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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह179 / 157
जुमलै की साखी

जमै की चौथी साखी

आओ मिलो साधो मोमिणों, रल मिल जुमलै होय।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

दोहा

माता धोवे पूत कूँ, कर कर हाथां जोर ।

निन्दक धोवे जीभ सूँ, जांकी की गति ओर।।

निन्दक नेड़ा राखियो, आंगण कुटि बणाय।

बिन पाणी बिन साबण, मेल धोयो धुप जाय॥

निन्दक मेरा मती मरो, वे तो बड़ा सपूत।

मोय पठावै सुरग में, आप भूत का भूत॥

आओ मिलो साधो मोमिणों, रल मिल जुमलै होय।

आशा तृष्णा पापणी ये, तजिये कारण जोय।

ओगणगारो आदमी, गुण कूं लखै न कोय।

अजर जरै भवसागर तिरे, पापी परलय होय।

अमृत वाणी बोलिये, दोष न लागे कोय।

काम क्रोध को मैल है, ज्ञान नीर से धोय।

चंचल चित्त को थिर करो, स्वर्ग वास हुवै तोय।

ढूंढै सांसा पलक में, फिर गत कैसे होय।

तपे तो ऋषियां शरण जा, तेरी भ्रम गांठि दे खोय।

पर निंदा मूरखो करे, जिन गुरु न चिन्हों कोय।

भवसागर तिरना कठिन, मेर तजे नहिं कोय।

सांसो सांस सिवरण करो, साध केशो कहे तोय।