कवि परिचय — वील्होजी
वील्होजी का जन्म विक्रम संवत् 1589 में हुआ था। निर्वाण संवत् 1673 निश्चित रूप से ज्ञात है। वील्होजी के सम्बन्ध में सुरजन जी, केशोजी,परमानन्द जी, गोविन्दराम जी, तथा साहबराम जी आदि सभी ने लिखा है। संवत् 1601 में मुकाम मन्दिर में शब्दवाणी का सस्वर पाठ श्रवण करके वील्होजी छोटी आयु में आकर्षित हुए थे और नाथोजी के शिष्य बन गये थे। नाथोजी ने जाम्भोजी द्वारा दी हुई वस्तुऐं वील्होजी को सप्रेम भेंट दी थी। और पंथ का स्वामी यही होंगे यह पहचान कर ली थी। नाथोजी तथा उदोजी तापस से ज्ञान श्रवण किया और शब्दवाणी तथा साखियां नियम धर्म कण्ठस्थ करके पूर्णतया तैयार हो गये तब संवत् 1611 में विधिवत् साधु दीक्षा प्रदान की थी। साधु परंपरा वंशावली से ऐसा ही ज्ञात हुआ है। साधु दीक्षा लेकर समाज में भ्रमण प्रारम्भ किया। अनेक स्थानों में सत्संग करते थे। लोगों को समझाते थे, साखी शब्द गायन में बड़े ही निपुण थे। स्वयं भी साखियों की रचना करते थे। वील्होजी ने अनेक आख्यान कथाओं की भी रचना की है। तथा अनेकानेक हरजसों की रचना करके गा करके सुनाते थे और अपने शिष्यों को भी प्रेरित किया करते थे। साहित्य लेखन का कार्य वील्होजी ने ही प्रारम्भ किया था। अपने शिष्य सुरजन जी एवं केशोजी को नये साहित्य की रचना करने की प्रेरणा देते थे। वील्होजी मण्डली सहित धर्म प्रचारार्थ भ्रमण किया करते थे परन्तु लोग उनकी बातों पर ध्यान कम ही देते थे। तब वील्होजी जोधपुर के राजा सूरसिंह के राज दरबार में पहुंचे और राजा के कहने पर जेष्ठ के महीने में मरूभूमि में बाजरी का सिट्टा, काकड़ी एवं मतीरा अपनी सिद्धि के बल पर दिया था। जिससे प्रभावित होकर राजा ने वील्होजी की प्रार्थना पर सिपाही, खूंटा, कोरड़ा यानि दण्ड देने का अधिकार दिया था। वील्होजी गांव-गांव में पहुंचे और लोगों को साम, दाम, दण्ड भेद से समझाया और पंथ की टूटी हुई मर्यादा को पुनः जोड़ा। वील्होजी ने ही मुकाम का आसोजी मेला तथा चेत्र अमावस्या का जाम्भा मेला प्रारम्भ करवाया था। जब समाज में प्रथम बार आकर समिलित हुए थे तब उनके चक्षु खुल गये थे ये चर्म चक्षु तथा ज्ञान चक्षु भी यह उनके जीवन का प्रथम चमत्कार था। तभी वील्होजी ने अपने उद्धार की प्रार्थना इस साखी द्वारा बड़े ही कारूणिक रूप से की है यह प्रथम उनकी साखी नीचे दी जा रही है-
करमणी चलणों इण संसार, संभल कर कर चालिये । जीवड़ा नै जोखो होय, सोई ओ डर पालिये । पालिये सो डर चेत अवसर, राख मन अमरापुरी । करो सारी गुरु फुरमाई, चेतकर करणी खरी । मान आण पिछाण सतगुरु, पाप से मन पालिये । चेतणां संसार करमणी, संभल कर कर चालिये ।१।
जोधपुर जिले के अन्तर्गत रैवासड़ी बिश्नोइयों का गांव है। उसी ग्राम की रहने वाली करमां अरू गौरा के बलिदान की कथा इस साखी में वील्होजी ने वर्णित की है। एक दिन गौरा करमां के घर अकस्मात् पहुंची और करमां से कहने लगी हे करमां ! इस संसार में रहकर अपने को जीवन यापन करना है परन्तु बहुत ही संभलकर चलना होगा। जीव को प्रति क्षण खतरा बना ही रहता है इसलिये सावधानी पूर्वक ही चलना है। सदा दुर्गुणों बुराइयों से डरते हुए मन की इच्छा अमरापुर की तरफ होनी चाहिये। जैसा गुरु ने कहा है वैसा ही करें और सचेत होकर कर्त्तव्य कर्म करें। अभिमान को छोड़कर सतगुरु की पहचान करें। तथा पाप कर्मों से मन को हटा दें। इस संसार में सचेत होना है और संभलकर चलना है ।१।
करमणी जपै विसन को नाम, जगत गुरु मन में रहै । भक्ति तणां न मेले आण, हीणों वैण न कहै । वैण हीणों न कहै करमा, रही सिर कंध मांडियो । सांभरण संग्राम हुवो, मरण को बीड़ो लियो । मैल मायाजाल चाली, राख तागो पंथ को । सुरग सामै पांव परठे, जपै नांव विसन को ।२।
