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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह40 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 40

राम-कथा

वील्हा उवाच- हे गुरुदेव! आपने मुझे अनेकानेक दिव्य चरित्र एवं ईश्वरीय शक्ति की कथा सुनाई। सुनकर मैं कृतार्थ हुआ। अब आगे मैं आपके श्री मुख से राम कथा सुनना चाहता हूँ। वैसे तो राम अनन्त राम कथा अनन्ता” राम की कथा भी अनन्त अपार है। फिर भी आपने श्री गुरु जाम्भोजी से सुना है,वही कथा विशेष सुनना चाहता हूँ।

नाथोजी उवाच- हे शिष्य-एक समय सम्भराथल पर श्री देवजी विराजमान थे। उसी समय आगन्तुक श्रद्वालुओं ने श्री विष्णु जाम्भोजी से पूछा था कि हे गुरुदेव! हमने आपके श्री मुख से सुना है। आप राम रूप की कोई अद्भूत घटना यदि है, तो अवश्य ही सुनाइये। हम आपके आधीन हैं। ऐसी वार्ता सुनकर श्री जम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाया था वही मैं आपसे बतलाता हूँ।

राजा दशरथ धरम नेम किया जासूं राम लछमण अवतार हुआ। राम लछमण पै वनवास हुवौ। अठार पदम सेन्या करि। राम लछमण लंका वीढी। रावण लछमण को जत छीलवण नु काली ब्राही मेल्ही। लछमण को जत छद्धलवो तो माहनै मारण हारो को नहीं। क्योकि मैने जोतकी बुझया। कोई राम की सेन्या मां मने मारण हारो इ सूझै। जोतकियां लछमण कुवर बतायों। खुध्या,त्रिषा,निंद्रा नहीं। काछ वाच को निकलंक। रावण काली ब्राही नैं मेल्ही। काली ब्राही लछमण कंवार आगै हाथ जोड़ी उभी रही। लछमण कंवार कहै क्यौं। ब्राही कहै एक वचन मांगा। लछमण कुवार कहै मागो ब्राही कहे थे महाने वरो। लछमण कहै, म्है तो भारथ करिस्या कुण जाण वचां क न वचां। ब्राही कह म्हे थांहरा गाढा जतन करेस्यां। लछमण कह थे वचन द्यौ। माहर जे घाव घोबो चोट फेट लागी तो मांहरी वाच अवाच छः न लागो तो थानुं वरस्य। काली ब्राही उलटो छल हुवो। नागण्य होय डस्य गइ। राम लक्ष्मण भारथ कियो। लंका लूटी। दत स्ंयघारयां लछमण कुंवार

साढा तीन स कोश आपको सरीर लांबो असवानै वध्यौ। नींव कोस मां देह चौड़ी कीवी। राकसणीयां सु जंतर हुवा नही। लछमण रावण की मुंछ बरोबरय छुटी। हीर तीर सुं भुंवरो मारयौ। सगति बाण सु लछमण धर पड़यो। राम विसुरणा कर। श्री राम वायक-

