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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह18 / 18

रचना 18

छप्पय:- श्री गुरु जांभा शिष्य भक्त रणधीर भंडारी।

श्री गुरु जांभा शिष्य भक्त रणधीर भंडारी। सुवरण की जो सिलम, अछय पाई उपकारी।। तातैं करि करि दान, मान पायो मरुधर में। कीरति लता अखूट, घणी पसरी घर-घर में।। मंदिर मुकाम विरच्यो महा, देखि दुष्ट जन जरि गये। खल गरल खवायो ताहितै, तन तजि ध्रुव यश करि गये।।