तीसरा अध्याय · कथा 39
सेंसेजी का अभिमान खण्डन
वील्हो उवाचः- हे गुरुदेव! आपने मुझे अब तक जाम्भोजी के जीवन के बारे में अनेकानेक चरित्रों से अवगत करवाया। उनतीस नियमों का ही आपने अनेक तरीको से समझाया है। जाम्भोजी के मुख्य निवास स्थल सम्भराथल धाम की चर्चा मैंने श्रवण की है, जहाँ पर अनेक लोग आये थे। उन्होंने श्री देवजी का दर्शन करके जीवन को सफल बनाया था। जाम्भोजी द्वारा धरोहर के रूप में रखी हुई सफेद पोशाक चोला, चादर, माला आपने मुझे दी है और मुझे आपने शिष्य बनाया है। मैं तो आपकी महान् कृपा से कृत कृत्य हो गया हूँ।
मैंने देखा है कि जाम्भोजी के शरीर का चोला, चीपी और टोपी जाँगलू गाँव में मेहोजी थापन के घर पर रखी हैं। ये तीनों वस्तुएँ जाँगलू कैसे चली गयी? तथा जाम्भोजी की चीपी (भिक्षा-पात्र) यह खण्डित देख रहा हूँ। यह पात्र खण्डित किसने और क्यों किया? यदि इसमें कोई रहस्यमय बात हो तो बताने की कृपा करें। वैसे तो भगवान् का जीवन चरित्र रहस्य से परिपूर्ण है। जितना मैं सुनता जाता हूँ, उतना ही आनन्द विभोर होता जाता हूँ क्योंकि भगवान् की लीला बड़ी ही विचित्र है।
हे गुरुदेव! जो मैंने जानने की इच्छा की है और जो नहीं भी पूछ पाया हूँ, मेरे लिए कथन करने योग्य है, तो अवश्य ही कथन कीजिये। मैं आपकी शरण में हूँ। इस प्रकार से जिज्ञासा प्रकट करने पर श्री नाथोजी कहने लगे- हे वील्ह! अभी थोड़े ही समय पूर्व की बात है। रणधीरजी बाबल जाम्भोजी के परम शिष्य समाधि मन्दिर बना रहे थे। अभी मन्दिर पूर्ण भी नहीं हुआ कि रणधीरजी की किसी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। सेखोजी थापन का मंझला बेटा मेहोजी ये तीन वस्तुएँ लेकर जाँगलू चले गये। एक टोपी तो अपने बड़े भाई चोखा के कहने पर वापिस दे दी, किन्तु दो वस्तुएँ चीपी चोला जाँगलू में ही रखे हुए हैं जो दर्शनीय हैं। इन बातों की विस्तार से चर्चा समय आने पर करूँगा। जो चिपी खण्डित रखी हुई है यह तो सेंसोजी कस्वां नाथूसर निवासी के घर पर खण्डित हो गयी थी। वहाँ पर जाम्भोजी भिक्षा हेतु गये थे।
वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! आपने पूर्व में कहा था कि जाम्भोजी तो भिक्षा भोजन नहीं करते थे, तब वो सेंसे के घर पर भिक्षा लेने के लिए क्यों गये थे? तथा चीपी खण्डन होने की कथा विस्तार से बतलाने की कृपा करें।
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! यह बात तो तुमने सत्य कही कि जाम्भोजी भोजन नहीं जीमते थे। किन्तु अहंकारी भक्त सैंसे का गर्व खण्डित करने के लिए जाम्भोजी का जाना हुआ था। इस वार्ता को विस्तार से मैं बतलाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो-नाथोजी कहने लगे कि मैं इस घटना का प्रत्यक्ष द्रष्टा हूँ-
एक समय सम्भराथल पर विराजमान सतगुरु देव ने नाथूसर गाँव में झींझाला धोरा पर जाने की इच्छा की। उसी समय ही साथरियों (भक्तों) ने भी साथ ही चलने की प्रार्थना की। श्रीदेवजी ने सभी को साथ में चलने की आज्ञा प्रदान की। उसी समय ही सभी ने ही अपने ऊँट और घोड़ा आदि जोते और नाथूसर की तरफ चल पड़े। सभी संत-भक्तजन कीर्तन करते हुए देवजी के साथ ही रवाना हुए और उनकी शोभा अतिसुन्दर थी। स्वयं विष्णु ही देवताओं के साथ कहीं मृत्युलोक में किसी को निहाल करने ही जा रहे थे। सफेद रंग के बैल हंसों के समान अपनी उज्ज्वलता को प्रदर्शित कर रहे थे। रंग-बिरंगे ऊँट घोड़ा एकत्रित चलता हुआ मेघ वर्ण, एवं गर्जन करते हुए वर्षा की शोभा को भी शोभित कर रहे थे। राग ध्वनि, साखी, शब्दों की, इन्द्र राज्य में गन्धर्वों के गान को भी मन्द कर रहे थे। बीच के गाँवों को सुशोभित करते हुए आज स्वयं हरिजी न जाने क्यों झींझाले धोरे पर जंगल में मंगल करने जा रहे थे। इस बात का तो कुछ पता नहीं था। जय जयकार की ध्वनि सुनाई पड़ती थी। आज क्या हो रहा है? शांत सुरम्य वातावरण में आज सुगन्धी क्यों आ रही है? नासिका अपने विषय को ग्रहण कर रही थी। आँखें रूप देखने को तरस रही थी। यही कारण था कि गाँवों के लोग एकत्रित होकर अपनी आँखों से रूप को देखकर अपने जीवन को सफल कर रहे थे।
