चौथा अध्याय · कथा 42
बीदे जोधावत को परचा देना
एक समय वीदे जोधावत मोतिये साध नै रोक्यो। जांभोजी मोतिये की मदति दूणपुर आये। वीदो वाद रूपी क्रोधवंत हुय देवजी के हजूर आयों। वीदो कैवण लागौ-कोई जोगी अलेख धीयाव कोई जंगम सन्यासी शिव नु ध्याव। कोई गोरख नु धीयाव। कोई भगवंत नु धीयाव। कोई परमेसर नु धीयाव। सो कोई देव दुगरी ध्याव। नी करछः तुंतो आपो आप देव कहावै छै। सो देव पणै मो दिखाल्य। आज थारी सीधाई जाणी जासी। देवजी कहै-थारै मनां मां सो पूछय। वीदो कह-आके आम किया। नीबे नारेल किया। पाणी का दूध किया। वीदो कह आं थांहर सोरम क्यांहरी आव। जाम्भोजी श्री वायक कहै -
शब्द-3 ओ३म् मोरे अंग न अलसी तेल न मलियो, ना परमल पीसायों।
जीमत पीवत भोगत विलसत दीसां नाहीं, म्हापण को आधारूं। अड़सठ तीरथ हिरदा भीतर, बाहर लोका चारूं। नान्हीं मोटी जीया जूंणी, एती सास फु रंते सारूं। वासंदर क्यूं एक भणीजे, जिंहि के पवन पिराणौं। आला सूका मेल्हे नाहीं, जिहिं दिश करे मुहाणों। पापे गुन्हे वीहे नाही, रीस करे रीसाणों। बहूली दोरे लावण हारूं, भावे जाण में जाणूं। ना तूं सुरनर, ना तूं शंकर, ना तूं राव न राणों। काचे पिंड अकाज चलावे, महा अधूरत दाणों। मोरे छुरी न धारूं, लोह न सारूं, न हथियारूं सूरज को रिप बिहंडा नाहीं, ताते कहाँ उठावत भारूं जिहिं हाकणड़ी बलद जूं हांके, न लोहे की आरूं।।3।। नाथोजी अपने शिष्य वील्हाजी के प्रति कथा सुनाते हुए कहने लगे-हे शिष्य! इन राजाओं की पंरपरा में जोधपुर नरेश का बेटा बीदा दूणपुर में राज करता था। वह गुरु की आज्ञा का लोप करता था। वह अहंकारी व विवादी व्यक्ति था। उसी नगरी में ही एक मोती नाम का मेघवंशी था। वह गुरु का शिष्य बन गया था। उसने गुरु पंथ को अपनाया था। शुद्ध कर्म करने लगा था। “आचारो ही परमो धर्मः” आचार ही प्रथम धर्म है। इसी धर्म का पालन करना था। उनतीस नियमों का पालन करने में तत्पर था। श्री गुरुदेव मोतिये पर अति प्रसन्न थे। प्रातःस्नान, संध्या, हवन, सद्गुरु की सेवा,श्रद्धा,तथा एक विष्णु का ही भजन करना,अखाद्य भोजन छोड़ दिया था। अपने ही हाथ से भोजन बनाता था। शौच आदि पवित्रता से जीवन व्यतीत करता था। असंस्कारी, चाहे वह जाति से ब्राह्मण ही क्यों न हो उससे संगति नहीं करता था। दूर ही रहता था। अपने जाति भाइयों से भी दूर ही रहता था। उनके साथ खान-पान व्यवहार नहीं करता था। दुर्मति मिट गयी थी और सुमति आ गयी थी। ऐसा साधु पुरुष दूणपुर में रहता था। उसी दूणपुर का राजा वीदो राठौड़ था। वीदे ने अपने सेवकों से सुना-कि एक मोती मेघवाल बिश्नोई हो गया है और उत्तम जाति ब्राह्मण से भी छूआछूत करता है। वीदे ने कहा-ऐसा मेरे राज्य में कौन है? जो अपना पुस्तैनी धन्धा छोड़कर उत्तम जाति की बराबरी करता है? इस प्रकार से तो सभी छोड़ने लग गये तो हमारे छोटे-बड़े कार्य कौन करेगा? इसके देखा देखी तो दूसरे भी छोड़ देंगे। इसको पकड़ कर ले आओ और चरखी पर चढा दो। जल्दी ही समाप्त करो। वीदे की बात किसी दयावान ने सुनी और कहा-हे राजन्! इतनी जल्दी ना करो। चार पहर तक इसे मुहूलत दी जावे। यह अपने इष्ट देवता को तो याद कर ले। वीदे ने उसे चरखी तो नहीं चढाया, किन्तु पति पत्नी दोनों को जेल में बन्द कर दिया। जेल में बन्द उन दोनों भक्तों ने हरि का स्मरण किया। और विनती करने लगे-हे सम्भराथल धणी! हम तो अब आपकी ही शरण में हैं। हमारा आपके सिवा और कोई नहीं है। आप यदि बचा तो हम बच जायेंगे। अन्यथा वीदे के द्वारा मृत्यु होना तो निश्चित् ही है। धर्म रक्षा हेतु हम प्राण दे देंगे, तो भी मोक्ष प्राप्ति होगी। दोनों ही हाथों में लंÂ हैं। यह सुअवसर प्राप्त हुआ है अब हम चूकने वाले नहीं हैं। इस प्रकार जेल में बन्द भगवान् से पुकार करने लगे।
सवा पहर रात्रि जब व्यतीत हो गयी तब अन्तर्यामी ने साथरियों से कहा- कि एक सेवक दूणपुर में है। उसको संकट आया है। मैं जाता हूँ। आप लोग यहीं रहें।
सद्गुरु ने अपनी इच्छा से मनसा विमान चलाया और दूण पुर के पास ही एक स्थल पर विराजमान हुए। प्रातःकाल में ही मोतिये को मारने का उपाय किया जाने वाला था, किन्तु किसी व्यक्ति द्वारा वीदे को यह पता चला कि मोतिये का गुरु आ गया है। पास ही में एक स्थल पर आसन लगाये बैठा है।
