जमै की पांचवीं साखी
जुमले जुलके जाइये, जो दिल जुमलै होय।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
दोहा
संभरा नगरी सोनवी, ऊंचो बण्यो कैलास।
माटी काढे प्रेम सूं, हुवै बैकुण्ठा वास।
संमराथल सो थल नहीं, मन्दिर बण्यो मुकाम।
जाभोलाव सो सरवर नहीं, जहां संतारो विश्राम।
सुरजन सोदा श्याम सूं, जे कर जाणो कोय।
दुणा डोढ़ा चौगणा, अनन्त गुणों फल होय।
जुमले जुलके जाइये, जो दिल जुमलै होय।
ज्ञान सरोवर न्हाइये, दिल का कषमल खोय।
जुमलै सोहे सालिया, काबरिया जुमलै कांय
काबरिया जुमलै आवियां, लेसी वाद विराम।
जो कोई बोले श्याम सूं, स्वानां जूं घुर्राय
फीडा घातै गाफल पायचा, ठलहल पांव धराय।
खांघी बांधे गाफल पागड़ी, निरखत चालै छांय
घात कुसट में गेडियो, करड़ी नजर झुकाय।
कांय रे गाफल पांतरयो, शब्द गुरु का मान
गुरु का शब्द न मानहीं, अतरा दौं जाय ।
निंब चालो खिंव बोलणो, एकण मरण मराय
देवजी तेरे नामनै, सुमिरण करूं बारंबार।
पहिले हिन्दू सिरजिया, पीछे मुसलमाण
मुसलमानां हिन्दुवां, रोजी दे करतार ।
नाहरसिंह नर देवता, ढोयो स्वर्ग विमाण
जिहिं चढि मोमण लांघिया, भवजल सो परवाण।
मरो न जरो न तेजरो, चूकौ आवाजाण
मोमण स्वर्गे नावड़या, कर पूरो परवाण।
जर जंवरो जोखो नहीं, पोसण न गंजै कोय
ऊदो बोलै बीनती, म्हारी आवागवण न होय।