जब श्रीदेवजी अपनी भक्तमण्डली सहित झींझाले धोरे पर आ गये थे। चारों तरफ गाँवों के लोगों ने सुना तो दर्शनार्थी आसपास के गाँवों के लोग एकत्रित होकर आने लगे। जांति-पांति के भेद, भाव को छोड़कर 1पूर्व श्रद्धा भाव से एवं विश्वास से आ रहे थे। पास में आते चरणों को प्रणाम करते, कुछ लोग अत्यधिक भावुक हो जाते। अपने सुख दुःख की बात त्रिकम जी से करते। ओ३म् विष्णु की ध्वनि से वह धोरा की धरती गुंजायमान हो रही थी।
इसी प्रकार से नाथूसर गाँव वासी भी अपने सिरदार सेंसोजी भक्त के साथ नृत्य करते हुए हर्ष खुशी के साथ झींझाले धोरे पर पहुँचे। अपनी-अपनी अभिलाषा लेकर देवजी के पास अपार जन समूह आ रहा था। सैंसे ने सर्वप्रथम देवजी के पास आकर पूछा-हे देव! यदि आप आज्ञा प्रदान करें तो हम लोग जमात के सहित आपके चरणों में प्रणाम करें तो हम लोग आपके प्रताप से पार पहुँच जायें।
देवजी ने कहा-हे सेंसा! अवश्य ही आप लोग तिरने की योग्यता रखते हैं। किन्तु अब तक तैरना जानते नहीं हैं। मैं तुम्हें तैरना सीखाने के लिए हद्ध तो आया हूँ। नर नारी अपनी भेंट श्रीदेवजी के चरणों में रख रहे थे। कहाँ-कहाँ किस किस वन में प्रह्लाद पंथी जीव बिखरे हुए हैं, उन्हें सचेत करना होगा। इसलिए उस रात्रि में निवास श्रीदेवजी ने झींझाले पर ही किया।
गाँवो की आगन्तुक जमात ने वापिस अपने घरों में जाने की आज्ञा मानी। नाथूसर के सैंसे ने भी आगे बढ़कर हाथ जोड़े और कहने लगा-आपने बड़ी कृपा की जो हमारे जंगल में पधारे हैं। हे गुरुदेव! आप अपनी मण्डली सहित अन्नपान करें और हम लोग वापिस अपने घर को जायें। आपके पास पूरे दिन सत्संग में युक्ति-मुक्ति का मार्ग सीखा। अब रात्रि होने वाली है, हमें घर जाने की आज्ञा दीजिये।
हे गुरुदेव! आपने सम्पूर्ण जमात को कुछ न कुछ सीख अवश्य ही दी है, मेरे लिए कुछ भी नहीं कहा। मैं क्या इस योग्य नहीं हूँ जो आपके वचनों का पालन न कर सकूं। श्रीदेवजी ने सैंसे भक्त का भाव देखकर कहा- हे सेंसा!
भाव भलै सूं दीजौ भीख, साम्य कह संसा आ सीख।
भाव-भक्ति से भूखे को भोजन देना यही तुम्हारे लिये शिक्षा है। सैंसे के मन में यह सीख जंची नहीं। सैंसा कुछ सोचने लग गया। न तो कुछ हाँ कह सका और न ही कुछ ना ही कह सका। साथरियों ने कहा- हे सैंसा! जैसा सतगुरु कहते हैं, वह ठीक ही कहते हैं। उनकी बात को स्वीकार करके पालन करे।
श्रीदेवजी ने साथरियों से कहा- सैंसे ने मेरी बात सुनी तो अवश्य ही है, किन्तु यह इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। यह भक्त तो अच्छा है, किन्तु अहंकारी भक्त है। सैंसा कहने लगा-हे देव! मैंने तो दान देते हुए सम्पूर्ण पापों का नाश कर डाला है। मैं तो भाई बन्धु, न्यात-जमात को एकत्रित करके इन्हें भोजन करवाता हूँ। अब इन्हें और भी जिमाऊँगा।
हे देव! मैं तो घर पर आये हुए अतिथि, साधु-संतों को अच्छी प्रकार से भिक्षा देता हूँ। घर पर आये हुए अतिथि को ना तो मैं कभी कहता हद्ध नहीं हूँ। आप भी मेरे घर को देखें। मेरे घर को सारा संसार जानता है। केवल आप ही शायद नहीं जानते। इसलिए तो आपने ऐसी बात कही है।
श्रीदेवजी ने सैंसे भक्त तथा उनकी मण्डली को जाने की आज्ञा प्रदान की और सैंसे के चले जाने पर साथरियों से कहा-हे भक्तो! सैंसे का भण्डारा, अतिथि सेवा अवश्य ही देखूँगा। सैंसा कहता था कि आपने अब तक देखा नहीं है।
संसार के लोगों ने तो देखा है। स्वयंकर्ता अलख पुरुष ने अन्य ही रूप धारण कर लिया। दूसरा ही रूप, दूसरी ही बोली, दूसरी ही वेशभूषा। सरसा सीस बर्धाया केशा। सिर के बाल लम्बे बढ़ा लिये, भगवान् की भक्ति बिना कौन पहचान सकता है?