वीदे ने कहा-अच्छा हुआ। मैं स्वयं उनके वहाँ जाता, किन्तु स्वयं ही आ गया, तो अच्छा ही हुआ। वीदा तैयार होकर मिलने के लिए चल पड़ा। चलते-चलते विचार किया कि वह मोतिये का गुरु इसे मुक्त करवाने हेतु आया है। मैं इस पुरुष के पास तो जा रहा हूँ, किन्तु मैं इसे अपना मस्तक तो नहीं झुकाऊँगा। पीछे से जाकर पीठ पर लात मारूँगा। यह भी क्या समझेगा कि दूणपुर आया है। चलते चलते ज्यों ज्यों पास पहुँचा त्यों त्यों मति बदल गयी। लात मारने की इच्छा तो थी, किन्तु जाम्भोजी के प्रभाव क्षेत्र में आने से विचार बदल गये। बिना प्रणाम किये ही पास में जा बैठा। विवाद करने लगावील्होजी
ने पूछा-हे गुरुदेव! वीदे ने अपना विचार बदल क्यों दिया? क्या चमत्कार हुआ था? यहाँ पर भी कोई कृष्ण चरित्र हुआ है तो बतलाने की कृपा करें। नाथोजी उवाच-वीदा राठौड़ अहंकारी, विवादी, हठीला था। परन्तु भगवान् के पास में आने से वह अपनी हिंसक वृत्ति भूल गया था। क्योंकि जो भी मन, वचन,कर्म से सर्वथा अहिंसा का पालन करह्य,उसके पास में रहने वाला भी वैर भाव भूल जाता है। ऐसी ही महिमा वाले थे सद्गुरुजी। उनके पास आने से वैर भाव भूल गया था? वह वीदो। वीदो अहंकारी, विवादी अत्यधिक था। वह कृष्ण चरित्र को क्या समझे?
उन्हें क्या पता चले कि स्वयं भगवान् ही समक्ष विराजमान हैं? वीदा कहने लगा-कोई तो अपने को योगी कहता है,कोई संन्यासी कहता है,कोई तपस्वी कहता है, कोई अपने को सिद्ध साधु एवं साधक कहता है। कोई भक्त भगवान् को ही जपता है,किन्तु आप अपने को देवता भगवान् विष्णु कहते हैं। यदि आप में देवत्व है, तो आज मुझे दिखलाओ। जिस शक्ति से अपने को देवता कहते है।
आप लोगों को भ्रमित करक उनका पुश्तैनी कर्म छुड़ाते हैं। तो आज वह अपनी शक्ति मुझे दिखलाओ। ह्य सद्गुरु ने कहा-हे लोगों! जो जीव अपरिचित है, उसे तो परिचित करना ही होगा। यह वीदा तो ऐसा ही मूढ है।
वीदे से प्रकट रूप से कहा-हे वीदा! तुझे क्या अलौकिक कार्य चाहिये। जो देखना चाहता है वह मैं तुझे दिखाऊँगा। वीदा कहने लगा, यदि आप अलौकिक कृष्ण चरित्र कर सकते हो तो इन नीमों के नारियल देखना चाहता हूँ। सद्गुरु ने मोतिये को छुड़ाने हेतु नीमों के नारियल लगा कर के दिखलाये। वीदे ने तथा उपस्थित जन समुदाय ने नीमों के नारियल लगे हुए देखे तो सभी ने जाम्भोजी की जय जयकार की और अपने को धन्यवाद दिया।
एक सेवक को भेजकर नारियल तोड़ कर मँगवाये, और वही सभा में ही तोड़कर प्रसाद लिया तो कहने लगे-है तो नारियल ही। इसमें फर्क नहीं है। नारियल खाते जाते और कहते जाते कि ऐसा तो अचंभा न तो कभी सुना है, और न ही कभी देखा है। वीदा कहने लगा-यह कैसा मानव है जो नीम के नारियल लगा देता है।
उसी समय उसी सभा में ही एक भेदी कहने लगा-यह तो जादूगर का जादू खेल है। ऐसा तो बाजीगर लोग खेल दिखाते ही रहते हैं। वीदे ने कहा-यह ठीक कह रहा है। इस परचे को मैं नहीं मानता। जितनी कला मनुष्य के पास है, यदि उतनी ही कला देव के पास है, तो देव को लज्जा आनी चाहिये। इससे तो जाम्भोजी देव सिद्ध नहीं हो सकते। क्योंकि साधारण गलियों में घूमने वाले भी ऐसा करतब दिखाते हैं।
वीदा ने पुनः कहा-यदि आप मेरी इच्छा पूर्ण करेंगे, तो इस समय मेरे सामने आक के पेड़,दिखाई दे रहे हैं उन आकों के मैं आम देखना चाहता हूँ और नारियल की तरह बिना मौसम के आम के फल खाना चाहता हूँ। जम्भेश्वरजी ने कृष्ण चरित्र किया और आक वृक्षों के आम लगाये। केवल दिखलाने की बात नहीं थी। आम मंगवाकर जिमाया भी। सभी ने स्वाद चखा और कहने लगे,वही आम का मधुर रस है। ऐसी अनहोनद्ध तो कृष्ण चरित्र से ही संभव है। कोई गोड़िया,कोई बाजीगर नहीं कर सकता।
वीदे के मन में कुछ शांति हुई। क्योंकि अलौकिक आम और नारियल वीदो भी जीम चुका था। इतना करने पर भी वीदे का संदेह अब तक निवृत्त नहीं हुआ था। कहने लगा-यदि आप साधारण संत न होकर देव रूप में हो तो एक परचा मुझे और दे दीजिए। तो मैं मोतिये को मुक्त कर दूँगा। यदि आप जल का दूध बना कर सभी को पिला दें तो मेरा मन निश्चय कर लेगा।
