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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह181 / 157
जुमलै की साखी

जमै की छठी साखी

जंमै आवो गुरु भाइयो, सुपही करो जै काय।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

दोहा

अड़वो चुगै न चुगण दै, माणस की उणियार।

वील्ह कहै रे भाईया, सूम बड़ो संसार ॥

जंमै आवो गुरु भाइयो, सुपही करो जै काय।

ज्ञान सरवणे सांभलो, शब्द सुणो हित लाय ।

गुरु फरमाई से करो, कुपही करो ज काय।

दान दया जरणा जुगति, सतव्रत शील दृढ़ाय।

आठ धरम नवधा भगति, साध सेव सत भाय।

आचारे ब्रह्या सही, जोग ज ध्यान दिढाय।

आन तजो विसंन भजो, पाप रसातलि जाय।

जिण ओ जीव सिरजियो, सो सतगुरु सुरराय।

जुगां जुगां जीवै जकौ, अवगति अकल ज थाय।

मात पिता जाके नहीं, पख परवार न थाय।

जोंति सरूपी जग मई, सरवे रह्यो समाय।

अटल इडग इक जोति है, ना कहीं आव न जाव।

जन सुरजन वां परसिया, आवागुवण न थाय।