रचना 15कवित - आदि अनादि युगादि को योगीआदि अनादि युगादि को योगी, लोहट घर अवतार लियो है। धनहीं धन भाग बड़ो, जिन हांसल को हरि मात कह्यो है।। होत उजास प्रकाश भयो, जैसे रेन घटी अरू भोर भयो है। कोटी दवादश काज के तांही, केशवदास भणे संभराथल आय रह्यो है।।