हरि ने पतरी (चीपी) अपने हाथ में ले ली। अन्य किसी भक्त संत को साथ में नहीं लिया। अकेले ही सैंसे के घर जाकर अलख जगाई। सम्पूर्ण संसार जिनके आगे भिक्षुक बन करके कुछ न कुछ माँगता है। वह जगजीवन-मालिक आज सैंसे के घर भिक्षा के लिए पहुँच गये। भगवान् की अहैतु की कृपा होती है तभी भगवान् उसके अज्ञान जनित गर्व का भंजन करते हैं।
सैंसा तो घर पहुँचा ही था। संध्या वेला थी। गुरु के नियम का पालन करते हुए संध्या करने को बैठा ही था। जगत स्वामी ने सैंसे के घर पर अलख जगाते हुए कहा- सत विष्णु की बाड़ी। हे देवी! विष्णु के नाम से भिक्षा दो। आपकी बाड़ी हरी-भरी रहेगी। सैंसा भक्त संध्या कर रहा था। अन्दर से आवाज सुनी और कहने लगाइस
संध्या बेला में मैं यह क्या सुन रहा हूँ। होगा कोई कंगाल पुरुष। फलसा-किवाड़ बंद कर दो। सैंसे भक्त ने बात तो बड़ी विचार के कही थी, क्योंकि यह बेला संध्या की थी। इस बेला में तो भगवान् के दर्शन ही होना चाहिये थे, किन्तु सेंसे ने तो अकस्मात् कुपात्र के दर्शन कर लिये। सैंसे की आज्ञा को शिरोधार्य करके सैंसे की धर्मपत्नी दौड़कर सामने आयी कि यह कहीं अतिथि आंगन में न आ जाये? पहले ही इसे रोका जाये।
सेंसे की नारी कहने लगी-मैंने तुझे देख लिया है तू हमारे घर में प्रवेश करने के योग्य नहीं है। बाहर चलो। श्रीदेवजी ने सैंसे की धर्मपत्नी की इच्छा समझ ली कि यह कुछ भी नहीं देगी किन्तु इससे बिना कुछ प्राप्त किये वापिस जाना भी तो नहीं है। इसलिए खिड़की को पकड़ लिया। खिड़की छूट गयी तो फिर यहाँ कुछ भी नहीं मिलेगा यहाँ आना व्यर्थ ही हो जायेगा।
गृहलक्ष्मी कहने लगी-हे योगी! खिड़की पकड़े हुए क्यों खड़ा है? जिस प्रकार कर्जा लेने वाला खड़ा रहता है, उसी प्रकार से खड़ा हुआ क्या देख रहा है? हमने तुम्हारे से कर्जा तो नहीं लिया है। मालिक ने तो खेल रच दिया था। खिड़की को और मजबूती से पकड़ लिया था। श्री देवजी कहने लगे-हे लक्ष्मी! तू तो साक्षात् गृहलक्ष्मी है। विष्णु तुम्हारे पर प्रसन्न हैं। मुझे खाली मत भेज। कुछ तो अवश्य ही दे। पहले भी आपने बड़े-बड़े दान दिये हैं। अभी-अभी देवजी के पास दान देकर लौटै हैं। मैंने जब गाँव में प्रवेश किया था, दानियों का घर पूछा था तो उन्होंने भी आपका ही घर बताया था। इसलिए मैं भी आशा विश्वास के साथ तुम्हारे घर आया हूँ।
सैंसे की नारी कहने लगी-बाहर चलो! अपना काम करो। ये कैसी बातें करनी प्रारम्भ की है। इन बातों से मैं रीझने वाली नहीं हूँ। पीछे हट जाओ। मैं अपनी खिड़की ढ़क लेती हूँ। ऐसे खड़ा है जैसे कोई अतिथि मेहमान आया है। उस बिना बुलाये अतिथि ने तो खिड़की मजबूती से पकड़ ली थी कि कहीं हाथ से छूट न जाये। वह देवी तो ढ़कना चाहती है, किन्तु देवाधिदेव तो उघाड़ना चाहते हैं।
कैसा घर का भाग्य है। घरवाली तो घर को ढ़कना चाहती है किन्तु देवजी उघाड़ना चाहते हैं। यही ढ़कना-उघाड़ना संसार में चलता रहता है। वह तो धक्का देती है, देवजी सहन कर लेते हैं। भृगु की लात भी तो सहन कर ली थी। स्वयं विष्णु आज तो सैंसे के घर पर आये थे। घर में लक्ष्मी को प्रवेश करवाने के लिए किन्तु संसार के व्यक्ति क्या जानें? अब तो खींचातानी होने लगी। आखिर जीव रूपी देवी तो थक ही गयी थी। उसे तो थकना ही था।
दूसरी नारी कहने लगी-यह योगी हठीला है। हठ नहीं छोड़ेगा, इसे कुछ न कुछ देना ही पड़ेगा। अपने घर का बड़प्पन तो देखो। इस बड़प्पन में तो खाक है जो एक साधु को एक रोटी भी नहीं दे सकते। दोनों महारानी विचार करने लगी इसे क्या देना चाहिये? जिससे यह अपना पीछा छोड़े। एक नारी घर में गयी और खिचड़ी की खुरचण (हंडिया के लगा हुआ वासी भोजन) (हंडिया के लगा हुआ अधजला भोजन) कुड़सी में भरकर ले आयी और कहने लगी-हे हठीले योगी! तुम्हारा पत्र (चीपी) इधर करो, मैं तुझे भिक्षा देती हूँ। दूसरी महारानी कच्चा दूध ले आयी और दोनों ने भिक्षा प्रदान की। श्रीदेवजी ने भिक्षापात्र आगे किया। तब कुड़सी में खुरचण लेकर खड़ी हुई और जोर से क्रोध में भरकर पत्री पर दे मारा, जिससे एक किनारा खण्डित हो गया। किन्तु भिक्षा लेने में सफल तो हो ही गये। उस खण्डित बर्तन को दूसरी स्त्री ने दूध से भर दिया।
