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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह44 / 94

चौथा अध्याय · कथा 44

जेतसी को राज्य प्राप्ति का वरदान

वीसनोई कह कुंवर प्रतापसी भागबलि थ। जाम्भोजी कह-जेसलमेर गया पहलू सवामण भाग थो। जाप दरखत कटाया जा पछ रतीउ रहयो नैही। कंवर बीकानेर गयै पछै राव लूणकरण जोतगी बुलाया, जती सेवड़ा बुलाया, भगवत वसना बुलाया, संन्यासी जोगी बुलाया, दीसंतरी श्रब वेदारथीयां नु पुछया-म्हे ढोसी जावां, म्हान महुरत द्यौं, साराइ कह्यो-रावजी री फ तै होयसी। रावजी साथ भेलो कियो। काण्यवत डेरा किया। श्री जाम्भोजी काणांवत आया। कुंवर वरसी आय पगे लागो। जाम्भोजी कह वरसी। तुं रावजी नुं पाल्य छः माहीना पछै थांहरी जीत्य होयसी। पहलां जायस्यौ तो हारस्यो। म्हें रावजी नूं पाल्य छः माहीना पछै थांहरी जीत्य होयसी। पहलां जायस्यौ तो हारस्यौ। म्हें रावजी नुं थांभण नुं आया छाः। रावजी वीजो मालावत मेल्ह्यों। वीजो कहे और सगला कहे फ तैं होयसी। मांहरा देव मांहर सहाय होयस्यै। मो मालीय सरीखा साथ छै। भांजणी पत्य देवजी कह-सगला पहलु तूं भाज्यस्यै। जाम्भोजी श्री वायक कहे-

शब्द 87 ओ३म् जिहिं का उमग्या समाघूं, तिहिं पंथ के बिरला लागूं।

बीजा चाकर बीरूं, रिण शंख धीरू।

कबी झूझत रायूं, पासै भाजत भायूं।

ते हतंते जीयौ, ताथैं नुगरा झूझ न कीयो।

समराथल पर कुंवर प्रताप ने घोड़ा नचाया था। श्री देवजी ने साथरियों को शब्द द्वारा समझाया था। किन्तु उनके मन में बैठी हुई बात को वे रोक नहीं सके थे और देवजी से पूछ ही लिया- हे देव! कुंवर प्रतापसी का भाग्य बलवान है इसीलिए तो राज घराने में जन्म लिया है। जाम्भोजी ने कहा- अवश्य ही भाग्यवान कुंवर है। राजा का बेटा है। कभी यह राजा बन सकता था। किन्तु अब नहीं क्योंकि यह कुमार जब जैसलमेर गया था तो इसका सवामन भाग्य था अर्थात सवाया भाग्य था। किन्तु वहाँ जाकर इसने हरे वृक्ष कटवाये हैं उसके बाद तो एक रत्ती भर भी भाग्य नहीं रहा है। हरे वृक्षों को काटना तो पाप की पोटली सिर पर बाँध लेनी है। इसका भाग्य फूट ही गया है।

नाथोजी कहने लगे-हे शिष्य! जब कुंवर प्रतापसी जैसलमेर से वापिस बीकानेर पहुँचा, तब अपने बेटे को वापिस आया जान कर लूणकरण ने एक सभा बुलायी। सभा में उपस्थित ज्योतिषी, यति, सैंवड़ा, भक्त, संन्यासी, दिसांतरी, वेदज्ञ आदि से विचार-विमर्श किया। राव ने पूछा-हे विद्वानो! मैं ढोसी, नारनौल प्राप्त करने हेतु सेना सहित जाना चाहता हूँ। आप लोग मुझे मुहूर्त बताओ। सभी ने राजा की बात का समर्थन किया और कहा-अवश्य ही जाओ और विजय पताका फ हराओ। जीत तुम्हारी ही होगी।

रावजी ने अपने साथियों को एवं सेना को एकत्रित किया तथा मुहूर्त देखकर के रवाना हुए। काण्यवत के तालाब पर डेरा लगाया। जाम्भोजी स्वयं काण्यौत पहुँचे। उसी समय बरसी आया और गुरु के चरणों में प्रणाम किया।

