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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह48 / 94

आठवाँ अध्याय · कथा 48

बाजोजी तरड़ को सन्मार्ग में लाना

वील्हो उवाच - हे गुरु देव ! त्रिगुणात्मिका यह माया है। सम्पूर्ण संसार इस माया के वशीभूत ही होगा। सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से ऊपर भी कोई व्यक्ति उठ सका है या सभी अपने स्वभाव में ही प्रवृत्त हो रहे हैं, यदि स्वभाव को व्यक्ति नहीं छोड़ सकता, तब तो व्यक्ति सुधार का कार्य व्यर्थ ही सिद्ध होगा? क्या जाम्भोजी ने ऐसे व्यक्ति का आमूल-चूल परिर्वतन किया है? यदि किया है तो ऐसे व्यक्ति की कथा सुनाइये,जिससे श्री सिद्धेश्वर जी की महत्ता एवं भगवान् की दिव्य लीला का श्रवण हो सके और व्यक्ति के सुधार का मार्ग प्रशस्त हो सके?

नाथोजी उवाच - हे शिष्य ! मैं तुम्हें आँखों देखी घटना कहता हूँ। जो कुछ भी मैंने प्रत्यक्ष आँखों से देखा है। उसमें संदेह की कुछ भी गुंजाइस नहीं है। एक समय सम्भराथल की हरि कंकेहड़ी के नीचे आसन लगाये हुए सिद्धेश्वरजी विराजमान थे। बिश्नोई पंथ का विस्तार हो चुका था। जाम्भोजी ने दो प्रकार के शिष्य बनाये थे, प्रथम तो विरक्त साधु समाज, दूसरा गृहस्थ समाज। एक समय जाम्भोजी के चेले साधु समाज की मण्डली भ्रमण करते हुए जसरासर गाँव में पहुँची। बीकानेर राज्य का यह गाँव है। इस गाँव में तरड़, गौत्र के जाट रहते हैं। इन लोगों में किसी प्रकार की भक्ति,क्रिया आदि साधन नहीं थे। कुकर्म सुकर्म का ज्ञान भी नहीं था। साधुओं की मण्डली ने अपनी इच्छा से भ्रमण करते हुए गाँव में प्रवेश किया था। भोजन की इच्छा से गाँव की एक बहन सहजा के घर पहुँच गये थे। सहजा का हृदय अन्य लोगों की अपेक्षा शुद्ध-पवित्र था। सहजा ने संतों को नमन किया तथा प्रेम से भोजन दिया। संत मण्डली भोजन करके चलने लगी तब सहजा ने हाथ जोड़े और कहा -

आप संत लोग परोपकारी हैं। मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे घर पर पधारे। मैं आपकी शरण में हूँ। अब आप कृपा करो। जीवन सफल होने का उपाय बतलाओ। अन्यथा तो भवसागर में डूबने का खतरा तो अवश्य ही है। यही जीवन डूब गया तो फिर बचेगा ही क्या? संतों ने शुद्ध हृदय सहजा को देखा और अधिकारी मान कर उससे इस प्रकार से कहने लगे -

हे सहजा-तू सद्गुरु के पास जाओ। सम्भराथल पर सद्गुरु सदा ही विराजमान है। वो ही तुम्हारा भला करेंगे। सहजा ने संतों की बात को सत्य माना और दूसरे दिन प्रातः काल ही सहजा फल फूल घृत आदि की भेंट लेकर सम्भराथल पर श्री देवजी के पास पहुँच गयी। देवजी के सामने भेंट रख कर के कहने लगी-

हे देव! आप तो पूर्ण परमात्मा हो। इस समय सद्गुरु के रूप में विराजमान हो। ऐसा मैंने संतों के मुख से सुना है। उन्हीं को मैं आज अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रही हूँ। मैं आप से क्या कहूँ? माया के वशीभूत होकर जंजाल में यह जीव उलझ गया है। मैं निष्प्रयोजन ही संसार में भटक रही हूँ। मुझे नियम धर्म का कुछ भी पता नहीं है। अब मैं आपकी शरण में हूँ। आप ही मेरी इच्छा पूर्ण करोगे। इस प्रकार से निष्कपट भाव से की गयी प्रार्थना को श्रवण कर के श्री जांभोजी कहने लगे -

हे बहन! कुकर्मों का त्याग करो। झूठ,कपट,दम्भ,एवं अपनी बड़ाई इत्यादिक के नजदीक भी नहीं जाना।

