मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह43 / 94

चौथा अध्याय · कथा 43

लूणकरण द्वारा स्तुति

श्री देवजी सम्भराथल आ गये। मोतिये को छुड़ा लिया। ऐसा बीकानेर नरेश लूणकरण ने सुना तो अपने प्रताप को साथ लेकर सम्भराथल पर आये। लूणकरण ने देव का दर्शन आनन्द विभोर होकर किया। कवि हृदय जाग उठा और अनायास ही राजा श्री देव की स्तुति करने लगा -

कवित्त भक्त मुक्त दातार, जम्भ जगदीसर कहिये। थल सिर रह्यो, जु आय, भाग बड़े सू लहिये। औलखिये आचार, पार कहो कूण जू पावे। सारा सनमुख रहै, दई नहीं पूठ दिखावै। ज्ञान कह्यो गुरु गम दई, म्हासूं सनमुख देव। लूणकरण कर जोड़ कहे, किणी न पायो भेव। 1।

दई जु धारी देह, कहो कुण पार जु पावै।

जाकी कला अनेक, जीव कहो जस कहाँ गावै।

जोजन लग महकार, श्री खण्ड जिमि नित आवै।

किस्तुरी से अधिक, सुवास प्रमल महकावै।

साधां मन आनन्द अति, आएऊ जम्भ अचम्भ।

लूणकरण कर सिर धरो, दया धर्म के थम्भ। 2। जम्भगुरु सो देव न कोऊ, सुण्यों न देख्यो। धूप घृत मिष्टान्न, होम करत नित प्रति पेख्यो। करै विष्णु उपदेश, लेश जीव पाप न राखे। सब दुनिया सूं हेत, खेत मुक्ति मुख भाखे। आन देव किये दूर सब, कहै मुखा हरि सेव। लूणकरण राजा कहै, नमो नमो गुरुदेव। 3।

हरि की महिमा अनन्त, कहो कुण वरण सुणावै।

सेंस सहंश मुख रटत, तास गुण पार न पावै।

रिख नारद गौतम, ब्रह्मा विसनु महेसर।

इन्द्र चन्द सूरज व्यास, जै देव भजै हर।

नेत नेत सारा कह्यो, किणियन पायो पार।

परगट आयो कहे लूणकरण, जम्भगुरु किरतार। 4। गुरु सो दाता नहीं, परम गति गुरु ते पाई।

भव सागर बहै जात, मुक्त की न्हयाव लगाई।

हर कोई है प्रभाव, वचन हूँ कोई न टालै।

जीव सुजीवां सोध, परीत पहलों की पालै।

मुक्त झयाज मांडी जेही, खालक खेवणहार।

लूणकरण तव दास है, प्रभु मोहे पार उतार। 5।

दोहा एहि विधि अस्तुति करी, लूणकरण नर ईश।

चरन कमल प्रसत भया, धरयो जम्भ कर सीस।

राव लूणकरण को कंवर प्रतासी घोड़ो नचावे थो। किणो कह्यो। कंवर घोड़ो भलो नचावे थे। जाम्भौजी श्रीवायक कहै- यह 'ाष्टद सुनाया, वै कंवराई अनंत ष्/ाई, वै कंवराई सुरग ष्/ाई।

सबद-68 ओÖम्म9 वै कंवराई अनंत बधाई। वै कंवराई सुरग बधाई।। यह कंवराई खेह रलाई। दुनीयां रोलै कंवर किसो। कण बिण कूकस रस बिन बाकस। बिन किरिया परिवार किसो।। अरथूं गरथूं साहण थाटूं। धूंवै का लहलोर जिसो।। सो शारंगधर जपरे प्राणी। जिहिं जपिये हुवै धरम इसो। चलण चलंतै बास बसंतै। जीव जिवंतै काया नवंती।। सास फुरंतै किवी न कमाई। तातैं जंवर बिन डसीरे भाई।। सुर नर ब्रहा कोउ न गाई। माय न बाप न बहण न भाई। इंत न मिंत न लोक जणो। जंवर तणा जमदूत दहेला। लेखो लेसी एक जणो।। त्ध्।।