शब्द- 60 ओ३म् एक दुख लक्ष्मण बंधू हइयों,एक दुख बूढै घर तरणी अइयों।

एक दुख बालक की मां मुइयो,एक दुख ओछै को जमवारूं।

एक दुख तूटे से व्यवहारूं,तेरे लक्षणे अन्त न पारूं, सहै न शक्ति भारूं।

कैते परशुराम का धनुष जे पइयो, कै तै दाव कुदाव न जाण्यौ भइयूं।

लक्ष्मण बाण जे दहसिर हइयों, ऐतो झूझ हमें नहीं जाण्यो।

जे कोई जाणै हमारा नाऊं,तो लक्ष्मण ले बैकुण्ठे जाऊं।

तो बिन ऊभा पह प्रधानो,तो बिन सूना त्रिभुवन थानों।

कहा हुआ जे लंका लइयो,कहा हुओ जे रावण हइयों।

कहा हुआ जे सीता अइयों,कहा करूं गुणवंता भइयो।

खल के साटे हीरा गइयो।

श्री जम्भेश्वर जी ने राम कथा स्वयं इस प्रकार से बतलायी-त्रेतायुग में रघुवंश में राजा दशरथ हुए। अयोध्यापति दशरथ की आयु साठ वर्ष की हो गयी। तब भी उनके संतान नहीं हुई। कुल गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से ऋ ष्यशृंग से दशरथ ने यज्ञ करवाया। जिससे उनके तीन रानियों से चार संतानें हुई। राम,भरत,लक्ष्मण, एवं शत्रुघ्न।

राम बड़े हुए। युवराज बनने की तैयारी होने वाली थी। किन्तु दैवयोग से दशरथ द्वारा वनवास दिया गया। राम, लक्ष्मण एवं सीता तीनों चौदह वर्षो का वनवास पंचवटी में व्यतीत कर रहे थे। किन्तु रावण ने मारीच को कपटी मृग बना कर छल किया और सीता का हरण कर के लंका में ले गया।

हनुमानजी ने सीता की खोज की और सुग्रीव मित्र की सहायता से लंका पर चढाई कर दी। समुद्र पर पाज बंधवायी और सेना सहित लंका में प्रवेश किया। राम की सेना लंका में प्रवेश कर गयी थी, तब रावण ने ज्योतिषियों से पूछा था कि राम की सेना में मुझे मारने वाला कौन है? ज्योतिषियों ने बतलाया कि राम की सेना में लक्ष्मण यति हैं, जो तृष्णा,भूख,नींद आदि को जीत चुका है तथा यति ब्रहाचारी है। वही रावण को मार सकता है।

हमारे यदि किसी प्रकार की चोट,घाव न लगे, यदि लग गयी तो हमारा वचन अवचन। यदि घाव लग गया तो मैं तुम्हारे से विवाह नही करूँगा। यदि घाव नहीं लगे तो ही मैं तुम्हारे से विवाह करूँगा। इस प्रकार से काली आयी तो थी लक्ष्मण के साथ छल करने के लिये किन्तु स्वयं ही छली गयी। खाली हाथ जैसे आयी थी वैसे वापिस लौट गयी। लक्ष्मण के यतित्व को भंग नहीं कर सकी।

गीन हो कर के लक्ष्मण को डस गयी। राम लक्ष्मण ने युद्व किया। लंका लूट ली। दैत्यों का संहार किया। लक्ष्मण कुमार ने साढे तीन सौ कोश अपना शरीर बढाया। नौ कोश देह को चौड़ी की। इसलिये राक्षसणियों से यंत्र नहीं हुआ।

रावण लक्ष्मण ने अपनी मूंछे बढाई दोनो की बराबर हुई। लक्ष्मण ने हीरे के बाण से रावण के भंवरे- जीव को मारा। लक्ष्मण के बाण से रावण मारा गया। किन्तु इससे पूर्व मेघनाद द्वारा चलाया हुआ शक्ति बाण को लक्ष्मण सहन नहीं कर सका। युद्व भूमि में मूर्छित होकर गिर पड़ा। राम ने लक्ष्मण के वियोग में विलाप किया।

साथरियों ने पूछा-हे गुरुदेव ! राम ने लंका में लक्ष्मण के वियोग में विलाप किया था। वह विलाप आप हमें सुनाइये आपके मुख से राम विलाप सुनना चाहते है। क्योंकि राम रूप धारण करने वाले तो आप स्वंय ही हैं।