नित्यप्रति ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर शौच स्नानादिक क्रियाएँ करना। हवन, विष्णु-भजन आदि के कार्य करना। घर पर आये हुए अतिथि, संत जनों की सेवा करो। ऐसा उपाय करो कि थोड़ा-थोड़ा पुण्य होता रहे। पुण्य दान करने से होता है तथा दान सुपात्र को देना। यही सब से बड़ा यज्ञ है। यह घर में चलता रहे। इस प्रकार से पुण्य को पांगला कर के रखे, ताकि घर में ही बना रहे,अन्यथा घर से निकल जायेगा।

ऐसे हरि के वचनों को सुना। हरि के चरणों में प्रणाम किया और वापिस अपने गाँव जसरासर चली गयी। जैसा श्री सद्गुरु ने कहा था वैसे ही नियमों का पालन करने लगी। इस बात का पता जसरासर के चौधरी बाजाजी तरड़ को लगा-बाजा स्वयं देखने के लिए एक दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ही सहजा के घर पर आया,उस समय सहजा स्नान करके आयी थी।

बाजा ने कहा-हे बहन! सुबह-सुबह ठण्डी में स्नान करने का क्या प्रपंच कर रही है? सहजा ने बाजा के वचन सहन कर लिये, जो कि असहनीय थे। नियम धर्म को बाजा प्रंपच बता रहा था।

सहजा हंस कर के कहने लगी-हे भाई! मैं तो जाम्भोजी की चेली हूँ। वे तो सम्भराथल पर सदा ही विराजमान हैं। उनका दर्शन करने से ही सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। सहजा की वार्ता सुन कर के बाजो कहने लगा-तू कहती है, तो मैं जाकर स्वयं देखूँगा कि क्या है? शायद पाखण्डी होंगे। लोगों को बहकाते है। अपनी इच्छा से मनमुखी धर्म चलाते हैं। यह सवेरा स्नान करने का नियम कहाँ से आया है? हमारी परंपरा में तो ऐसा नहीं था।

बाजोजी क्रोधित होकर सम्भराथल गया और कहने लगा-मैं जो चाहूँगा वही परचा देंगे, तो मैं दास हो जाऊँगा अन्यथा मैं यहाँ पर तुम्हारा पाखण्ड नहीं चलने दूँगा। जम्भेश्वरजी ने कहा- हे बाजा! जो तुम्हें चमत्कार चाहिये, वही परचा मैं तुम्हें दूँगा, बोल क्या माँगता है?

बाजोजी के बाप दादा का धन धरती में गड़ा हुआ था, किन्तु बाजा को पता नहीं था कि कहाँ है? बाजोजी ने धन प्राप्ति हेतु जाम्भोजी के चरणो में लंबा पड़कर दण्डवत प्रणाम किया। श्री देवजी के चरणों को पकड़ा। सिर झुकाया। जिससे कुछ कोमल हुआ और कहने लगा-

हे देव! हमारे पुरखों का धन धरती में गड़ा हुआ है। आप कृपा कर के बतला दीजिये। जाम्भोजी ने कहा- एक मूण (मटका) सोने-चाँदी का भरा हुआ है, वह जमीन में है। तुम नहीं जानते। किन्तु तुम्हारे दोनों बेटे और बहू जानतद्ध है। उन्हें पता है। क्योंकि वह धन उन्हीं का है। उन्होंने ही पूर्व जन्म में अपने लिये ही एकत्रित करके रखा था। उन्हें जाकर पूछ लेना, वे बतला दे3े। अब उन्हें याद हो आयी है।

बाजा सम्भराथल से अति शीघ्रता से वापिस अपने घर आया और अपने दोनों बेटों से पूछा-तो उन्होंने बतलाते हुए कहा-पिताजी। इस बात का तो हमें पता ही था। हमने आपको वैसे नहीं बतलाया था। आपने भी कभी हम से पूछा भी नहीं था। हमें तो जाम्भोजी की कृपा से साफ दिखाई दे रहा है। क्योंकि वह तो आपने भी कभी हमसे पूछा भी नहीं था। क्योंकि वह तो हमारा ही अपना धन था, जो सुरक्षित रखा था। आप जब चाहो, तभी लाकर उपस्थित कर देंगे।