जाम्भोजी ने कहा-हे वरसी! तू रावजी को जाने से रोक दे, इस समय तुम्हारी जीत नहीं होगी। आज से छः महीने पश्चात् जाओगे तो तुम्हारी जीत होगी। मैं यहाँ रावजी को रोकने के लिए आया हूँ। वरसी ने रावजी से कहा-जाम्भोजी जाने से रोकते हैं। ये आपके ज्योतिषी मुहूर्त झूठे हैं। यदि चलेंगे तो वापिस लौटकर नहीं आओगे। रावजी ने माले को भेजा-माले ने आकर देवजी को रावजी का संदेश सुनाते हुए कहा-

हे जम्भेश्वरजी! रावजी ने कहा है कि सभी लोग मुझे युद्ध में जाने की बात कहते हैं। आप मुझे क्यों रोकते हैं। सभी पण्डितों के अनुसार तो मेरी जीत निश्चित है। हमारे देव हमारे साथ हैं, जो हमारी रक्षा करेंगे। तथा माले जैसा मंत्री सलाहकार साथ में है। भारी सेना का साथ है, फिर हार कैसी? श्री देवजी ने शब्द सुनाते हुए कहा-हे माला! पहले तो तू ही भागेगा। पीछे तुम्हारे अन्य सेना, तथा तुम्हारे देवताओं का तो पता भी नहीं चलेगा। ऐसा कहते हुए शब्द सुनायाजिसके

मन की उमंगे लहरे लेती हैं। स्वयं का मानसिक उत्साह होता है, वही साधना तथा युद्ध में सफल हो सकता है। दूसरे के कहने-सुनने से जो कार्य करेगा, वह सफल नहीं हो सकता। स्वयं के पास ही कुछ गुंजाइश नहीं है, तो दूसरा क्या करेगा? ऐसे उत्तम पंथ में तो विरल ही लगता है। दूसरे सभी तो चाकरी करते हैं। दूसरे के कहने से लगते हैं। उनका उत्साह उमंग तो क्षणिक ही होता है।

कुछ लोग प्रथम तो घोषणा कर देते हैं कि हम साधना, भजन, मुक्ति पर्यन्त करेंगे। बीच में हटेंगे नहीं। युद्ध भूमि में भी जाकर शंख बजा देते हैं, सूचना देते हैं कि हम तैयार हैं। कुछ समय तक झूझते भी हैं साधना तथा युद्ध दोनों में ही किन्तु पीछे कष्ट पड़ने पर भाग जाते हैं। डर के मारे मैदान छोड़ जाते हैं। ये लोग दूसरों की हत्या करके स्वयं जीना चाहते हैं। ऐसे लोग वीरता से युद्ध नहीं कर सकते। ये लोग नुगरे हैं।

हे माला! तू स्वयं एवं तुम्हारे लोग ऐसे ही नुगरे हैं। इनके बस की बात नहीं है। जो लोग कलयुग में थान-मूर्ति की पूजा करते हैं तथा जीवित नारायण को काटते हैं। जो निर्जीव की तो पूजा करते हैं और सजीव की हत्या करते हैं। उनमें बुद्धि कहाँ से आयेगी? उनके अंदर तो शैतान बैठा हुआ है।

मालौ रावजी के पास्य गयौ। देवजी उठउं वरज छः। हमै उं वरज छै। रावजी जांभोजी घणो बुरो कहै छैः कै भाजिस्यै कै रिण मां रहिसी। राव रोस करनै कह्यो- हूँ पाछो आयौ समौ इतरा इण मोडियां माहे जो ये जका करूं। रावजी कह आपा ठीक। धनराज कह- जांभाजी री कहीयौ किया भला छः। रावजी कह- मरणता बीहौ छौ तो आप गढरो जापतो करो पाछा पधारौ। धनराज कह- थे कह्यो सौ करिस्या। धनराज भाटी गढ आयौ। रावजी नारनौल के चड़िया। देवजी सम्भराथल आया।

जेतसी जाम्भाजी के हजूरी आयौ। अरज करण लागौ। जाम्भाजी- राव लूणकरण रै मह मोभी छा। मैं एक घोड़ो मांग्यौ। रावजी मोनो एक घोड़ो दीजै। आपरे साथ हालूं। तिकौ रावजी मोनो रीसाय कह्यो- तोने घोड़े बेई भाटा। मोटा दगड़ा। जैतसी वैराजी हुवौ। जैतसी जांभाजी पाऐ आयौ। जांभाजी! बाप सगला इ सरीसो मोन भाठा करया। देवजी कह- गढ कोट थांरो देस थांरो बल कीसुं चाहै- जांभोजी श्री वायक कहै।

