कवि परिचय — गोविन्दरामजी
"गोविन्दरामजी" का संवत् 1860-1950 के मध्य में जीवन समय था। साहबराम जी ने जम्भसार में गोविन्दरामजी की स्तुति करते हुए कहा है- गोविन्द तो गोविन्द सम जानो। गोविन्दरामजी ने अनेक फुटकर छन्दों की रचना की थी। इन्होनें वील्होजी की महिमा में कुछ छन्द बनाये थे। तथा इनके द्वारा रचित दो साखियां उपलब्ध है। ये जाम्भा के महंत थे। विख्यात ज्ञानी एवं सामाजिक न्यायकारी वक्ता थे। इन्होंने सबदवाणी सम्पादन का महत्वपूर्ण कार्य किया था। वर्तमान में प्रचलित सबदवाणी शुद्ध रूप इनकी ही देन है।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
अवगत अलख अपार, पार पावै नहीं कोई ।
आद अन्त अरू मध्य, वेद कथ हारे सोई ।
सचिदानन्द स्वरूप, ध्यान जोगेश्वर ध्यावै ।
रात दिवस लव लीन, अन्तर का मेल गमावै ।
दासा पण सूं हरि भजै, भगति भाव सूं मन धरै ।
भवसागर दुख मेट के, अमर पद वासो करै ।