ऐसी बेटों की वार्ता सुनकर बाजा बहुत ही प्रसन्न हुआ और कहने लगा-हे बेटा! वह धन अभी निकाल कर ले आओ। मैं उस धन से बहुत बड़ा यज्ञ करूँगा। न्यात जमात को भोजन जिमाऊँगा, पहिया करूँगा, दस दस कोश से सभी गाँवो के लोग आयेंगे। उनको भोजन दूँगा। अपना पाप नष्ट होगा। हे बेटे! आपका नाम सभी जगह प्रकट होगा, लोग आपकी बड़ाई करेंगे, जब आपकी बड़ाई होगी,जब तक सूर्य चन्द्रमा रहेंगे तब तक आपका नाम रहेगा। स्वर्ग में भी अप्सराएँ आपका गीत गायेगी। अपने सभी पाप धुल जायेंगे। हे बेटों! आप लोग तब तक तैयारी करो और मैं सम्भराथल जाता हूँ और जाम्भोजी से पूछ आता हूँ, उनको भी खबरनिमन्त्रण दे आता हूँ। ऐसा अपने बेटे न्यात- जमात को समझाकर के बाजोजी देवजी के पास सम्भराथल पर आया।

बाजोजी विनती करने लगा-हे गुरुदेव! आपकी कृपा से मैंने धन प्राप्त कर लिया है। आप हमारे गाँव चलो। हमारे पूरे कुटुम्ब को बिश्नोई बनालो। जाम्भोजी ने कहा-हे बाजा! केवल बिश्नोई बनने से तो तुम्हारा कुल नहीं तर सकेगा। बिना समझ के तो सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो सकेगी। जब तक उनतीस नियमो का पालन आपका कुटुम्ब नहीं करेगा, तो केवल बिश्नोई बनने से क्या लाभ होगा? केवल तुम्हारे कहने से भी तो क्या होता है? जब उन लोगो का भाव जगेगा, तभी वे यहीं चले आयेंगे।

बाजोजी हंस कर कहने लगा-हे देव! बात तो मैं आपसे दूसरी ही पूछने आया था। वह यह कि आपकी कृपा से मिले हुए धन द्वारा मैं पहिया करना चाहता हूँ, इतना बड़ा भारी उत्सव जो अब तक किसी ने किया भी नहीं है। आप आज्ञा प्रदान करो। तो मेरा कार्य सफल हो सके। पहला कार्य तो मेरा यही है। दूसरे कार्य नियम- धर्म को तो मैं बाद में करूँगा।

जाम्भोजी ने समझाते हुए कहा-इतना बड़ा उत्सव पहिया नहीं करना। थोड़ा-थोड़ा पुण्य दान करना ही श्रेष्ठ है। घर पर आये हुए सुभ्यागत की पूजा करो। हमारे ये संत-भक्त पूर्णतया सुपात्र हैं। इनकी सेवा, पूजा, भोजन आदि प्रदान करना ही सभी से बड़ा यज्ञोत्सव-पहिया है। इससे अधिक करोगे तो सुपात्र-कुपात्र का कोई निर्णय नहीं हो सकेगा। पुण्य होने की संभावना कम ही होगी।

बाजो तो तन-मन-धन के अभिमान में लिप्त था। वह जाम्भोजी की बात को कुछ भी नहीं समझ सका। कहने लगा- महाराज-आप ये छोटी-छोटी बातें बतला रहे हैं। एक, दो या तीन वह भी कभी-कभी सुपात्र आता है, इससे कितना धन खर्च कर सकूँग? न तो इससे संसार में नाम ही होगा और न ही पाप ही कटेंगे,ये छोटे-छोटे कार्य मेरे से नहीं हो सकेंगे।

हे देव! आप स्वयं घर चलो। हमें सभी को बिश्नोई बना लो, मेरे साथ मेरे कुटुम्ब के इक्यासी घर पलट कर बिश्नोई बन जायेंगे, आप कृपा करके पाहल दीजिये। बाजे की बात को स्वीकार कर के श्री देवजी ने बाजे को पाहल का कलशा दिया और कहा-जिस जिस को तुम यह पाहल दोगे, वही तुम्हारी जमात में मिल जायेगा।

बाजो ने जाम्भोजी की बात सुनी तो थी, किन्तु अनसुनी कर दी तथा अपने घर लौट आया। बाजा ने अपने कुटुम्बी लोगों को एकत्रित किया। उन्हें जाम्भोजी का पाहल पिलाया तथा जाम्भोजी की आज्ञा फ रमाते हुए कहा- अब हम जाम्भोजी के चेले हो गये हैं। उनतीस नियमों का पालन करेगें। भवसागर से पार तिरने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। इसमें लापरवाही नहीं करनी है। जाम्भोजी की आज्ञानुसार अब मैं एक यज्ञ करूँगा। पहियो करूँगा। न्यात-जमात को भोजन जिमाऊँगा। आप लोग सभी मेरा सहयोग करेंगे।