शब्द-64 ओ३म् मैं कर भूला मांड पिराणी, काचै कन्ध अगाजूं।

काचा कंध गले ग4 जायसैं, बीखर जैला राजों। गड़बड़ बाजा कांय विबाजा, कण विण कूकस कांय लेणा। कांय बोलो मुख ताजो।

भरमी वादी अति अहंकारी, लावत यारी, पशुवां पड़े भिरांति।

जीव विणासै लाहै कारणै, लोभ सवारथ खायबा खाज अखाजूं।

जो अति काले लेजम काले तेपण खीणा, जिहि का लंका गढ़ था राजों।

बिन हस्ती पाखर बिन गज गुड़ीयों, बिन ढोला डूमां लाकड़ियो।

जाकै परसण बाजा बाजै, सो अपरंपर काय न जंपो।

हिन्दू मुसलमानों, डर डर जीव के काजै।

रावां रंका राजा रावां, रावत राजा, खाना खोजां, मीरां मुलकां घंघ फ कीरां।

घंघा गुरवां सुरनर देवा, तिमर जू लंगा, आयसा जोयसा, साह पुरोहितां। मिश्र ही व्यासां रूंखा बिरखां आव घटंती अतरा माहे कूण विशेषो। मरणत एको माघो।

पशु मुकेरू लहै न फेरूं कहे ज मेरूं सब जग केरूं। साचै से हर करै घणेरूं।

रिण छाणै ज्यूं बीखर जैला, तातें मेरूं न तेरूं।

बिसर गया ते माघू, रक्तूं नातूं सेतूं धातूं कुमलावै ज्यूं शागूं।

जीव र पिंड विछोबा होयसी, ता दिन दाम दुगांणी।

आड न पैको रती बिसोवो सीझै नाही, ओपिंड काम न काजूं।

आवत काया ले आयो थाह्य, जातैं सूको जागो।

आवत खिण एक लाई थी, पर जातैं खिणी न लागो।

भाग परापति कर्मा रेखां, दरगैं जबला जबला माघों।

बिरखे पान झड़े झड़ जायला, तेपण तई न लागूं।

सेतूं दगधूं कवलज कलीयों, कुमलावै ज्यूं शागूं।

ऋतु बसंती आई, और भलेरा शागूं।

भूला तेण गया रे प्राणी, तिहिं का खोज न माघूं।

विष्णु विष्णु भण लई न साई, सुर नर ब्रह्मा को न गाई।

तातैं जंवर बिन डसीरे भाई, बास बसंते कीवी न कमाई।

जंवर तणा जमदूत दहैला, तातैं तेरी कहा न बसाई।

सतगुरु ने माले को शब्द सुनाया। माला सचेत होकर रावजी के पास गया और कहने लगा-हे रावजी! देवजी वहीं तालाब पर बैठे हुए ही आपको रोक रहे हैं। वे आपको जाने की आज्ञा नहीं दे रहे हैं। हमें इस प्रकार से बहुत ही बुरा कहा है। उन्होंने कहा है कि या तो युद्ध के मैदान से भागोगे। या युद्ध के मैदान में ही रह जाओगे, वापिस लौट नहीं सकोगे।

राव ने क्रोधित हो कर कहा-अब तो मैं अवश्य ही जाऊँगा। किन्तु वापिस लौट कर आऊँ गा। तब इस मोडिये के साथ ऐसी करूँगा, जो अब तक किसी ने किया ही नहीं। यह हमें राज का विस्तार करने नहीं देता। देवी देवताओं की पूजा भी नहीं करने देता। कोई न कोई नियम धर्म आगे रखता है। आगे मैं एक भी बात नहीं मानूँगा। मैं जो कर रहा हूँ, वही ठीक है।

उसी समय जाँगलू के धनराज भाटी साथ में थे। उन्होंने भी राव को समझाते हुए कहा-जांभोजी ने जो बात कही है, वही करने में हमारी भलाई है। रावजी ने कहा-धनराज जी! आप मरने से डरते हो। यदि ऐसा है तो आप वापिस चले जाओ। गढ की व्यवस्था करना। जो आप कहते है वही करूँगा। धनराज भाटी वापिस लौट आया। रावजी ने नारनौल की तरफ रवानगी की और जाम्भोजी वापिस सम्भराथल लौट आये।

