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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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जुमलै की साखी

जमै की दसमी साखी

आवो मिलो जुमलो करो, रल मिल जमो कराय

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

दोहा

गाड़ी जोड़ गांव सू, सुणे सुगन निरधार।

निकसत ही सामें मिल्यो, लोहट जी पंवार॥ १॥

देखत ही दुबलो भयो बोल्यो वचन करूर।

दाणो एक न होयसी, पड़सी काल जरूर॥ २॥

सवैया

चैत चमंकी बीज मेघ मन्डयो चहूँ औरां

बिरखा भई असरार छापर निंबी के धोरां।।

गोवल गये महाराज जाय दुणपुर बसायो।।

जंगल मिल्यों एक जाट देखत उल्टो आयो।

लोहट मन में सोच विचार अन्न खन्न ले बन में गयो।

सायब सांचे स्याम ने आय दर्श तांहि दियो।।

आवो मिलो जुमलो करो, रल मिल जमो कराय

भवजल लंघै सो ऊबरै, रतन काया पहराय।

रतन काया संचै ढली, ज्यों आपो पहराय

रतन काया पणि पहरिकै, हिंडोलै बैसाय।

हिंडोलै पणि बैठके, सहजे सहज हिंडाय

सहजे सहज हिंडाय के, सहजे ही सुरत लगाय।

छल्या कचोला अमी का, गुरु प्रसाद पिलाय

गुरु प्रसादे पीयके, अती पात वर सोय।

अती पात वर कामणी, जां सूं केल कराय

केल करां आलम कहै, इण रंग जमो रचाय।