जाम्भोजी ने कहा-हे वीदा! जगत में दूध तो अनेक पशुओं का होता है, किन्तु तू जल का दूध बनाने की बात कहता है। फिर भी मैं तुझे दूध पिलाऊँगा, किन्तु किसका दूध पीयेगा? तुझे किसका दूध अच्छा लगता है। वीदा ने कहा-महाराज ! यह बात आपकी सत्य है कि अनेक पशुओं से दूध प्राप्त होता है, किन्तु मैं गाय का दूध पीना चाहता हूँ। क्योंकि गऊ का दूध उतम माना जाता है। यदि यह परचा 1ापका सत्य हुआ तो मैं मोतिये को छोड़ दूँगा।
हे वीदा! तुम्हारे विश्वास पात्र सेवक को घड़ा देकर भेजो। जहाँ से भी शुद्ध जल मिले, वहाँ से मंगवाओ। कलश में जल छान कर ले आये। सेवक ने जल का कलशा कपड़े से ढक कर पास में रख दिया। सद्गुरु ने शब्द उच्चारण किया और कपड़ा उठाकर वीदे को बतलाया और कहा-अब आप भी इस पवित्र दूध को पिएँ, औरों को भी पिलाएँ।
प्रथम तो अति शोभायमान उज्ज्वल दूध सभी ने आगे बढ कर देखा तथा बाद में सभी ने पिया भी। सभी ने प्रशंसा करते हुए कहा-यह दूध तो गाय के दूध से भी सवाया है। गाय के दूध से भी स्वादिष्ट, मधुर है। वीदा ने कृष्ण चरित्र द्वारा निर्मित दूध का आस्वादन लिया और कहने लगा-भोपा भरड़ा द्वारा जो अलौकिक वस्तुएँ दिखाई जाती हैं, वे तो केवल देखने तक ही सीमित हैं। उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता। बाजीगरों का खेल तो झूठा है, किन्तु जाम्भोजी का यह मंत्र सत्य है। जिससे पानी का दूध बन जाता है।
वीदा कहने लगा-यह मंत्र मुझे भी सिखलाओ ताकि मैं जब चाहूँ तब जल का दूध बना लूँ। श्रीदेवजी ने कहा-हे वीदा! जिस मति शक्ति से जल की उत्पत्ति होती है, बादल बन करके बरसता है, उसी वर्षा से घास धान आदि पैदा होते हैं। गऊवें घास चरती हैं। जल पीती हैं। उसी घास जल से गऊ के पेट में दूध ग्रहण करता है। शरीर में शरीर पैदा होते हैं।
उसी शक्ति मति द्वारा ही जल का दूध भी हो जाता है। अन्य शक्ति मति द्वारा नहीं हो सकता। वह विद्या शक्ति तुम्हारे पास नहीं है। इसलिये केवल मंत्र सीखने से जल का दूध नहीं हो सकता। ऐसी करामात सीखी भी नहीं जा सकती। किन्तु वीदे ने मंत्र लिखने के लिये कागज कलम और दवात मंगवायी और मोहता से कहने लगा- आप लिखिये, कैसे नहीं लिखा जायेगा? आप मुझे याद करवा दीजिये। मैं जल का दूध बना लूँगा।
मोहता कलम कागज लेकर बैठ गया-वीदा ने कहा-बैठे क्या देख रहे हो? जैसा देवजी उच्चारण करते है।, वैसा लिखते जाइये। मोहते ने कहा ठाकुर साहब। जो तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाला है,श्वास प्रति श्वास जीवों की संभाल करता है, जो सभी को रोजी-रोटी देता है,उनके शब्द से ही जल का दूध हो सकता है, अपने शब्दों द्वारा नहीं हो सकता।
फिर भी मोहतो सावधान होकर लिखने लगा किन्तु मन स्थिर नहीं हो सका। जांभोजी के होठों से तो शब्द निकल रहे है किन्तु मोहता पकड़ नहीं पा रहा है। अन्त में मोहते ने हाथ जोड़ लिये और वीदे से कहने लगा-यह मंत्र मेरे से तो नहीं लिखा जायेगा।
मोहता कहने लगा-जिस प्रकार से शरीर में जीव रहता है किन्तु उसका आदि अन्त पार नहीं पाया जा सकता है। कुछ भी ठीक से नहीं कह सकते। वह अलख निरंजन ही उसकी गति को जानता है। उसी प्रकार से ही यह जल का दूध हो गया, किन्तु उसकी गति नहीं जानी जा सकती। वीदे ने पूछा-आपका शरीर महिमावान है। आपके दिव्य शरीर में सुगन्ध आ रही है। क्या आपने कोई सुगन्ध वाला तेल या परमल लगा रखी है? यदि ऐसा है तो वह कौन सा तेल है जो हमें भी बतलावे हम भी आपकी तरह सुगन्धी प्राप्त करें।
श्री देवजी ने शब्द सुनाया-मोरे अंग जिसका भावार्थ इस प्रकार से है-हे वीदा! मैंने अपने शरीर में कोई सुगन्धी वाला तेल या परमल नहीं लगाया है। किन्तु तुम सोचो! शरीर में दुर्गन्ध क्यों आती है? हम जो भी खाते पीते हैं, उसी की ही दुर्गन्ध बनती है। मैं तो कुछ भी खाता पीता नहीं हूँ, तो जीवित किस आधार पर रहते हो? श्री देवजी ने कहा-हम ही तो सम्पूर्ण जगत जीवन के आधार भूत हैं। किन्तु हमारा कोई आधार नहीं है। हम स्वंय समर्थ हैं।
जहाँ सद्गुरु, देव, ऋषि, मुनि, भक्त, संत विराजमान होते हैं। और जल का स्नान होता है, वही तीर्थ होता है जांभोजी कहते हैं कि हे वीदा! अड़सठ तीर्थ तो हृदय के भीतर ही हैं। बाह्य तीर्थ तो लोकाचार है। जब हृदय स्थित तीर्थो में स्नान हो जाये तो बाह्य तीर्थो की आवश्यकता नहीं रह जाती है। तथा हृदय के तीर्थो का जब तक पता नहीं चले तब तक बाह्य तीर्थ भी उपयुक्त हैं। ये तीर्थ आचार विचार को शुद्ध करने वाले हैं।