देवजी भिक्षा लेकर वापिस चले। किन्तु कुछ ही दूर जाकर वापिस लौट आये और दूसरी माँग पेश कर दी कि इस समय सर्दी पड़ रही है तो एक सी ओढ़ण तो दीजिये। सैंसे की नारी ने कहा-यह कैसा साधु है, जिसे समय का भी ज्ञान नहीं है। इसके गुरु ने यह भी सिखाया नहीं कि गृहस्थ के घर पर भिक्षा माँगने कब जाना चाहिये तथा बिना समय भिक्षा मिलने पर भी अब तक संतोष नहीं हुआ जो अब वस्त्र भी मांग रहा है।
श्रीदेवजी ने कहा-हे देवी! भिक्षा का कोई समय नहीं होता। जब भूख लग जाये तभी भिक्षा याद आती है परंतु इस भूख का कोई पता नहीं कि कब लग जाये। तथा वस्त्र तो जब सर्दी लगे, तभी याद आता है। ऐसी वार्ता सुनकर स्वयं सैंसे ने ही अबकी बार एक गूदड़ा (पुराना मोटा वस्त्र) प्रदान किया और कहा अब तो चले जाओ।
सैंसे की नारी बोली-अभी अभी तो इसको बाहर निकाला था, किन्तु यह तो वापिस आ गया। भिखारी तो बहुत देखे, किन्तु इतना हठीला मैंने कभी नहीं देखा। सेंसे ने अपनी नारी की वार्ता सुनी तो कहने लगे- क्यों कलह मचायी है? यदि और कुछ देना है तो दे दो, नहीं देना है तो ना कह दो। गाँव के लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे? घर की लज्जा तो रखो। सैंसे की नारी ने सैंसे की वार्ता को अनसुना कर दिया, किन्तु सैंसे ने एक आथर (वस्त्र विशेष) दिया और वहाँ से रवाना किया।
इस प्रकार से सैंसे के घर से मिला अन्न एवं वस्त्र लेकर वापिस झींझाले आ गये। परब्रह्म से साथरियों (भक्तों) ने पूछा-हे देवजी! सैंसे की वार्ता बतलाओ। वहाँ क्या और कैसी भिक्षा दी? भक्तों के भाव को देखकर देवजी ने टूटी हुई पतरी में सैंसे के घर का अन्न एवं वस्त्र दिखलाया। और कहा यह मुझे मिला है। सैंसे ने मुझे यह सोड़ उढाई है।
रात्रि व्यतीत हुई। दूसरे दिन प्रातःकाल ही गाँवों से मतवाले भक्तजन आने लगे। साखी, शब्द, हरिजस गाते हुए, झींझा बजाते हुए प्रातः काल ही जमात एकत्रित हुई। सभी लोग देवजी के दर्शन करने आ रहे थे। विशेष रूप से वे ही लोग आ रहे थे, जिनका भाग्य सौभाग्य में बदल चुका था। महिलाएँ, पुरुष, बच्चे अनेकानेक यथा रूप शृंगार करके आ रहे थे। आकर स्वामी परमात्मा को शीश झुकाते हैं और यथास्थान बैठ जाते हैं। वन में ही नगरी बस गयी है। ऐसा खेल मालिक ने रचा था। भेदभाव से रहित चाकर ठाकर एक से ही प्रतीत हो रहे थे।
जो भी श्री देवजी के दर्शन करता वह अपने सन्मुख ही देख रहा था। मुख मण्डल की कांति सूर्य सदृश शोभायमान हो रही थी। किसी को भी श्रीदेवजी की पीठ नहीं दिखाई दे रही थी। क्योंकि स्वयं देवाधिदेव विष्णु ने ही सम्भराथल पर अवतार लिया था। मनुष्य ही नहीं, पशु पखेरू भी सन्मुख आकर पवित्र हो गय थे। उत्तम जीवों को ही बिश्नोई पंथ में सम्मिलित किया गया था।
नाथूसर निवासी भी सैंसे के साथ उसी प्रकार से आये थे। श्रीदेवजी को शीश झुकाते हैं और बैठ जाते हैं। दिनभर सत्संग का कार्य चलता रहा, पुनः सांयकाल हुआ, सूर्यास्त होने जा रहा था। पहले की भांति सेन्से ने फिर कहा-हे देव! दिन व्यतीत हो चुका है, रात्रि का आगमन होने जा रहा है। हमें क्या शिक्षा है, जमात हाथ जोड़े खड़ी है।
श्री देव ने पुनः कहा-
सतगुरु नाम इम द्यो भीख। साम्य कहे सैसा आ सीख।
हे सैंसा! सतगुरु परमात्मा के नाम से भिक्षा देना, तेरे लिए यही शिक्षा है।
सैंसा कहने लगा-हे सतगुरु! आप बिना सोचे-विचारे एक ही बात मुझे बार-बार क्यों कहते हो? वैसे क्या मैं समझता नहीं हूँ। मैं आपके नाम से आपको ही समर्पण करके भिक्षा देता हूँ। प्रेमभाव से भोजन करवाता हूँ। जो मेरे पास मेरे घर में आ जाता है, उसको मैं खाली हाथ उत्तर नहीं देता हूँ। हे देव! मेरा क्या है सभी कुछ आपका ही है और आपके नाम से खर्च भी करता हूँ। सैंसे ने इस बात को जोर देकर कहा।
तब सतगुरु बोले-हे दुवागर-द्वारपाल! तुम सैंसे के घर से लायी हुई भिक्षा तथा गूदड़ा लाकर दिखाओ। जब दुवागर के हाथ में टूटी हुई पतरी एवं आथर-वस्त्र देखा तो तुरंत पहचान गया। सतगुरु ने कहा-हे सैंसा!
