे तो पार पहुँच जाओगे।

कंवलनाथ को गुरु वीसुरण कीयो। बालनाथ कंवलनाथ कहे-जांभोजी! कोई भैरूं अरू माता, अरू आन देव, पूजै तिनको फल कहो-जांभोजी श्री वायक कहै-

शब्द-77 ओ३म् भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं।

जिंहि ठूंठड़िये पान न होता ते क्यूं चाहत फूलूं।

को को कपूर घूंटीलो, बिन घूंटी नहीं जाणी।

सतगुरु होयबा सहजे चीन्हबा, जाचंध आल बखाणी।

ओछी किरिया आवै फि रिया, भ्रांती सुरग न जाई।

अन्त निरंजन लेखो लेसी, पर चीन्हैं नहीं लोकाई।

कण बिन कूकस रस बिन बाकस,बिन किरिया परिवारूं।

हरि बिन देह रै जांण न पावे, अम्बाराय दवारूं।

जाम्भोजी द्वारा पूर्व शब्द सुना तो बालनाथ ने विलाप किया। घर बार छोड़ कर योग धारण भी किया, साधना मार्ग में भी चल रहे है। किन्तु हमारी साधना को तो जाम्भोजी तुच्छ ही मानते है।

पुनः बालकनाथ ने पूछा-हे गुरु देव! यदि कोई भैरू, योगमाता आदि आन देवता की पूजा करते हैं, उनको कुछ फल मिलता है या नहीं? जाम्भोजी ने शब्द सुनाते हुए कहा -

हे बालनाथ कंवलनाथ! तुम लोग भूले हुए हो। तुम्हें वास्तव में साधना-पूजा का पता नहीं है। योग धारण करने से पूर्व भी भूले भटके थे। कुछ ज्ञान की किरण जगे, इस आशा से तो योग धारण किया था। किन्तु तुम्हें गुरु भी ऐसे ही मिलते गये, जो वो भी भूले हुए थे। अन्धे को अन्धा मिला तो रास्ता कौन बतलाये? इस समय भी तुम भूले हुए हो। तो भी फिर से भूल मत करना।

अब भी रात्रि नहीं आयी है, दिन ही है, सचेत रहो। जिस ठूँठ पर पत्ते ही नहीं हैं, सूख चुका है उस पर फल कहाँ से आयेगा? ये कल्पित देव जिन्हें तुम देवी देवता कहते हो, ये तो सूखे हुए ठूँठ की भाँति है। यहाँ फल कहाँ है? जिसने अनुभव किया है वही जानता है। अनुभवी तो कोई बिरला ही होते हैं। जिस प्रकार कपूर ऊपर से देखने में तो बहुत अच्छा रुचिकर प्रतीत होता है, किन्तु उसे घोटकर चखकर देखे, तो असलियत का पता चले। उसी प्रकार से तथाकथित देवी देवता कपूर की तरह ही शोभायमान हैं, किन्तु रस एवं फल में कटुता भरी है।

सतगुरु यदि है तो सहज में ही पहचान करले। अन्यथा तो सतगुरु के नाम पर डुबोने वाले ही अधिक सक्रिय हैं, जो व्यक्ति भ्रमित है जांचध पीलिया रोग से पीड़ित है वह तो जो आँखों में पीलापन है। वही सभी जगह देखेगा। स्वयं स्वार्थवश देखेगा और दूसरों को भी आल-बाल कुछ बकेगा।

अधूरा कर्म पूर्ण फल नहीं दे सकता। ओछे छोटे देवता की पूजा भी जन्म-मरण के चक्कर से नहीं छुड़ा सकती। बार-बार जन्म-मरण के चक्कर में डालेगी। किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँचना, यह भ्रमित का लक्षण है। भ्रान्त व्यक्ति कभी स्वर्ग (मोक्ष) को प्राप्त नहीं कर सकता।

मृत्यु काल में भगवान् निरंजन ही सम्पूर्ण जीवन का लेखा जोखा माँगेगा। उस समय आन देवता की पूजा साधना जवाब नहीं देगी। वहाँ पर इस साधना का कोई महत्व नहीं होगा। ये बाते तो वहाँ छुपानी ही होंगी। ये भूत-प्रेत तो बिना कण के थोथे भूसे की तरह व्यर्थ ही हैं। बिना रस के बाकस की तरह इनकी पूजा की हुई व्यर्थ में हो जायेगी। उस अमृतमय परमात्मा से दूर ही ले जायेगी। जिस प्रकार से जिस परिवार में शुद्ध क्रिया नहीं है, वह परिवार भी व्यर्थ ही है।

वह परिवार एकता नहीं रख सकता, बिखर जायेगा। इसी प्रकार से तुम्हारा सम्पूर्ण प्रयास धूल धूसरित हो जायेगा। हरि की कृपा बिना तो इस शरीर से जब आत्मा निकलेगी तो पार नहीं पहुँच सकेगा। हरि ही संसार सागर में डूबते हुए का एक मात्र सहारा है। इसलिये अम्बाराय मेरे श्री भगवान् विष्णु के परम धाम पहुँचने के लिये, सदा सदा के लिये जन्म मरण से मुक्त होने के लिये, अन्य देवता को छोड़कर एक हरि का ही सहारा पकड़े, तभी कल्याण युक्ति मुक्ति है। योग धारण करने का फल है।

जोगी कहै जाम्भाजी हम जोग साज्या है नव पोली जीती है जाम्भोजी श्री वायक कहै

शब्द-78 ओ३म् नवै पोल नवै दरवाजा, अहूँठ कोड़रूं राय जड़ी।

कांय रे सींचो बनमाली, इंहि बाड़ी तो भेल पड़सी।

सुवचन बोल सदा सुहलाली, नाम विष्णु को हरे सुणो।

घण तण गड़बड़ कायों वायो, निज मारग तो बिरला कायो।

निज पोह पाखो पर असी पर, जाण म गाहि म गायो 3ूंणो।

श्रीराम में मति थोड़ी, जोय जोय कण बिण कूकस कांयो लेणो।

योगी बालनाथ कहने लगा-हे जाम्भोजी! हमने योग साधना की है। नौ पोल जीती है। जाम्भोजी शब्द कहै -

