बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 88
रामूजी खोड़ का बलिदान
सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम समय में अपने प्राणो का बलिदान देने वाले रामूजी खोड़ गोत्र के बिश्नोई थे। उन्होंने राज कर्मचारियों द्वारा जबरदस्ती से कर उगहाने के विरोध में अपने को युद्ध की विभीषिका में होम दिया। जोधपुर से लगभग चालीस कि.मी.पूर्व में कापरड़ा गाँव है। वहाँ पर उस समय विशाल मेले का आयोजन होता था। दूर दूर से लोग क्रय-विक्रय करने के लिये आते थे। प्रत्येक वस्तु का वहाँ व्यापार होता था। सम्पूर्ण भारत से व्यापारी वहाँ पहुँचते थे। इसी मेले में ही जाम्भाणी लोग भी जाते थे। प्रत्येक वर्ष इस मेले का आयोजन चैत्र के महीने में होता था। बे खटके लोग मेले में प्रवेश करते थे। कभी किसी प्रकार का कर नहीं लगाया जाता था। और न ही लोगों का ऐसा कर देने का स्वभाव ही था।
संवत् सत्रह सौ के चैत्र मेले में कापरड़ा में राजा की आज्ञा लियह्य बिना ही मेले में प्रवेश कर लगा दिया था। प्रत्येक व्यक्ति एवं पशु धन,सामान आदि सभी पर कर लाया गया था। गरीब जनता में त्राहि त्राहि मच गयी थी। राज कर्मचारियों के सामने जाकर विरोध करने की हिम्मत किसी को भी नहीं पड़ रही थी। जिस प्रकार से अन्य लोगों से अन्याय पूर्वक जबरदस्ती से कर लिया जा रहा था, उसी प्रकाद्भ बिश्नोइयों से भी डाण (कर) मांगा गया। तब बिश्नोई बन्धुओं ने कर देने से मना कर दिया।
जब कर्मचारियों ने पूछा-आप लोग ही क्यों नहीं देते? तब बिश्नोईयों ने कहा-हम जाम्भोजी के शिष्य हैं। हमारे लिये सभी जगहों पर कर (डाण) माफ है। जहाँ कहीं भी अन्याय होगा,हम उसे सहन नहीं करेंगे। वह चाहे हरे वृक्ष काटने का हो? चाहे वन्य जीव मारने की बात हो अथवा गरीब जनता को कष्ट देने की बात हो। हम इसका डट कर विरोध करेंगे। स्वयं मर जायेगें,दुष्टों को मार देगें,किन्तु अपने सामने अन्याय नहीं होने देंगे। इस बात को आप ठीक से समझ ले और हमारे तथा इन जनता के सामने से हट जाओ।
राजकर्मचारियों ने उन बिश्नोइयों की बात को अनसुनी कर दी और लोगों से कर उगाहना प्रारम्भ कर दिया। बिश्नोइयों की जब बारी आयी तब उन्होंने कुछ भी नहीं दिया। बिना कुछ दिये,उन कर्मचारियों की परवाह किये बिना ही मेले में प्रवेश कर गये। उसी समय ही उन्होंने रोका तो आपस में लड़ाई प्रारम्भ कर दी गयी।
एक तरफ तो जाम्भोजी के शिष्य और दूसरी तरफ राजकर्मचारी थे। मोर्चा बन्दी होकर युद्ध का रूप धारण कर लिया। दोनों तरफ से तलवारें खींच ली गयी। कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं था। सभी अपनी आन मान की दुहाई पर डटे हुए थे। उसी समय ही रामू जी खोड़ दूल्हा बने हुए बारात सहित विवाह के लिये जा रहे थे। सिर पर मोड़ बंधा हुआ था। बारात सहित रामूजी ने देखा कि भीड़ इकट्ठी हो रही है। काफी शोर शराबा भी हो रहा है। अपने गन्तव्य स्थान में जाकर उस भीड़ में प्रवेश कर गये और पूछा कि क्या बात है? ऐसा क्या होने जा रहा है?
