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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह5 / 18

रचना 5

कलश पूजा

ओं अकलरूप मनसा उपराजी। तामा पांच तत्त्व होय राजी।।1॥आकाश वायु तेज जल धरणी। तामा सकल सृष्टि की करणी ।।2।। ता समरथ का सुणो विचार। सप्तदीप नवखण्ड प्रमाण।।3।। पांच तत्व मिल इण्ड उपायों। विगस्यो इण्ड धरणि ठहरायों।।4।। इण्डे मध्ये जल उपजायों। जलमां विष्णु रूप ऊपनों।। ता विष्णु को नाभकंवल बिगसानों। तामां ब्रह्मा बीज ठहरानों।।5।। तां ब्रह्मा की उत्पति होई। भानै घड़ै संवारै सोई।6।। कुलाल कर्म करत है सोई। पृथिवी ले खाके तक होई।।7।। आदि कुम्भ जहां उत्पन्नों। सदा कुम्भ प्रवर्तते॥8॥ कुम्भ की पूजा जे नर करते। तेज काया भौखण्डते।9॥। अलील रूप निरंजनों। जाके न थे माता न थे पिता न थे कुटुम्ब सहोदरम्।। जे करै ताकी सेवा। ताका पाप दोष क्ष्यो जायंते।॥10॥ आदि कुम्भ कमल की घड़ी। अनादि पुरुष ले आगे री।।11।। बैठा ब्रह्मा बैठा इन्द्र। बैठा सकल रवि अरु चन्द्र।12।। बैठा ईश्वर दो कर जोड़। बैठा सुर तेतीसां कोड़।।13।। बैठी गङ्गा यमुना सरस्वती। थरपना थापी बाल निरंजन गोरख जती।।14।। सत्रह लाख अठाइस हजार सतयुग प्रमाण। सतयुग के पहरे में सुवर्ण को घाट। सुवर्ण को पाट। सुवर्ण को कलश। सुवर्ण को टको। पांच क्रोड़या के मुखी गुरु श्री प्रहलाद जी महाराज कलश थाप्यो। वै कलश जो धर्म्म हुआ सो इस कलश हुइयो श्री सिद्धेश्वर महाराज भला करियो ओ३म् विष्णो तत्सत् ब्रह्मणे नमः।15॥ बारह लाख छ्यानवे हजार त्रेता युग प्रमाण। त्रेता युग के पहरे मैं रूपे को घाट। रूपे को पाट। रूपे को कलश। सुवर्ण को टको। सात क्रोड़या कै मुखी राजा हरिश्चन्द्र तारादे रोहितास कलश थाप्यो। वै कलश जो धर्म हुआ सो इस कलश हुइयो श्री सिद्धेश्वर महाराज भला करियो। ओ३म् विष्णो तत्सत् ब्रह्मणे नमः॥16॥ आठ लाख चौसठ हजार द्वापर युग प्रमाण। द्वापर युग के पहरे में तांबे को घाट तांबे को पाट। तांबे को कलश। रूपे को टको। नव क्रोड़या कै मुखी राजा युधिष्ठिर कुन्ती माता द्रोपदी पांच पाण्डव। कलश थाप्यो। वै कलश जो धर्म्म हुआ सो इस कलश हुइयो। श्री सिद्धेश्वर महाराज भला करियो। ओ३म् विष्णो तत्सत् ब्रह्मणे नमः॥17॥ चार लाख बत्तीस हजार कलियुग प्रमाण। कलियुग के पहरे में माटी को घाट माटी को पाट। माटी को कलश। तांबा को टको अनन्त क्रोड़या कै मुखी गुरु जम्भेश्वर कलश थाप्यो। वै कलश जो धर्म्म हुआ सो इस कलश हुइयो। श्री सिद्धेश्वर महाराज भला करियो। ओ३म् विष्णो तत्सत् ब्रह्मणे नमः॥18॥