जमै की आठवीं साखी
आवो जमो साधो सेवगो, संभलो ज्ञान सुजाण।
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छपइया
पांच पच्चीस दस लखे, तीन चार अरु दोय
उणचासां रा मर्म मिलै, ज्ञान गोष्ठि तब होय
जप तप तीर्थ योग है, धारण करिये कोय
चार वेद छः शास्त्र को, सार समझले सोय
खाणी वाणी अर्थ लखे, भेद खेद दे खोय
जगदीशराम निज आतमा, समझे विरला जोय
आवो जमो साधो सेवगो, संभलो ज्ञान सुजाण।
सतगुरु आयो संभराथलि, विधि सूं सुणो बखाण।
जिण प्रहलादो ऊधरयो, मल्या असुर का माण।
ध्रुव अमरपद जिण हीं दियो, चौकी द्यै शशि भाण।
हरिचंद रोहितास तारा सती, सत सीधा संत सुजाण।
पांच पांडु कुंता द्रोपदी, चाल्या गुरु फुरमाण।
कलजुग कायम आवियो, अयाणा करै सयाण।
पूण छतीस परचाइया, कीया साध सुजाण।
दान दया जप साच शुचि, विष्णु करया बखाण।
चोह जुग सिद्ध साधां जप्यो, शिव ब्रह्या शेष जपाण।
अनंत कोड़ परचाविया, जंभेश्वर सुभ्याण।
पारगिरांय पोह किया, चूको आवाजाण।
परमाणंद की वीनती, राखो संग रहमाण।