उस समय वहाँ के लोगों ने स्थिति से अवगत करवाया। रामू जी ने भीड़ में प्रवेश करते हुए सभी लोगों को पीछे हटाया और कहा-अब आप लोग रुक जाओ। मैं विवाह करने जा रहा हूँ। मुझे तो विवाह ही रचाना है। तो फिर यहाँ पर ही क्यों न रचाऊँ? ऐसा मौका बार बार कहाँ मिलता है? कुछ दिनों के पश्चात तो यहाँ से जाना ही होगा इससे तो अच्छा है कि अभी तुरंत ही इस परोपकार कार्य को करता हुआ पहुँच जाऊँ।
बाद में तो यमराज जबरदस्ती खींच के ले जायेंगे। अब तो मैं स्वंय ही अपना मार्ग चुन लेता हूँ। आप लोग अनेक युद्ध में आहत होंगे,इससे कुछ भी लाभ नहीं है। यदि मेरे एक के प्राण देने से आप लोगों के प्राण भी बचेंगे तथा मर्यादा की पाज पुनः बंध जायेगी। अन्याय सदा के लिये बंद हो जायेगा। मैं अभी युवा हूँ जैसी युद्ध में करामात दिखा सकता हूँ, शायद आप उतनी नहीं दिख सकोगे। अन्य उपस्थित जन समूह ने रामूजी का ही अनुसरण किया।
रणभेरी बज उठी। दोनों तरफ से भयंकर युद्ध हुआ। इधर तो नेतृत्व रामोजी कर रहे थे। उधर वहाँ के राजकर्मचारियों का प्रधान। रामोजी अपनी वीरता दिखाते हुए अनेक लोगों को मौत के घाट उतारा और अन्तिम में स्वयं ही मृत्यु का वरण किया। वहीं पर ही रण में युद्ध करते हुए बलिदान दे दिया। रामोजी की स्वर्ग यात्रा के साथ ही युद्ध रुक गया
जोधपुर राज दरबार तक खबर पहुँची। तब राजकर्मचारियों को ही राजा ने दंडित किया। तथा शूरवीर रामोजी के लिये बार-बार धन्यवाद कहा। उसी दिन से ही स्वयं राजा ने ही आज्ञा प्रसारित कर दी कि इस बलिदान के बदले में यही कर सकता हूँ कि पुनःकभी भी राजकर्मचारी मेले आदि में इस प्रकार का कर नहीं लगायेंगे। सत्य निष्ठा के साथ प्रजा का पालन करूँगा। मुझे इस बात का गर्व है कि मेरे राज्य में ऐसे शूरवीर लोग निवास करते हैं।
धवा गाँव के निवासी रामोजी खोड़ का यह अद्भुत और निराला ही बलिदान था। यह घटना केशोजी के अनुसार वि.सं.सत्रह सौ में चैत्र सुदी एकादशी मघा नक्षत्र वार मंगलवार को घटित हुई थी। इस घटना के स्वंय केशो जी प्रत्यक्ष द्रष्टा थे। जिन्होंने एक साखी ““हटवाड़े हलचल हुवो”” में विस्तार से वर्णन किया है। साहबरामजी ने केशोजी का अनुसरण करते हुए जम्भसार में कथा के रूप में वर्णन की है।
इस घटना के कुछ समय पूर्व ही रामोजी ने भाव विभोर होकर एक साखी की रचना की थी, ऐसा लगता है कि रामोजी सांसारिक बंधन में बंधने के लिये सिर पर मोड़ बांध कर भले ही जा रहे हो, किन्तु उसकी भावना तो सदा ही परलोक में स्वर्ग या मोक्ष प्राप्ति की तरफ ही लगी हुई थी। अपने जीव दर्शन कर के फिर इस संसार रूपी डाल में रमण करने में हानि दिखा कर,स्वर्ग का सुख जो चंपा,मरवा,केवड़ा की सुगन्धी ह,ै उसकी ओर ही आकर्षित करते हुए नजर आ रहे है। आगे स्वर्ग में हरिश्चन्द्र,युधिष्ठिर,प्रह्लाद आदि से मिलने की आतुरता प्रगट होती है।
कहीं वृद्धावस्था न आ जाये। फिर भंवरे की पांख भीग जायेगी,उड़ नहीं सकेगा।
इसलिये श्रावण का महीना आने से पूर्व ही घर का निर्माण करना आवश्यक है। इन्हीं भावो को दर्शाती हुई यह महत्वपूर्ण साखी नीचे दी जा रही है। यह बहुत अच्छी राग में गायी जाती है। इस साखी से रामू जी की मन की भावना का पता चलता है।
साखी जां थलीयां देवजी भंवराह्य अवतरयो, जां थलीयां छै गाढ़ो नूर।
भक्तां रे मन चान्दणो, दिलमां ऊ गो सूर।। 1।।
अली यल टोली भंवरो रम रहयो, रहयो दिसावर छाय।
बाग बिहूणों भंवरो क्यों रहें।। 2।।
आवो आवो भंवरा घर चिणा यआयो सांवणीया रो मास।
भीजण लागी पांखड़ी छीजण लागो मास।। 3।।
घण गरजे दावण खिंवै, चातक मने उदास।
सर छलिया सरिता वह, रटत पीयास पीयास।। 4।।
तोड़ो तोड़ो भंवरा पिंजरो, भांज करो चकचूर।
मोमण स्वर्गे नावड़या, तूं काय रहीयो मजूर।। 5।।
भंवरा एक सनेसड़ो मोमणा ने, थै कहियो जाय।
पींजर नांही प्राणीयां, थाई दिस लहिया आय।। 6।।
हीरा विणजो साधो मोमणो, भले न चढ़िस्यां हाथ।
हमे जपस्यां निस्तारसा, रमस्यां झूलरीये रे साथि।। 7।।
स्वर्गे सोरभ अति घणी, मोर रही बणराय।
चंपो मरवो केवड़ो, भंवर रह्या रंगलाय।। 8।।
मेलो गुरु प्रहलाद सुं, मेलो हरिचंद राय।
मेलो पांचे पांडवे, धन्य कूंता दे मांय।। 9।।
जां बूठो तां वाहीयो, जारा सुपह सुवाया खेत।
ते जन भंवरा नीपजां, जारा जम्भगुरु सुं हेत।। 10।।
कर सुक्रत स्वर्गे गया, ते जन पहुंता पार।
बीनतड़ी रामो कह, म्हारी आवागवण निवार।। 11।।