हे बालनाथ! इस शरीर की संरचना में नौ दरवाजे हैं (दो आँखें, दो कान, दो नासिकाएँ, एक मुख) ये सात तो ऊपर के दरवाजे तथा दो नीचे के उपस्थ एवं गुदा। ये नौ दरवाजे तथा नौ ही इनके पीछे पोल खाली जगह हैं। जहाँ पर ये इन्द्रियाँ अवस्थित होती हैं। तथा साढे तीन करोड़ रोमावली छिद्रों से यह शरीर युक्त है। ये सभी दरवाजे बाह्य वस्तु ज्ञान को ग्रहण करते हैं और अन्दर के अवशिष्ट मलादि का त्याग करते हैं।

इस प्रकार यह शरीर एक जंगल के रूप में है। जहाँ पर अनेकानेक झाड़ियाँ आदि उगे हुए हैं, इसी वन की सिंचाई माली बन कर के कर रहे हैं। इससे पार भी जाना है। यह साधना तो तुमने की ही नहीं। यह वनबाड़ी तो एक दिन अवश्य ही मुरझा जायेगी तथा उजड़ भी जायेगी। इसलिये हे योगी! सुवचन का उच्चारण करोगे, तो सदा ही खुशहाली बनी रहेगी।

तुमने योग धारण कर लिया है, तो सदा निरंतर एक विष्णु का ही स्मरण,पूजन करो। उसी का ही कीर्तन करो। यही तुम्हारा कर्तव्य है। अधिक भाग-दौड़, उछल-कूद क्यों कर रहे हो? शांत होने की कोशिश करो। अपने निज स्वकीय मार्ग पर चलो। स्व धर्म के अनुयायी बनो। ऐसे मार्ग पर तो कोई विरला ही चलता है।

यदि अपना निज पथ छोड़ कर देखा देखी चलेगा, तो पार नहीं उतर सकोगे। यही चौरासी लाख जीव योनियो में भटकोगे। जानते हुए भी भूल कर रहे हो। तुम्हें पता है कि मूँग मोठ निकाल लेने के पश्चात् पद्धछे गूणा (भूसा) ही अवशिष्ट रहता है। उसे तुम दुबारा गाहटा करोगे तो आपका प्रयत्न व्यर्थ ही जायेगा। उसमें अन्न कहाँ है।

श्री रामजी में तो बुद्धि (विश्वास) कम ही है, किन्तु संसार में मति अधिक है। यदि ऐसा है तो बिना कण के थोथे घास को ले रहे हैं। उसमें अन्न आदि तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती।

जोगी कहै जांभाजी! जोग सों उमर बधै-जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द-79 ओ३म् बारा पोल नवै दरसाजी, राय अथरगढ़ थीरूं।

इस गढ़ कोई थीर न रहिबा, निश्चै चाल गया गुरु पीरूं।

योगी कहने लगा - हे देव जाम्भोजी! हम लोग योग साधना करते हैं। श्वासों को जीत लिया है। इससे हमारी आयु बढती है।

जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-यह जीवात्मा इस बारा पोल और नौ दरवाजे वाले शरीर में बैठा हुआ है। बाहर तो क्योंकि पोल (शून्य आकाश) ही है। उस शून्य आकाश मार्ग से जीव निकलकर के चला जायेगा। आगे मार्ग साफ है। शरीर में बैठा हुआ यह न जाने कौन से दरवाजे से निकलेगा? उसे तुम कैसे रोक सकोगे?

यह जीव अन्दर बैठा है तभी तक यह काया-जीवन है। इस काया गढ में न तो अब तक कोई स्थिर रहा है और न कोई आगे स्थिर रहेगा। कुछ तो जल्दी ही प्रयाण कर जाते हैं। तो कुछ बाद में इससे कुछ भी अन्तर नहीं पड़ता। निश्चित् ही गुरु पीर राजा आदि चले गये हैं। हे योगी! तुम लोग इसमें रहने का विचार कर रहे हो। इस प्रकार से बालनाथ एवं कंवलनाथ जाम्भोजी के शिष्य बने। धर्म का आचरण किया।

यह बिश्नोई पंथ सीधा, सरल एवं साफ है। इसलिये इसमें समय-समय पर अनेकानेक लोग सम्मिलित होकर कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होते रहे हैं।

नाथोजी उवाच-हे शिष्य! इस परम पवित्र सम्भराथल पर देवजी इन हरि भरी कंकेहड़ी वृक्षों के नीचे विश्राम करते थे। उनके बिछाने के लिये कोई आसन आदि नहीं था। इसकी पूर्ति हेतु गंगा पार से आने वाले बिश्नोई यात्री सुन्दर मखमल का बिछौना लेकर श्री देवजी के पास आये थे। इस बात को मैं तुझे विस्तार से बतलाता हूँ।

एक पूरब को बिश्नोई मखमल मीसरू को गदरो रूई सू छलाय र ल्यायो। तम जाम्भोजी पोढो तदे यापे सोइयो। जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द-80 ओ३म् जे म्हां सूता रेण बिहावे, तो बरते बिम्बा बारूं।

चन्द भी लाजै सूर भी लाजै, लाजै धर गेणारूं।

पवणा पांणी ये पण लाजै, लाजै बणी अठारा भारूं।

सप्त पताल फु णींदा लाजै, लाजै सागर खारूं।

जम्बु दीप का लोइया लाजै, लाजै धवली धारूं।

सिध अरु साधक मुनिजन लाजै, लाजै सिरजन हारूं।

सतर लाख असी पर जंपा, भले न आवै तारूं।

एक पूर्व गंगा पार का बिश्नोई मखमल मिसरूं का गद्दा रूई से भराकर के सम्भराथल पर लाया, और जाम्भोजी से कहा - हे देव ! आप यहाँ वृक्ष तले रेत पर ही बैठे रहते हैं। रात्रि में सोते नहीं। शायद यहाँ कठोर भूमि में नींद नहीं आती होगी? आप यह मखमल का गदरा स्वीकार कीजिये। इस पर सोइये। आपको गहरी नींद आयेगी।