राव लूणकरण का बड़ा बेटा जेतसी सम्भराथल पर श्री देवजी के पास आकर विनह्मी करने लगा- हे जाम्भाजी! राव लूणकरण का मैं सबसे बड़ा बेटा हूँ। मैंने रावजी से एक घोड़ा माँगा था। मैंने कहा था-हे पिताजी! मुझे एक घोड़ा दीजिए। मैं भी आपके साथ युद्ध करने को चलूँ। किन्तु रावजी ने क्रोधित होकर कहा-तुम्हें घोड़े की जगह पत्थर-भाठा देता हूँ। बड़े-बड़े पत्थर दगड़े। इसलिए नाराज होकर देवजी आपके पास यहाँ आया हूँ। अब तो मैं आपकी शरण में हूँ। हे देव! मेरे छोटे भाई प्रतापसी को तो घोड़ा दिया। मुझे भाठा दिया। बाप तो सभी पुत्रों के लिए बराबर होता है। मेरे साथ भेदभाव क्यों?

देवजी ने कहा-हे जेतसी! सुनो, यह बीकानेर का गढ-कोट तुम्हारा ही है। यह बागड़ देश भी तुम्हारा ही है। तुम बलवान हो, बलवान क्या नहीं चाहता है? ऐसे कहते हुए शब्द बनाया-

हे प्राणी! अहंकार के वशीभूत होकर भूल में मत पड़। जिस शरीर एवं राज की वजह से अहंकार करता है, यह तो कच्चा है, कभी टूट जायेगा। जिस प्रकार से कच्ची मिट्टी जल में गल जाती है। उसी प्रकार से यह शरीर एवं राज पाट भी गल जायेगा। ये तुम्हारे दरबार के गाजे बाजे, उठा-पटक, छीना-झपटी, छोटा-बड़ा, मेरा-तेरा, ये सभी कुछ कण रहित थोथे भूसे के सामान हैं। इनमें सुख आनंद रूपी कण की प्राप्ति कहाँ है?

अपने ही मुख से स्वकीय बड़ाई क्यों करते हो? भ्रम में पड़े हुए, वाद विवाद में रचे हुए, अत्यधिक अहंकारी, स्वार्थ वश सम्बन्ध जोड़ते हैं। पशु सदृश भ्रमित जीवन यापन करते हैं। अपने लाभ हेतु ये राजा लोग जीवों को मारते हैं। अपना राज्य बढाने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं। अखाद्य भोजन करते हैं।

समय आयेगा। यमदूत इन्हें ले जायेंगे, तब इनका सभी कुछ नष्ट हो जायेगा। जिनके गढ थे, राज थे, हस्ती घोड़ा थे, किंतु ये कोई साथ नहीं चलेंगे। इनके बिना ही, बिना गाजे बाजे पैदल ही जाना होगा। जिस परमात्मा के दर्शन-स्पर्श से दिव्य बाजे बजते हैं, उनका स्मरण क्यों नहीं करते? केवल संसार का ही स्मरण किया।

हे हिन्दू मुसलमानो! इस जीव की भलाई के लिए पापों से डरो। वहाँ पर तो सभी बराबर ही है वह चाहे राजा, रंक, राव, रावत, खान, खोज, मीरा, मुलका, गंगा पार रहने वाले फकीर, गंगा पर द्भहने वाले गंगा गुरु , सुरनर, तिमर, लंगा, आयस, जोयस, साह पुरोहित,मिश्रा, व्यास, रूखा, बिरखा, इत्यादि इनकी सभी की आयु घटती जा रही है। सभी का मरण एक जैसा ही है। किसी में कुछ भी विशेषता नहीं है।

पशु आदि धन को अपना कहता है, किन्तु तुम्हारा है नहीं। क्योंकि एक एक बार छूट जाता है। तो पुनः प्राप्ति नहीं होती। इसे मेरा कहना नादानी! सच्चा जो परमात्मा है, वही मेरा है। उसी से ही संबंध जोड़ें वही सदा साथ रहेगा। जिस प्रकार रिण (जंगल) में पड़ा हुआ छाणा(उपला) समय आने पर अपने आप बिखर जाता है, उसी प्रकार से यह सभी कुछ बिखर जायेगा। इसीलिए न कोई मेरा है, और न कोई तेरा है।