बाजोजी के कथनानुसार घृत मिष्ठान आदि वस्तुएँ एकत्रित की गयी। पहिया चढा दिया गया। कई दिनों तक सभी आगन्तुओं को भोजन करवाया। अनेकानेक मिष्ठानों का भोजन प्रेम से सभी ने किया। यज्ञ सम्पूर्ण हुआ। जाम्भोजी के पास सम्भराथल पर पहुँचे कि मैं जाम्भोजी से पूछ कर के आऊँ कि इस यज्ञ में पुण्य फल कितना मिला? क्या हमारे सभी पाप समाप्त हो गये हैं? क्योंकि वे तो अन्तर्यामी हैं। सभी कुछ जानते हैं। इसलिये बतला देगे।

बाजा जम्भेश्वर जी के सामने हाथ जोड़े हुए खड़ा था। जाम्भोजी ने कहा-कहो बाजा! यज्ञ कैसा हुआ? बाजा ने कहा महाराज! ऊपर से देखने में तो बहुत ही अच्छा था।

सभी लोग वाह-वाह कहते हुए बड़ाई कर रहे हैं, किन्तु पुण्य-पाप की बात तो सूक्ष्म है। वह आप ही बतला सकते हो। हे देव! आप ही बतलाओ कि कितना पुण्य हुआ?

जाम्भोजी ने कहा-हे बाजा! पुण्य की आशा छोड़ दो। पुण्य तो कुछ हुआ ही नहीं है। एक खेजड़ी का तइया हुआ है। उसका पाप तुम्हारे पल्ले में है। वह तुम्हें भोगना पड़ेगा। तुमने मेरी बात मानी नहीं। तुम्हारे सेवकों ने पहिया बनाने हेतु एक खेजड़ी वृक्ष को काटा था। उसका पहिया-चक्र बना कर के चढाया था। उस खेजड़ी वृक्ष को काटने से वह मर गयी थी। मरने के पश्चात् तीजा किया जाता है। वही हुआ है। उसे काटने का जो पाप है, वह तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। ऐसी वार्ता सुन कर बाजो उदास हो गया। इतना धन खर्च हुआ, किन्तु पुण्य कुछ भी नहीं हुआ।

कहने लगा- हे देव ! अब दुबारा फिर यज्ञ करूँ। आपकी आज्ञा हो तो सम्पूर्ण पापों का नाश कर डालूँ। ये तुच्छ पुण्य मेरे से नहीं होते। आप मुझे बार-बार क्यों कहते हैं। आप विधि बतलाइये। अबकी बार ऐसा यज्ञोत्सव करूँ जिससे पुण्य का ढेर हो जाये।

श्री देवजी ने कहा-हे बाजा ! तू जसरासर का चौधरी है। तरड़ तेरी गौत्र है। खेजड़ी वृक्ष काट कर के तूने पहिया बना कर चढाया और यहाँ आकर कहता है कि मैंने न्यात जमात को जिमाया है। अब तू मेरे पास आकर पूछता है कि पुण्य कितना हुआ? मैंने तुम्हें कहा है कि खेजड़ी का तइया हुआ है। इससे तू क्रोधित हो रहा है।

बाजे ने फिर नहीं पूछा। मन में मरोड़ कर ली। जाम्भोजी से क्रोधित हो कर आँखें लाल करके वहाँ से चल पड़ा। मानो राठौड़ ही रूठ गया हो। बाजे ने हरि से मन को तोड़ लिया। अपना संपर्क समाप्त कर के वापिस अपने गाँव आ गया। आगे वर्षा हुई तो बाजे ने अपने खेत में हल चलाया। जांभोजी ने उनतीस नियमों में कहा था कि अमावस्या के दिन हल नहीं चलाना। किन्तु बाजे ने जानते हुए भी अमावस्या को हल चलाया। एक सौ बीघा में तिल बोये। अच्छी वर्षा हुई। इस वर्ष तो तिलों की फसल बहुत अधिक हुई। पाप किया। अमावस्या को हल चलाया। तिलों की पैदावार अधिक हुई तिलो में तेल भी अधिक ही निकला। बाजा तिल-तेल बेचकर बहुत सा धन प्राप्त करके श्री देवजी के पास सम्भराथल पर आया और कहने लगा-

हे देवजी ! आपने तो बतलाया था कि अमावस्या को हल न चलायें, किन्तु मैंने तो अमावस्या को ही हल चलाया था। तिल बहुत हुए हैं। मैं तो माला माल हो गया हूँ। आपने कहा था कि अमावस्या को हल चलाने में पाप लगता है, वह पाप मेरे कहाँ चिपका है? मुझे दीख तो नहीं रहा है। या अमावस्या को हल चलाने से तिल नहीं होते तो मैं मानता कि पाप हुआ है,जिससे तिल नहीं हुए हैं। इसका कारण मुझे बतलाओ।