ए सहनाण पिछाण, मूंधे मुंह सैंसो पड़्यो, सांभल सके न कोय।
सैंसे ने अपने ही घर की वस्तु पहचान कर मुंह नीचे कर धरती ऊपर गिर पड़ा। सामने देख भी नहीं सका। विलाप करने लगा-मेरे घर स्वयं सिरजणहार आये और मैं उनकी सेवा नहीं कर सका, उल्टा उन्हें अपमानित किया। हे धरती माता! तू फट जाओ और मैं तुम्हारे में समा जाऊँ। अब मुँह दिखानह्य लायक भी नहीं रहा।
यदि संसार छोड, दे तो हरिजी संभाल लेते हैं। और यदि हरिजी ने ही छोड़ दिया, तो अब मुझे बचाने वाला कोई नहीं होगा। यदि कोई कुएँ में गिरने वाला हो और पीछे से कोई धक्का दे देवे तो अच्छी प्रकार से गिरा जा सकता है। सैंसा विलाप करते हुए अचेत हो गया। साथ में रहने वाले सज्जनों ने प्रार्थना की कि हे नाथ! यदि आप हाथ छोड़ देंगे, तो यह जड़ मूल से ही चला जायेगा। अब यह तो आपके सामने नहीं देख सकेगा। आप से प्रार्थना नहीं कर सकेगा। किन्तु हमारी अर्ज अवश्य ही सुनो। उठ सैंसा सतगुरु कहे गर्व न करो लिंगार। सतगुरु कहने लगे-हे सैंसा! अहंकार न करो और खड़े हो जाओ। सतगुरु के आशीर्वचन सुनकर सैंसा खड़ा हो गया। हाथ जोड़कर विनती करने लगा-हे देवाधिदेव! आपने मुझे बचा लिया है अन्यथा मैँ तो अहंकार के पंक में डूब जाता। मुझे तो इस अज्ञानता का पता ही नहीं था। आपने मेरी आंखे खोल दी है। अब मैँ गर्व को छोड़कर आपके ही अधीन हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। आपने कृपा करके मेरी आँखें खोल दी हैं। सैंसा पुनः स्वस्थ हुआ। सतगुरु ने क्षमा कर दिया। उपस्थित जन समूह ने जय जयकार की। सैंसे के भाग्य की सराहना की और देवजी के दयालुता की प्रशंसा की।
सैंसो कसवों कहे-देवजी! म्हें तो सुरगा जोगो सांमो ?ाणो ही कियो- जाम्भोजी श्रीवायक कहे-
शब्द-57 ओ३म् अति बल दानों, सब स्नानो, गऊ कोट जे तीरथ दानो
बहुत करे आचारूं। ते पण जोय जोय पार न पायो, भाग परापति सारूं।
घट ऊंधै बरसत बहु मेहा, नींर थयो पण ठालूं।
को होयसी राजा दुर्योधन सो, विष्णु सभा महलाणो।
तिणही तो जोय जोय पार न पायो, अध विच रहीयो ठालूं।
जपिया तपिया पोह बिन खपिया, खप खप गया इंवाणी।
तेऊं पार पंहुता नाहीं, ताकी धोती रही अस्माणी।।
सैंसा कस्वां स्वस्थ हुआ। फिर कहने लगा-हे देव! मैंने तो स्वर्ग जाने के बहुत से उपाय किये थे, किन्तु अब तक मुझे मेरे गर्व का पता ही नहीं था। यह अहंकार मुझे ले डूबेगा। इस बात से मुझे आपने अवगत करवाया है। मैं धन्यभागी हूँ, जो आपके दर्शन एवं स्पर्श का लाभ मुझे मिला।
श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-हे सैंसा! अति दान, अपनी औकात से भी ज्यादा दिया हुआ दान भी लाभदायक नहीं है। अड़सठ तीर्थों में बिना श्रद्धा एवं योग्यता के किया हुआ दान लाभदायक एवं संतोषजनक भी नहीं है। करोड़ों गऊवों का तीर्थों में जाकर दान देना भी मुक्ति का कारण नहीं बन सकता। अन्य भी बहुत से किये हुए आचार-विचार भी अति आनन्ददायक नहीं है। अपने से बड़ों को देखोगे तो पार नहीं पा सकोगे। सभी से ऊँचा नहीं बन पाओगे।
अभी तो तुम्हारे से बहुत से लोग आगे हैं। वे लोग ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। तुम तो तुम ही हो। दूसरा तो दूसरा ही होगा। अपने अपने भाग्य से ही प्राप्त होता है। घड़े को उल्टा कर दिया जावे, ऊपर चाहे कितना ही जल बरसे तो भी उसमें जल नहीं भरेगा। प्रथम घड़े को सीधा करो तब जल अन्दर गिरेगा। प्रथम अधिकारी बनो तब ज्ञानरूपी जल अन्दर भरेगा।
दुर्योधन जैसा अहंकारी राजा अब तक नहीं हुआ। जिस दुर्योधन की सभा में स्वयं विष्णु-कृष्ण आ गये, किन्तु नहीं समझ सका। और कृष्ण को बाँधने लगा। अब तक कोई कृष्ण (विष्णु) को बाँध सका है क्या? अहंकारी जीव दुर्योधन यही नादानी करता है। जब कृष्ण ने दुर्योधन की सभा में अपने रूप को विराट बनाया तो देखते हुए भी दुर्योधन पार नहीं पा सका। गर्व से संयुक्त दुर्योधन अधबिच में ही रह गया। न तो पार पहुँच सका और न ही मृत्युलोक का राजा ही रह सका। न तो इस मृत्युलोक में रहकर यश ही प्राप्त कर सका और न ही परलोक सुधार सका।
कई जपी तपी बिना मार्ग जाने साधना का बहाना करते हुए समाप्त हो गये। इसी प्रकार कितने ही लोगों ने शरीर धन के मद में अपने को अनाधिकारी बना डाला। वे लोग भी ज्ञान बिना व्यर्थ की सिद्धि प्राप्त करने पर भी पार तो नहीं पहुँच सके, जिनकी धोती आकाश में सूखा करती थी।
