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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 87

बूचो जी का बलिदान

विक्रम संवत सोलह सौ तीस से सत्रह सौ छतीस के बीच में संत केशोजी महान् कवि हुए थे। केशोजी उस समय बूचो के बलिदान के प्रत्यक्ष द्रष्टा थे। अपने गुरु वील्होजी की भांति इन्होंने भी खड़ाणे की अनेक साखियांँ विरचित की हैं। उन साखियों में ही यह प्रसिद्ध साखी बूचेजी की है। जिसमें कवि ने उक्त घटना का सविस्तार वर्णन किया है “बूचो बारां करोड़”

बूचो भक्त मेड़ता परगने के पोलावास गाँव का रहने वाला एक सच्चा विष्णु का भक्त था। उस गाँव में सभी बिश्नोई भाई ही निवास करते थे। जिस गाँव में बिश्नोई निवास करते थे, वहाँ वहाँ रूँखों का बाहुल्य था। जो अब भी देखा जा सकता है। जहाँ पर रूँख अधिक होंगे, वहाँ वर्षा भी ज्यादा होगी। जिस वजह से तालाब जल से लबालब भरे रहते थे। उन्हीं तालाबों के आस पास तथा सम्पूर्ण वन में ही वृक्ष इतने गहरे तथा घने थे कि पत्तों के भार से नीचे झुके हुए थे। धरती पर टिक चुके थे। कहीं पर भी धरती खाली नहीं थी। उन में भी अधिकतर खेजड़ी के ही वृक्ष थे। क्योंकि उस क्षेत्र में और दरखत कम ही पनपते हैं।

अन्य वृक्ष तो अपने नीचे धान- घास आदि को पनपने ही नहीं देते, किन्तु खेजड़ी वृक्ष अपने नीचे दूसरों को पनपने में सहायता ही देते हैं। किसी अन्य से विरोध न होकर सहयोग ही रहता है। इतना घना वन भी इसलिए ही था क्योंकि बिश्नोई लोग जाम्भोजी के वचनों को पालने वाले थे “जीव दया पालनी, रूंख लीलो नहीं घावै” इस नियम का अक्षरसः पालन करते आ रहे थे। इसलिए न तो स्वयं ही काटते थे और न ही दूसरों को काटने देते थे।

उस समय बिश्नोई केवल अपने बलबूते पर ही वृक्षों की रक्षा कर रहे थे किन्तु राजकीय सहायता बिना तो वृक्षों की रक्षा करना उनके लिए कितना कठिन था। उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। बिश्नोइयों के गाँव भी प्रायः एक ही जगह पर हुआ करते थे। वे अपना समूह बना कर आस पास के ही जंगलों में बस जाया करते थे। मेड़ते परगने में उस समय तथा अभी भी लगभग पन्द्रह बीस गाँव बिश्नोइयों के थे। वे सभी एक ही जंगल में बसे थे। इसीलिए वन की हरियाली दूर दूर तक बड़ी ही सुहावनी लग रही थी। उससे बाहर तो अज्ञानी लोगों ने वृक्ष काट लिये थे। जब कभी ईंधन व इमारती लकड़ी की आवश्यकता पड़ती थी सभी लोग बिश्नोइयों के गाँवो की सीमाओं में ही दृष्टि लगाये रखते थे। उनसे रक्षा बिश्नोई करते थे।

कुछ वस्तुएँ पूजनीय होती हैं, जिनमें एक ईश्वर विष्णु की भक्ति- उपासना करना, गुरु जाम्भोजी महाराज, एवं उनके वचन- शब्द, गऊ जो माता तुल्य दूध देती है, वन्य जीव, हरिण, मयूर आदि तथा खेजड़ी वृक्ष जो तुलसी मानी जाती है। यदि इन पूजनीय वस्तुओं की हानि होती है तो बिश्नोई लोग कदापि सहन नहीं कर सकते।

