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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-11

लोहट तणी जै लाज, पत राखो पूरा धणी।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

छपइया

पुरूष प्रगट्यो एक पाप पुनि भेद कथन्तो

नहीं भूख तिस नींद रह्यो निरंकार निरंतो

रूखा बिरखां विश्राम तज्या मन हूं तै माया

मेड़ी मंडप कोट तज्या घर मंदिर छाया

'वील्हा'सोच विचार अब मन साध गुरू साचो मिल्यो

जंभ सरीखो इसो गुरु जुग जुग और न सांभल्यो

लोहट तणी जै लाज, पत राखो पूरा धणी।

गऊ चरावण काज, गोवल चाल्या म्हे सुणी।

गोवल चाल्या म्हे सुणी नै धणी ज आयो धाय।

भगवे बाने विष्णु आयो, दरसण दीनों आय।

लोहट करे छै वीणती नै, विनय सुणो सुर राज।

पुत्र दीजो देवजी लोहट तणी जे लाज।

पतराखो पुरा धणी॥ १॥

ऐसो जलमें पूत सुण लोहट सतगुरु कहे।

जोगी महा अवधूत, डर पै मत आसा सही।

डर पै मत आसा सही नै, करणी एती बात।

गोविन्द गोवल चालिया नै, जहां हांसा दे मात।

सखिया बैठी सांवठी नै, आण खड्यों अवधूत।

हांसा ने सतगुरु कह एसो जलमें पूत।

सुण लोहट सतगुरु कहे॥ २॥

माता मन अणराय, मोसिरजी करतार ज्यूं।

बलि बलि लागे पाय, झुरवे कायर मोर ज्यूं।

झुरवे कायर मोर जयूं ने, पुत्र बिहुणी माय।

जमारो अहलो गयो ने, मैं क्या किया जुग आय।

जब दया निधि बोलिया ने, सुण हांसा दे माय।

नवै महिनै अवतरू ने, घरां तिहारे आय।

हांसा ने सतगुरु कहे॥ ३॥

समराथल अवतार, गोवल रमतो डावड़ो।

किसन सही करतार, नंदघर हूंवतो छावड़ो।

नंदघर हूंवतो छावड़ो ने डावड़ो रणधीर।

बाकी बैला सदा ज आवै, भगता भजन भीड़।

गज को ग्राह घेरियो जल डूबत सुणी पुकार।

गुरुड़ छोड़ पैदल भयो, गज को लियो उबार।

गोवल रमंतो डावड़ो॥ ४॥

कुल पंवार तणी प्रकाश, पींपासर परगट्यो दई।

चोचक हुवो उजास, जाणे रवि ऊगो सही।

जोणे रवि ऊगो सही ने, माता मन आनंद।

पुत्र जलम्यो पुंवार घर, गावै गुण गोविन्द।

सरणे राखो श्यामजी ने हरजी हरि की आस।

लोहट घरा बधावणो, कुल पंवार तणै प्रकाश।

पींपासर परगटयो दई॥ ५॥