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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह6 / 18

रचना 6

पाहल प्रारम्भ

ओं नमो स्वामी शुभकरतार। निर्तार, भवतार, धर्म्म धार पूर्व एक ओंकार।।1। साधूनां दर्शणम्पुण्यम्। सन्मुखे पापनाशणम्।।2॥। जन्म फिरंता को मिलै। सन्तोषी सुचियार। अपणो स्वार्थ ना करै। पर पिण्ड पोषणहार।।3।। पर पिण्ड पोषणहार जीवत मरै। पावै मोक्ष हि द्वार।।4।। एहस पाहल भाइयो साधे लिवी विचार। एहस पाहल भाइयो थूले मेल्ही हार।।5।। एहस पाहल भाइयो ऋषि सिद्धों के काज। एहस पाहल भाइयो ऊधरियो प्रहलाद।6।। तेतीस कोटि देवाकुली लाधो पाहल बन्द। एहस पाहल भाइयो ऊधरियो हरिचन्द।।7॥। पाहल लीन्हीं कुन्ती माता होती करणी सार। साधू एहा भेटिया मिल्यो मोक्ष को द्वार।।8।। आओ पांचों पाण्डवों। गुरु की पाहल ल्योह। पाहल सार न जाणहीं। तिसे पाहल मत द्योह।।9।। पाहल गति गंगा तणी। जेकर जाणै कोय। पाप शरीरां झड़ पड़ै। पुण्य बहुत सा होय।।10।। नेमतलाई नेमजल। नेम के जीमे पाहल। कायम राजा आइयो। बैठो पाव पखाल।11॥ ऋषि थाप्या गति ऊधरै। देता दिये पाहल। वन वन चन्दन न अगरण। सरसर कमल न फूल।।12॥। एका एकी होय जपो ज्यों भागै भ्रमभूल। अड़सठ तीर्थ कांय फिरो। न इण पाहल सम तूल।।13।। गोवल गोवल को को धवल। सब संता दातार। विष्णु नाम सदा जीम। पाहल एह विचार।।14।। सद्गुरु बोले भाइयो। सन्त सिद्ध शुचियार।। मछ की पाहल कच्छ की पाहल। बाराह की पाहल। नृसिंह की पाहल। बावन की पाहल। परशुराम की पाहल। राम लक्ष्मण की पाहल। कृष्ण की पाहल। बुद्ध की पाहल। निष्कलंक की पाहल। सर्वाधार सर्वशक्तिमान सर्वेश्वर मेरी जम्भेश्वर की पाहल ।।16॥