रचना 4
धूप मन्त्र
महर करो महाराज, महर करो महल पधारो । त्रिकुटी भवन में वास, दास के संकट टारो । धूप घृत मिष्टान, पाय प्रभु पाप निवारो । जम्भ गुरू जगदीश, सन्त के कारज सारो । चौष लेह्य भक्ष भोज रस, अचवन करो अघाय । साहब हृदय सन्त के, सदा रहो सुरराय ।।1।। धूप लीजिये जलन, धूप ले रूप समावो । कृपा करो कर गहो, हरि तुम हिरदै आवो । वासुदेव विश्वेश, विश्वधर ब्रह्म रहावो । हृदय ध्वांत कूं हरी, ज्ञान उद्योत करावो । ज्ञान अग्न जोगा अगन, जठरा अग्न प्रचण्ड । साहब ससितारा तड़ित, तूं ही तरूण मार्तण्ड । तू ही तेज तप करै, निरंजन नाम धरावै । ब्रह्म तेज बल रचें, विष्णु शिव पाल नसावै । इन्द्र तेज तप करै, सप्त नवखण्ड बसावै । शेष तेज लवलेश, शीस ब्रह्माण्ड उठावै । तपही साध तपही ऋषी, तप कर तेज अपार । तप कर साहब अवनिपति, तेजपुंज ततसार ।।3।। शब्द रूप सोड़ जोत, जोत निहतंत भणीजै । अमीतत सोइ जोत, जोत सब हंस गिणी । तेज शीला सोई जोत, निरंजन जोत जाणीजै । हिरण्यगर्भ सोई जोत, जोत विराट तणीजै । महातत ब्रह्मा विष्णु शिव, सबही जोत अपार । दस चौबीसूं जोत है, साहब सो उर धार ।4। महाजोत गुरू जम्भ, भक्त हित लीलाधारी। सप्त वर्ष रहे मौन, सप्त बीसू गऊ चराई। इक्यावन कथ ज्ञान, शब्द अणभै अधिकारी। पच्यासी त्रिय मास, तेज तप लाई तारी । आठम सोम अठोतरै, पंद्रासै अवतार । तिराणवै मिंगसर वद नवमी,साहब पहुंचे पार ।5।
इति धूप मंत्र साहबराम राहड़ कृत सम्पूर्णम् ।