सतगुरु जी ने शब्द सुनाते हुए इस प्रकार से कहा - हे भक्त ! क्या मैं तुम्हारे कथानुसार सो जाऊँ? यदि मैं सो गया तो तुम नहीं जानते क्या हो जायेगा? हमारे सोने का अर्थ तुम नहीं जानते। यदि मैं सो गया तो रात्रि हो जायेगी अर्थात् प्रलय हो जायेगा। अभी मुझे असमय में मत सुलाओ। प्रलय होने का समय नहीं आया है। जब तक एक हजार युग पर्यन्त मैं सोता रहूँगा तो रात्रि ही बनी रहेगी। और जब मैं जग जाऊँगा तो उतना ही दिन रहेगा।

इस समय प्रलय हो जाये तो सूर्य,चन्द्र,तारे,धरती,गगन,मण्डल,पवन,पाणी,अठाहर भार वनस्पति,सातों पताल, शेष नाग, सागर, सिद्ध, साधक, मुनिजन तथा सृजनहार तथा इस जम्बू दीप के लोग ये सभी लज्जित हो जायेंगे।

ये सभी असमय में ही प्रलय हो जायेगा। यहाँ कुछ भी नहीं रहेगा। किसी भी प्रकार का जीवन एवं जीने का साधन नहीं रहेगा। इसलिये मुझे आप सोने के लिये ना कहो। अब तो जीओ और विकास करो, यह समय अनुकुल है।

हे लोगों! इस समय तो साधना भजन करो। भजन भी ऐसा करो जो तुम्हें संसार सागर से पार उतार दे। जिस प्रकार से लाख की चूड़ियाँ बनती हैं लाख को तपा करके साँचे में ढाला जाता है, तो वे साँचे का आकार ग्रहण कर लेती हैं उसी प्रकार से तुम्हारी चित्त वृत्ति भी तदाकार-विष्णु के आकार की हो जाये। वही सच्चा भजन होगा। सर्वत्र विष्णु परमात्मा का ही दर्शन हो सके, ऐसी साधना करो।

पुनः वील्होजी को समझाते हुए नाथोजी कहने लगे- जाम्भोजी ने अनेकानेक साधन - मार्ग मुक्ति के लिये बतलाये हैं, उस समय सम्भराथल पर विराजमान देवजी के पास में योगी,सिद्ध, विशेष रूप में आया करते थे। उन्हें उसी प्रकार की बात बतलाया करते थे। एक समय की बात है कि जाम्भोजी के पास एक साधु आया और उनसे वार्ता हुई। वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। एक साधक साधु का क्या कर्तव्य है ऐसा श्री देवजी ने बतलाया था -

एक साध परदेस ता चाल्यौं। घोड़ी नै घोड़ो छोड़ी नीसरयौ। घाटि बाधि छः महीना को बछेरो हुवौ। बीकानरे को देश पूछि पांव धोपालियै आयौ। एक लुगाई पूछै कीथोड़ीयौ आयौ। कीथोड़ी जासी। साध कहै देवजी के दीवाणि जासूं। अत तो देव कोई नहीं। एक पाखण्डी सो थै। पाखण्ड चलायौ थै। कोई देव ना बात। साध पछताणें। कलपण लागौ। देवजी दूवागर मेल्ह्यों। दुवागर कहै- साध तन्है देवजी यादि कीयौ। कह्यों घोड़ी झालै बैठो थै। जीह नै जाय बुलाय ल्यावो। साध खुसी हुवो। देवजी कै दीवाण आयौ। देवजी कहै साध कलप्यौ क्यौ। देवजी ! थानैं पाखण्डी कह्या। जाम्भोजी श्री वायक कहै-

शब्द-81 ओ३म् भल पाखण्डी पाखण्ड मंडा, पहला पाप पराछत खंडा।

जा पांखडी के नादे वेदे शीले शब्दे बाजत पौण।

ता पाखंडी ने चीन्हत कौण, जाकी सहजै चूके आवागौण।

एक साधु प्रदेश से चला। उसके पास में सवारी हेतु घोड़ी थी। जब अपने देश में चला था तब घोड़ी गर्भवती हुई थी और सम्भराथल तक पहुँचते पहुँचते बछेरा छः माह का हो गया अर्थात् सत्रह-अठारह माह बराबर चला था। तब धूँपालिये गाँव में सम्भराथल के निकट पहुँचा था। धूँपालिये गाँव की एक महिला ने पूछा-कि कहाँ से आये हो? और कहाँ जाओगे?

साधु ने कहा-हे देवी ! मैं बहुत ही दूर से चल कर आया हूँ और देवजी जाम्भोजी के पास जाऊँगा। वह देवी कहने लगी-यहाँ पर कोई देव नहीं है। एक पाखण्डी अवश्य ही है। पाखण्ड चलाता है। न कोई देव है और न ही कोई देव पने की बात ही है।

साधु पछताने लगा-इतनी दूर से चलकर आया, किन्तु यहाँ के लोग तो पाखण्डी बतला रहे हैं। मेरा यहाँ तक आना व्यर्थ ही हुआ। देवजी ने सम्भराथल पर विराजमान होते हुए भी बात जान ली और अपने एक सेवक को भेजा। सेवक ने जाकर कहा-हे साधो! तुम्हें देवजी ने याद किया है। वहीं सम्भराथल पर बुलाया है। मुझे तुम्हारे पास भेजा है और कहा है कि घोड़ी पकड़े हुए साधु बैठा है, उसे बुला लाओ। ऐसा निमन्त्रण सुन कर साधु बड़ा ही प्रसन्न हुआ। और देवजी के पास सम्भराथल आ गया। देवजी ने कहा-हे साधो! तुम दुःखी क्यों हुए? हे देवजी! आपको उस स्त्री ने पाखण्डी बतलाया था। इसलिये मुझे दुःख हुआ। जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-हे साधु पुरुष! उस स्त्री ने मुझे पाखण्डी बतलाया था। सो ठीक ही बतलाया था। मैं पूरा पाखण्डी हूँ। मैने पूरा पाखण्ड प्रारम्भ कर दिया है। प्रथम तो पाखण्ड द्वारा मैंने पापों का खण्डन कर दिया है। पापों को पराजित करके उन्हें भगाता हूँ।