बीकानेर राव लूणकरण का पुत्र प्रतापसी सम्भराथल के नीचे घुड़ दौड़ कर रहा था। उस समय पिता तो देवजी की स्तुति कर रहा था किन्तु पुत्र घोड़ा नचा रहा था। वही पर देवजी के पास स्थित भक्त ने कहा - हे गुरु देव ! लूणकरण का पुत्र राजकुमार घोड़ा बहुत ही अच्छा नचाता है। यह राजकुमार कितना शोभायमान हो रहा है। कुंवर की बड़ाई सुनकर श्री देवजी ने शब्द सुनाया - और कहा -

राजकुमार तो ध्रुव प्रहलाद आदि थे। जिनके लिये अनन्त बधाइया बांटी थी। अब भी बधाइयां बांट कर खुशी मनाते है। राजकुमार तो वे ही थे जिनके जन्म होने पर मृत्यु लोक एवं स्वर्ग लोक में भी बधाइयां बांटी गयी। उनकी कीर्ति स्वर्ग लोक तक फैली थी। अब तक कीर्ति पताका फहरा रही है।

यह प्रतापसी जैसे राजकुमार खेह में यानि मिट्टी में मिल जायेगे। इनका यश नहीं फैल सकेगा। ऐसा कोई दिव्य कार्य कुंवर जैसा नहीं कर जायेगा तो इसका कोई नाम लेने वाला भी नहीं होगा।

यह दुनिया तो चली जा रही है। अस्थिर दुनिया के बारे में स्थिरता सोचना अज्ञानता ही है। जब दुनिया ही यथावत नहीं रहेगी, तो इन कंवरों की क्या ओकात है, जो थोड़े ही दिन ठहर जाये। बिना कण तत्त्व के थोथा भूसा-घास तथा बिना रस के रसहीन फल कुछ प्रयोजन नहीं है। जिस परिवार में धर्म क्रिया नहीं है, वह परिवार भी थोथा रस हीन है।

धनिक पुरुष एवं राजाओं के पास यह जो धन-धान्य, घोड़ा, हाथी आदि ठाट-बाट हैं, यह तो धूंवे के थोथे बादलों के समान है। इन बादलों से वर्षा नहीं होती जो हवा के झोंके से उड़ जायेंगे। इसलिये हे प्राणी! उस सांरगधर भगवान् विष्णु का जप करे,वही सर्वोत्तम धन है। जिसका जप करने से ऐसा दिव्य धर्म होगा जो संसार के दुःखो से छुटकारा दिला देगा। यही जीवन का उद्देश्य है। जब तक शरीर चलता है तब तक भगवान् का भजन करे। शरीर चलते हुए,संसार में जीवन जीते हुए,जब तक शरीर स्वस्थ है तब तक हरि को न भूले। जब तक श्वास चलते हैं, तब तक शुद्ध कमाई अवश्य ही करे। यह कार्य करेगा तो यमदूतों से रक्षित हो जायेगा। इस गाथा को सुर नर, ब्रह्मा आदि सभी ने गाया है। तुम्हारे इस जीव के न तो मां, बाप, बहन एवं भाई हैं तथा न ही अपना पराया, मित्र तथा सम्बन्धी ही है। ये तुम्हे यम दूतो से नहीं छुड़ा सकेगे तुम्हारा हिसाब किताब लेखा जोखा लेने वाला तो एक है, उससे नहीं छूट सकोगे।

हीन्दवां मुसलमाणां शब्द सुण्यौ। हिन्दू मुसलमाण सरबई बैठा है। जाम्भोजी सगलाइ नो सन्मुख दीसै। केईक हिन्दू मुसलमाण कहै - कोई जंवर कै वसि है थऊ नहीं। जाम्भोजी श्री वायक कहै -