जाम्भोजी ने शब्द सुनाया- हे भाई लक्ष्मण ! संसार में दुःख तो बहुत आते हैं, किन्तु लक्ष्मण जैसे भाई का बिछोह हो जाना,इससे बढकर तो दुनिया में कोई दुःख नहीं है। दूसरा दुःख संसार में बूढे के घर पर तरुणी स्त्री का पत्नी के रूप में आ जाना। तीसरा दुःख छोटे बालक की मां का मर जाना है। चौथा दुख धन हीन का जीवन है। पाँचवां दुःख व्यवहार लेन देन में टूट जाना है। ऐसे दुःख तो संसार में बहुत हैं। कहाँ तक गिनाये? किन्तु भाई लक्ष्मण के बिना जो इस समय मुझे जो दुःख हो रहा है, उसका कोई आर पार नहीं है।

हे लक्ष्मण- तू शक्ति बाण को सहन नहीं कर सका। हे भाई। तुम्हारे पास परशुराम का दिया हुआ धनुष था। जो जनक धनुष यज्ञ में परशुराम ने दिया था। क्या उस धनुष को उठाया नहीं था। हे भाई! क्या तुमने दैत्यों के दाव कूदाव नीति अनीति को नहीं समझ सका। लक्ष्मण के बाण से रावण मारा जायेगा। मैं तो ऐसा ही समझता था। मैं यह नहीं समझता था कि ऐसा भयंकर युद्ध होगा और मेरा भाई लक्ष्मण मूर्च्छित जायेगा।

हे लक्ष्मण-आज मैं स्वयं तुम्हारे सामने विपत्ति मे हूँ। मेरा तो कोई नाम भी ले ले तो बैकुण्ठ में पहुँच जाता है। किन्तु मैं इस समय असहाय होकर कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ। हे लक्ष्मण! उठ जाओ! देखो! तुम्हारे बिना तो सभी प्रधान खड़े हुए हैं। कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। तुम्हारे बिना तो तीनों भवन लोक शून्य हो गये हैं।

हे भाई ! अब क्या होगा? यदि मैं लंका ले लूँ और क्या होगा? यदि रावण को मार दूँ? और क्या होगा? यदि सीता को वापिस ले लूँ। हे मेरे गुणवान भाई। मैंने खली के लिये हीरा खोदिया। कहाँ तो सीता कहाँ भाई लक्ष्मण। मैंने सीता प्राप्ति हेतु भाई लक्ष्मण को खो दिया। मैं हानि को प्राप्त हुआ हूँ

मैं बिना भाई लक्ष्मण के अयोध्या कैसे जाऊँ गा? वहाँ मेरी माताएँ पूछेंगी के लक्ष्मण कहा है? तो मैं क्या जवाब दूँगा? लक्ष्मण को मूर्च्छित अवस्था में प्रधानों ने देखा तो युद्ध रुक गया।

राम ने विलाप करते हुए कहा-कोई होगा अपनी सेना मे शूरवीर जो संजीवनी बूँटी ले आवे। जिससे यति लक्ष्मण ठीक हो सके। वैद्य जी ने बतलाया है कि पवन पराक्रम से जावे। भूत दैत्यो से डरे नहीं और सूर्योदय से पूर्व में ही वापिस लौट कर आवे। वह संजीवनी बूंटी कौन लायेगा? लक्ष्मण कंवर को ठीक करेगा। मैं इस विपत्ति काल में किससे कहूँ?

यदि मेरे पिता दशरथ होते तो उनसे कहता। किन्तु वो तो स्वर्गवासी हो चुके हैं। भाई भरत अयोध्या में हैं। अयोध्या यहाँ से बहुत दूर है। अब मेरी पीड़ा को कौन मिटाये? अपना ही अपनी पीड़ा को समझता है। पराया भला क्या समझे। हनुमान ने कहा-हे राम! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं आपका सेवक जाऊँ और सूर्योदय से पूर्व ही आपकी कृपा से लौट आऊँ। राम ने कहा-अच्छा भाई हनुमान तुम्ही जाओ। और यहाँ है भी कौन? हनुमान जड़ी बूटी लेने चले। पीछे रामजी ने पुनः विलाप किया।

