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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह28 / 94

तीसरा अध्याय · कथा 28

वरसी को शब्दोपदेश

वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! यह पंचभौतिक शरीर तो दृष्ट है, किन्तु इसमें रहने वाला जीव तो अदृष्ट ही हैं। ये दोनों भिन्न भिन्न होते हुए भी अभिन्न से दिखते हैं। शरीर का क्या स्वरूप है? एवं जीव का क्या स्वरूप है? शरीर में जीव प्रवेश होने का क्या विज्ञान है? एवं जन्म तथा माता पिता का क्या किसके साथ सम्बन्ध है। बतलाने की कृपा करें।

नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! इस सवाल के जवाब हेतु हमें श्रीदेव जम्भेश्वर की शरण में जाना होगा। वरसी वणियाल को गुरुजी ने शब्द सुनाया था, उसके बारे में मैं तुझे बतलाऊँगा।

एक समय वरसी वैणहाल देवजी कह जुरै आयो। देवजी सुं अरज कीवी, झाभाजी जेसं/ाक भरी या क पूत हुवों। माटी का म्रघ कर तीरां सुं मार, आक का पानां का बकरा कर मार। ओ कुण जीव थ, देवजी कह्यों ओ चांदिय थोरी को जीव थ, ग्रहण मां थोरी न दांन दीनुं ज्यों थौरी आय जल्म लीयों। आप कीवा लसी खुम लार गयो तलाब की एक भाल्य मांटी काढ़ी,3ायां के आगी काम आयों। इब काठ के संग्य लोह ज्यों तरयसी। जाम्भोजी श्री वायक कहगाँव

जाँगलू का वरसी बेणीवाल गोत्र का बिश्नोई एक बार सम्भराथल पर श्रीदेवजी के निकट आया और कहने लगा-हे गुरुदेव! आपने तो कहा था कि तुम्हारी सात पीढ़ी का उद्धार होगा। किन्तु मेरे एक पुत्र हुआ है, वह कुपात्र (जीव हत्यारा) है। ज्यों-ज्यों समझ पकड़ता है, त्यों-त्यों उसके लक्षण शिकारी के प्रकट हो रहे हैं। वह मिट्टी के मृग बनाकर के उन्हें तीर से मारता है और आक के पत्ते का बकरा बना करके उन्हें भी मारता है। यह कौन कैसा जीव है? जो मेरे घर में आ गया? यदि ऐसा जीव मेरा बेटा बनकर आया है तो फिर मेरी सात पीढ़ियों का उद्धार कैसे होगा?

श्रीदेवजी बोले-हे बरसी! अब मैंने तेरे को खेराज से वर देकर वरसी बना दिया है। मेरा वर झूठा नहीं होगा। अवश्य ही सात पीढ़ियों का उद्धार होगा। जिस प्रकार से काठ के संग लोहा भी पार उतर जाता है, उसी प्रकार से यह तेरा बेटा भी सत्संगति से पार उतर जायेगा। यह जीव पूर्व जन्म में चांदियो थोरी था, ग्रहण में थोरी को दान दिया था, वही थोरी तुम्हारे घर में आया है। ग्रहण समय में जब तुम्हारी स्त्री दान दे रही थी, उस समय रजस्वला अवस्था में थी। इसकी दृष्टि तुम्हारी स्त्री पर पड़ गयी और यह वासना के वशीभूत होकर मृत्यु को प्राप्त हो गया था। अन्त मति सो गति।

अन्तकाल में वह तुम्हारे घर की वासना सहित मरा था, इसलिए जन्म तुम्हारे घर में हो गया। पूर्व जन्म के इसके संस्कार शिकार खेलने के ही हैं। इस जन्म में भी, यह वही पूर्व जन्म के संस्कार दोहरा रहा है। धीरे-धीरे पूर्व जन्म के संस्कार लुप्त हो जायेंगे। यहाँ पर सत्संगति से नये संस्कार उदय हो जायेंगे। तब वह पूर्व जन्म को भूल जायेगा।

वरसी कहने लगे-हे गुरुदेव! यदि वह शिकारी था। मेरे पुण्यवान श्रीमान् पवित्र घर में इस कुपात्र का जन्म क्यों हुआ? इसे नरक में पड़ना चाहिये था। चौरासी लाख जीया योनि भोगनी चाहिये थी?