मेरे पास पापों का खण्डन करने के चार साधन हैं। प्रथम नाद, वेद, शील और शब्द। इन साधनों की महत्ता बढती है, तो पाप भाग जाते हैं। ऐसा मैं पापो। का खण्डन करने वाला पाखण्डी हूँ। ऐसे पाखण्डी को कोई पहचान लें तो उसका सहज में ही जन्म-मरण मिट जायेगा। जीवन मुक्त होकर आत्मानन्द का लाभ मिलेगा।

साध सबद क सांभल्यौ। सतगुरु नै साच करि जाणै। साध के हिरदे की खिड़की खुली। साध को सबद कह्यो -

शब्द-82 ओ३म् अलख अलख तूं अलख न लखणा, तेरा अनन्त इलोलूं।

कौण सी तेरी करणी पूजै, कोण से तिंहि रूप सतूलूं।

हे साधो! तू वाणी द्वारा तो “अलख-अलख” ऐसा उच्चारण करता है, किन्तु उस अलख को तुमने जाना-पहचाना नहीं है। उस अलख को जान ले तो तेरे अन्दर आनन्द उमंग की लहर उठ रही है, उससे परिचित हो जायेगा। ऐसा होने पर फिर संसार के दुःखों से दुःखित नहीं होगा। वह आनन्द तुझे अपने में डुबोये रखेगा।

ऐसा कौन सा कर्म तू करता है,ऐसी कौन सी तू पूजा करता है, जिससे आत्मानन्द की अनुभूति हो सके। तू है तो सच्चिदानन्द रूप। तेरे स्वरूप की तुलना किससे की जाय? ऐसा कुछ है भी नहीं, जो तुम्हारी बराबरी कर सके।

देवजी कहै सबद मत कहै। तेरे जीव को भलो हुवो। तेरा जीव काया छोडिसी जदि अढाई घड़िये सुरगे जासी। साथरिये कह्यौ देवजी! अणी सिर का केस मैल्ह कराया नहीं। चलु लियो नहीं। इह नै थे सुरग दीन्हौ। औरा नै तो घणा घणा बरष हुवा। भजन भगति करता नै। जांह नै तो कदे कहो नहीं। देवजी कहे-अणि म्हानै रूड़ा पिछाण्यां।

उस साधु के मन में उस स्त्री के प्रति रोष था। क्योंकि उसने जाम्भोजी को पाखण्डी कहा था। वह कुछ अप शब्द कहने लगा-जाम्भोजी ने रोक दिया और कहा-ऐसा किसी के प्रति मत बोलो। अब पीछे की बात को भूल जाओ। तुम्हारा भला हो गया। तुम्हारा जीव तुम्हारी काया को छोड़ कर जायेगा तो अढाई घड़ी में ही स्वर्ग पहुँच जायेगा।

साथरियों ने पूछा हे देवजी ! इस साधु ने तो आपसे संपर्क सत्संग किया ही नहीं,सिर के बाल कटवाये ही नहीं,नियमों का पालन किया ही नहीं,पाहल भी ग्रहण नहीं किया,इसको आपने अति शीघ्र ही मुक्त होने का वरदान दे दिया। हम लोगों को तो देखिये तथा दूसरो को भी, बहुत वर्ष हो गये हैं आपकी संगति करते हुए भी पहचान नहीं सके हैं। “क्यूं क्यूं भणता क्यूं क्यूं सुणता,समझ विना कछू सिद्धि न पाई” समझ से ही सिद्धि की प्राप्ति होती है केवल कहने या सुनने से कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता।

अन्य अनेक क्षत्रिय वैश्य आदि के आगमन पर जाम्भोजी ने बतलाया-

एक समै जाट रजपूत मुंडिया नै लैआर देवजी कै दीवाणी आया। थे जाण्यौ म्हे जिसड़ो ज्ञान थांहरै कोई नहीं। मुडिंया कहै थे किसे ठिकाणै रा अतीत। जाम्भोजी श्री वायक कहै-

शब्द-83 ओ३म् जो नर घोड़ै चढ़े पाग न बांधै, ताकी करणी कौण विचारूं।

शुचियारा होयसी आय मिलसी, करड़ा दो जग खारूं।

जीव तड़ै को रिजक न मेटूं, मुवां परहथ सारूं।

हाथ न धोवै पग न पखालै, नहीं सुधी बुधि गिवारूं।

म्हे पहराजा सूं कौल ज लियो, नारसिंघ नर काजूं।

जुग अनन्त अनन्त बरत्या, म्हे सुनि मण्डल का राजूं।

एक समय रजपूत एवं जाट बहुत सारे एकत्रित होकर एक साधु (मोडा) को साथ लेकर सम्भराथल पर देवजी के पास आये और कहने लगे-कि आप समझते हो कि मैं लोगों को प्रमोध (ज्ञान) देता हूँ, जाग्रत करता हूँ। किन्तु हमारे जैसा ज्ञान आपको नहीं है। हम तुम से ज्ञानी ज्यादा हैं। साधु मुंडिया कहने लगा-आप किस आश्रम या मठ के साधु हैं? आप कौन सी पंरपरा से सम्बन्ध रखते हैं?

जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-जो मनुष्य घोड़े पर तो चढना चाहता है, किन्तु पागड़ा (रकाब) नहीं बाँधता। पागड़ा पर ही पैर रख कर घोड़े पर चढा जा सकता है। बिना पागड़ा चढना नादानी है,अज्ञानता है। उसी प्रकार से सर्वोच्च शिखर, वैकुण्ठ धाम तो पहुँचना चाहता है, किन्तु साधना रूपी मार्ग नहीं पकड़ता, तो ऐसे पुरुष के कर्मों के बारे में क्या विचार करे? उसका कर्म तो बिना बीज की खेती की तरह व्यर्थ ही है।

जो शुचि (पवित्र) आत्मा है, वह तो कही से भी आकर मिलेगा। और जो कठोर, अपवित्र, अश्रद्धालु होगा वह दोजक नरक में गिरेगा। इसलिये आप लोग पहले शुचि बनो। इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है, वह अपने पूर्वकृत कर्मो के अनुसार जैसा भी जीवन व्यतीत कर रहा है, उन्हें पूरी आजादी है। उनके कृत कर्मों को मिटाया नहीं जा सकता, किन्तु मरने पर दूसरों के हाथ चढ जायेगा। स्वयं पराधीन हो जायेगा, कुछ भी करने में स्वंतत्र नहीं होगा। यह स्वतन्त्रता तो जीते जी ही है।

