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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह2 / 18

रचना 2

वृहन्नवणम् (सन्ध्या मंत्र) (नवण)

ओ३म् विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी। साधे भक्ति उधरणो। दिवला सों दानों। दाश विदानों। मदसु दानो। महमाणो। चेतो चित जाणी। षाङ्र्ग पाणी।। नादे वेदे निरंजणों। आदि विष्णु वाराहां दाढा कर धर ऊधरणों। लक्ष्मीनारायण। निश्चल थाणों थिर रहणों।। मोहन आप निरंजन स्वामी। भण गोपालों। त्रिभुवन तारों। भणता गुणता पाप क्षयों। स्वर्ग मोक्ष जेहि तूठा लाभै। अब चल राजों। खापर खानो क्षय करणों। चीता दीठां मिरग तिरासै। बाघां रोलै गऊ विणासै। तीर पुले गुणबाण हयों। तप्त बुझै धारा जल बूंठा। यों विष्णु भणता पाप क्षयों।। ज्यों भूख को पालण अन्न अहारों। विष को पालण गरुड़ दवारों। के के पंखेरु सीचांण तिरासै। यों विष्णु भणता पाप विणासै। विष्णु ही मन विष्णु भणियों। विष्णु ही मन विष्णु रहियों। तेतीश कोटि बैकुण्ठ पहुन्ता। साचे सद्गुरु का मन्त्र कहियों।।