जाम्भोजी ने कहा-हे बाजा! पाप-पुण्य की बात का तो तब पता चलेगा, जब यमदूत तुम्हें नरक में डालेंगे ऊपर से मार पड़ेगी। पाप-पुण्य का फल समय आने पर ही फलीभूत होता है। अब जल्दी ही क्या है? फल दुख रूप होकर अतिशीघ्र ही सामने आ जायेगा। तिल पैदा होने की बात तो यह है कि खेत में बीज पड़ेगा वर्षा होगी जल वायु का ठीक से संगम होगा तो बीज उगेगा ही। बीज वपन समय पर करने से उगता है, यह तो प्रकृति का नियम है। अनैतिक कार्य करने से भी तो उसका फल मिलता ही है, ऐसा जानकर के पाप कर्म न करे, मर्यादा को न तोड़े।

बाजा कहने लगा- महाराज! आपने मुझे खरी-खरी असहनीय बातें कही हैं। मैं आपको देखता हूँ तो मेरी आँखें जलती हैं। मैं आगे से किसी मोडे-साधु या संन्यासी के पास ही नहीं जाऊँगा। सामने मिल भी जायेगा, तो दूर से टल कर चला जाऊँगा। और यदि सामने मिल भी गया तो आँखें बन्द कर लूँगा।

जाम्भोजी ने कहा- हे बाजा! तू देखेगा क्या? तुम्हें दिखेगा ही नहीं। मुंडिये साधु-संतो के दर्शन तो दुर्लभ ही हैं। ऐसा सुनते ही बाजा अन्धा हो गया। आँखों के बिना तो जीना ही व्यर्थ है। इससे बाजे को चेता हुआ,हाथ जोड़ कर चरणों में गिर पड़ा। कहने लगा-बिना आँखों के कार्य नहीं चलेगा।

हे प्रभु! मेरी आँखें मुझे वापिस लौटा दीजिये। इन्हीं आँखों से मैं आपका दर्शन करूँगा। मेरी हृदय की आँखें भी खोल दीजिये, ताकि मैं आपकी बात पर श्रद्धा विश्वास करके जीवन को सफल कर सकूँ। मुझे आप अपना सेवक बना लीजिये। श्री देवजी ने बाजे के सिर पर हाथ रखा। बाजे के नयन पुनः खुल गये।

बाजो कहने लगा-हे देव! अब आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये। मैं अबकी बार एक यज्ञ और करूँ। आप हमारे घर पर पधारो। आपके कथानुसार ही मैं करूँगा। देवजी ने कहा-यदि तू मेरा कहना करेगा, तो मैं तुम्हारे घर अवश्य ही चलूँगा। यदि तू किसी अन्य के कहने से या अपनी मन मर्जी से चलेगा तो मेरे को कभी मत ले जाना।

बाजा कहने लगा-हे गुरुदेव! आपके सिवाय मेरा यहाँ कोई नहीं है, जिसको मैं प्रथम वरण करूँ। आपही अपनी संत मण्डली सहित मेरे घर पधारो। आप जैसे गुरु अन्य इस संसार में कोई नहीं हैं, जिसको हम महता दे। हे देव! आप यज्ञ में पधारो। आपका मुख देखने से ही हमारी गति होगी।

बाजे की प्रार्थना पर श्री जाम्भेश्वरजी जसरासर बाजे के घर पधारे थे, साथ में संत मंडली भी थी। जसरासर के लोगों को सत्संगति की महिमा बतलाई। रात्रि में जागरण किया। प्रातः काल स्वयं सद्गुरु देव हवन करने को विराजमान हुए। पाहल देकर बाजे की जमात को बिश्नोई पंथ में सम्मिलित किया।

बाजे ने पूछा-हे गुरु देव! इस यज्ञ में मैं पीछे वाली भूल तो नहीं दोहराऊँ गा, किन्तु आगे मुझे क्या आदेश है? आपकी आज्ञा का लोप नहीं करूँगा। जाम्भोजी ने कहा- हे बाजा! इस यज्ञोत्सव में तू विशेष रूप से कुपात्र को नहीं आने देना, अन्यथा तुम्हारा यज्ञ फल समाप्त हो सकता है। बाजे ने पूछा-हे महाराज! सुपात्र- कुपात्र का निर्णय कैसे किया जावे? जाम्भोजी ने बतलाया-

