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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह184 / 157
जुमलै की साखी

जमै की नवमी साखी

आवो मिलो साधो मोमणो, देखो जुमले री लोय जै।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

खींयों भीयों दुरजणो सहसो और रणधीर।

पुरी दिखाई सोनवी, सेवक पांच सधीर॥

बाबल मन लालच हुवो, सिलम लीवी उठाय।

ज्यूं काटे त्यूं दुणी हुवे, इसमै संशय नाय॥

पर उपकारी जीव है, मंदिर दियो बणाय।

कह आलम कोई सुणे सांभले सहजे सुरगे जाय॥

आवो मिलो साधो मोमणो, देखो जुमले री लोय जै।

जाग्रत को स्थूल है, विश्व नेत्र जोय जै।

वेखरी वाणी ऋगवेद की, ब्रह्या देव पिछाण जै।

क्रिया शक्ति जाणिये, अकार मात्रा जाण जै।

स्वप्न में सूक्ष्म कही, तेजस कण्ठ रहाय जै।

मध्यमा वाणी यजुर्वेद की, सरस्वती गुरु भाव कल्याण जै।

ज्ञान की शक्ति जाणिये, ऊंकार मात्रा प्रवाण जै।

त्रिकुटि लख लेइये, सही उगसी भाण जै।

कारण की सुषुप्ति, हृदय प्राज्ञ निहार जै।

पश्यन्ति वाणी सामवेद की, शिव देव समझे सार जै।

द्रव्य शक्ति जाणिये, मकार मात्रा धर ध्यान जै।

तीनों की उपाधि तीन है, स्थूल सूक्ष्म अज्ञान जै।

तुरीया में तीनो नहीं, आत्म देव अपार जै।

परा वाणी है अथर्ववेद की, अचल देव निज धार जै।

रजोगुण वेखरी जाणिये, मध्यमा सतो पहचाण जै।

तमोगुण पश्यंति जाणिये, वाणी शुद्ध सतोगुण परा की जाणजै।

अनुभव आत्मा जाणिये, इनमें मीन न मेख जै।

जगदीशराम निज आत्मा, व्यापक घट में देख जै।