जो व्यक्ति हाथ भी नहीं धोता, पैरों को भी नहीं धोता,स्नान आदि शुचि क्रिया भी नहीं करता ऐसे गंवार (मुर्ख) पुरुष को शुद्धि एवं बुद्धि कहाँ से आयेगी। हे साधो ! आपने पूछा कि मैं कहाँ का साधु हूँ? सुनो! मैं तो वैकुण्ठ वासी विष्णु हूँ। प्रह्लाद की रक्षा हेतु जब मैंने नृसिंह का रूप धारण किया था, हिरण्यकशिपू को मारा था, तब मैने प्रहलाद को वचन दिया था। उन वचनों को मैं पूरा करने के लिये मैं यहाँ आया हूँ।

वैसे असली मेरा पता पूछते हो तो सुनो! अनन्त युग व्यतीत हो गये। मेरे देखते हुए, मैंने प्रलय एवं सृष्टि की संरचना देखी है। मैं शून्य मण्डल का राजा हूँ। शून्य मण्डल ही मेरा निवास है। मैं ही उस मण्डल का मण्डलेश्वर हूँ।

मुंडिया कहै म्हे दाढी मूंछ माथै का केस सह मुंडाया भदर हुवा। डाफ डोफ काई राखी नहीं। जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द-84 ओ३म् मूंड मुंडायो मन न मुंडायो, मूंहि अबखल दिल लोभी।

अन्दर दया नहीं सुर काने,निंदरा हड़े कसोभी।

गुरु गति छूटी टोट पड़ैला, उनकी आवा एकपख सातो।

वे करणी हूँता खूंधा, असी सहंस नव लाख भवैलां कुंभी दौरे ऊंधा।

वह साधु फिर से कहने लगा - मैंने दाढी मूंछ तथा सिर के केश सभी मुडवा लिये है। मैं भदर हो चुका हूँ। तथा अन्य कोई दिखावा पाखण्ड नहीं है। मैं स्वर्ग मुक्ति का अधिकारी क्यों नहीं? श्री देवजी ने शब्द सुनाते हुए कहा -

हे साधो! तुमने सिर आदि तो मुंडवा लिये ये तो बाह्य जटाएँ थी। किन्तु तुमने अपने चंचल मन को नहीं मुंडाया। इस मन की चंचलता को नहीं मेटा। इसे स्थिर नहीं किया। मुख से अपशब्द बोलना नहीं छोड़ा। दिल में बैठा हुआ लोभ, उसको भी नहीं छोड़ा। तो केवल वद्भ मुंडाने से क्या होगा? तुम्हारे अन्दर दया भाव नहीं है। कर्ण द्वारा परमात्मा का शब्द स्वर सुनने की क्षमता नहीं है। नित्य प्रति दूसरो की निंदा करता है। अपनी ही हानि करता है। स्वकीय यश को ही पलीता लगाता है। दूसरो का यश समाप्त करने के चक्कर में स्वंय का ही यश नाश करता है। सद्गुरु का बताया हुआ मार्ग छूट गया, तो तुझे बहुत ही हानि उठानी पड़ेगी।

यह दुर्लभ मानव जीवन हाथ से चला जायेगा तो आगे चौरासी लाख छोटी-छोटी योनियों में भटकना पड़ेगा। उनकी आयु एक सप्ताह या दो सप्ताह से ज्यादा नहीं होगी। बार बार अति शीघ्र ही जन्म और मरण को प्राप्त होगा। वे अपने ही कर्म से नरक में गिरोगे। जियेंगे तो मारे जायेंगे, आयु अति अल्प होगी। नौ लाख अस्सी हजार वर्षों तक कठिन दुखदायी कुंभी पाक नरक में चक्कर काटेगा। इसलिये यही समय है। सुकृत करने का। इससे मुख न मोड़ो। आगे फिर से जाट मुंडिया कहने लगे -

जाट रजपूत मुडिया परचि पाऐ लागा। कह-जाम्भोजी-कोई मोटो हुव स बतावौ, जक नुं जपां। जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द-85 ओ३म् भोम भली कृषाण भी भला, खेवट करो कमाई।

गुरु प्रसाद काया गढ़ खोजो, दिल भीतर चोर न जाई।।

थलिये आय सतगुरु परकाश्यो, जोलै पड़ी लोकाई।

एक खिण मांहि तीन भवन म्हें पोखां, जीवाजूण सवाई।

करण समो दातार न हूवो, जिन कंचन बाहू उठाई।

सोई कवीसा कवल नवेड़ी, जिण सुरह सुबछ दुहाई।।

मेर समो कोई केर न देख्यो, सायर जिसी तलाई।

लंक सरीखो कोट न देख्यो, समंद सरीखी खाई।।

दशरथ सो कोई पिता न देख्यो, देवल देसी मांई।

सीत सरीखी तिरिया न देखी, गरब न करीयो कांई।।

हनुमत सो कोई पायक न देख्यो, भीम जैसो सबलाई

रावण सो कोई राव न देख्यो, जिण चोहचक आन फि राई।।

एक तिरिया के राहा बैधी, लंका फेर बसाई।

संखा मोहरा सेतम सेतूं,ताक्यूं बिलगै कांई।।

ब्राह्मण था ते वेदे भूला, काजी कलम गुमाई।

जोग बिहूणा जोगी भूला, मुंडिया अकल न काई।।

इहिं कलयुग मैं दोय जन भूला, एक पिता एक माई।

बाप जाणे मेरे हलीयो टोरे, कोहर सींचण जाई।

माय जाणे मेरे बहूटल आवे, बाजे बिर/ा बधाई।।

म्हें शिम्भू का फरमाया आया, बैठा तखत रचाई।

दो भुजडंडे परबत तोला, फेरां आपण राई।।

एक पलक मैं सर्व संतोषां, जीया जूण सवाई।

जुगां जुगां को जोगी आयो, बैठो आसन धारी।

हाली पूछे पाली पूछे, यह कलि पूछण हारी।

थली फि रंतो खिलेरी पूछे, मेरी गुमाई छाली।

बांण चहोड़ पारधियो पूछै, किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी।