छोटी मोटी जीव-योनियाँ जो जन्म-मरण के चक्कर में चलती रहती हैं। ये सभी तो एक श्वांस के जीवन वाले हैं। श्वास आया तो जीवन, नहीं आया तो मृत्यु। जिन्दगी अस्थिर है। मृत्यु सदा ही सिर पर खड़ी है। हे वीदा! तू ,,ेसा क्यों कर रहा और किस के लिये? तुम नहीं जानते कि यह क्रोध तो धधकती हुई अग्नि है। इस अग्नि को जलाने में पवन ही प्राण है। क्रोध को बढाने में भी शब्द ही प्राण है। यह क्रोध रूपी अग्नि भंयकर रूप धारण कर लेती है, तो न तो सूखे को छोड़ती है और नहीं हरे को छोड़ती है। दोनो को ही जला देती है।
उसी प्रकार से यह बढा हुआ क्रोध भी यह नहीं देखता कि यह सामने वाला व्यक्ति अपराधी है या निरपराधी है। दोनों को सामान्य रूप से पीड़ित करता है। अग्नि इन्धन को जला देती है और स्वंय भी जल कर राख हो जाती है। इसी प्रकार से क्रोध भी स्वंय जलता है और दूसरों को भी जलाता है स्वंय कष्ट में पड़ता है,सामने वाले को भी कष्ट में डालता है। यह चाहे जाने में हो या अनजाने में हो अग्नि तो जलायेगी ही।
हे वीदा! तू क्रोध क्यों करता है? न तो तू शंकर है। न ही तू सुर-देवता ही है और न ही तू नर ही है। तू मानवता के गुणों से युक्त ही नहीं है। न ही तू कोई राजा ही है। इस कच्चे शरीर से अकर्तव्य कर्म कर रहा है। तू महान धूर्त है। तू राक्षस है।
वीदा कहने लगा-हे महाराज ! आप तो बड़ी ही कठोर वाणी बोलते हैं। इस प्रकार से तो आपके शत्रु पैदा हो जायेंगे तो आपको हानि पहुँचा सकते हैं अपने बचाव हेतु आप कोई शस्त्र भी रखते ही होंगे। यदि नहीं रखते तो मैं आपको देता हूँ। आपको शस्त्र पास में रखना चाहिये।
श्री देवजी ने कहा-हे वीदा ! मेरे पास किसी भी प्रकार का लोहे से बना हुआ शस्त्र नहीं है। मैं तो अपने पास बैल हांकने वाली हांकणी के समान भी लोहे या लकड़ी का हथियार नहीं रखता, क्योंकि मुझे भय नहीं है।
सूर्य का शत्रु कभी विनाश नहीं कर सकता। सूर्य का कोई शत्रु हो भी नहीं सकता। रात्रि में चमकने वाला जुगनू क्या सूर्य का शत्रु हो सकता है? उसी प्रकार से संसार के लोग तो मेरे सामने जुगनू के समान ही हैं। जो सूर्य उगने से पूर्व ही अपनी कला दिखाते है। सूर्य के सामने नहीं।
वीदा कह उदभूद परचौं दीखालौं। न कणी मांग्यौं नैं कणी दानूं। दुणपुर की हदेक म्रघ श्रब सोनै का करूं। श्रब सोने की पहाड़ी करूं। वीदो कहै पातेस्या खोसल्य। देवजी कह - बारै बौ घैणा पाहण बरसाउ। वीदो कहै विच माहै तीस भूख मरा। जांभोजी कह छ रूते बारमास मुसलधार मेह बरसाउ। वीदो कहे पाणी सुं वहे जावां। है मैं म्हानैं सहस डील्ह करी दीखावौ। जाम्भोजी सुकल दीसां - श्री वायक कहै -
शब्द-67 (शुक्ल हंस) ओ३म् श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुय नागौरी, म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयो।
अठगी ठंगण, अदगी दागण, अगजा गंजण, ऊनथ नाथन अनूं नवावन।
कांहि को मैं खैंकाल कीयों, कांही सुरग मुरादे देसां, कांही दौरे दीयूं।
होम करीलो दिन ठावीलो, सहस रचीलो छापर नींबी दूणपूरू।
गाँव सुंदरीयो छीलै बलदीयो, छन्दे मन्दे बाल दीयो।
अजम्है होता नागो वाड़े, रैण थम्भे गढ़ गागरणो।
कुं कुं कंचन सोरठ मरहठ, तिलंग दीप गढ़ गागरणो।
गढ़ दिल्ली कंचन अर दूणायर, फिर फिर दुनियां परखै लीयों। थटे भवणिया अरू गुजरात, आछो जाई सवा लाख मालबै। पर्वत मांडू मांही ज्ञान कथूं।
खुरासाण गढ़ लंका भीतर, गूगल खेऊ पैर ठयो।
ईडर कोट उजैंणी नगरी, काहिदा सिंधपुरी विश्राम लीयो।
कांय रे सायरा गाजै बाजै, घुरे घुर हरे करे इंवाणी आप बलूं।
किंहि गुण सायरा मीठा होता, किंहि अवगुण होशो खार खरूं।
जद वासग नेतो मेर मथाणी, समंद बिरोल्यो ढोय उरूं।
रेणायर डोहण पांणी पोहण, असुरां बेधी करण छलूं।
दहशिर ने जद वाचा दीन्ही, तद म्हे मेल्ही अनंत छलूं।
दह शिर का दश मस्तक छेदया, ताणु बाणु लडू कलूं।
सोखा बाणू एक बखाणू, जाका बहु परमाणूं निश्चय राखी तास बलूं।
राय विष्णु से बाद न कीजै, कांय बधारो दैत्य कुलूं।
म्हे पण म्हेई थेपण थेई, सा पुरुषा की लच्छ कुलूं।