जमाती कहे देवजी! कोई चार जुगा में पारि पहुँतो। जाम्भाजी कहे-राव मालदेव, झाली राणी दीठा। देही कि दाह गयी। तिह समय श्री वायक कहे-
शब्द-58 ओ३म् तउवा माण दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत मांणो।
तउवा दान जू कृष्णी माया, अवर भी फूलत दानो।
तउवा जाण जू सहस्त्र झूझ्या, अवर भी झूझत जाणों।
तउवा बाण जू सीता कारण लक्ष्मण खैंच्या, अवर भी खेंचत बाणों।
जती तपी तकपीर ऋ षेश्वर, तोल रह्या शैतानों।
तिण किण खेंच न सके, शिंभु तणी कमाणूं।
तेऊ पार पहूँता नांही, ते कीयो आपो भांणों।
तेऊ पार पहूँता नांही, ताकी धोती रही अस्माणों।
बारां काजै हरकत आई, अध बिच मांड्यो थांणो।
नारसिंह नर नराज नरवो, सुराज सुरवो नरां नरपति सुरां सुरपति।
ज्ञान न रिंदो बहुगुण चिन्दो, पहलू प्रहलादा आप पतलीयो।
दूजा काजै काम बिटलीयो, खेत मुक्त ले पंच करोड़ी।
सो प्रहलादा गुरु की वाचा बहियो, ताका शिखर अपारूं।
ताको तो बैकुंठे बासो, रतन काया दे सोप्यां छलत भंडारू।
तेऊ तो उरवारे थाणो, अई अमाणो,तत समाणो। बहु परमाणो पार पंहुचन हारा।
लंका के नर शूर संग्रामे घणा बिरामे, काले काने भला तिकंट।
पहले जूझ्या बाबर झंट, पड़े ताल समंदा पारी, तेऊ रहीया लंक दवारी।
खेत मुक्तले सात करोड़ी,परशुराम के हुकम जे मूवा।
सेतो कृष्ण पियारा, ताको तो बैकुण्ठे बासो।
रतन काया दे सौंप्या छलत भण्डारूं, तेऊ तो उरवारे थाणो।
अई अमाणो पार पंहुचन हारा।
काफर खानो बुद्धि भराड़ो, खेत मुक्त ले नव करोड़ी।
राव युधिष्ठिर से तो कृष्ण पियारा, ताको तो बैकुण्ठे बासो।
रतन काया दे सौंप्या छलत भण्डारूं, तेउ तो उरबारे थाणो।
अई अमाणो बहु परमाणो, पार पंहुचन हारा।
बारा काजै हरकत आई, तातै बहुत भई कसबारूं।
सैंसे भक्त के साथ उपस्थित जमाती लोगों ने पूछा-हे गुरुदेव! इन चार युगों में कोई संसार-सागर से पार पहुँचा या नहीं। जाम्भोजी ने उत्तर देते हुए कहा-जोधपुर नरेश राव मालदेव तथा चित्तौड़ नरेश की माँ झालीराणी ये दोनों ही सुजीव हैं, पार पहुँच जायेंगे। इन दोनों की कथा विस्तार से आगे बतलायेंगे।
इस समय श्रीदेवजी ने लोगों को सम्बोधित करते हुए शब्द कहा-अहंकारी व्यक्ति कभी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। यह तो पका निश्चय ही है। जितना अहंकार निवृत्त होता जायेगा, उतना ही मुक्त होता जायेगा। बंधन ढ़ीला पड़ता जायेगा। जैसा अहंकार दुर्योधन ने किया उतना अहंकार तो अब तक किसी ने भी नहीं किया। राजा मालदेव एवं झालीराणी सर्वथा निरहंकारी हैं।
फूलते-फलते तो बहुत हैं, किन्तु कृष्णी माया जितनी फूलती फलती है, उतना कोई नहीं। युद्ध के मैदान में जाकर युद्ध तो शूरवीर संसार में बहुत करते हैं, किन्तु जितना सहसा्रबाहू ने किया उतना कोई नहीं कर सका। जिसने परशुरामजी का सामना किया।
बाण चलाने में भी बहुत लोग कुशल हैं, किन्तु जितने बाण सीता को लंका से लाने के लिए लक्ष्मण ने चलाए, उतने बाण अब तक कोई नहीं चला सका। इस संसार में जप करने वाले जपी, तप, करने वाले तपी कई तकियों के पीर, मठाधीश, ऋषि शिरोमणि इत्यादि अपने अपने बल को तोल रहे हैं। ये लोग केवल अपनी शैतानी को ही तोल रहे हैं। इनके पास ज्ञान नहीं है।
शिम्भू के धनुष को उठाने के लिए सभी ने प्रयत्न किये किन्तु अहंकार से मूर्छित लोग धनुष को हिला भी नहीं सके। परमात्मा की असीम शक्ति का कौन पार पा सकता है? जो निरहंकारी हैं, वे भले ही पार पा जायें। वे भी पार नहीं पहुँच सके, जिनकी धोती आसमान में सूखा करती थी।
गुरुदेव कहते हैं कि प्रह्लाद के बिछड़े हुए इक्कीस करोड़ तो पार पहुँच गये हैं। अब बारह करोड़ इसी भूमि पर विद्यमान है। उन्हें ले जाने के लिए मेरा आगमन हुआ है। ये सभी बारह करोड़ पार पहुँचेंगे। मैंने इस मृत्युलोक में आसन जमाया है। क्योंकि यह मृत्युलोक पाताल लोक एवं स्वर्ग के बीच में विद्यमान है। मानव जीवन भी देव तथा दानव के मध्य अवस्थित है। सतयुग में जब नृसिंह अवतार हुआ था, वह नर रूप में नरों में भी शिरोमणि, देवताओं में भी देव शिरोमणि, नरों के भी राजा एवं देवताओं के देवराजा ज्ञान से युक्त बहुगुणों से सम्पन्न थे। सर्वप्रथम तो उन्होनें हिरण्यकश्यिपू को मारा था। दूसरा उन्होंने भक्त प्रह्लाद को विश्वास में लिया था। प्रह्लाद को दिलाद्या दिलाई थी।