हनुमान गया तो अवश्य ही है, किन्तु समय पर शायद ही लौट कर आये। “ काज पराया सीवला,जां दुखै तां पीड़,” पराया कार्य ठण्डा ही होता है। जिसके पीड़ा होती है दुख भी उसी को होता है। हनुमान जी पर्वत पर पहुँच तो गये, किन्तु जड़ी बूटी की पहचान नहीं थी। इसीलिये सम्पूर्ण पहाड़ ही उखाड़ लिया और सूर्योदय से पूर्व ही जड़ी बूटी लाकर सौंप दी। वैद्य जी ने जड़ी घिस कर लगायी औद्भ लक्ष्मण तुंरत उठ बैठे। उसी समय राम्म जी ने पूछा-

अठारै दोषण है,रामचन्द्र कहै, तैं कोण दोशण कीयौ। कंवार कहै, कोई म्हाई दोषण दाखवी, रामचंद्र प्रदोषण का नाम कहै-श्री वायक कहै -

शब्द -61 ओ३म् कैंते कारण किरिया चूक्यौं, कैंते सूरज सामो थूक्यौं।

कैंते ऊभै कांसा मांज्या, कैंते छाण तिणूका खैंच्या।

कैंते ब्राहमण निवत बहोड़या,कैंते आवा कोरंभ चोरया।

कैंते बाड़ी का बन फल तोड़या,कैंते जोगी का खपर फोड़या।

कैंते ब्राहमण का तागा तोड़या, कैंते बेर बिरोध धन लोड्या।

कैंते सूवा गाय का बच्छ बिछोड़या,कैंते चरती पिवती गऊ बिडारी।

कैंते हरी पराई नारी, कैंते सगा सहोदर मारया।

कैंते तिरिया शिर खड़ग उभार्या,कैंते फिरते दातण कीयौं।

कैंते रण मैं जाय दो दीयों, कैंते बाट कूट धन लीयों।

किसे सरापे लक्ष्मण हइयों।

श्री रामजी ने कहा-हे भाई-तुमने इन अठारह दोषों में से कौन सा दोष किया? लक्ष्मण ने कहा-भाई! कोई मुझे निर्दोषी को दोषी कहता है। वे कौन से दोष है, जो शक्ति बाण लगने के कारण बन सकते हैं। उन्हीं दोषों को राम जी ने गिनाये हैं। वही दोष श्री जम्भेश्वरजी शब्द द्वारा बतलाते हैं।

हे लक्ष्मण-तुमने कौन सी कारण क्रिया में चूक की है। क्या तुम काली ब्राही द्वारा किये हुए छल में चूक गये? जो भी कर्म करते हैं, वही कारण एवं क्रिया है। कहाँ चूक गये? कौन सा ऐसा कर्म हो गया जिससे यह शक्ति बाण लगा, यह घोर विपत्ति आयी।

क्या तुमने सूर्य के सामने थूक दिया? सूर्य को तो प्रणाम करना चाहिये था। क्या तुमने सूर्य का अपमान किया? सूर्य की सत्ता-तेज को तुमने नकार दिया। क्या तुमने खड़े होकर बर्तन साफ किया? कुछ कार्य बैठ कर ही किये जाते हैं, वे कार्य तुमने खड़े हो कर किये। जैसे-भोजन ,पूजा-पाठ, यज्ञ, वार्तालाप, सत्संग आदि बैठ कर किये जाते हैं। खड़े होकर भोजन करने से अन्न देवता शाप देते हैं। क्या तुम अन्न देवता द्वारा शापित किये गये हो? क्या तुमने किसी गरीब की झोंपड़ी तोड़ दी, किसी को उजाड़ दिया है।