हे प्राणी! तू अपना मार्ग भूल गया है। एक दिन इस शरीर को छोड़कर यह आत्मा प्रयाण कर जायेगी। जिस प्रकार से शाक-पत्ती उगती है तो लाल यौवन अवस्था में होती है। जब पक जाती है तो सफेद हो जाती है। और अंत में कुम्हला जाती है। यही अवस्था मानव की भी होती है। तीन अवस्था को पार करने के अंत में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जिस दिन शरीर और जीव का विछोह होगा, उस दिन यह तुम्हारे दुगुने चौगुने दाम धन आदि कुछ भी सहयोग नहीं कर सकेंगे। एक पैसा भी साथ नहीं देगा। जो कुछ है यहीं छूट जायेगा।

आते समय तो काया लेकर आया था, जाते समय काया छोड़ कर जायेगा। आते समय तो एक क्षण का समय लगा था, किन्तु जाते समय इतना समय भी नहीं लगेगा। अपने भाग्य कर्मानुसार आगे की यात्रा करेगा। सभी के कर्म भिन्न-भिन्न हैं, इसीलिए मार्ग भी भिन्न भिन्न ही हैं। दरखत के पत्ते झड़ जाते हैं वे ही पत्ते दुबारा नहीं लगते हैं, नये पते ही दुबारा आते हैं। इसी प्रकार से यह शरीर छूट जायेगा, तो दुबारा प्राप्त नहीं हो सकेगा।

जिस प्रकार से शीत काल में कमल की पत्तियाँ जल जाती हैं तथा अन्य वनस्पति भी कुम्हला जाती है। सर्दी के पश्चात् बसंत ऋतु आती है, तो पुनः प्रफुल्लित हो जाती हैं। विकास कार्य प्रारम्भ हो जाता है। उसी प्रकार से जीवन में उतार-चढाव, सुख-दुःख आता ही रहता है।

हे प्राणी! तू भूल गया है। अपनी औकात को याद कर और अपने मार्ग को खोज। विष्णु का भजन कर। विष्णु के समान और कोई ग्रहण करने के योग्य नहीं है। उस विष्णु को सुर, नर, ब्रह्मा आदि ने गाया है। इसी से ही उच्च पद को प्राप्त कर सके हैं। विष्णु का भजन करेंगे, तो भयंकर यमदूतों के प्रकोप से बच जायेंगे।

यह कमाई यहीं पर रहते हुए, इस मृत्यु लोक में जीवन यापन करते हुए ही कर सकते हैं। यह शरीर छूटने के पश्चात् तो यह धर्म का कार्य होना असंभव है। मृत्यु समय तो नाग की भाँति डस लिए जाओगे। वहाँ तुम्हारा कुछ भी जोर नहीं चलेगा।

जैतसी कहै देवजी आपरे शब्द मांहे क्यौं समधा क्यौं न समधा। तिण रो विचार लाधो नही। देवजी कहैं तौनें भाठा दीन्हां। वै पाछा आवै नहीं। जैतसी कहे देवजी बारे जापतो घणो छ। घणो छल बल जाणे छै। जाम्भोजी श्री वायक कहे-