दूसरों की भलाई के लिए स्वयं भगवान् विष्णु अवतार लेकर आये थे । उस समय सतयुग में नृसिंह ने प्रह्लाद को वचन दिया था। इस वजह से पाँच करोड़ का उद्धार प्रह्लाद के साथ हुआ। क्योंकि वो लोग प्रह्लाद के वचनों पर चले थे । उनकी गति अति उत्तम थी। वे लोग मुक्ति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंँच चुके हैं, उनका निवास तो बैकुण्ठ में ही है। जन्म-मरण का चक्कर छूट गया है ।
इह भौतिक शरीर तो यहीं पर छूट गया है, किन्तु उनको दिव्य रतन सदृश अलौकिक काया मिली हैँ। उन्हें सम्पूर्ण आनंद का भण्डार सौंप दिया है। वे लोग भी यहीं उसी मृत्यु लोक के ही थे। आप लोगों के ही साथी थे।
इस संसार में ही तत्त्व रूप से विष्णु समाया हुआ है। उसमें बहुत ही प्रमाण हैं। जो पार पहुँचने योग्य होंगे वे तो अवश्य ही पहुंँचेंगे। इस समय भी आप पार पहुँचने की योग्यता धारण करें। निरहंकारी बनें, समर्पण भाव करें।
सतयुग के बाद त्रेता युग में भी राम अवतार हुआ। राम ने लंका में जाकर रावण को मारा था। लंका में बड़े बड़े सूरवीर योद्धा थे, जो अत्यधिक संख्या में थे। काले, कुरूप, काणे-बड़े-बड़े योद्धा युद्ध भूमि में राम की सेना से लड़ रहे थे। राम की सेना भी तो कुछ कम नहीं थी। वहाँ पर भी बबर, झंट, हनुमान आदि अनेकानेक योद्धा थे। जब उनका युद्ध होता था, तो समुद्र पार भी ताल की ध्वनि सुनाई देती थी। वे सभी लंका के दरवाजे पर ही थे।
ये सभी जीव मोक्ष के अधिकारी ही थे। राम के हाथ से मृत्यु को प्राप्त करके ये मुक्ति को प्राप्त हुए । कुछ रामजी की सेवा करके मुक्ति को प्राप्त हुए थे। वे लोग भी यहीं इसी मृत्यु लोक के ही जीव थे।
त्रेता युग में ही परशुरामजी ने क्षत्रियों का संहार किया था। उनके संपर्क में आने वाले पापी जन भी उनकी दृष्टि से ही पवित्र होकर मुक्ति को प्राप्त हुए थे। जिन्हें भी विष्णु प्यारा था, वे चाहे वैर भाव से स्मरण करें या प्रेम भाव से, वे सभी लोग पार पहुँचे हैं। इस प्रकार से त्रेता युग में सात करोड़ का उद्धार हुआ। वे सभी लोग यहीं के निवासी थे। पार पहुँचने के योग्य थे, वे पहुँच गए। वे सदा सदा के लिये पंथ निर्मित कर गये।
द्वापर में कृष्ण अवतार हुआ। युधिष्ठिर सम्राट हुए। उस समय भी नौ करोड़ का उद्धार हुआ। वे लोग भी ज्यादा भले भी नहीं थे, किन्तु कृष्ण के संपर्क में आने से पार पहुँचने के योग्य थे, वो पहुँचे गये। वहाँ उन्हें सुख दुःख से रहित आनंद का भंडार सौंप दिया गया। वे भी यहीं के ही लोग थे।
गुरु देव कहते हैं-कि इस समय कलयुग में बारह करोड़ का उद्धार करने हेतु मुझे आना पड़ा। प्रह्लाद के वचनों को पूरा करना है। इन्हें भी मैं पार पहुँचा कर ही जाऊँगा। हे लोगो! आप लोग भी उन्हीं बारह करोड़ के अंतर्गत ही हो। तुम भी पार पहुँच जाओगे। किन्तु अहंकार के रहते तो असंभव ही है।
सैंसो कह जमाती नै। सीख दीजै। जाम्भोजी कह गुरु नांय मांग जीन भीख द्यौ। विसन जंपो क्रीया मां सावधान चालौं सैंसे ने वले कह्यो। जाम्भोजी श्री वायक कहै-
शब्द-59 ओ३म् पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं भूला भूले झंख्या आलूं।
अहनिश आव घटंती जावै, तेरा सास सबी कसबारूं।
कइया चन्दा कइया सूरुं, कइया काल बजावत तूरूं।
उर्द्धक चन्दा निरधक सूरुं, सुन घट काल बजावत तूरूं।
ताछै बहुत भई कसवारूं।
रक्तस बिन्दु परहस निन्दू, आप सहै तेपण बुझे नही गंवारूं।
सैसा भक्त कहने लगा- हे गुरु देव! मेरे साथ में आये हुए सत्संगी लोग वापिस घर जाने की आज्ञा माँग रहे हैं। इन्हें तथा मुझे भी घर जाने की आज्ञा प्रदान कीजिए।
जाम्भोजी ने कहा-गुरु के नाम की आगन्तुक सुपात्र को भोजन दीजिए। विष्णु का जप करो। क्रिया कर्म में सावधान रहो। यह बात सैंसे को कहते हुए शब्द सुनाया-
हे लोगो! वेद, शास्त्र, शब्द अवश्य ही पढें। व्यर्थ का समय व्यतीत न करें। विष्णु का जप, स्मरण, स्वाध्याय करें। व्यर्थ का बकवास न करें। दिन रात करते हुए तुम्हारी आयु बीतती जा रही है। तुम्हारा प्रत्येक श्वांस बड़ा ही अमूल्य है। इसका सदुपयोग करो।
