कवि परिचय — गोविन्दरामजी
"गोविन्दरामजी" का संवत् 1860-1950 के मध्य में जीवन समय था। साहबराम जी ने जम्भसार में गोविन्दरामजी की स्तुति करते हुए कहा है- गोविन्द तो गोविन्द सम जानो। गोविन्दरामजी ने अनेक फुटकर छन्दों की रचना की थी। इन्होनें वील्होजी की महिमा में कुछ छन्द बनाये थे। तथा इनके द्वारा रचित दो साखियां उपलब्ध है। ये जाम्भा के महंत थे। विख्यात ज्ञानी एवं सामाजिक न्यायकारी वक्ता थे। इन्होंने सबदवाणी सम्पादन का महत्वपूर्ण कार्य किया था। वर्तमान में प्रचलित सबदवाणी शुद्ध रूप इनकी ही देन है।
मेधा नाम वैकुण्ठ, अखण्ड जोत जहां राजिये । झिगमिग जोत प्रकाश, वांरो पार न पाविये । वांरो पार न पाविये नै, झिगमिग जोत प्रकाश । सूरज जहां ज्यूं है नहीं, उषण ताषण नहीं होय । पावक तहां दरसै नहीं, सीत नहीं है कोय । अखण्ड जोत जहां राजिये ।१।
वह परमेश्वर अवगत अपार आदि अन्त रहित सच्चिदानन्द स्वरूप है उसका पार नहीं पाया जा सकता रात दिन योगी लोग उन्हीं का ध्यान करते है, अन्तर के मेल को दूर करते है तथा दास भाव से हरि की भक्ति करते है भवसागर को पार करके अमर पद प्राप्त हो जाते है। वैकुण्ठ लोक हरि का परम धाम है। जिनका नाम मेधा भी है। ज्ञान एवं दिव्य प्रकाशमय वह लोक है जिसे मेधा कहना उचित ही है। वहां पर परमात्मा की अखण्ड ज्योति जलती रहती है। वह ज्योति सदैव झिगमिग करती हुई सभी को प्रकाशमान करती है उसका पार नहीं पाया जा सकता वहां पर सूर्य नहीं है फिर भी करोड़ों सूर्य जैसे प्रकाश सदैव उसी ज्योति से बना रहता है वहां पर चन्द्रमा भी नहीं है। सर्दी गर्मी भी नहीं है। अग्नि के अभाव में वहां ठण्ड भी नहीं है। केवल अखण्ड ज्योति का ही वहां पर प्रकाश है ।१।
सतचित आनन्द रूप, एको हूं बहुता हुवै । कियो शब्द प्रकाश, प्रकृति भई तिहिं जोत सूं । प्रकृति भई तिहिं जोत सूं, त्रिगुणी वृति धार । सतोगुण रजोगुण तमोगुण, कीयो बहुत विस्तार । तीन वेद तहां मां भया, ब्रह्मा विष्णु महेश । यां सूं सारो जगत भयो, काट्यो कोट कलेश । एको हूं बहुता भया ।२।
वह परमात्मा सतचित आनन्द स्वरूप है। सृष्टि के प्रलय की समाप्ति पर उस परमदेव ने इच्छा उत्पन्न की कि एक से मैं अनेक बनूं। इसी इच्छा के फलस्वरूप सर्व प्रथम शब्द की उत्पति हुई उसी शब्द की ज्योति द्वारा प्रकृति अपने स्वरूप को पुनः प्राप्त हुई उसी प्रकृति में तीन गुण आये जो सत्व रज तथा तम के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्हीं प्रकृति ने अपने तीन गुणों द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार किया सर्वप्रथम तीन देवता ब्रह्मा विष्णु तथा महेश प्रगट हुए। इन्हीं तीनों से सम्पूर्ण जगत हुआ है। करोड़ों क्लेशों को उस देव ने काट दिया और सृष्टि की रचना कर डाली एक से बहुत इस प्रकार से हुए है ।२।
जिण रच्यो ब्रह्माण्ड, तीन लोक चवदा भवन । मनु मरीच्यादि होय, देव दाणु प्रगट करन । देव दाणु प्रगट किया नै, चौरासी लख जीव । और जूण भिन्न भिन्न करी, सब को सतगुरु सीव । जड़ चेतन रचना रची, कियो ओदर में वास । ज्ञान विना नहीं ध्यान है, सचिदानन्द को भास । सतगुरु विना नहीं पाविये ।३।