रैण और राजोद गाँव भी पोलास गाँव के निकट ही पड़ते हैं। वहाँ पर उस समय जाम्भोजी के शिष्य राव दूदा के पौत्र रहा करते थे। हालांकि दूदा तो परम धार्मिक था, किन्तु उनकी औलाद उस प्रकार से धार्मिक नहीं थी। वे ही लोग उस समय वहाँ पर जागीरदार थे। मेड़ते का राज्य तो उनसे छिन गया था क्योंकि उन्होंने जाम्भोजी के वचन नहीं माने थे। अब ये लोग यहीं पर ही रह कर अपने दिन व्यतीत कर रहे थे, किन्तु अपनी दुष्टता नहीं छोड़ी।

दूदा तो सुगरा था। गुरु के वचनों को मान कर अपने राज्य में हरे वृक्ष न काटने का नियम बनाया था। किन्तु उनकी औलाद इतनी जल्दी ही उन नियमों को भूल चुकी थी।

जहाँ तहाँ भी हरे-सूखे वृक्ष दिखाई दिये, वहीं से कटवाकर मंगवाने प्रारम्भ कर दिये। हरे वृक्ष काट काट कर के रैण और राजोद का वन तो प्रायःखाली कर दिया था। अब पोलास के जंगल की भी बारी आ चुकी थी।

लगभग होली के आस पास के दिन थे और किसान अपनी फ सलें खेतों से समेट कर घर आ चुके थे। होली की खुशियाँ मनाने की तैयारियाँ चल रही थी। वन-खेत तो प्रायः सूना हो चुका था। उस शून्य जन रहित वन में उस दूदे की औलाद ने घाह्म् लगा कर अनेक खेजड़ी के वृक्ष काट लिये और काट कर एकत्रित कर लिये,तथा बैलगाड़ियो में भर कर वहाँ से उठा कर ले भी गये।

ग्वालों द्वारा पोलास के बिश्नोइयों को यह खबर मिली कि अपने ही वन से रूँख कट गये हैं। एक तरह से धरती खाली हो गयी है। यदि इसी प्रकार का क्रम चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं कि सम्पूर्ण वन कट जायेंगे। गाँव के लोग एकत्रित हुए और वन में जाकर जहाँ जहाँ पर वृक्ष कटे थे वहाँ वहाँ पर पेड़ो के मूल देखे तो बात सच्ची ही निकली।

वहीं से पंचों ने चिट्ठी लिख कर चारों ओर बिश्नोइयों के गाँवो में भेजी और स्वंय उन लोगों ने पैरो के निशान देखे और पैर के निशाने पर आगे चले तथा राजोद गाँव पहुँच गये। वहाँ जाकर देखा तो वृक्षो का ढेर लगा हुआ था। मानो होली जलाने के लिये ही लगाया हो। खोजी ने पैरों के निशान देख कर यह बतलाया कि ये तो नरसिंघदास ठाकुर के ही आदमी हैं। जिनमें करम चंद, दुरजण आदि प्रमुख हैं। इन्हीं लोगों ने यह अन्याय किया है।

जमात एकत्रित हो चुकी थी। सभी ने कहा- वास्तव में यह तो बड़ा ही पापी जागीरदार है। इसी पाप के कारण तो इनका मेड़ता छिन गया है। वहाँ पर बिश्नोई ही नहीं, किन्तु वहाँ के स्थानीय मान्यता प्राप्त लोग ब्राह्यण,बनिया,राजपूत,आदि एकत्रित हुए थे। पंचायत होने लगी थी। किन्तु बुद्धि हीन उन लोगों ने नरसिंघदास का ही साथ दिया। बिश्नोइयों का पक्ष नहीं लिया। क्योंकि उनको यह भय था कि कहीं ग्राम पति ठाकुर नाराज हो गया तो हमें यहाँ से निकाल देगा। इसलिये स्वार्थ के वशीभूत होकर अन्याय का ही साथ दिया।

बिश्नोइयों के प्रधान ने भरी सभा के बीच में खड़े होकर कहा- यदि तुम लोग अन्याय का साथ देना चाहते हो तो भले ही दो,किन्तु ये दरख्त तो इस नरसिंघदास ने ही कटवाये हैं। हम पीछे नहीं हटेंगे।