आयु तो सभी की ही निश्चित है। चाहे सूर्य, चन्द्र, तारे ही क्यों न हो? इनकी भी आयु घटती जा रही है। काल ने तुरही बजा दी है। अपने आने से पूर्व ही सचेत कर दिया है। चन्द्र की आयु एवं ऊँचाई कम है। सूर्य की ऊँचाई, तेज एवं आयु चन्द्रमा से ज्यादा है। तो भी क्या हुआ? एक दिन काल का ग्रास तो अवश्य ही बनेंगे।
आप लोग किस के सहारे से अभिमान कर रहे हो। जब सभी कुछ छोड़,कर जाना निश्चित ही है तो समय का सदुपयोग करो और स्वाध्याय करो। दान पुण्य करो। सुपात्र का स्वागत करो। यही शिक्षा है। अब आप लोग खुशी से जा सकते हो। सैंसा भक्त अपने घर पहुँचा और गृह लक्ष्मी से जो घटना घटी थी। वही बताई। सैंसे की नारी ने आश्चर्य किया और पछतावा करने लगी। सैंसे के घर में चालीस दुधारू गायें दूध देती थी, किन्तु एक अजब गजब के मेहमान का स्वागत नहीं कर सके थे। फिर भी सैंसे को मुक्ति का वरदान श्री देवजी ने दिया था।
सैंसा पच्चीस दुधारू गायें और भी ले आया। अब तो घर में पैंसठ गायें दूध देने वाली थी। सैंसे की नारी बिलौवना करती। मक्खन,दूध,दही,घी आदि की नदियाँ बहने लगीं। आये हुये सुपात्र का सैंसा सम्मान करता। न जाने कब किस रूप में हरि ही आ जाये। गाँव के बच्चे सैंसे के घर आ जाते। वेला कुवेला में उनके साथ कोई अतिथि भी आ जाता, भोजन तैयार नहीं होता, तो सैंसा घर में तिल और शक्कर रखता उन्हें सभी को खाने के लिये देता था।
कभी-कभी बच्चे रात्रि में आकर झंझट खड़ी कर देते तो भी सैंसा देने से मुख नहीं मोड़ता था। कई बच्चे सैंसे से शिकायत करते, आज हमें कुछ भी नहीं मिला था। सैंसा भक्त उन्हें प्रेम से भोजन देता, या तिल शक्कर देता।
एक दिन सैंसा गुरु महाराज के पास सम्भराथल पर पहुँचा और कहने लगा-हे देव! मैं आपकी प्रतीक्षा करता था, किन्तु आप आये नहीं। आप भी बड़े विचित्र हैं देव!
बिना बुलाये तो आ जाते हो। किन्तु बुलाने पर नहीं आते। आप चाहे न भी आयें, किन्तु आने वाले प्रत्येक आगन्तुक में मैं आपको ही देखता था, क्योंकि पूर्व में मैं धोखा खा चुका था।
देवजी ने पूछा-हे सैंसा! कहो तुम्हारी सेवा की बात? सैंसा कहने लगा-क्या कहूँ! आपके कथनानुसार ही नियम निभा रहा हूँ, किन्तु एक आपत्ति बिना बुलाये ही आ गयी है। हमारे घर पर अतिथि आते हैं। मैं उनकी तन-मन-धन से सेवा करता हूँ। सर्दियो में मैं उनको ओढने के लिये सोड, देता हूँ किन्तु उनमें कई ऐसे चोर भी आ जाते है जो सी ओढण भी ले जाते है मैं परेशान हूँ क्या करूं।
श्री देवजी ने कहा-हे सैंसा! तुम एक बहुत बड़ी भारी लंबी चौड़ी सोड़ बनालो जिसे कोई उठा कर न ले जा सके,रात्रि में सो जायेगे। सैंसे ने वही किया एक बहुत बड़ी सोड़ बनाई जिसे सैसा सोड, के नाम से जानी जाती थी।
सैसे ने भक्ति दान मान करके अपना जीवन व्यतीत किया। एक समय सम्भराथल पर विराजमान श्री देवजी से पूछा कि हे गुरुदेव! सैंसे की बात कहो। हमने सुना है कि सैंसा मृत्यु को प्राप्त हो गया है? श्री देवजी ने कहा-सैंसा भक्त था। उसकी कभी दुर्गति नहीं हो सकती। सैंसा भी प्रह्लाद के बाड़ै का जीव था। निश्चित ही प्रह्लाद के पास ही पहुँच गया है। मुक्त हो गया है। ऐसा भक्त सदा ही सराहनीय है।
हे वील्ह! जो तुमने जाँगलू में जाम्भोजी की चीपी देखी है। वह सैंसे के घर पर टूटी है। सैंसे के घर तो भिक्षा नहीं मिल पाई थी, किन्तु अब भक्त लोग श्री देवजी को भिक्षा दे रहे हैं। अपनी मनोकामना पूर्ण कर रहे हैं। प्रेम से भक्ति भाव से दी हुई भिक्षा को श्री देवजी सहर्ष स्वीकार करते हैं। श्री देवजी को क्या चाहिये? उन्हें देवस्वरूप को भोजन हेतु घी चाहिये। वही भिक्षा दे रहे हैं तथा गुरुदेव सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं तथा भक्तों का भला कर रहे हैं।
सैंसा तो शिरोमणी भक्त हुआ। उनका तो स्वर्ग में वास हुआ। सतगुरु ने झींझाले को धाम बना दिया। नाथूसर तथा आस पास के लोगों को निहाल कर दिया। यही कथा है सैंसे की तथा और महिमा है सतगुरु जाम्भोजी की, जो मैने तुझे सुनायी है। अब आगे क्या जिज्ञासा है? अवश्य ही पूर्ण करूँगा। क्योंकि मुझे ज्ञान कथा कहने में आनन्द आता है। कथा कहना और सुनना तो साक्षात परमात्मा से ही वार्ता करनी है। हे शिष्य! इस कथा कहने में मेरा स्वार्थ एवं परमार्थ दोनो ही नीहित है।