शब्द - 69 ओ३म् जबरारे तैं जग डांडीलो, देह न जीती जांणो।

माया जालै ले जम काले, लेणा कोण समाणो।

काचै पिंडे किसी बड़ाई, भोलै भूल अयांणो।

म्हा देखंता देव दाणु सुरनर खीणा, बीच गया बेराणो।

कुम्भकरण महारावण होता, अबली जोध अयाणो।

कोट लंका गढ़ विषमा होता, कांयदा बस गया रावण राणो।

नौ ग्रह रावण पाए बन्ध्या, तिस बीह सुर नर शंक भयाणो।

ले जम काले अति बुधवंतो, सीता काज लुभाणो।

भरमी बादी अति अहंकारी, करता गरब गुमानो

तेऊ तो जम काले खीणा, थीर न लाधो थाणो।

काचै पिंड अकाज अफारूं, किसो पिराणी माणो।

साबण लाख मजीठ बिगूता, थोथा बाजर घाणो।

दुनियां राचै गाजै बाजै, तामैं कणू न दाणू।

दुनियां के रंग सब कोई राचै, दीन रचै सो जाणो।

लोही मास बिकारो होयसी, मूर्ख फि रै अयाणो। मागर मणियां काच कथीरन राचो, कूड़ा दुनी डफाणो। चलन चलन्तै, जीव जीवन्तै, काया निवन्ती, सास फुरंतै। कांयरे प्राणी विष्णु न जंप्यो, कीयो कंधै को तांणौ। तिहिं ऊपर आवैला जंवर तणा दल, तास किसो सहनाणो। ताकै शीष न ओढ़ण, पाय न पहरण, नैवा झूल झयाणो। धणक न बाण न टोप न अंगा, टाटर चुगल चयाणो।

साल सुचंगी घृत सुबासो, पीवण न ठंडा पाणी।

सेज न सोवण, पलंग न पोढ़ण, छात न मैड़द्ध माणो।

न वां दइया न वां मइया, नागड़ दूत भयाणो।

काचा तोड़ नीकुचा भाषै, अघट घटे मल माणो। धरती अरु असमान अगोचर,जातैं जीव न देही जाणो।

आवत जावत दीसे नाहीं, साचर जाय अयाणो।

जंवर तणा जमदूत दहैला, मल बैसेंला माणो।

तातैं कलीयर कागा रोलो, सूना रह्या अयाणो। आयसां जोयसां भणता गुणंता, वार महूर्ता पोथा थोथा।

पुस्तक पढ़िया वेद पुराणों।

भूत परेती कांय जपीजै, यह पाखण्ड परमाणो। कान्ह दिशावर जेकर चालो, रतन काया ले पार पहूँचो।

रहसी आवा जाणो। तांह परैरे पार गिरांये, तत के निश्चल थाणो।

सो अपरंपर कांय न जंपो, तत खिण लहो इमाणो।

भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेलत डालूं।

जइया मूल न सींच्यो, तो जामण मरण बिगोवो।

अहनिश करणी थीर न रहिबा, न बंच्या जम कालूं।

कोई कोई भल मूल सींचीलो, भल तंत बूझीलो।

जा जीवन की विध जाणी।

जीव तड़ा कछु लाहो होसी, मूवा न आवत हाणी।

वै कंवराई-शब्द राजा लूणकरण ने तथा अन्य हिन्दू मुसलमान आदि सभी ने सुना। उसी समय सम्भराथल पर हिन्दू-मुसलमान सभी बैठे हुए थे। किन्तु जाम्भोजी सभी को ही सन्मुख ही दिखाई देते थे। पीठ किसी को भी नहीं दिखाई देती थी। सभी श्री मुख की शोभा निहार रहे थे। क्योंकि उनका शरीर तेजो मय ज्योति स्वरूप ही था। इसलिये ज्योति चारों तरफ एक जैसी ही दिखाई देती थी। उस समय हिन्दू- मुसलमान आदि कुछ लोगों ने पूछा-हे देव! आप हमें यह बतलाइये कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति भी है जो जबर मृत्यु को वश में कर ले। इस प्रकार की शंका का समाधान देते हुए श्री देवजी ने यह शब्द सुनाया जंबरारे” इसका भाव इस प्रकार से है-