प्रथम चार वर्ण प्रसिद्ध हैं इनमें चौथा वर्ण शूद्र कहलाता है किन्तु किसी छोटी जाति में जन्म लेने से कुपात्र नहीं हो जाता है। ऊँची जाति में जन्म लेने से वह सुपात्र भी नहीं हो जाता है। सुपात्र-कुपात्र का निर्णय तो कर्मों के अनुसार ही होता है। जो व्यक्ति चाहे उच्च कुल में भले ही जन्मा हो, किन्तु अमल तमाखू, भांग, माँस, मद्य आदि का सेवन करता है, वह कुपात्र ही है। जो व्यक्ति जीवों की हत्या करता है या करवाता है, वह भी कुपात्र ही है। चोरी निंदा आदि का व्यवहार करके किसी को धोखा देने वाला भी कुपात्र ही है। असंतोषी भी कुपात्र ही है। ऐसा मानना चाहिये।

इसके विपरीत जो व्यक्ति चाहे नीच कुल में ही जन्म क्यों न लिया हो, किन्तु इन दुर्व्यसनों से दूर रह कर जीव दया, वृक्षों की रक्षा, शीलवान, सत्य प्रिय एवं मधुर वक्ता, यज्ञ, पूजा, भजन आदि ईश्वरीय एवं धार्मिक कार्य करने वाला, सुपात्र ही है। इसीलिए हे बाजा! कुपात्र से बच कर के यज्ञ करना। ऐसा कहते हुए श्री देवजी अपने शिष्यों सहित सम्भराथल पर आ गये।

इस प्रकार से बाजा ने दूसरा यज्ञ भी श्री देवजी के बतलाये हुए नियमों के अनुसार ही किया। बाजा ने सोचा कि अबकी बार तो मैंने पुण्य का ढेर कर लिया है। मैं सम्भराथल पर जाकर देवजी से पूछ आता हूँ। ऐसा विचार कर के बाजा सम्भराथल गया और कहने लगा-

हे देवजी! आप तो अति शीघ्र ही लौट आये। मैं अपने यज्ञ की महिमा आपके सामने क्या कहूँ? जैसा आपने कहा, ठीक उसी प्रकार से मैंने नियमों का पालन किया है। अब मैं आपके पास पूछने के लिये आया हूँ कि इस मेरे दूसरे यज्ञ में कितना सा पुण्य हुआ है? यह बतलाने का कष्ट करें।

सद्गुरु ने कहा-हे बाजा सुनो! इस तुम्हारे यज्ञ से पुण्य तो हुआ था, किन्तु वह तो बाड़ से कूद कर भाग गया है। तुम्हारे पल्ले में कुहृ भी नहीं रहा। बाजा ने पूछा- हे गुरु देव! बाड़ से कूदकर पुण्य कैसे भा3 गया? यह बात मेरी समझ में नहीं आयी।

श्री देवजी ने समझाते हुए कहा-तुम्हारी न्यात, जमात, तुम्हारे बेटे, दामाद आदि तो सभी बावले हैं। जब भोजन बनकर तैयार हो गया था, एक कड़ाहे में हलवा बनाया था। अब तक तो भगवान् के भोग भी नहीं लगा था, न ही संत सुपात्रों ने ही भोजन किया था, न ही तुम्हारे बड़े-बूढे बच्चों आदि ने ही भोजन किया था।

सर्वप्रथम एक तुम्हारा ढाढी शिकारी आया था। उसने बाड़ के ऊपर से भोजन माँगा और तुम्हारे दामाद अखै ने पावड़ी भर कर उस डूम कुपात्र को भोजन दे दिया। उसने पल्ला मांडकर भोजन ग्रहण कर लिया। वह तुम्हारा भोजन जीमकर वन में गया और एक हरिण को लट्ठी से मार गिराया। पहले इस हरिण के पीछे-पीछे भागता आया था। वह हरिण तो विचारा भूखा-प्यासा, कमजोर हो गया था और वह डूम शिकारी ने तुम्हारा भोजन करके हिरण को मार लिया। अब इस यज्ञ से तो एक हरिण का तइया हुआ है। इसका पाप तुम्हारे को भोगना होगा। वह तो जमा ही रहेगा। तुमने मेरी बात मानी नहीं। इससे तुम्हारा कार्य सिद्ध नहीं हुआ है। यदि तुम्हें विश्वास नहीं है, तो घर जाकर पूछ ले। पूर्व खेजड़ी काटने की घटना भी पूछ लेना।

दाता सुपात्र को दान देकर पुण्य की आसा करता है, तो कुपात्र को देकर पाप की भी आसा करनी चाहिये। सुपात्र तुम्हारा भोजन करके सत्कर्म करेगा तो इसका फल दान दाता को मिलेगा। कुपात्र दान दाता का भोजन करके कुकर्म करेगा तो उसका फल भी तो दान दाता को पाप रूप दुःख क्यों नहीं मिलेगा? अवश्य ही मिलना चाहिये।