गाजै गुड़के से क्यू वीहै, जेझल जाकी संहस फ णूं।
मेरे माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैंण न लोक जणों।
बैकुण्ठे विश्वास बिलम्बण, पार गिरांये मात खिणूं।
विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी, विष्णु भणंता अनंत गुणूं।
सहंसे नावें, सहंसे ठावें, सहंसे गावें, गाजे बाजे, हीरे नीरे।
गगन गहीरे, चवदा भवणे, तिहूँ तृलोके, जम्बू द्वीपे, सप्त पताले। अई अमाणो, तत समाणो, गुरु फु र्माणो, बहु परमाणो। अइयां उइयां निरजत सिरजत।
नान्ही मोटी जीया जूंणी, एति सास फुरंतै सारूं।
कृष्णी माया घन बरषंता, म्हे अगिणि गिणूं फूहारूं।
कुण जाणै म्हे देव कुदेवों, कुण जाणै म्हे अलख अभेवों।
कुण जाणै म्हे सुरनर देवों, कुण जाणै म्हारा पहला भेवों।
कुण जाणै म्हे ग्यानी के ध्यानी, कुण जाणै म्हे केवल ज्ञानी।
कुण जाणै म्हे ब्रह्मज्ञानी, कुण जाणै म्हे ब्रह्माचारी।
कुण जाणै म्हे अल्प अहारी, कुण जाणै म्हे पुरुष क नारी।
कुण जाणै म्हें वाद विवादी, कुण जाणै म्हे लुब्ध सुवादी।
कुण जाणै म्हे जोगी के भोगी, कुण जाणै म्हे आप संयोगी।
कुण जाणै म्हे भावत भोगी, कुण जाणै म्हे लील पती।
कुण जाणै म्हे सूम क दाता, कुण जाणै म्हे सती कुसती।
आपही सूम र आप ही दाता, आप कुसती आपै सती।
नव दाणूं निरवंश गुमाया, कैरव किया फती फती।
राम रूप कर राक्षस हड़िया, बाण कै आगै बनचर जुड़िया।
तद म्हें राखी कमल पती, दया रूप म्हें आप बखाणां। संहार रूप म्हें आप हती।
सोलै सहंस नवरंग गोपी, भोलम भालम टोलम टालम।
छोलम छालम, सहजै राखीलो,म्हे कन्हड़ बालो आप जती।
छोलबीया म्हें तपी तपेश्वर, छोलब किया फती फती।
राखण मतां तो पड़दे राखां, ज्यूं दाहै पांन वणासपती।
वीदे को तीन परचे दिखाये। एक शब्द कहा। किन्तु वीदा संतुष्ट नहीं हुआ,और कहने लगा-कोई अद्भूत परचा दिखलाओ। ऐसा चमत्कार जो न तो किसी ने अब तक दिखाया है और नहीं कोई दिखा सके। न भूतो न भविष्यति।
श्री देव ने कहा-दूणपुर की सीमा में जितने मृग हैं, उन्हें सोने का कर दूँ। तथा तुम कहो तो तुम्हारी सीमा में जितनी पहाड़ियाँ हैं, वे सभी सोने की कर दूँ। वीदा कहने लगा-यदि ऐसा होगा तो हम से बादशाह छीन लेगा। हमें तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
देवजी ने कहा-तुम्हारी राज्य सीमा के बाहर बड़े बड़े पत्थर बरसा दूँ। वीदे ने कहा-यदि ऐसा करोगे तो हम बीच-बीच में भूख मर जायेंगे। अन्नादि कहाँ से आयेंगे ऐसा न करें।
श्री देवजी ने कहा-बारह महीने मूसलाधार वर्षा करवा दूँ यदि तुम चाहो तो। वीदा ने कहा-हम लोग डूबक र मर जायेंगे। आप कृपा करे और हमें सहक शरीर करके दिखलायें। क्योंकि आप ही तो कृष्ण चरित्र की बात करते हैं। कृष्ण ने तो अर्जुन को विराट रूप दिखाया था।
भगवान् ने कहा-अब वह विराट् रूप तो दुबारा नहीं दिखाया जा सकता। क्योंकि एक कार्य एक ही बार होता है। पुनः आवृत्ति नहीं की जा सकती। किन्तु हे वीदा! तुम अपने विश्वास पात्र सेवकों को जहाँ कहीं भी कितने ही गाँवों में भेजोगे, मैं वहीं पर यहीं बैठा हुआ एक साथ दिखाई दूँगा। ज्योति स्वरूप से मैं सभी जगह विद्यमान हूँ। इस समय तुम्हारे पास भी मैं हूँ।
वीदा कहने लगा-सभी जगहों पर नहीं, इसी एक जगह पर ही सहक शरीर कर के दिखलाओ तो हमारा मन मानेगा। हमें विश्वास एवं श्रद्धा होगी। पंडित ज्योतिष आदि शास्त्रों का विचार करते हैं और कहते हैं कि चारों युगों में अवतार तो निश्चित जो होना है, वही होगा। यहाँ मरुदेश में अवतार कैसे होगा? हमारे शास्त्रो में लिखा नहीं है।
श्री देवजी ने बतलाया कि असीम, निरंजन, निराकार को न तो पंडित ज्योतिषी और न ही उनके बनाए हुए शास्त्र बन्धन में बाँध सकते। वह सर्व समर्थ कर्ता क्या करेगा? इस बात को तो वही जानता है। तुम्हारे पंडित नहीं जानते हैं।
एक मंत्री कहने लगा-यदि सहक डील न कर सको तो कोई बात नहीं है, यहीं पर पाँच शरीर एक साथ दिखा दें तो हजार भी दीख सकते हैं।
श्री देवजी ने कहा-मैंने तो आप लोगों को छूट दे दी है, जहाँ पर जितने रूप देखना चाहते हैं, उतना ही देखें। इस प्रकार से चालीस स्थानों पर वीदे ने अपने सेवक भेजे थे। उन्हीं जगहों पर भगवान् ने अपना दिव्य रूप दिखाया था। सेवकों ने जैसा देखा था, वैसा ही वापिस आकर वर्णन किया था। वीदे के प्रति शुक्ल हंस शब्द सुनाया था। जिसका भाव इस प्रकार से है -