रहो रे मूर्खा मुग्ध गवांरा, करो मजूरी पेट भराई।

है है जायो जीव न घाई।

मेड़ी बैठो राजेन्द्र पूछै, स्वामीजी कती एक आयु हमारी।

चाकर पूछै ठाकर पूछै, और पूछै कीर कहारी।

सोक दुहागण तेपण पूछे, लेले हाथ सुपारी।

बांझ तिरिया बहुतेरी पूछे, किसी परापति म्हारी।

त्रेताजुग में हीरा बिणज्या, द्वापर गऊ चराई।

वृन्दावन में बंसी बजाई, कल जुग चारी छाली।

नश खेड़ी म्हें आगे खेड़ी, दशवें कालंकै की बारी।

उत्तम देश पसारो माड्यो, रमण बैठो जुवारी।

एक खंड बैठा नव खंड जीता, को ऐसा लहो जुवारी।।

राजपूत मुंडिया परिचित हुए और श्री देवजी के चरणों में प्रणाम किया। कहने लगे-हे देवजी! जो सबसे महान् हो, वही हमें बतलाओ। जिसका हम जप करें। जाम्भोजी ने शब्द सुनाया, जिसका भावार्थ-

सबसे उतम तो खेती है। क्योंकि उसी से ही सभी पलते हैं। भोजन करने से ही सभी जीते हैं, केवल खेती करना ही पर्याप्त नहीं है। खेती के साथ ही साथ साधना भी जरूरी है। खेती तथा साधना दोनों ही श्रम साध्य है। इसके लिये भूमि अच्छी चाहिये। जहाँ खेती निपज सकेगी। साधना भी देश काल को ध्यान में रखकर करनी चाहिये। जिससे शीघ्र फलदायी हो सके। स्वयं परिश्रम करे, किन्तु इतना ही पर्याप्त नहीं है। गुरु की कृपा भी साथ में चाहिये, ताकि खेती साधना सफल हो सके।

इस काया रूपी गढ में काम क्रोधादि चोर प्रवेश न कर जायें। इसके लिये सचेत रहना जरूरी है। उसी आत्मा परमात्मा को काया रूपी गढ में देखो। वही हृदय देश में अवस्थित है। इस सम्भराथल पर सद्गुरु के रूप में स्वंय विष्णु आये हैं। उनका प्रकाश ज्ञान फैल रहा है। अब अन्धेरा मिट गया है। जो कुछ छिपा हुआ है, जो अन्धेरे में नहीं दिख रहा था, अब उसे खोज लो। दीख जायेगा।

श्री देवजी कहते हैं कि मैं सर्वत्र व्यापक होकर, सभी जीव-योनियो में प्रवेश करता हूंँ तथा उनका पालण-पोषण भी एक क्षण में कर देता हूंँ। कर्ण के समान कोई दाता नहीं हुआ। जिन्होंने हाथ में सोना लेकर सदा ही दान दिया था। खाली हाथ कभी किसी को नहीं भेजा। किन्तु कर्ण सभी जीवों का पालन- पोषण एक क्षण में करने में असमर्थ था। अवश्य ही घर पर आये हुए अतिथि को देता था। किन्तु सभी जीव योनियों तक नहीं पहुँच सका था। कह दिया दूँगा, तो अवश्य ही दिया। माता कुन्ती को वरदान,इन्द्र को कवच कुण्डल, तथा ग्वाला ऋषि को गोदान इत्यादि।

श्री जाम्भोजी कहते हैं-मैंने सुमेरू पर्वत जैसा कोई पर्वत नहीं देखा। समुद्र के समान तालाब नहीं देखा। लंका जैसा कोई कोट नहीं देखा। समुद्र जैसी खाई नहीं देखी। दशरथ जैसा कोई पिता नहीं देखा। देवकी जैसी कोई माता नहीं देखी। सीता जैसी की नहीं देखी। जिन्होंने किंचित भी अहंकार नहीं किया। बड़े घर की बेटी एवं बहू होकर भी गर्व नहीं करना कुछ विशेषता बतलाता है। हनुमान जैसा कोई सेवक नहीं देखा और भीम जैसा कोई बलवान भी नहीं देखा। रावण जैसा कोई राजा नहीं देखा। जिन्होंने चारों दिशाओं में अपनी आण-मर्यादा, राज्य सीमा फैला दी थी। किन्तु एक की सीता के लिये अपना विकास अवरुद्ध कर बैठा। जिस वजह से लंका दुबारा बसायी गयी। रावण और लंका दोनों ही तहस नहस हो गये। स्वर्णमयी लंका में शंख, मोहर, हीरे आदि लंका की शोभा बढाते थे।

वह लंका रावण की क्यों छूटी? एक की का हरण किया, इस वजह से। यहाँ पर जाम्भोजी कहते हैं कि मैंने तो रावण, लंका, सीता, हनुमान, भीम, देवकी, दशरथ आदि को देखा है। तो इसका अर्थ है कि जाम्भोजी उस समय मौजूद थे और इस समय भी हैं, आगे भी रहेंगे। अपनी आँखों देखी बात बतला रहे हैं।

श्री देवजी ने आगे फिर कहा-यहाँ पर मरुभूमि में कलियुग के पहरे में जो ब्राह्मण थे, वे तो वेद को भूल चुके हैं, अपने धर्म को ही भूल गये हैं। काजी लोग कुरान को भूल गये हैं, कलमे का क्या मतलब है? इन्हें पता नहीं है। केवल बाह्य दिखावे के योगी योग मार्ग को भूल गये हैं। मुंडिया लोगों को तो बुद्धि-ज्ञान ही नहीं है। ये लोग ज्ञानी होने का दावा करते हैं, किन्तु इनको ज्ञान नहीं है।

इस भंयकर कलियुग में माता-पिता भी भूल में है। पिता तो यह चाहता है कि मेरा बेटा बड़ा होगा तो हल चलायेगा। कुएँ से जल सींच कर के लायेगा। माता जानती है कि मेरा बेटा बड़ा होगा, तो बहू लायेगा। मैं खुशी मनाऊँगी, बधाइयाँ बाँटूँगी। किन्तु बेटे का क्या कर्तव्य है और माता पिता का क्या कर्तव्य है? ये दोनों ही नहीं जानते।