हे लोगो! यह जबरदस्त मृत्यु निश्चित ही है। इसने सम्पूर्ण संसार को दण्डित किया है। इस मृत्यु के रहते हुए कोई अपनी इस काया को कैसे जीत सकता है? क्योंकि यह शरीर तो पंच महाभूतों से निर्मित है। ये महाभूत ही माया हैं। माया में बैठा हुआ यह जीव कैसे मुक्त हो सकता है? इस कच्चे शरीर की क्या बड़ाई करें? न जाने कब फूट जाये? जो लोग इसकी वास्तविकता नहीं जानते, वही इसकी महानता, स्थिरता का विशेष ख्याल रखते हैं। किन्तु क्या इस मृत्यु से बच सकेगा? विषम विचित्र स्थान में बनाया हुआ लंका का कोट जो पूर्ण सुरक्षित था, जिसके चारों ओर समुद्र रूपी खाई थी और त्रिकुट पर्वत पर लंका बसी हुई थी। उसमें भी रावण कुछ समय तक ही निवास कर सका। वह लंका का कोट रावण को अमर नहीं कर सका। उस रावण की महिमा बड़ी विचित्र थी। रावण ने नौ ग्रहों को पाए के बाँ/ा रखा था। अर्थात् पूर्णतया वश में रखा था। ताकि वे रावण पर कुपित होकर मृत्यु का कारण न बन सके। उस रावण के डर के मारे सुर नर थर थर काँपते थे। सदा ही शंकित रहते थे कि न जाने कब क्या करेगा?

जब अति बुद्धिमान रावण का काल आया, तब उसने सीता का हरण किया। मृत्यु नजदीक आयी, तब रावण के मन में सीता प्राप्ति का लोभ पैदा हुआ। जब अन्त काल आता है तो व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। बुद्धि द्वारा निर्णय नहीं ले पाता। अहंकारी रावण भी ऐसा ही जाल में फंस गया था। जिससे अन्त तक बाहर नहीं निकल सका। और आखिर में यमकाल के हाथों चढ गया। उस रावण की लंका स्थिर नहीं रह सकी। सभी स्वप्न बिखर गये।

इस कच्चे शरीर से अकर्तव्य कर्म करता है। हे प्राणी! अभिमान कैसा है? जो तुम्हे जीने नहीं देगा। साबुन, लाख, मजीठ ये केवल ऊपर के दिखावे मात्र के हैं। अंदर से थोथा ही हैं। बाजरा निकालने के बाद थोथा चांचड़ा (भूसा) को गाहने से क्या मिलेगा। दुनिया तो खुश गाने बजाने में ही है। लेकिन उनमें तत्त्व कहाँ है। दुनिया के रंग में तो सभी कोई रचे हुए है किन्तु परमात्मा के रंग में जो रचे वही असली रंग चढ़ा हुआ जानो।

यह शरीर खून मांस हीं आदि का समूह है। इसमें कभी विकार पैदा हो जाएंगे। यह काया रूग्ण होकर क्षीण हो जाएगी। मूर्ख इस काया के अहंकार में डोलता है। उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकेगा। मगरे की चिड़ी मणियां, काच कथीर में रचे हुए लोग झूठे ही कहते हैं कि हमारे पास बहुत ही धन-दौलत है। यह संसार ऐसा ही असार है।

शरीर के चलते हुए, जीवन जीते हुए, काया द्वारा कार्य करते हुए, स्वस्थ काया रहते हुए, श्वांस चलते हुए, हे प्राणी! तुमने विष्णु का जप क्यों नहीं किया? केवल स्वकीय ताकत का ही प्रदर्शन किया।