बाजा दौड़ कर घर गया और पहले तो अपने चाकरों से पूछा कि आप लोगों ने हरि खेजड़ी काटी थी क्या? नौकरों ने कहा-हम क्या करें? पहिया बनाने के लिये आपके ही खेत में खड़ी खेजड़ी वृक्ष को काटा था। यह बात तो जाम्भोजी की ठीक हुई। इसके पश्चात् बाजा अपने दामाद अखो के पास गया और कहा- बेटा! तुमने मेरे यज्ञ को विध्वंस कर दिया। मैंने तुम्हें शिक्षा दी थी कि यज्ञ में कुपात्र को नहीं देना। क्या तुमने कोई ऐसा कार्य किया था?

अखो कहने लगा-श्वसुरजी! इसमें आप मुझे दोष क्यों देते हो? आपके कुल परिवार का ढाढी था। वह बाड़ के बाहर से खड़ा हुआ हलवा भोजन माँग रहा था। उसको अंदर तो आने ही नहीं दिया। तुमने यही कहा था कि किसी को अंदर नहीं आने देना। मैंने तो बाहर खड़े हुए को एक पावड़ी हलवा दिया था। इसमें आप मेरा दोष बता रहे हैं। भरी सभा में आप मुझे लज्जित कर रहे हैं। ऐसी ही बात थी तो यज्ञ ही क्यों किया? यदि किया तो मुझे बुलाया ही क्यों?

मैं तो अभी अपने घर वापिस चला जाता हूँ। फिर कभी इस घर में लौट कर नहीं आऊँ गा। मैंने तो सोचा था कि यह ससुराल है। यह तो दुश्मनों का घर हो रहा है। बाजोजी ने अपने दामाद को मनाया। बड़ी मुश्किल से रोका और वापिस सम्भराथल आये और कहने लगे-

हे देव! आपने जो कहा वह पूर्ण सत्य है। अब मैं क्या करूँ? जो भी पुण्य का कार्य करता हूँ, वह उल्टा ही हो जाता है। फिर भी कुछ धन अब तक मेरे पास बचा है। उसका मैं पुण्य कार्य करूँ। यदि आपकी आज्ञा हो तो एक बार प्रयास और करके देखूँ।

जाम्भोजी ने कहा- छीदो बीज। धीरे-धीरे चलने से गाँव पहुँच जायेगा और यदि भागेगा तो कभी नहीं पहुँचेगा। बाजा कहने लगा-हे देव! यदि मुझे जलाना है, तो एक बार ही जला डालिये। बारबार मुझे थोड़ा-थोड़ा डाम्भ देकर न जलाओ। आप कृपा करो। अबकी बार एक विधि और बताओ जिससे पुण्य का ढेर हो जाये। जाम्भोजी ने कहा-तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं आ रहा है। सर्वप्रथम तो न्यात जमात को जिमाने से अहंकार आता है। उससे निवृत्त होना आवश्यक है।

शास्त्र महापुरुषों के प्रति श्रद्धा का अभाव होना भी यज्ञ के फल को नष्ट कर देता है। अपने अन्दर बैठे हुए अवगुणों को बाहर निकालना भी यज्ञकर्ता के लिये जरूरी है। हरा वृक्ष नहीं काटना। कुपात्र से बचना। लोभी, क्रोधी, ईर्ष्यालु से संगति नहीं करना इत्यादि नियमों का पालन करते हुए यज्ञ करेगा तो तुम्हें सफलता मिलेगी। अमल,तम्बाकू , भाँग,मद्य माँस,का सेवन करने वाला कुपात्र ही जानो तथा नीला राक्षसी वस्त्र पहनने वाला भी चाण्डाल कुपात्र ही जानो। यज्ञ में जरणा रखना। स्वंय की कीर्ति हेतु किया हुआ पुण्य कार्य फूलता फलता नहीं है। वह सीमित हो जाता है। यज्ञादिक कर्तव्य कर्म निष्काम भाव से किया हुआ कर्ता को मुक्ति प्रदान करता है।

हे बाजा। अब तुम वापिस घर जाओ और शुभ कर्म करो। फल की आशा छोड़कर निष्काम कर्म करो। दान देना चाहिए, किन्तु देश काल सुपात्र का विचार करके देना चाहिये। वही सात्त्विक दान होगा। समुद्र में वर्षा का होना तो व्यर्थ ही है। कुपात्र में रखी हुई वस्तु भी दूषित हो जाती है। उसी प्रकार से कुपात्र को दिया हुआ दान भी दूषित हो कर विकार ही पैदा करेगा। संत सुपात्र की सेवा करो। वही तुम्हारा दिया हुआ अनन्त गुणा फ लित होगा।