शब्द-65 ओ३म् -तउवा जाग जु गोरख जाग्या, निरह निरंजन निरह निरालंब।

जुग छतीसों एकै आसन बैठा बरत्या,अवर भी अबधू जागत जांगू।

तउवा त्याग जू ब्रह्मा त्यागा, अवर भी त्यागत त्यागूं।

तउवा भाग जो इश्वर मस्तक, अवर भी मस्तक भागूं।

तउवा सीर जो ईश्वर गौरी, अवर भी कहियत सीरूं।

तउवा बीर जो राम लक्ष्मण, अवर भी कहियत बीरों।

तउवा पाग जो दश शिर बांधी, अवर भी बांधत पागो।

तउवा लाज जो सीता लाजी, अवर भी लाजत लाजूं।

तउवा बाजा राम बजाया, अवर बजावत बाजूं।

तउवा पाज जो सीता कारण लक्ष्मण बांधी, अवर भी बांधत पाजूं।

तउवा काज जो हनुमत सारा, अवर भी सारत काजूं।

तउवा खागज जो कुम्भकरण महरावण खाज्या, अवर भी खावत खागूं।

तउवा राज दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत राजूं।

तउवा राग ज कन्हड़ बांणी, अवर भी कहिये रागूं।

तउवा माघ तुरंगम तेजी, टटू तणा भी माघूं।

तउवा बागज हंसा टोली, बुगला टोली भी बागूं।

तउवा नाग उद्यावल कहिये, गरूड़ सीया भी नागूं।

तउवा शागज नागरबेली, कूकर बगरा भी शांगू।

जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंतज फलियों।

जुरा जम राक्षस जुरा जुरिन्द्र,कंश केशी चंडरूं।

मधु कीचक हिरणाक्ष हिरणाकुस, चक्र धर बलदेऊं।

पावत वासुदेवो मंडलीक कांय न जोयबा, इहिं धर ऊपर रती न रहीबा रांजू।

उक्त शब्द सुनकर जेतसी कहने लगा-हे गुरु देव! आपके द्वारा कहा गया शब्द मैंने सुना, किन्तु पूर्णरूपेण समझ नहीं पाया। कुछ तो समझा किन्तु कुछ नहीं समझा। देवजी ने कहा-हे जेतसी! तुम्हारे पिता श्री ने तुम्हें भाठा (पत्थर) दिये, घोड़ा नहीं दिया। वे तुम्हारे पिता वापिस नहीं आयेंगे। यह बीकानेर का गढ पत्थर ही तो है। यही तुम्हें दिया है। इस पत्थर के मिल जाने से तुम्हें राज्य सम्पूर्ण सम्पत्ति मिल जायेगी।

जेतसी कहने लगा-हे देव! उनके साथ में सैनिक हैं। सुरक्षा बहुत है। वे जीत कर लौटेंगे। मुझे आपका दिया हुआ पत्थर नहीं मिलेगा। मेरे पिता स्वयं ही बलवान शूरवीर है, तथा छल-बल सभी कुछ जानते हैं। जाम्भोजी ने श्री वायक सुनाया-जिसका भावार्थ इस प्रकार से है-

हे जेतसी! तुम अपने पिता के बारे में यह कहते हो कि छल-बल सभी कुछ जानते हैं, सर्व समर्थ हैं और जानने का दावा तुम भी करते हो, किन्तु तुझे अब तक पता नहीं है। जो इस संसार में विभूति हुई है वे तो विरले ही हैं। उन विभूतियों के बारे में सुन! और अपने से तुलना करे।

इस संसार में बहुत से लोग जाग्रत हुए हैं। सचेत होकर अपने जीवन का लाभ लिया है। किन्तु निरीह, निरंजन, निरांलब, गोरख यति जितने जाग्रत हुए, उतना तो कोई नहीं हो सका। उनके एक ही आसन पर बैठे हुए छत्तीस युग व्यतीत हो गये। वैसे तो अन्य अवधूत भी जागे हैं, किन्तु गोरख जैसा कहाँ?

त्यागी तो संसार में बहुत हुए हैं, किन्तु जितना त्याग प्रजापति ब्रह्माजी ने किया, उतना त्याग कोई नहीं कर सका। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होते हुए भी अपने पुत्रों से पूजा नहीं चाही, यही बड़ा त्याग है। कुछ भी नहीं चाहना। भाग्यशाली तो दुनिया में बहुत देखे गये, किन्तु जितना भाग्य ईश्वर के मस्तक में है उतना किसी के भी नहीं। क्योंकि जो भी दृष्ट-अदृष्ट है, वही सभी कुछ ईश्वरीय है। वह धनवानों का भी धनवान है। उनके बराबर कोई नहीं है। किससे उपमा दी जावे।

पति-पत्नी का सम्बन्ध, इस संसार में निभा लेते हैं। यह सम्बन्ध जन्म जन्मांतरों तक भी किसी किसी का चलता है। सभी का नहीं। बाकी तो इस जन्म में ही सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं। किन्तु जितना शिव और गौरी-पार्वती में चला, उतना किसी का भी नहीं। पहले जन्म की सती, दूसरे जन्म में पार्वती बन कर आयी और पति शिव तो वही थे।