“सिर धन आवै सिर साटै,सिर साटै सनमान,

सिर साटै लाभै सुरग,जे सिर दीनों जाय।

हम अपना बलिदान दे देंगे किन्तु इस प्रकार से वन का विनाश नहीं होने देंगे। वहाँ पर उपस्थित जन समूह ने इस बात पर आश्चर्य प्रगट करते हुए कहा-कि यह असंभव है। क्या कभी कोई रूँखों के बदले भी अपने प्राण निछावर कर सकता है? कदापि नहीं। हम लोग भी धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, पूजा पाठ यज्ञ उपासना,आदि यही धार्मिकता है। कहीं कोई वृक्षों के बदले मर जाना भी क्या कोई धार्मिकता है? हे बिश्नोइयों! क्यों व्यर्थ में अपने प्राणों से हाथ धो रहे हो?

बिश्नोइयों ने सम्बोधन कर के कहा-हम लोग केवल कहते ही नहीं हैं, करके भी दिखाते हैं। धर्म तो केवल कहने-सुनने की वस्तु नहीं है। वह तो आचरण का विषय है। हमारे गुरु जम्भेश्वर जी ने हमें यही सिखाया है कि प्राणो को देकर भी हरे वृक्षों की रक्षा करो। एक या दो के शरीर भले ही चले जायें, किन्तु उसके बदले में धर्म की रक्षा होगी। तो उससे असंख्य प्राणियों की रक्षा होगी। यही सब से बड़ा परोपकार है।

यदि ऐसी बात है तो हम सभी लोग यहाँ देख रहे हैं तुम्हारे बीच में से कौन मरने के लिये तैयार है। किस व्यक्ति को घर परिवार, स्त्री-बच्चे प्यारे नहीं हैं? कौन व्यक्ति ऐसा है जो शरीर को इस धर्म रक्षार्थ सहर्ष सौंप देगा? शस्त्र की पैनी धार के सामने स्थिर कौन रहेगा? यदि ऐसा कोई है तो अवश्य ही सामने आये,और अपनी शूरवीरता दिखाये।

ऐसी वार्ता श्रवण कर के बूचोजी भक्त बीच में से निकल कर सामने आकर खड़े हो गये। बूचोजी ने अभी ही यौवनावस्था में पदार्पण किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि थोड़े ही दिन पूर्व उड़सर गाँव में विवाह हुआ था,और अपनी पत्नी आदि का मोह माया छोड़कर सभी के बीच में निर्भय होकर खड़ा था।

बूचोजी ने ललकारते हुए कहा- यह मैं शहीद होने के लिए तैयार खड़ा हूँ। आइये, कौन आकर मेरा काम तमाम करेगा? मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं बिल्कुल इस जगह से हिलूँगा नहीं। सामने हाथ उठाऊँगा नहीं। मेरा सिर धड़ से अलग कर दीजिये। न ही अन्य कोई मेरा भाई बंधु विरोध करते हुए आपका सामना करेगा। आप लोगों में से जो अपने को शूरवीर समझता है। वह सामने आ जाइये। मेरी एक शर्त है, वह भी सुन लो। मेरे बलिदान हो जाने के बाद फिर कभी भी तुम्हारे सम्बन्धियों में से कोई भी हरा वृक्ष नहीं काटेगा और न ही कटवाने की प्रेरणा ही देगा। यह जो वृक्ष कट गये हैं, इनकी जगह पर तुम्हें दूसरे रूँख लगवा कर देने होंगे। यही रूँख कटने की घटना इस इलाके में अंतिम होनी चाहिये। इसलिए मेरा शरीर तुम्हारे समर्पित है। मेरा सिर काट लीजिये परन्तु रूँख नहीं काटना।

