रचना 16
छप्पय :- जम्भ गुरु जगदीश, ईश नारायण स्वामी
ॐ जम्भ गुरु जगदीश, ईश नारायण स्वामी । निर लेखक निरलेप, सकल घट अन्तर्यामी । पेट पीठ नहिं ताहि, सकल को सन्मुख दर्श । पाप ताप तन हरे, जहां पद पंकज पर्शे । अखे अडोल अनन्त अज, अवगत अलख अभेव । स्वयं स्वरूपी आप है, जम्भगुरू जगदेव । जम्भगुरू जगदेव, भेव कोई बिरला पावै। रहै शरण जो आय, बहुरि भवजल नहि आवै। विष्णु धर्म परगट कियो, धर्म विकट विहंडनम्। संभराथल परगट सही, ज्योति स्वरूप जगमण्डनम्।