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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह139 / 156

साखी-138

कपिल सरोवर नाम, कलियुग तीरथ थापियो

कवि: गोविन्दरामजी

कवि परिचय — गोविन्दरामजी

"गोविन्दरामजी" का संवत् 1860-1950 के मध्य में जीवन समय था। साहबराम जी ने जम्भसार में गोविन्दरामजी की स्तुति करते हुए कहा है- गोविन्द तो गोविन्द सम जानो। गोविन्दरामजी ने अनेक फुटकर छन्दों की रचना की थी। इन्होनें वील्होजी की महिमा में कुछ छन्द बनाये थे। तथा इनके द्वारा रचित दो साखियां उपलब्ध है। ये जाम्भा के महंत थे। विख्यात ज्ञानी एवं सामाजिक न्यायकारी वक्ता थे। इन्होंने सबदवाणी सम्पादन का महत्वपूर्ण कार्य किया था। वर्तमान में प्रचलित सबदवाणी शुद्ध रूप इनकी ही देन है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

कपिल सरोवर नाम, कलियुग तीरथ थापियो । देश फलोदी मांय, भाग परापति पावियो । भाग परावति पावियो नै, कृपा करी जगदीश । आदू तीर्थ प्रगट कियो, सही विसवा वीस । कपिल मुनि तपै यहां नै, तपै ऋषेश्वर जोग । जम्भसरोवर नाम अब, परगट कह सब लोग । कलियुग तीरथ थापियो ।१।

दवापर जुग के मांय, बहु जिग कर हरि पूजियो । पांडू परमारथ रूप, वेद व्यास जी नै पूछियो । वेद व्यास जी नै पूछियो नै, थे कृपा करो भगवान । दिव्य दृष्टि है आपकी, म्हां सूं कहो बखाण । ऐसो तीर्थ जगत में, जहां अनंत गुणो फल होय । जिहिं तीर्थ म्हे जिग करां, म्हारी मनसा पूर्ण होय । वेद व्यासजी नै पूछियो ।२।

कलियुग मंझ के मांय, पाप पूरे जग छावसी । तीर्था रो घटे प्रभाव, दसो दिस दोष दरसावसी । दसो दिस दोष दरसावसी नै, धरम हीण संसार । श्रुति पुराण भागवत को, मानें नहीं लिंगार । धर्म अंग राजा हुवै, पूछे श्रुति विचार । गोप तीर्थ प्रगट कियो, महिमा बधे अपार । घर घर मंगल छावसी ।३।

कपिल सरोवर नाम, कृत जुग में कह भाखियो । तीर्थ अधिक अनूप, वेद व्यास जी नै यूं आखियो । वेद व्यासजी नै यूं आखियो नै, पांडू चल्या परदेश । यज्ञ करण के कारणै, आया बागड़ देश । विविध भांति सूं यज्ञ कियो, उतम तीर्थ जांण । हेत करि हरि पूजियो, पांडू परम सुजाण । जम्भेश्वर यूं आखियो ।४।

तीर्थ जाम्भोलाव, हेत कर जहां जावियो । हरष करे कर कोड, जांण र गंगा न्हाविये । जांण गंगा न्हाण कीजै, माटी सूं चित लाय । निसार माटी करो पूजा, निंवत संत जिमाय । विष्णु मन्दिर होम कीजै, परिक्रमा करि प्रीत । साखी हरजस सबद गावै, कर कर उत्सव रीत । श्री जाम्भेश्वर गुण गाविये ।५।

तीरथ बड़ो तालाब, जहां जाय सूत फिराविये । भाव भगति मन सार, सहंस गुणों फल पाविये । सहंस गुणों फल पाविये नै, जो सेवे मन कांम । सायुज्य मुक्ति मिले, पावै मन विश्राम । अड़सठ तीर्थ उपरा, जम्भ सरोवर धाम । श्री जाम्भोजी की कृपा से, वरणत गोविन्द राम । जहां जाय सूत फिराविये ।६।

जाम्भोलाव की महिमा बताने वाली यह साखी है। इस तीर्थ को कपिल सरोवर के नाम से बतलाया है। यह मान्य है कि कपिल मुनि ने यहां तपस्या की थी। द्वापर युग में पाण्डवों ने वेदव्यास जी से वनवास काल में पवित्र भूमि के बारे में पूछा था वेद व्यासजी ने अपनी दिव्य दृष्टि से यही जाम्भोलाव तालाब बताया था। पाण्डवों ने वनवास काल अधिकतर यहीं व्यतीत किया था। उस समय यज्ञ उपासना करते हुए अपने पूर्व पापों को धो डाला था। कलयुग में जाम्भोजी ने भी इसी जगह को सर्वश्रेष्ठ स्थान चुना था और अपने सेवकों को बतलाया था यहां पर तालाब से मिट्टी निकालना, विष्णु मन्दिर में हवन करना, शब्दों का उच्चारण करना, तालाब के चारों तरफ कपड़ा फेरना, जिसे सूत फिराना कहा गया है और साधु संतों को निमन्त्रण देकर भोजन करवाना आदि पुण्य दायक माना गया है। यहां वर्ष में दो मेले लगते है। अड़सठ तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है वही यहां पर स्नान ध्यान यज्ञ द्वारा प्राप्त होता है। यही इस साखी का भाव है। अर्थ साखी में ही स्पष्ट है।