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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह143 / 156

साखी-142

नरसिंह नर मुलतान, सतयुग में साको कियो

कवि: साहबराम जी

कवि परिचय — साहबराम जी

"साहबराम जी" का जन्म वि. सं. 1871-1948 है इनकी निम्नलिखित रचना प्राप्त हुई है-सार शब्द गुंजार, और जम्भसार तथा दो साखियां जो प्रहलाद भक्त से सम्बन्धित है, एक प्रसिद्ध आरती भी साहबराम जी द्वारा रचित है। जम्भसार साहबरामजी की महत्वपूर्ण रचना तथा संग्रह है। यह दो भागों में बिश्नोई मन्दिर ऋषिकेश से पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है तथा सार शब्द गुंजार उनकी अपनी अनुभव की रचना है वह भी जम्भसार के साथ ही प्रकाशित हो गई है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

नरसिंह नर मुलतान, सतयुग में साको कियो । मार्यो दैत दीवान, पहलाद भक्त गोदी लियो । पहलाद भक्त गोदी लियो नै, सिरपर दोनूं हाथ । शिव ब्रह्मा आया सही नै, सुर तेतीसूं साथ । लिछमी हूं लारै लुकै तूं, मांग वचन पहलाद । बाड़ै हुता बीछड़्या, आण मिलावो साध । कर जोड़या ऐसे कही ।१।

कह हरि महाराज, दूर पड़ै टोली टलै । सांसो मत कर साध, चहुं फेरा चोकस मिले । चहुं फेरा चोकस मिलै नै, चार जांमै जुग चार । हरिचंद पाण्डू अंस तव, नन्द लोहट अवतार । पांच सात नव करोड़ बारां, बहुरी मिलेंगे आंण । नहतंती नर लोक में, आवै जम्भ सजाण । दुख मेटण मोटो दई ।२।

तारयो जिण पहलाद, हिरणाकुश मार्यो हरि । असुरां लागी आंच, देख दुनी सारी डरी । देख दुनी सारी डरी नै, गहया धर्म उणतीस । अग्नि की पूजा करो, आय निवावो सीस । असुर बुध अलगी भई, करे सोच सिनान । पाहल ले प्रसण भया, अरू मांनै गुरु की आंण । दिल की दुबध्या सब गई ।३।

जब का बिछुड़या जीव, बिन खोजी पावै नहीं । गया समंदरा तीर, विन लाया आवै नहीं । विन लाया आवै नहीं नै, कलयुग बहै करूर । भक्ति हमारी कूण करै, यूं जाण्यो विष्णु जरूर । महा विष्णु को तप कियो, निरह निरंजण देश । पहलाद कवल के कारणै, आये जम्भ नरेश । घट घट व्यापक जम्भ वही ।४।

लोहट है नन्दराय, जसोदा हांसा भई । मरूस्थल है वृज भोम, पींपासर वृज है सही । पींपासर वृज है सही नै, वचन के प्रति पाल । कृष्ण कवल के कारणै, गुरु जम्भ लियो अवतार । सतलोक को छोड़ के, गुरु किया भगवां भेस । जेठ बदि नौमी दिन, गुरु कियो नन्द उपदेश । साहब सतगुरु है सही ।५।

इन दोनों साखियों में कवि ने सम्पूर्ण प्रहलाद कथा का संक्षेप में वर्णन किया है। कथा का प्रारम्भ प्रहलाद को हिरण्यकशिपू द्वारा विष देकर मारने के प्रयत्न से हुआ है। भगवान नृसिंह खंभे से प्रगट होकर हिरण्यकशिपू को मार देते है। प्रहलाद को उनके तेतीस करोड़ अनुयायियों का उद्धार करने का वचन देते है। पांच करोड़ तो प्रहलाद के साथ पार उतर गये और सात करोड़ हरिश्चन्द्र के साथ त्रेतायुग में तथा नौ करोड़ का उद्धार द्वापर युग में युधिष्ठिर के साथ होने का वचन दिया था। बारह करोड़ का उद्धार कलयुग में जाम्भेश्वर जी के रूप में आकर नृसिंह भगवान ने किया। यही जाम्भेश्वरजी के अवतार का मुख्य कारण बताया है। दूसरा कारण कृष्ण ने भी अपने माता-पिता को वचन दिया था कि कलयुग में मैं फिर से आऊंगा और तुम्हें बाल लीला दिखाकर के आनन्दित करूंगा, यह भी एक खास कारण था। इसलिये कहा भी है कि वही पींपासर ही वृजभूमि है और लोहट ही नन्दजी है तथा माता हांसा ही उस समय की यशोदा है। कृष्ण ही जाम्भोजी के रूप में आये है। ऐसी मान्यता इस साखी द्वारा प्रगट होती है। बिश्नोई पन्थ की स्थापना की मूल धारणा प्रहलाद पंथ से ही की जाती है। इसलिये इन दोनों साखियों का समाज में महत्व है। ये दोनों साखियां प्रायः होली के अवसर पर या अन्य अवसरों पर भी प्रेम से गायी जाती है। सरलार्थ होनें से यहां पर विस्तार नहीं किया गया है। विशेष कथा प्रहलाद चरित्र में अवश्य ही पढ़ें।