हे करमणी ! विष्णु के नाम का स्मरण करो। जगत गुरु को मन में ही रखें अर्थात् उनका ही ध्यान करें। भक्ति का अहंकार न करें। तथा कटु असत्य वचन न बोलें। चुभती बात किसी से नहीं कहें। वहां जमात के लोग वृक्षों की रक्षा करने के लिये अपना सिर देने के लिये तैयार थे। दोनों ओर से भयंकर संग्राम होना निश्चित था। मरने मारने के लिये बीड़ा उठा लिया था। मैं तो मोह माया को छोड़कर चली आयी हूं। पंथ की रक्षा करना मेरा परम कर्तव्य है। मेरा तो स्वर्ग की तरफ पांव उठ चुका है और विष्णु का जप करते हुए यहां तक आ चुकी हूं ।२।
करमणी चलती सिंवरियो, श्याम शरीर सत घणों । करमणी गौरा लिवी बुलाय, ओ अवसर छै आपणों । आपणों अवसर राम गौरा, लिखी कलम सो नहि मिटे । जाय चौहटे शीश मांड्यो, लिखी स्याही ना मिटे । बाहि तेग समांहि आसु, है है कारो बरतियो । धन्य तेरो ध्यान कर्मा, सीझती साको कियो ।३।
हे करमां ! मैनें घर से बाहर निकलते ही घनश्याम विष्णु का स्मरण किया था जिससे मेरे शरीर में शक्ति का संचार हुआ है। इस प्रकार से गौरा ने करमां को अपने पास बुला लिया और कहने लगी इस समय अपना अवसर आ चुका है। यह अपना सौभाग्य है तथा जो कुछ भाग्य में स्याही से लिखा गया है वह कभी मिटने वाला नहीं है। इस प्रकार से करमां और गौरा ने आकर दोनों दलों के बीच में अपना सिर झुका दिया। उधर वृक्ष काटने वालों ने राक्षसी वृति के कारण तलवार चलाई और कहा अब इसे संभालो। उसी समय ही चारों ओर हा हाकार होनें लगा। कवि कहते है कि धन्य है गौरा और करमां जिन्होनें प्रत्यक्ष देखते ही देखते अपने प्राणों की बलि दे दी परन्तु वृक्ष नहीं कटने दिये ।३।
गुरु फरमाई खांडा धार, अवसर आपो सारियो । आपण जीवड़ो कबूल कर, पर जीव यूं उबारियो । उबारियो जीव अरू जीवा काजै, असुरां खोटो हियो । रूखां उपर मरण धार्यो, कीजै ज्यूं करणी कियो । करणी पाल उजाल सतपंथ, प्रेम तत्व उपाइयो । जीव काजै प्राण दीन्हे, कीयो गुरु फुरमाइयो ।४।
गुरु ने जो मार्ग बताया था वह तो खांडे की धार जैसा तीखा है। अवसर आनें पर इन बहनों ने चलकर दिखाया। अपने आप को बलिदान देना स्वीकार किया परन्तु जीवों की रक्षा करने में वीरता दिखलाई इस प्रकार से परोपकार के लिये अपना शरीर समर्पण कर दिया किन्तु असुरों का हृदय तो कलुषित था, वे क्या जानें परोपकार के महत्त्व को। उन्होनें वृक्षों की रक्षा के लिये मरना सहर्ष स्वीकार किया। जैसा मानव का कर्त्तव्य होता है वैसा ही किया। कर्त्तव्य कर्मों की रक्षा करते हुए पंथ का नाम जगत में उज्जवल किया और प्रेम तत्व का पसारा किया। जीवों की भलाई के लिये प्राण दे दिये। जैसा गुरु ने कहा था वेसा ही करके दिखाया ।४।
करमां खड़ी छै खेजड़ियां काज, रैवासड़ी के चौहठे । सम्मत सौला सौ संसार, समय मंझ अरू इकसठे । इकसठे मंझ और जेठ मासे, किसन पख अरू थावर दिनें । बीज के दिन कियो पयाणों, सरियो सूधों मनें । निरवाही नाम न सीख, मोटी पांव दे बेड़े चड़ी । गुरु परसादे वील्ह बोलै, करमां अरू गौरा खड़ी ।५।
करमां और गौरां ने आत्म बलिदान दिया वह भी खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिये तथा रैवासड़ी गांव के चौराहे पर सभी के सामने। यह घटना संवत् १६६१ के जेष्ठ महीने कृष्ण पक्ष शनिवार को घटित हुई थी। उस दिन द्वितिया तिथि थी। उसी दिन गौरा करमां ने इस पंच भौतिक शरीर का परित्याग किया तथा स्वेच्छा से ही किया। परमात्मा के बताये हुए मार्ग का पूर्णतया निर्वाह किया और संसार में अपनी महानता का परिचय देकर स्वर्ग से आये हुए विमान पर बैठकर चली गई। गुरु जाम्भोजी की कृपा से वील्होजी कह रहे है कि इस प्रकार से करमां और गौरा का बलिदान हुआ ।५।