श्री जम्भेश्वरजी वीदे के प्रति कहते है कि हे वीदा ! मैं श्री गढ बैकुण्ठ धाम से आल-चलकर मोतपुर- मृत्यु लोक में आया हूँ। पाटण भूंय नागौरी-नागौर की पट्टी में जहाँ गहरा जल है ऐसे बागड़ देश में मैंने अवतार लिया है। अवतार लेने के क्या कारण है? यह आगे शब्द में बतलाते हैं। जो ठग लोग हैं। जो दूसरों काह्य ठगने के लिये, उन्हें सुपथ का पथिक बनाने के लिये। धर्म का चिह्न धारण कर के धार्मिक बनाने के लिये। जो लोग शारीरिक दैनिक क्रिया करना नहीं जानते हैं, उन्हें पवित्रता सिखाने के लिए। जो लंबी-लंबी जटाएँ रखते हैं, शुद्धता से दूर हैं, उन्हें शुद्ध पवित्र शिष्य बनाने के लिए। जो धर्म की मर्यादा रूपी बंधन से मुक्त हैं, उन्हें धर्म के बंधन में बाँधने के लिए। उनकी उद्दण्डता पर अंकुश लगाने के लिये। जो किसी के आगे झुकते नहीं हैं, नमन करना नहीं जानते हैं, महान अहंकारी हैं, उनके अहंकार की निवृत्ति के लिए मैंने इस मरुभूमि में अवतार लिया है।
इस समय अधिकारी के भेद से तीन प्रकार के लोग हैं। उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार ही गति प्रदान करूँगा। कुछ लोग तो बिल्कुल ही मूढ हैं। उनका तो विनाश ही होना है। जन्म-मरण के चक्कर में चौरासी काह्य भुगतेंगे। कुछ लोग ज्ञान के अधिकारी हैं, उन्हें स्वर्ग मुक्ति प्रदान की जायेगी। और अन्य कुछ लोग तो महान् पापी हैं, उन्हें तो नर्क दिया जायेगा।
हजारों स्थान में एक ही समय श्री देवजी ने हवन किया- दिन निश्चित किया, उन जगहों का नाम बतलाते हैं। छापर, नींबी, दूणपुर, गाँव सुंदरियो, छीलै, बलदीयों, छंदे मंदे, बालदीयो, अजमेर, होता, नागौर, रणथम्भौर, गढ, गागरौन (सवाई माधोपुर), कुं कुं कंचन, सोरठ, मरहठ, तिलंग दीप, गागरणों, गढ दिल्ली, कंचन दूणायर, थटे, भवणिया, गुजरात, आछोजाई, सवालाख, मालवै, पर्वत, मांडूं, खुरासाण, गढ लंका, ईडर कोट, उजैणी सिन्धपुरी आदि।
श्री गुरु जांभोजी कहते हैं कि हे वीदा! कुछ समय तक मैंने जगनाथ पुरी में विश्राम लिया। वहाँ पर मैंने समुद्र से कहा था-हे समुद्र! क्यों गर्जना करता हुआ भयंकर ध्वनि करता है? अपने ही अहंकार की पुष्टि करता है।
हे सायर! पहले तो तू मधुर ही था, किन्तु अब खारा कड़वा क्यों हो गया? ऐसा क्या हुआ होगा? सागर ने तो जवाब नहीं दिया। इधर वीदे ने भी कुछ जवाब नहीं दिया। तब स्वयं ही श्री देवजी ने बतलाया सुनो।
भगवान् की आज्ञा से जब देव-दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब मधुर अमृत तथा चौदह रत्न तो देवताओं ने निकाल लिये तभी से कड़वा हो गया। हे वीदा! सागर का अहंकार भी नहीं रह सका। तब तेरा अहंकार भी नहीं टिक सकेगा। अहंकार की वजह से ही समुद्र रस विहीन कड़वा था। तुम्हारी भी वही दशा होगी। अहंकारी दानव तो अमृत से वंचित रह गये, किन्तु विनम्रशील देवता अमृत पान कर गये।
हे वीदा! दससिर वाले रावण को प्रथम तो वचन दिया था, जिससे रावण शक्ति संपन्न हो गया। फिर उसी रावण के साथ छल करने हेतु सीता को लंका में भेजी, और रावण के दस मस्तक काट डाले। बांण तांण तांण के मारे थे और रावण को कुल के सहित नष्ट कर दिया था। वही बाण अब भी मेरे पास मौजूद हैं। किन्तु इस समय आवश्यकता नहीं पड़ेगी। रावण की भांति तू भी वीदा, नीति मर्यादा को भंग कर रहा है। वही दशा तेरी होगी।
हे वीदा! जब राम रूप धारण करके स्वयं विष्णु ही सीता को लाने के लिए सेना सहित लंका में जा रहे थे, किन्तु बीच में समुद्र ने मार्ग अवरुद्ध कर दिया। तीन दिन तक तो प्रार्थना ही करते रहे, किन्तु उस प्रार्थना से समुद्र नहीं माना। रास्ता नहीं दिया। तो रामजी ने अग्नि बाण चढा लिया था और कहा था-
एक बाण से सुखा डालूँगा। सागर ने भी मानव रूप धारण करके पुल बनाने का उपाय बतला दिया। उसी प्रकार से वीदा तेरी भी वही गति होगी । किसी अहंकारी का अहंकार टिक नहीं सका। सभी का टूटा है। वही बल निश्चित ही अब भी तेरे पास विद्यमान है। हे वीदा! तुम्हारे सामने उपस्थित साक्षात विष्णु से व्यर्थ का विवाद क्यों करता है। तथा राक्षस कुल को बढ़ावा क्यों दे रहा है?