भाई-भाई का सम्बन्ध चलता है। काफी हद तक निभता है। किन्तु स्वार्थ वश टूटता भी देखा गया है। किन्तु जितना सम्बन्ध राम-लक्ष्मण का चला, उतना तो किसी का भी नहीं। ये शरीर दो, किन्तु जीवात्मा एक रूप ही थे। एक के बिना दूसरा जीवंत भी नहीं रह सकता था। सिर पर पगड़ी मान मर्यादा की प्रतीक लोग बाँधते हैं। किन्तु जितनी पगडियाँ दसशिर रावण ने बाँधी, उतनी तो अब तक कोई नहीं बाँध सका। किन्तु अति सर्वत्र वर्जयेत, अति सर्व नाश का कारण है।

गृहणियाँ अपने घर, कुल, परिवार की लज्जा रखती हैं। सभी तो नहीं, किन्तु कुछ ही मात्रा में, घर की प्रतिष्ठा गृह लक्ष्मी के हाथ में है, किन्तु जितनी प्रतिष्ठा मान मर्यादा सीता ने रखी उतनी तो कोई नहीं रख सकी। सीता ने अपने पिता के घर ससुराल, तथा राम की लज्जा रखी। मर्यादा धर्म में आँच नहीं आने दी।

युद्ध भूमि में जाकर नगाड़े आदि बाजे तो बहुत लोग बजाते हैं। जीतने की लालसा रखते हैं। किन्तु राम ने लंका पर विजय का बाजा बजाया, धनुष की टंकार की, ऐसी टंकार ध्वनि तो अब तक कोई नहीं कर सका।

कुछ चौधरी लोग सभा में बैठ कर मर्यादा की लकीर तो खींचते हैं। उसे पूर्ण कर पायें या नहीं, यह तो निश्चित नहीं है, किन्तु लक्ष्मण ने जो रेखा खींची ऐसी रेखा तो कोई नहीं खींच पाये। लक्ष्मण ने पंचवटी में सीता की द्भ6ार्थ रेखा खींची थी। जिसे रावण भी लाँघ नहीं सका था। औरों की तो बात ही क्या है?

परोपकार का कार्य तो बहुत लोग करते हैं, दूसरों के दुःखों से व्यथित होकर उनका कार्य करने की कोशिश करते हैं, किन्तु जो परोपकार सेवा का कार्य हनुमान जी ने किया ऐसा तो अब तक किसी ने भी नहीं किया।

भोजन करने में तो बहुत ही लोग पेटू हैं। अधिक भोजन करते हैं तो एक दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ लगी हुई है। किन्तु जितना भोजन कुम्भकरण करता था, उतना भोजन तो कोई नहीं कर सका। कुम्भकरण का भाई अहिरावण भी उसके तुल्य ही था।

राज तो बहुत लोगों ने किया। राज सुख में मदमस्त भी हुए और अहंकारी दुर्योधन हुआ,जितना अपने को ही महत्व दुर्योधन ने दिया इतना मान तो किसी ने नहीं बढाया। जो “जनम्यो छत्र समेत” राजा ही जन्मा था और राजा ही मरा था। अहंकार की पराकाष्ठा दुर्योधन में थी।

गऊएँ चराते हुए ग्वाले बंसी तो बहुत बजाते हैं, गीत गाते हैं, किन्तु जितनी सुन्दर बंसी कृष्ण ने बजाई तथा सुन्दर गीत गाये ऐसे गीत व बंसी अब तक किसी ने नहीं बजाई। वैसे तो टट्टÂ भी काफी तेज चलते हैं किन्तु जितनी तेजी तुरंगम (घोड़े) में होती है, उतनी तेजी तो किसी भी पशु में नहीं होती है। तेज चलने वालों में घोड़ा ही श्रेष्ठ है।

बगुलों की भी टोली देखने में अच्छी लगती है बाग को शोभायमान करती है। किन्तु हंसों की टोली सदृश बगुलो की टोली कहा है। हंस तो हंस ही है बगुले तो बगुले ही है,दोनो की क्या बराबरी। अनेक जाति के नाग हैं जैसे गोहिरा आदि भी नाग ही हैं किन्तु मणि धारी सर्प जैसे साधारण नाग कहा है। कुकुरमुत्ता आदि का भी तो साग है,जो साग कहा जाता है किन्तु नागर बेल की बराबरी कहाँ करेगा? एक ही जाति होते हुए भी गुण धर्म में बड़ा ही भेद है। ऊपर से देखने मात्र से कुछ भी नहीं होता है।