हे बाजा! इस समय तुम गरीब कन्याओं का विवाह करो। जो गरीब बाप की बेटी है, वह बाप विवाह करने में असमर्थ है। तुम उन्हें अपनी बेटी मान कर विवाह करो। यही ठीक रहेगा। जाम्भोजी की आज्ञा शिरोधार्य करके बाजा वापिस अपने घर आया और अपने कुटुम्बियो को एकत्रित किया और जाम्भोजी की आज्ञा सुनाई।

अपने ही जाति भाइयो का घृत एकत्रित किया। अपने ही नये कड़ाह-कड़ाही बनवाये। पवित्रता से कार्य प्रारम्भ किया। न्यात-जमात, जानी-बराती सभी को प्रेम से भोजन जिमाया। जैसा जाम्भोजी ने कहा था, वैसा ही एक सौ कन्याओं का विवाह किया। सभी को अपनी सामर्थ्य अनुसार दहेज दिया। किसी से कुछ लिया नहीं। केवल दिया ही दिया। पूरा खर्च बाजे ने उठाया, क्योंकि पुण्य का ढेर जो करना था।

यज्ञ समाप्त कर के बाजो गर्व से जाम्भोजी के पास गया। पहले तो अपने यज्ञ की बड़ाई स्वंय ही अपने मुख से की। बाजे ने कहा- हे देव! आप तो स्वंय ही अन्तर्यामी हैं। मैं आपसे क्या बखान करूँ? किन्तु बिना कहे मुझ से रहा भी नहीं जाता है। मेरे घर पर एक सौ कन्याओं का विवाह हुआ है। एक बेटी का विवाह करना भी बड़ा कठिन कार्य है। आपकी कृपा से मैं पूर्ण सफल हुआ हूँ, कई हजारो लोगों ने मिष्ठान्न भोजन लगातार कई दिनो तक किया है। उनकी आत्मा प्रसन्न हुई होगी। मुझे कितना फल मिलेगा?

हे देव आपही बतलाइये। इस यज्ञ का क्या फल हुआ है? मैंने तो सारा ही धन लगा दिया है। अब मेरे पास कुछ भी नहीं हैं। मैंने सर्व मेध यज्ञ कर दिया है। यदि पुण्य हुआ है, तो कह दो अन्यथा पहले की तरह अब की बार भी ऐसा कह दो कि नहीं हुआ।

जाम्भोजी ने कहा- अवश्य ही बड़प्पन हुआ है, किन्तु पुण्य तो कुछ भी नहीं हुआ है। बाजा की आँखें फ टी की फ टी रह गयी। सद्गुरु ने दया की और बाजे को उठाया और कहा-पुण्य तुम्हारे घर में ही राख में दबा है। राख में दबे हुए आठ टके लेकर तुम यहाँ आ जाना। मैं तुम्हारा कार्य बनाऊँगा।

बाजे के बात समझ में आ गयी। मेरा पुण्य मेरे घर में राख में दबा हुआ है?

जाम्भोजी के कथनानुसार बाजो अपने घर गया और अपने बेटे की बहू से पूछा- हे बेटी! मैंने पुण्य के लिये कार्य किया था, किन्तु जाम्भोजी ने कहा है कि पुण्य कुछ हुआ नहीं है।

पुण्य राख में कैसे दबा हुआ है? तुम राख से बरतन साफ करती थी, तब तुमने किसी से कुछ लिया तो नहीं? क्या बात हुई? जो कुछ हुआ सो निःशंकोच बतलाओ। तुम्हीं तो इस घर की लज्जा-मर्यादा हो। तुम्हारे लिये तो मैं पुण्य कार्य कर रहा था।

बहू ने कहा-हे श्वसुर जी! मैं तो बरतन साफ करने की सेवा कर रही थी। मैंने तो बरतन मंजाई का किसी से कुछ भी लेने की इच्छा नहीं की, किन्तु एक बराती जेब में हाथ डाल कर कुछ देने लगा। मैंने तो देखा तक नहीं। लेना तो दूर की बात है। किन्तु वह बराती राख में कुछ टके डाल कर चला गया। हमने तो लिया नहीं। वही राख में ही दबे पड़े होगे।

बाजोजी छलनी लेकर गये। वहाँ पर बरतन साफ करने की राख पड़ी थी। राख छान कर जाम्भोजी के कहने के अनुसार आठ टका लेकर सम्भराथल पर पहुँचे। जाकर देवजी के सामने रखे। जाम्भोजी ने बाजा को धन्यवाद दिया। अपना कमल हस्त बाजे के सिर पर रखा।