हे वीदा! मैं तो मैं ही हूँ और तू तो तू ही है। न तो मैं तू हो सकता है और नहीं तू मैं हो सकता। तू अपने प्रकृति स्वभाव को नहीं छोड़ सकता। मैं भी अपने ईश्वर स्वभाव को नहीं छोड़ सकता। जो है वही बने रहो। दूसरे की नकल करने का प्रयास न करो।
वे पुरुष तो भिन्न ही हैं, जिनके लक्षण उत्तम है। हे वीदा! क्रोध में भर कर क्यों गर्जना तर्जना करता है। शेष नाग की तरह मुख से जहर उगलता है। उस प्रकार की क्रिया करके तू किसको डराता है? मेरे को तो तू भयभीत नहीं कर सकता, क्योंकि मेरे माता-पिता, बहन-भाई, सगा-मित्र, कुल-परिवार कोई नहीं है जिसका तू विनाश कर सके। केवल वैकुण्ठ लोक ही मेरा घर है। वैसे तो सभी प्राणी ही मेरा परिवार है। विश्वास श्रद्धा ही तो मेरा सम्बन्ध है।
हे वीदा! इस समय संसार सागर से पार उतरना, बैकुण्ठ लोक की प्राप्ति का समय उपस्थित हुआ है। इस समय का अवसर हाथ से न जाने दे। वैसे ही बिना कमाई के ही नष्ट नहीं हो जाना। हे प्राणी! तू अपना भला चाहता है तो विष्णु का जप कर। विष्णु का जप करने में अनन्त गुण हैं।
वह विष्णु सर्वत्र विद्यमान है। हजारों जिसके नाम, गाँव, स्थान, शब्द में गर्जना में जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, तेज आदि में सर्वत्र है। उस विष्णु की व्यापकता देखिए-चौदह भवन, तद्धनों लोकों में, जम्बूद्वीप, सप्त पाताल, यहाँ तक कि सम्पूर्ण संसार में कण-कण में तत्त्व रूप से समाया हुआ है।
हे वीदा! यह गुरु का वचन सत्य है। इसमें बहुत ही शास्त्रादि प्रमाण हैं। छोटी-मोटी जीव योनियाँ जो कुछ तो सृजन हो चुकी हैं, नाना प्रकार के शरीरों को धारण कर चुकी हैं तथा कुछ अभी शरीर धारण करने हेतु प्रतीक्षा कर रही हैं, उनको मैं एक श्वांस का जीवन देता हूँ। दूसरे श्वांस मृत्यु भी।
भगवान् की माया से अनहोनी भी हो जाती है। कृष्णी माया कहाँ क्या करेगी? इसका कुछ भी पता नहीं है। जो माया द्वारा होन हार है वही होगा। किन्तु मानव कुछ अन्य करने हेतु संघर्षशील है। परेशान होता हुआ दीख रहा है। कृष्णी माया ही वर्षा के रूप में बरसती हैं। अगणित वर्षा की फु हारें भी मैं गिन लेता हूँ। मानव माया अधीन है। किन्तु गुरु महाराज कहते हैं कि माया मेरे अधीन है।
हे वीदा! भगवान् के तत्त्वस्वरूप को कौन जानता है कि ईश्वर परमात्मा क्या है? श्रीदेवजी कहते हैं कि मैं क्या हूँ, यह भी तुम कैसे जान पाओगे? कौन जानता है कि मैं देव हूँ, या कुदेव हूँ? कौन जानता है कि मैं अलख निरंजन अगम्य निराकार बुद्धि द्वारा अप्राप्य हूँ? कौन जानता है कि मैं सुर हूँ या नर हूँ, या ये दोनों ही संयुक्त रूप से हूँ?
हमारे प्रथम आदि उत्त्पत्ति के भेद को कौन जानता है? कौन जानता है कि मैं ज्ञानी हूँ या ध्यानी हूँ? कौन जानता है कि मै कै वल्य ज्ञानी हूँ। कौन जानता है कि मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ? कौन जानता हैं कि मैं ब्रह्मचारी हूँ? कौन जानता है कि मैं थोड़ा भोजन करने वाला हूँ या अधिक? या मैं सर्वथा निराहारी हूँ?
कौन जानता है कि मैं पुरुष हूँ कि नारी हूँ? कौन जानता है कि मैं वाद विवादी हूँ? कौन जानता है कि मैं लोभ की पूर्ति हेतु मीठा बोलने वाला हूँ? कौन जानता है कि मैं योगी हूँ या भोगी हूँ? कौन जानता है कि मैं संयोगी हूँ या वियोगी? कौन जानता है कि मैं इच्छानुसार भोगी हूँ? कौन जानता है कि मैं इस संसार लीला का पति स्वामी हूँ? कौन जानता है कि मैं सूम हूँ या दाता? कौन जानता है कि मैं सती हूँ या कुसती?
