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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह142 / 156

साखी प्रहलाद की-141

परम भगत पहलाद, हिरणाकुश दुख ही दियो

कवि: साहबराम जी

कवि परिचय — साहबराम जी

"साहबराम जी" का जन्म वि. सं. 1871-1948 है इनकी निम्नलिखित रचना प्राप्त हुई है-सार शब्द गुंजार, और जम्भसार तथा दो साखियां जो प्रहलाद भक्त से सम्बन्धित है, एक प्रसिद्ध आरती भी साहबराम जी द्वारा रचित है। जम्भसार साहबरामजी की महत्वपूर्ण रचना तथा संग्रह है। यह दो भागों में बिश्नोई मन्दिर ऋषिकेश से पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है तथा सार शब्द गुंजार उनकी अपनी अनुभव की रचना है वह भी जम्भसार के साथ ही प्रकाशित हो गई है।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

परम भगत पहलाद, हिरणाकुश दुख ही दियो । घोल हलाहल जहर, उण पायो इण पी लीयो । उण पायो इण पी लियो नै, महा विसनु को नाम । मुलताने मेलो मंड्यो नै, देखे सारो गांम । दैतां कुल इचरज भयो, मार्यो मरे न बाल । हिरणांकुश हिरदै डरै, आय गयो मुझ काल । पुत्र नहीं कोई देव है ।१।

फौजा लई बुलाय, मार मार मुख ओचरे । तोपा दई झुकाय, ओला ज्यूं गोला पड़ै । ओला ज्यूं गोला पड़ै नै, तीर तुपक तलवार । परसी परघा मरगला, मुगदर करे ज बहुती मार । छुरी कटारी गुपती चालै, लागै नहीं लिंगार । हरि भक्तां रे संग रमै, जाणै नहीं गिंवार । जाकै साची टेव है ।२।

मरे नहीं पहलाद, हिरणाकुश हिरदै डरै । गई भूख अरू पियास, रात दिन सांसो करै । रात दिन सांसो करै नै, कोट चिण्यो कर रीस । करोड़ साध किया केद में, तीना उपर तीस । सो जोजन ऊंचो चिण्यो, अन जन कबहूं न दीस । रवि दवादस गढ़ कांगरा, तपै जो विसवा वीस । जाणै नहीं तहां भेव है ।३।

हरि रा आडा हाथ, बादल नित बरषा करै । छपन भोग तियार, रिधि सिधि साथे फिरै । रिधि सिधि साथे फिरै नै, मेवा लिया मिष्ठान । अन्न इच्छा लेवै नहीं पण, देवै करे गुण ज्ञान । कुलफ खोय देखे दुष्ट, जब बीता बारा मास । संता रे सुख अनन्त है, देख अरू भयो उदास । सिधि करे सब सेव है ।४।

खड़ग लिया उण हाथ, पांच करोड़ परलय किया । पकड़ लियो पहलाद, संत सकल मन में डर्या । संत सकल मन में डर्या नै, भागा आठ अरू बीस । कंठ पकड़यो पहलाद को, कहां तेरो जगदीश । मो तो खड़ग खंभ के मांहि, तब निकल्यो भभकार । पकड़ पिछाड़ियो चौक में, जाणैं सब संसार । साहब सतगुरु सेव है ।५।