जिस देव ने ब्रह्माण्ड की रचना की है, उस ब्रह्माण्ड में तीन लोक चवदा भवन विद्यमान है। उन देव ने मनु मरीचि आदि ऋषि भी उत्पन्न किये। देव दानव मानव की उत्पति भी उसी ने ही की है। चौरासी लाख जीव योनियां भिन्न-भिन्न करके उत्पन्न की है। उसी देव ने जड़ चेतन सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है तथा स्वयं ही सष्टि के रूप में आकर गर्भ में वास लिया है। ज्ञान के बिना ध्यान नहीं होता तथा ध्यान के बिना सच्चिदानन्द की प्राप्ति नहीं होती वह ज्ञान सतगुरु के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता ।३।
सिंवरो श्याम स्वरूप, आण देव नहीं ध्यावियो । विष्णु ओही जाप, मोख परम पद पावियो । मोख परम पद पावियो नै, जो सिंवरे हरि नाम । मन इच्छा सारी हुवै, फलै जो मनोरथ काम । एकाग्रह मन को करो, दुबध्या दूर हटाय । सिंवरो सांच श्याम नै, जलम मरण मिट जाय । आण देव नहीं ध्याविये ।४।
श्याम स्वरूप विष्णु का स्मरण करो अन्य देवता की उपासना त्याज्य है। विष्णु का जप ही मोक्ष गति देने वाला है। विष्णु का जप करने से मनों वांच्छित फल की प्राप्ति होती है। मन को एकाग्र करके किया हुआ जप सम्पूर्ण द्विधा द्वैत भावना को मिटा देगा। सत्य श्याम का स्मरण करो इससे तुम्हारा जन्म मरण मिट जायेगा ।४।
चरण शरण हरि नाम, भवसागर कूं लांघिये । भक्तां भंजण भीड़, जुग जुग मां जस गाविये । जुग जुग मां जस गाविये नै, संता सदा सहाय । दुकरती मार दुख मेट के, दीनो धर्म बधाय । भगत बछल महाराज कूं, भजिये आठो याम । भगति किया भव उधरै, चरण शरण हरि नाम । भवसागर कूं लांघिये ।५।
हरि का नाम तथा हरि की शरण ही भवसागर से पार उतारने में समर्थ है। भक्तों के दुखों का भंजन करने वाले हरि का नाम युगों-युगों तक गाया जाता है। हरि ने ही दुष्कृति पाप मेटकर धर्म को बढ़ावा दिया है। भक्त वत्सल भगवान को आठों प्रहर याद रखिये। जिनकी भक्ति करने से संसार सागर से पार उतर जाओगे ।५।
विष्णु परम दयाल, सोई जाम्भेश्वर अवतर्यो । भगति सुधारण काज, कलू में पंथ प्रगट कियो । कलू में पंथ परगट कियो नै, पापी किया पहमाल । पापी बहुत परचाविया, सोध्या जीव निहाल । सुध जीव सोध्या सही, दीन्हो कवल निभाय । गोविन्दराम कह जम्भ कूं, सिंवरो हित चितलाय । भरम मत भूलो भाइयो ।६।
विष्णु परम दयालु है वही गुरु जम्भेश्वरजी के रूप में अवतरित हुए है। भक्तों का कर्म सुधारने के लिये कलयुग में पन्थ प्रगट किया है। पापियों को पराजित करके कलयुग में बिश्नोई पन्थ प्रगट किया है अनेक पापियों को सन्मार्ग पर लाये प्रहलाद पंथी जीवों को खोज करके उन्हें निहाल कर दिया। शुद्ध जीवों को खोजकर के प्रहलाद के वचनों को पूर्ण किया है। गोविन्दराम जी कहते है कि ऐसे पूर्ण देव जाम्भेश्वर को चित लगाकर प्रेम से स्मरण मनन करें। भ्रम से भूल कर हे भाइयों भटको मत ।६।