क्या तुमने किसी ब्राहम्मण, संत, भक्त, सज्जन पुरुष को भोजन का निमन्त्रण देकर भोजन नहीं करवाया? क्या तुम किसी ऋषि पुरुष द्वारा शापित हुए हो? क्या तुमने कुम्हार के आवा में से बर्तन चुरा लिये हैं? अर्थात् कोई चोरी का कार्य किया है? सच्ची कमाई करने वाले के धन का हरण कर लेना उसके दुःख का पार नहीं है। उसी दुःखी व्यक्ति द्वारा तुम्हें शाप दिया गया होगा। क्या तुमने किसी खेत से धान फल-फूल आदि चुराये हैं? बाड़ी के फल अभी पके भी नहीं थे, क्या तुमने तोड़, लिये? अथवा तुमने हरे वृक्ष काटे होंगे? बिना पके पराये फल तोड़ ने से प्रकृति शापित करती है। असमय में धान,फूल फल आदि तोड़ने में दोष है।

क्या तुमने योगी साधु पुरुष भिक्षुक के हाथ का भिक्षा पात्र तोड़ दिया? सुपात्र भिक्षुक को भिक्षा देनी चाहिये। तुमने क्या एक मात्र सहारा भिक्षा पात्र को ही तुमने तोड़ डाला। न तो स्वंय ही भिक्षा दे सका और नहीं कोई और ही दे सके, ऐसा अपराध तुमने लक्ष्मण कर दिया।

क्या तुमने ब्रान्ण का तागा तोड़ डाला। ब्राम्मण की आजीविका का साधन ही तुमने समाप्त कर डाला। या, क्या तुमने ब्राह्मण की प्रतिज्ञा नियम को भंग कर डाला। नियम मर्यादा बाँधने का सहयोग करना चाहिये किन्तु तुम नियम भंग करने में हेतु बन गये। उसी दोष के कारण शक्ति लगी है। क्या तुमने किसी से वैर विरोध धन ले लिया।

हे कुंवर-तुम राजकुमार हो राज कार्य हेतु धन ले सकते हो, किन्तु जोर जबरदस्ती से नहीं। अपनी खुशी से सामर्थ्यानुसार ही धन कोई लेता और देता है, तो वही खुशी का दिया हुआ दान कर आदि फलीभूत होता है। अन्यथा जबरदस्ती लिया हुआ तो डाका है। दिल दुखाकर लिया हुआ कल्प-दुःख का दान है। यह दोष है। क्या तुमने ऐसा तो नहीं किया?

क्या तुमने सूवा गाय का बछड़ा अपनी माँ से विलग कर दिया? गाय ब्याहने के पश्चात् दस दिन तक तो उसका बछड़ा ही दूध पीने का अधिकारी है। वह दस दिन तक का दूध मनुष्य के पीने लायक भी नहीं होता है। एक महीने तक माँ का दूध बछड़े को भर पेट मिलना चाहिये। बछड़ा जब भर पेट पी ले, पीछे बच जाये, वही दूध दूहना चाहिये। एक महिने बाद बच्चा घास खाने लग जाता है।

क्या तुमने घास चरती हुई, जल पीती हुई गऊ को डराकर भगा दिया। गो माता दुग्ध प्रदान करती है,घास खाती है। अमृत सदृश दूध देती है जल ?ास आदि से गो की सेवा करनी चाहिये। इह लोक और परलोक दोनों ही बन जाते हैं, क्या तुमने गऊ की सेवा नहीं की है। ?

क्या तुमने परायी स्त्री का हरण कर लिया? पराया धन,पराई स्त्री, पराया तो पराया ही है। जो अपना नहीं है, उसे लेने का हमारा क्या अधिकार है? लोक मर्यादा एवं धर्म के विरुद्ध है किसी के धन स्त्री को छीन लेना उसके हृदय में दुःख भर देना है। किसी दूसरे को दुःख देना ही दोष-पाप है।