जहाँ-जहाँ पर शैतान लोग अपनी शैतानी-दुष्टता का प्रसार करेंगे तो वही पर वही फली भूत होगी। अच्छाई कहाँ से आयेगी? मृक्रयु अनादि काल से ही चली आ रही है। कंस, केशी, चंड:, मधु कीचक, हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, चक्रधर, बलदेव, इत्यादि लोगों ने भी वासुदेव भगवान् की प्राप्ति की है।

हे जेतसी! तुम्हारे ये मण्डलीक क्यों नहीं देख रहे है? समझ क्यों नहीं रहे हैं? जो नारनौल युद्ध के लिए जा रहे हैं। यहाँ इस धरती पर तो किसी का भी राज एक रत्ती भर स्थिर नहीं रहा है। जब किसी का भी नहीं रहा, तो इनकी क्या औकात है? जो स्थिर रह सकेंगे।

राजपूत कहै-रावजी क्यौ समझां। शब्द मांहै, जैतसी कहै-जाम्भोजी साच कहै छै। इण धरती ऊपर कोई राजा रह्यौ नहीं। मांहरै तो रूड़ा छै। राव लूणकरण नुवां ही छै। म्हानु तो कोट दीन्हौ। राव जेतसी बीकानेर में राज कीयों। लूणकरण कामि आयों।

सम्भराथल पर देवजी ने जेतसी को शब्द सुनाया। उस समय वहाँ पर उपस्थित एक राजपूत ने कहा-हे रावजी! क्या आप जाम्भोजी की बात समझे या नहीं? जेतसी ने कहा-जाम्भोजी ने जो कहा है वह सत्य ही कहा है। इण धरती पर कोई राजा स्थिर रहा ही नहीं है। मेरे लिये तो यह उपदेश बहुत ही अच्छा है। मुझे ज्ञान हुआ है। किन्तु मेरे पिता के लिए अच्छा नहीं है। मुझे तो जाम्भोजी ने कोट दिया, राजा बना दिया है। राव लूणकरण युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। जेतसी बीकानेर के अधिपति बने।

वील्हो उवाच-हे गुरु देव! प्रथम जो आपने बतलाया था कि राव लूणकरण ने जाम्भोजी की स्तुति की थी। उन्हें अपना इष्ट देवता मानता था। किन्तु नारनौल जाते समय उन्होंने जाम्भोजी की आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया?

नाथोजी उवाच-हे शिष्य! मनुष्य की मनोवृत्ति बड़ी ही चंचल है। लूणकरण जब जाम्भोजी के सामने था तब तो उमंग उमड़ रही थी, उनका कवित्व जग गया था। किन्तु जब वापिस अपने राज में आया तो वासना ने उस आनंद को ढक दिया और नारनौल हस्तगत करने की इच्छा जागृत हुई। राजा ने अपनी इच्छा पूर्ति के लिए ज्योतिषी, पण्डित आदि विद्वानों से पूछा था। तब उन्होंने युद्ध में जाने की प्रेरणा दी थी। और कहा कि अवश्य ही जीत होगी। पण्डित लोग चाहते थे कि राजा हमारे चंगुल से कहीं निकल न जाये इसीलिए जाम्भोजी की बात को झूठी करते गये और अपने वाक्जाल में फंसा लिया तथा राजा को मृत्यु तक पहुँचाने के लिए तैयार कर लिया।

जब अंत समय आ जाता है तो अच्छी बात भी उल्टी लगती है राजा लूणकरण के साथ भी ऐसा ही हुआ। राव लूणकरण के विपरीत उनका बड़ा बेटा जाम्भोजी की शरण में आ गया तो देवजी ने कृपा की और उन्हें राजा बनाने का वरदान दिया। कुदरत का खेल बड़ा ही विचित्र है, जो होनहार है वही होता है। इसके लिए परिस्थितियां अपने आप बनती जाती है।

“ नर चीते कछु और दई कछू और बणावै।

करण मत महल दई तहां धूल उड़ावै।