तुम्हारे उपर यमदूतों का दल आयेगा। उनकी क्या पहचान होगी? उनके सिर पर ओढने बाँधने के लिए पगड़ी नहीं है। पैरों में पहनने के लिए जूते नहीं हैं। शरीर पर पहनने के लिए कुर्ता नहीं है। न ही उनके पास धनुष है, न ही बाण है, न ही सुरक्षा कवच है। टाटर चुगल बकवासी है।

वहाँ पर रहने के लिए भवन नहीं है। भोजन के लिए घृत-मिष्ठान्न नहीं हैं। पीने को ठण्डा जल नहीं है। सोने के लिए सहज पलंग-बिस्तर नहीं हैं। न वहाँ छत, मंदिर, मठ आदि नहीं हैं। वहाँ न तो दया है और न ही मया है नहीं दादी है और नही माता है। वहाँ नंगे रहने वाले भयंकर यमदूत हैं। कच्चे शरीर को तोड़ कर जीव को निकालेगे। धमकी भरे वचन बोलेगे। अघटित घटना घटेगी।

वे यम दूत धरती और आसमान के बीच से ले जायेंगे। किन्तु आते जाते दिखाई भी नहीं देंगे। यह सत्य घटना अवश्य ही घटित होगी। वहाँ पर यम दूत भयंकर दुःख देंगे। दुर्गन्ध युक्त स्थान में डाल देंगे। जीव दुःख के मारे रोयेगा, चिल्लायेगा। किन्तु रक्षा करने वाला कोई नहीं होगा।

इस समय आयस, योगी, ज्योतिषी, पढे-लिखे, गुणी, वार-महुर्त बताने वाले, पुस्तक पढने वाले, वेद, पुस्तक, वार ग्रह नक्षत्र सभी कुछ थोथा हैं। कोई भी मृत्यु से नहीं बचा सकते। ये पढे लिखे कथित विद्वान्, भूत प्रेतों को क्यों जपते हैं? यह तो पाखण्ड है। कृष्ण (गीता) के बताये हुए मार्ग के अनुसार जीवन यापन क्यों नहीं करते? यदि गीता अनुसार चले तो इस रतन काया द्वारा बैकुण्ठ की प्राप्ति हो सकती है। अन्यथा पंथ से भटके हुए लोगों का जन्म-मरण नहीं मिट सकेगा। जन्म मरण मिट जायेगा तो उस स्थिर भगवान् के धाम बैकुण्ठ को प्राप्त कर लेगा।

सदा एक रस रहने वाले भगवान् विष्णु का जप क्यों नहीं करते? वह सदा नित्य स्थायी धाम प्राप्त करवायेगा। उस की प्राप्ति अतिशीघ्र संभव है। हे प्राणी! अच्छे मूल की सिंचाई करो। जिस प्रकार से मूल में जल डालने से वृक्ष विस्तार को प्राप्त होता है। सुमधुर फल प्रदान करता है। उसी प्रकार से विष्णु सभी का मूल है। मूल की सिंचाई करने से तुम भी फू लोगे-फ लोगे। जिसने मूल विष्णु का स्मरण नहीं किया उसका जन्म-मरण नहीं मिटेगा। प्रत्येक दिन की क्रियाएँ स्थिर नहीं रहती हैं। किन्तु उन क्रियाओं द्वारा जो पाप-पुण्य होगा वह स्थिर है। उसी का फल सुख-दुःख प्राणी भोगता है। नित्य कर्म जो धार्मिक नहीं है, तो वह यमदूतों से रक्षा नहीं कर सकेगा।

इस संसार में विरले कोई-कोई ही भल मूल की आराधना, सेवा पूजा करते हैं और तत्त्व के बारे में पूछते हैं। जो ऐसा करते हैं, वही जीवन की विधि जानते हैं और वैसा ही जीवन जीते हैं। उन्हे जीवन में लाभ मिलेगा। इस जीवन में सुख की प्राप्ति होगी। शरीर छोड़कर जायेंगे, तो भी हानि नहीं होगी। सर्व मंगल मांगल्यम् रहेगा।