राजोद गाँव के ठाकुर नरसिंघदास की तरफ से बूचे जी का सिर छेदन के लिए रतने को हाथ में नंगी तलवार देकर भेजा गया और कहा- बिना कुछ सोचे समझे, बिना दया दिखाये, तुम जाकर उस सभा के बीच में खड़े व्यक्ति का सिर काट लो। मैं देखता हूँ कि कैसे नहीं कोई विरोध करता है। जहाँ थोड़ा भी विरोध करते हुए यदि देखा गया, तो हम समझेंगे कि यह इनका धर्म नहीं, पाखण्ड है। यदि ये लोग पाखण्डी सिद्ध हो जायेंगे, तो इन्हीं सभी को यहाँ से भगा देंगे।

बूचो जी ने हाथ जोड़ कर भगवान् विष्णु का नाम स्मरण किया और गुरु जाम्भोजी से प्रार्थना की कि हे गुरु देव! अब तो इस पंथ के आप ही रखवाले हैं। यह मेरी तथा समाज की परीक्षा की घड़ी आ गयी है। इस अवसर पर आप मुझे शक्ति प्रदान कीजिये, ताकि मैं शांति पूर्वक धर्म का निर्वाह कर सकूँ। इस शरीर की मुझे चिंता नहीं है। किसी भी प्रकार से धर्म की रक्षा हो जाये, यही मैं चाहता हूँ।

रतने ने सभी के देखते ही देखते बूचे जी के शरीर पर नंगी तलवार से वार किया और सिर धड़ से अलग होकर धरती पर गिर पड़ा। खून की धारा बह चली। धरती माता के एक सपूत ने अपने खून से माता के मस्तक पर तिलक किया था। जिससे यह धरती भी गौरवता को प्राप्त होकर सदा के लिये उस मरुभूमि का मस्तक ऊँचा कर दिया। ऊपर आकाश में सूर्य देवता देख रहे थे। उस दिन तो भगवान् सूर्य कुछ अधिक ही प्रसन्न हो रहे थे। मानो आशीर्वाद देने के लिए किरण सीधी धरती पर उतर कर के आ रही थी। देवता भी अत्यधिक प्रसन्न होकर मौसम को सुहावना बना दिया था। उपस्थित जन समूह ने भी हर्ष की ध्वनि प्रकट करके बूचोजी की जय जय कार की। चारों ओर से धन्य धन्य की ध्वनि गूँज रही थी।

बूचोजी के प्राण तो शरीर से विलग होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गये थे और जाते-जाते धर्म की मर्यादा को बांध गये। फिर कभी भी मेड़ता की अधिकार भूमि में हरे वृक्ष नहीं काटे गये। नरसिंघदास ने आकर जमात से क्षमा याचना माँगी और निवेदन किया कि आज से मैं और मेरा सम्पूर्ण परिवार जाम्भोजी की आज्ञा का पालन करेगा। आप बिश्नोई लोग मेरे बड़े गुरु भाई हैं। जो भी कार्य करूँगा,मैं आप लोगों से पूछ कर ही करूँगा। मुझे क्षमा प्रदान कीजिये।

अब मुझे वास्तविकता का पता चल गया है। हरे वृक्ष तथा वन्य जीव कितने हमारे लिये परोपकारी हैं। इन को काट बाढ कर हम कभी सुखी नहीं हो सकते। इसलिये आज से मेरी यह प्रतिज्ञा होगी कि मैं कभी भी न तो स्वयं रूँख काटूँगा और न ही दूसरों को काटनें दूँगा। आज बूचे जी के बलिदान ने मेरी आँखें खोल दी है।

यह घटना वि संवत् सत्रह सौ के होली के पश्चात चेत वदी तीज को घटित हुई थी। उस दिन हस्त नक्षत्र मंगलवार था।

केशोजी कहते हैं कि सुकर्म कर के बूचोजी स्वर्ग में पहुँच गये थे। यह वार्ता मैंने विचार पूर्वक सच्ची कही है। इसे सुन कर लोगो के मन में धार्मिक भावना उदय हो सके, यही मेरा उद्देश्य है।