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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह15 / 18

रचना 15

कवित - आदि अनादि युगादि को योगी

आदि अनादि युगादि को योगी, लोहट घर अवतार लियो है। धनहीं धन भाग बड़ो, जिन हांसल को हरि मात कह्यो है।। होत उजास प्रकाश भयो, जैसे रेन घटी अरू भोर भयो है। कोटी दवादश काज के तांही, केशवदास भणे संभराथल आय रह्यो है।।