क्या तुमने अपने किसी सम्बन्धी एवं सहोदर भाई को मारा है। अपना सम्बन्धी विश्वास पात्र होता है। उसे दुःख देना या मार देना ये दोष हैं। उसके साथ विश्वास घात करना महापाप है। सहोदर तो भाई होता है। वह तो अपनी ही जान होती है। दो शरीर एक जान होती है। उसे मारना तो अपने को ही मारना है। भाई सम्बन्धी को मार कर तो स्वयं ही मर जाता है। इस पाप का फल तो शक्ति बाण लगने जैसा ही भयंकर दुःख है।

क्या तुमने त्रिया (स्त्री जाति विशेष) कन्या,बहन,पत्नी,माँ आदि के ऊपर खड्ग उठा लिया। ये तो सभी देवी रूपा हैं। इनकी तो रक्षा करनी चाहिये। क्या तुमने कोई अकरणीय कार्य कर लिया? क्या तुमनें चलते घूमते हुए दातुन किया। अर्थात् दांतुन करना,भोजन करना,जल पीना आदि चलते-फिरते हुए नहीं करना चाहिये।

बैठ कर करने वाले कार्य को तुमने चलते फिरते किया है। यह प्राकृतिक प्रकोप है। यही दोष है, इसका फल भी दुख रूप है।

क्या तुमने किसी से मार पीट करके धन तो नहीं ले लिया। या तुमनें अपनी मर्यादा सीमा को छोड़ कर दूसरे की सीमा में से धान आदि छीन कर ले आया।

हे लक्ष्मण भाई ! मैं तुम्हारा भाई राम तुम से पूछता हूँ कि कौन सा श्राप (दोष) तुम्हें लगा है? जिस कारण से शक्ति बाण लगा है। यह विपत्ति आयी है। बिना दोष बिना कारण के तो कोई कार्य बनता ही नहीं है।

इति श्री रामचंद्र कहीं लखमण कुवांर सुणी। श्री लखमण कुवांर कहै -

शब्द-62 ओ३म् ना मैं कारण किरिया चूक्यौ, ना मैं सूरज सामो थूक्यो।

ना मैं उभै कांसा मांज्या, ना मैं छान तिणूका खैंच्या।

ना मैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, ना मैं आशा कोरंभ चोर्या।

ना मैं बाड़ी का बन फल तोड़्या, ना मैं जोगी का खप्पर फोड़या।

ना मैं ब्राह्मण का तागा तोड़्या, ना मैं बेर बिरोध धन लोड़्या।

ना मैं सूवा गाय का बच्छ बिछोड़्या, ना मैं चरती पिबती गऊ बिडारी।

ना मैं हरी पराई नारी, ना मैं सगा सहोदर मार्या।

ना मैं तिरिया शिर खड़ग उभार्या,ना मैं फि रतैं दातण कीयो।

ना मैं रण मैं जाय दों दीयों, ना मैं बाट कूट धन लींयो।

एक जू ओंगुण रामैं कीयों, अणहुंतो मिरघो मारण गइयों।

दूजो औगुण रामैं कीयों, एको दोष अदोषा दीयों।

वन खंड मैं जद साथर सोइयों, जद को दोष तदों को होईयों।

राम जी ने अठारह दोष लक्ष्मण को गिनाये तब लक्ष्मण ने कहा-हे भाई! इन अठारह दोषों में से तो मैंने एक भी नहीं किया किन्तु हे भाई! आपने तो अवश्य ही दोष किये हैं। जिस वजह से आपको दुःख आया है। मैंने तो न तो दोष ही किये हैं और न ही मुझे दुःख आया है। मैं तो मूर्च्छित था, तो कुछ भी चेता नहीं था। अब स्वस्थ हूँ। मुझे दुःख कब आया? किन्तु हे भाई! आपने विलाप अवश्य ही किया। दुःख आपको अवश्य ही हुआ। इसमें आप दोषी होंगे।

रामजी ने कहा-मैंने कौन सा दोष किया है? मेरे छोटे भाई! जरा मुझे बतलाओ तो सही। मैं तो वियोग दुःख में व्याकुल था कि मुझे कुछ भी पता नहीं चला। दोष किसमें है, यह मैं नहीं जानता।