हे वीदा मैं आप ही सूम हूँ तथा दाता भी मैं स्वयं ही हूँ। सृष्टि का लय करने में तो मैं सूम हो जाता हूँ, और उत्पत्ति करने में मैं दाता हो जाता हूँ। पालन पोषण करने में दाता हूँ तो लय करने में सूम हो जाता हूँ। मैं ही सतियों में सती रूप से विद्यमान होता हूँ। तथा कुसतियों दुष्टता रूप में। हे वीदा! मैंने तो राक्षसों का वंश ही समाप्त कर दिया। कौरव जो दुर्योधन आदि थे उनको भी तित्तर-बित्तर कर दिया। राम रूप धारण करके राक्षसों को मारा था। उस समय राम बाण के आगे वनचर हनुमानादि स्वतः ही आकर जुड़ गये।
उस समय रावण की लंका में सीता की रक्षा की थी। जब हम दया करते हैं तो अति दयालु कहलाते हैं और जब भयंकर रूप धारण करके राक्षसों को मारते हैं तो हत्यारे भी कहलाते हैं।
हे वीदा! भौमासुर की कैद में सोलह हजार गोप बालाएँ जो अभी भोली भाली, खेलने वाली कन्याएँ थी। उनकी रक्षा मैंने की थी। भौमासुर को मार कर उन्हें कैद से मुक्त करवाया था। और उन्हीं जीवो को मैंने पत्नी रूप में स्वीकार किया था। वे बालाएँ मुझे स्वामी रूप से मान कर मेरे ही शरण में रही थी। उनको मैंने सहज भाव से स्वीकार किया था। इतनी गोपियो के होते हुए भी मैं कृष्ण बाल यति ही था।
भगवान् कहते हैं कि यदि हम रक्षा करना चाहें, तो रक्षा कर सकते हैं। जिस प्रकार से चारों तरफ अग्नि लगी हो। एक सूखा पत्ता बीच में जलने को तैयार, किन्तु उसको मैं बचा लेता हूँ,या दाहा पड़ने पर भंयकर शीत से बड़े बड़े लकड़े जल जाते हैं, किन्तु एक पत्र भी बच जाता है। उसको बचाने वाला तो मैं ही हूँ। इसलिये हे वीदा ! मैं मोतिये को बचाना चाहता हूँ। यह अवश्य ही बचेगा। तू कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगा। इस प्रकार से वीदे को शब्द सुनाया।
सहंसार सार श्री कुण जाणै। म्हे पुरुष क नारी। वीदो कहे देवजी म्हे थानै नागा करस्या। देवजी कह जुगा जुगंतर जाहि तोई म्हे नागा हुवा नहीं। वीदै एक जणै नै सैनी कीवी। धोती को पलौ खांच्यो,पलै को छेड़ो आयो नहीं। वीदो कहै-म्हे घणा खारया। म्हारे जीव रो कासो होसी। देवजी कहै-मनसा पाप दहिसी। मोतियो छुड़ायो। देवजी संभराथलि आयो साथरिये पूछयौ-देवजी ! इह शब्द को नांव कहो। देवजी शब्द को नाव सुकल हंस बतायो। सुकल दिसा बोल्यो जीव अहल्यौ न जाय।
भगवान् विष्णु जांभोजी सहक रूप से विद्यमान हैं। इस रूप को कौन जानता है? मानव की बुद्धि अत्यल्प है, भगवान् स्वंय विराट रूप हैं। एक घड़े में समुद्र कैसे समा सकता है? जब श्री देवजी ने शब्द कहा कि “कुण जाणै म्हे पुरुष कै नारी” तब वीदे ने कहा-हे देवजी! हम लोग आपको नंगा कर के देखेंगे कि आप पुरुष हो या नारी। देवजी ने कहा-युगों-युगों तक तो मैं नंगा हुआ ही नहीं। अब तुम्म मुझे नंगा कैसे करोगे?
वीदे ने एक व्यक्ति को इशारा किया कि जाम्भोजी की धोती खींचो। उस व्यक्ति ने द्रौपदी के चीर की भांति जाम्भोजी की धोती खींची, किन्तु पार नहीं पाया। ज्यों ज्यों धोती खींचता गया, त्यों त्यों धोती बढती गयी।
वीदा कहने लगा-हे देव ! हम तो बहुत ही अपराधी हैं। आप हमारा अपराध क्षमा करें। मेरे इस जीव की क्या गति होगी ? देवजी ने कहा-मनसा पाप तुझे जलाते रहेंगे। चैन नहीं मिल सकेगा। वीदे ने कहा-मैंने आपके बारे में अच्छा नहीं सोचा था। आपकी पीठ में लात मारने की सोच कर चला था, किन्तु मार नहीं सका। इसका फल मुझे क्या भुगतना होगा?
देवजी ने कहा-तुमने पीठ पर लात मारने की सोची थी। जो दूसरे के प्रति सोचता है, वह अपने पर ही लागू होती है। तुम्हारी पीठ पर भयंकर फोड़ा होगा, जो किसी जड़ी बूटी से ठीक नहीं होगा। यह स्वयं का किया हुआ स्वयं को ही भुगतान होगा।
श्री देवजी ने मोतिये को छुड़ाया। वापिस सम्भराथल पर आये। साथरियों ने पूछा-हे देव। वीदे की बात कहो-श्री देव ने बतलाया कि वीदा तो ऊँट जैसा ही आदमी है। यह तो मर कर ऊँट बनेगा। अपने कर्मों का भोगना चाहता है। वीदे में विवाद भरा है। समर्पण भाव नहीं है। इसलिये उसे साथरियों ने कहा - आपने वीदे को शब्द सुनाया, उसका क्या नाम रखा है ? देवजी ने कहा-कि नाम “शुक्ल हंस” शब्द का सस्वर उच्चारण करने से जीवों के पाप नष्ट हो जायेगे। अहंकार की निवृत्ति एवं परमानन्द की प्राप्ति कराने वाला यह शब्द है।