श्री सतगुरु देवजी कहते हैं-मेरे इस शरीर के माता-पिता लोहट हांसा भी यही सोच रहे थे। किन्तु मैं तो स्वयंभू हूँ। प्रह्लाद को फरमाया था, कि आऊँगा, इसलिये आया हूँ,किन्तु मेरे या अन्य माता-पिता इस बात को क्या समझे, क्योंकि वे तो भूले हुए हैं। मैं यहाँ सम्भराथल पर आसन लगा कर बैठा हूँ, मैं चाहूँ तो दोनो हाथों से पर्वत को उठाकर तोल सकता हूँ। अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकता हूँ।

एक ही पलक में सर्व जीवों को भोजन देकर संतोष पैदा करता हूँ। अनेक शरीरों में आत्मा रूप में प्रवेश करके मैं पोषण करता हूँ। मैं तो युगों-युगों का योगी हूँ। यहाँ पर आया हूँ। आसन लगाकर के बैठा हुआ हूँ। यहाँ सम्भराथल पर आसन लगाकर बैठे हुए को भी बैठने नहीं देते। अनेक प्रकार के लोग आते हैं और पूछते हैं-

हल चलाने वाला हाली पूछता है। पाल-पशु धन चराने वाला पाली पूछता है। इस कलयुग में लोग सांसारिक बातें पूछते हैं, थलों पर घूमता हुआ खिलेरी पूछता है कि मेरी बकरी खो गयी है। आप बतलावें। बाण चलाकर के पारधी (शिकारी) पूछता है कि अकारण ही मेरा निशाना क्यों चूक जाता है?

जाम्भोजी कहते हैं कि-रे मूर्ख। मुग्ध गंवार! मजदूरी करके पेट भराई कर लो, किन्तु इन जीते जागते जीवों को क्यों मारते हो? मैड़ी बैठा हुआ राजा पूछता है कि मेरी आयु कितने दिनों की है? चाकर पूछता है ठाकुर पूछता है। कीर-कहार भी यहाँ आकर पूछते हैं। विधवा स्त्रियाँ पूछती हैं। हाथ में सुपारी की भेंट लेकर स्त्रियाँ पूछती हैं कि मेरे संतान क्यों नहीं हुई? आगे होगी या नहीं? मेरा यहाँ जन्म लेने का क्या प्रयोजन है? यदि संतान ही नहीं होगी तो?

जाम्भोजी कहते हैं कि मैंने त्रेता युग में हीरों का व्यापार किया। उत्तम लोगों के साथ संपर्क हुआ। उत्तम फल की प्राप्ति हुई। द्वापर युग में गऊ चराई। वृन्दावन में बंसी बजाई। किन्तु अब कलयुग में तो छाली-भेड- बकरी चराने का समय आ गया है। यहाँ इस कलयुग में तो भेड-बकरी जैसे ही लोग यहाँ बसते हैं। ऐसे लोगों के साथ मेरा संपर्क है। इससे पूर्व मैंने नौ अवतार लिये हैं। दसवाँ अवतार कल्कि होगा।

इस बार मैंने इस उत्तम बागड़ देश में /ार्म का प्रचार किया है। यहाँ पर मैं एक जुवारी की तरह खेल रहा हूँ। आखिर जीत तो मेरी ही होगी। मैं यहाँ पर बैठा तो एक खण्ड में ही हूँ, किन्तु नव खण्ड को जीत लिया है। ऐसा मैं जुवारी हूँ। कोई लेना चाहे तो अवश्य ही प्राप्त करें।

साथरियाँ जमाती अरज कीवी। जांभोजी सुधी मार्ग बताओ। जाम्भोजी श्री वायक कहे -

शब्द-86 ओ३म् जुग जागो जुग जाग पिरांणी, कांय जागंता सोवो।

भलकै बीर बिगोवो होयसी, दुसमन कांय लकोवो।

ले कूंची दरबान बुलावो, दिल ताला दिल खोवो।

जंपो रे जिण जंप्यो जणीयर, जपसी सो जिण हारी।

लह लह दाव पड़ंता खेलो, सुर तेतीसां सारी।

पशन बंधान काया गढ़ काची, नीर छलै ज्यूं पारी।

पारी बिनसै नीर ढुलैलो, ओपिंड काम न कारी।

काची काया दृढ़कर सींचो, ज्यूं माली सींचे बाड़ी।

ले काया बासंदद्भ होमो, ज्यूं ईधन की भारी।

शील स्नाने संजमे चालो, पाणी देह पखाली।

गुरु के वचने निंव खिंव चालो, हाथ जपो जप माली।

बस्तु पियारी खरचो क्यूं नाहीं, किहिं गुण राखो टाली।

खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली।

घर आगी इत गोवल बासो, कूड़ी आधो चारी।

सुकरत जीव सखायत होयसी, हेत फ लै संसारी।

आज मूवा कल दूसर दिन है, जो कुछ सरै तो सारी।

पीछे कलियर कागा रोलो, रहसी कूक पुकारी।

ताण थकै क्यूं हार्यो ना ही, मुरखा अवसर जोला हारी।।

साथरियां जमाती के लोगों ने अर्ज की कि हे गुरुदेव ! आप हमें कोई ऐसा पवित्र मार्ग बताओ कि हम पवित्र हो सकें? जाम्भोजी ने शब्द द्वारा बतलाया-हे प्राणी ! जागो!