लक्ष्मण ने कहा-हे राम! एक अवगुण तो सर्व प्रथम आपने ही किया जो अनहोना मृग मारने-पकड़ने चले गए। आपने मेरी बात नहीं मानी और न ही सीता ने ही सुनी। मैंने सीता माता से कहा था कि असंभव है स्वर्ण मृग। मैं सभी जीवों की जातियाँ जानता हूँ, और जो जीवों को शरीर प्रदान करता है, उसको भी मैं जानता हूँ। किन्तु आपने और सीता ने मेरी बात नहीं मानी। जिस वजह से सीता का हरण हुआ, यही छोटी सी भूल थी।

जब आपने मृग के तीन बाण एक साथ मारे तो उस कपटी मृग ने पड़ते हुए हा लक्ष्मण! हा लक्ष्मण! ऐसा पुकारा था। मैं तो आपका सेवक सीता की रक्षा के लिए सावधान था। किन्तु सीता ने कहा- हे लक्ष्मण! आपने राम की आवाज सुनी। तुम्हारा भाई विपति में पड़कर तुम्हें पुकार रहा है। जल्दी जाओ। मैंने कहा था हे मात! मेरे भाई का कुछ भी नहीं बिगड़ सकता। मैं तुम्हें अकेली वन में छोड़ कर जाऊँ गा नहीं। यही मेरे भाई राम की आज्ञा है।

किन्तु सीता ने जाने के लिए मुझे मजबूर कर दिया। मुझे सीता को अकेली ही छोड़ कर जाना पड़ा। आपके पास जब मैं पहुँचा, तो आपने मुझे ही दोष दिया कि सीता को अकेली छोड़ कर क्यों आए? आपने तथा सीता दोनों ने ही मुझ निर्दोष को दोष दिया। यही आपका ही दोष था।

किसी निर्दोष को दोषी बना देना या बता देना ही दोष है। किसी अचोर को चोर बता देना यही तो दोष- पाप है। दूसरों को दोष देने वाला स्वयं दोषी-पापी हो जाता है। इसी को ही पर निंदा कहते हैं। यही पाप दोष है, जिसका फल दुःख है।

हे भाई! उसी वन खंड में ही तो हम रह रहे थे। उसी में ही राक्षस विचरण करते थे। किन्तु हम सचेत नहीं हो सके। सोते रहे। यही कारण था कि सीता का हरण हुआ लंका में पहुँच गयी।

हे राम! आपको दुख होना था, इसीलिए मुझको शक्ति बाण लगा। आपने दोष किया तो आपने दुःख भोग लिया। वही दोष और इसका फल दुःख। किया हुआ कर्म सुख-दुःख अवश्य ही भोग्य है। वह चाहे राम ही क्यों नहीं। हमारे जैसे छोटे-मोटे लोगों की तो ओकात ही क्या है?

कर्म फल सिद्धान्त अटल है। यहीं इस शब्द द्वारा बतलाया है। कर्मो का फल सुख दुःख ज्ञानी को भी भोगना पड़ता है, अज्ञानी को। किन्तु ज्ञानी तो हंस कर भोग लेता है, अज्ञानी रोकर के भोगता है। सुख दुःख की मात्रा में अंतर हो सकता है, किन्तु जीवन में आयेंगे तो दोनों ही। हम पाप-पुण्य मिश्रित कर्म करते हैं इसीलिए मिश्रित सुख-दुःख आते हैं।

रावण आदि राक्षसों को मार कर के सीता को लेकर चौदह वर्षो का वनवास पूरा करके राम लक्ष्मण वापिस अयोध्या लौट आये। अयोध्या निवासियों ने घर-घर दीप जला कर राम लक्ष्मण एवं सभी वानर सेना का स्वागत किया। दीपावली मनायी गयी। अब भी वही दीपावली मनाते हैं।