श्री जम्भेश्वरजी ने बतलाया-अवश्य ही यह जीव पापी था। इसे दुःखदायी नरक में गिरना चाहिये था। किन्तु कभी पापीजन भी कोई शुभ कार्य कर लेता है। इस चांदिये ने तालाब से मिट्टी निकाली थी। उससे उसको पुण्य हुआ तथा दूसरा कार्य इसने बहुत ही पुण्य बढ़ाने वाला किया था। वह गऊवों की रक्षा करते हुए बलिदान हो गया था। इसने अपने प्राणों के रहते हुए जीवो की रक्षा की थी। हत्यारों से गऊवों को त्राण दिलाया था। इस पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे जैसे शुचि श्रीमान् के घर में जन्म लिया है।

इस प्रकार कहते हुए श्री जम्भेश्वर ने उस बालक के सिर पर हाथ फेरा ओ कहा-यह तो स्याणा ही है। तुम इसे घर ले जाओ। जाम्भोजी के वरद हस्त का आशीर्वाद प्राप्त करके वह बालक स्याणा-ज्ञानी हो गया। उसका नाम भी स्याणा ही रख दिया।

हे शिष्य! वरसी के पुत्र स्याणों इस समय विद्यमान है। तुम गाँव जाँगलू जाकर दर्शन कर सकते हो। यह सभी कुछ कृष्ण चरित्र से ही संभव हुआ है। यह कृष्ण चरित परिवाणों। इस सम्बन्ध में श्रीदेवजी ने शब्द सुनाया-

शब्द-22 ओ३म्- लो लो रे राजिंदर रायों, बाजै बाव सुवायों।

आभै अमी झुरायो, कालर करसण कद्धयों।

नैपे कछु ना कीयों।

अइया उत्तम खेती, को को इमृत रायो,

को को दाख दिखायो,को को ईख उपायो।

को को नींब निबोली, को को ढ़ाक ढ़कोली।

को को तूषण तूंबण बेली, को को आक अकायों।

को को कछु कमायों,ताका मूल कुमूलूं।

डाल, कुडालूं, ताका पात कुपातूं।

ताका फल बीज कुबीजूं, तो नीरे दोष किसायो।

क्यूं क्यूं भए भागे ऊंणा, क्यूं क्यूं कर्म बिहूँणा।

को को चिड़ी चमेड़ी,को को उल्लू आयों।

ताके ज्ञान न जोति, मोक्ष न मुक्ति।

यांके कर्म इसायों, तो नीरे दौष किसायों।

मेघाधिपति देवराज इन्द्र ही बादलों के रूप में वर्षा करते हैं। वर्षा से अन्न होता है। अन्न से रजवीर्य बनता है। उसमें ही सूक्ष्म जीव विद्यमान रहता है। तब सृष्टि की उत्पत्ति होती है। सुखेती में समय पर बोया हुआ बीज फूलता फलता है। तत्त्व भूमि में बोया हुआ व्यर्थ ही चला जाता है। जैसा बीज होगा वैसा ही पौधा होगा। बीज में ही कणतत्व है। वही जीव भी बीज है। शरीर के उत्पन्न करने में तो माता-पिता हेतु हैं। किन्तु बीज रूप जीव सदा ही सनातन है। वह न तो कभी मरता है और न ही जन्मलेता है। जब जलरूपी बीज शरीर के गर्भ में प्रवेश होता है, तभी जीवधारी शरीर माँ के गर्भ में वृद्धि को प्राप्त होता है। अन्यथा जलरूपी वीर्य व्यर्थ में ही चला जाता है।

यदि ईख का बीज है तो ईख ही उत्पन्न होगी। ठीक इसी प्रकार से माता-पिता तो केवल शरीरदाता हैं। बीज उत्पन्न करने वाला नहीं है। हे वरसी! इसमें तुम्हारा तो केवल जल ही है। शरीर के ही तुम माता पिता हो। इस जीव के माता पिता नहीं हो। जीव के कर्म ही ऐसे हैं, तो माता पिता का क्या दोष है? माता पिता केवल अपने ही सदृश शरीर की आकृति प्रदान करते हैं। जीव रूप बीज से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। यह जीव तो अपने ही कर्मानुसार अनेकानेक योनियाँ धारण करता है। कर्म फल सुख-दुःख भोगता है। बार-बार जन्म लेता है और मरता है।