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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह182 / 157
जुमलै की साखी

जमै की सातवीं साखी

आवो मिलो साधो मोमणो, रल मिल जमो रचाय । टेर।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

गेले में मोती पड्या, अन्धा निकस्या आय।

ज्योति बिना जगदीश की, जगत उलाण्डे जाय।

आई लहर समन्द की मोती आया मांय।

बगुला तो यों ही रह्या हंसा चूण चुगाय।

हरजस कथा साखी कहो, कवत छंद सिरलोक।

परमानन्द हरि नांव री, शोभा तीनों लोक।।

आवो मिलो साधो मोमणो, रल मिल जमो रचाय । टेर।

साधु सिदक मिल जोइया, विष्णु विष्णु भणाय

विष्णु भण्यां भव ऊधरै, जन्म मरण मिट जाय।

जां बाह्यो ताहीं लुण्यो, बिन बारयां पछिताय।

बाहै बीज न बीजियो, पीछै हाथ मलाय।

हाथ मल्या पीछे क्या होवे, खिल सुखी रह जाय

लुणो चुणो साधो मोमणो, सबल गांठि की जाय।

काज सबल बेड़ै चढो, भवजल पार लंघाय

सुपहा स्वर्गे नावड़या, कुपहा दोरै जाय।

मनसा भोजन मनसवी, हरि दीदार मिलाय

वील्ह कहे गुरु भाइयो, करणी साच तराय।