जुमलै की साखी
जमै की छठी साखी
जंमै आवो गुरु भाइयो, सुपही करो जै काय।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
दोहा
अड़वो चुगै न चुगण दै, माणस की उणियार।
वील्ह कहै रे भाईया, सूम बड़ो संसार ॥
जंमै आवो गुरु भाइयो, सुपही करो जै काय।
ज्ञान सरवणे सांभलो, शब्द सुणो हित लाय ।
गुरु फरमाई से करो, कुपही करो ज काय।
दान दया जरणा जुगति, सतव्रत शील दृढ़ाय।
आठ धरम नवधा भगति, साध सेव सत भाय।
आचारे ब्रह्या सही, जोग ज ध्यान दिढाय।
आन तजो विसंन भजो, पाप रसातलि जाय।
जिण ओ जीव सिरजियो, सो सतगुरु सुरराय।
जुगां जुगां जीवै जकौ, अवगति अकल ज थाय।
मात पिता जाके नहीं, पख परवार न थाय।
जोंति सरूपी जग मई, सरवे रह्यो समाय।
अटल इडग इक जोति है, ना कहीं आव न जाव।
जन सुरजन वां परसिया, आवागुवण न थाय।