इस युग के लोगों! समयानुसार चलो! जाग्रत होवो! जागते हुए सोते क्यों हो? जागने का अर्थ है कि सचेत हो जाओ। दृष्टा (साक्षी) बनो। आलस्य निंद्रा प्रमाद में समय नष्ट न करो। एक क्षण में ही यह जीवात्मा शरीर से विलग हो जायेगी। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा। तुम्हारे अन्दर बैठे हुए काम क्रोधादि दुश्मनों को क्यों छिपाते हो? अपने सद्गुरु को अपने पास बुलाओ। वह तुम्हारी अज्ञानता का ताला सद्गुरु खोल देगा। आप अन्दर प्रवेश करोगे, तो अन्दर छुपे हुए आपके दुश्मन भाग जायेंगे।

हे लोगों! विष्णु का जप करो। वह विष्णु ही तुम्हारा जन्म दाता, पालन कर्ता एवं संहारकर्ता भी है। जप भी वही करेगा, जो उसको पहचान लेगा। जैसा जहाँ भी अवसर-दाव मिल जाये, यह भक्ति-भजन का खेल खेलो। इसी खेल को ही तेतीस कोटि देवता खेल रहे हैं। इसी प्रभाव से वे देवता पद को भी प्राप्त हो गये हैं। श्वास प्रच्छवास पर आधारित यह कच्ची काया है। पवन में बंधी हुई विनाशशील काया का कुछ भी भरोसा नहीं है। जिस प्रकार से जल से भरा हुआ कच्चा घड़ा होता है,वह कच्चा घड़ा

कब फूट जाये और जल बिखर जाये? फू टा हुआ कच्चा घड़ा किसी प्रयोजन का नहीं होता। उसी प्रकार से यह शरीर भी व्यर्थ ही हो जाता है। जब उसमें से जीव निकल जाता है।

कच्ची काया को पाल- पोष कर के बड़ी करते हैं। समय-समय पर भोजन-जल आदि द्वारा सिंचाई की जाती है। जिस प्रकार से माली बगीचे में पेड़ पौधों की सिंचाई गुड़ाई आदि करके फल देने के लायक बना देता है।

उसी प्रकार से यह शरीर है। एक पौधे की भांति ही है। इससे मधुर फल मिलता। किन्तु कुछ लोग कटु कषाय- जहरीला फल भी प्राप्त कर रहे हैं।

इस काया को तपस्या-त्याग रूपी अग्नि में तपाओगे, तो परिश्रम का फल सुमधुर ही होगा। जिस प्रकार से लकड़ी का गट्ठा जलते हुए ईन्धन में डाल दिया जाता है, तो वह जल कर राख हो जाता है। उसी प्रकार से तपस्या रूपी अग्नि में काम, क्रोध, अहंकार आदि जल जायेंगे, तो इस काया में बैठे हुए परमात्मा का साक्षात्कार हो सकेगा। लकड़ी में अग्नि तो रहती ही है, किन्तु प्रकट जलाने से ही होती है। उसी प्रकार से इस शरीर में आत्मा-परमात्मा तो रहता ही है, किन्तु प्रकट-साक्षात् दर्शन तो तभी होगा जब काम क्रोधादि का पर्दा हट जायेगा।

हे लोगो! शीलवान बनो। नित्यप्रति बाह्य शुद्धि के लिये प्रातःकाल स्नान करो। आन्तरिक शुद्धि के लिये संध्या हवन आदि कार्य करो। मन-बुद्धि का संयम करो। इन्द्रियों को वश में करो। इस शरीर को जल से धो डालो और मन को भगवान् की भक्ति संयम-नियम से धो डालो। गुरु के वचनों को श्रद्धा विश्वास पूर्वक धारण करो। सभी के प्रति नम्रता, सहनशीलता का स्वभाव धारण करो। हाथों में माला रखो, और विष्णु का जप करो।

जो वस्तु अपने को प्यारी लगती है, उसे ही एकत्रित क्यों करते हो? उसे खर्च करते रहो। व्यय करने में लाभ है और जोड़कर रखने में हानि है। जल पड़ा हुआ गंदा हो जाता है। बहता हुआ जल स्वच्छ (उज्ज्वल) पवित्र रहता है, इसी प्रकार से धन-संपत्ति है। ऐसा विचार करके देखोगे तो निहाल हो जाओगे। परमात्मा को प्राप्त कर जाओगे।

सच्चा घर तो आगे है। यहाँ तो गोवलवास ही है। जिस प्रकार से अकाल या विपत्ति दशा में अपने घर को छोड़कर के कुछ दिनों के लिये अन्यत्र समय व्यतीत करने के लिये चले जाते हैं। उसी प्रकार से यह संसार है, असली घर तो हम जहाँ से आये है वही वापिस जाना है वहीं है। जीव शरीर में रह कर जीता है इसके द्वारा किया हुआ सुकर्म ही इस जीवन में सुख-दुःख का हेतु है। आगे भी सुकर्म ही सखा की भांति साथ जायेगा। इस संसार में प्रेम ही फलीभूत होता है। प्रेम ही इह लोक एवं परलोक में साथ देता है।

जीवन जीते हुए एक दिन मृत्यु भी आ जाती है। आज मृत्यु प्राप्त हु, शरीर से जीव आत्मा विलग हुई है। कल दूसरा दिन होगा। और परसों तीसरा दिन भी आ जायेगा। कब तक यहाँ रहेगा? तीसरे दिन तो यहाँ से प्रस्थान करना पड़ेगा। भाई-बन्धु तीसरे दिन एकत्रित हो कर विदाई दे देंगे। जलांजलि प्रदान कर देंगे। बस इतना ही तुम्हारा हमारा सम्बध था। अब आगे जैसी तुम्हारी कर्म वासना होगी, वैसा ही जन्म होना निश्चित होगा। इन तीनों दिनों में भी यदि मोह माया का जाल छोड़ सके, तो छोड़ देना। यह अवसर प्राप्त है। संसार, परिवार, धन-दौलत को छोड़कर ऊपर उठ सके तो उठ जाना, अन्यथा तो यहीं कहीं पुनः जन्म हो जायेगा।

तीसरे दिन भाई-बन्धुओं को भोजन करवाये, उस अन्न द्वारा जीव आगे के जन्म की यात्रा करेगा। अन्न नहीं जिमायेंगे, तो वह जीव दुर्गति को प्राप्त हो सकता है। दूसरे जन्म का आधार अन्न ही है। मरने के पश्चात् तो पीछे तो रोना-पीटना ही रह जाता है। वह रोना-चिल्लाना जीव की सम्मति में सहायक नहीं होगा। उस समय तो भगवान् का कीर्तन ही सहायक हो सकेगा।

अपनी निजी ताकत होते हुए भी हे जीव ! तू क्यों हार गया? इस संसार में तो खेल खेलने के लिये आया था। बहुत दाँव खेले सभी उलट ही पड़ गये। इस अवसर का सदुपयोग करना चाहिये था किन्तु मुर्खता वश दुरुपयोग ही किया।