साखी दोहा-77
विज्ञानी आतम थके, आलोच्यो मन मांय । जां जां जुग में जीवणों, ते दिन दुख में जाय
कवि: वील्होजी
कवि परिचय — वील्होजी
वील्होजी का जन्म विक्रम संवत् 1589 में हुआ था। निर्वाण संवत् 1673 निश्चित रूप से ज्ञात है। वील्होजी के सम्बन्ध में सुरजन जी, केशोजी,परमानन्द जी, गोविन्दराम जी, तथा साहबराम जी आदि सभी ने लिखा है। संवत् 1601 में मुकाम मन्दिर में शब्दवाणी का सस्वर पाठ श्रवण करके वील्होजी छोटी आयु में आकर्षित हुए थे और नाथोजी के शिष्य बन गये थे। नाथोजी ने जाम्भोजी द्वारा दी हुई वस्तुऐं वील्होजी को सप्रेम भेंट दी थी। और पंथ का स्वामी यही होंगे यह पहचान कर ली थी। नाथोजी तथा उदोजी तापस से ज्ञान श्रवण किया और शब्दवाणी तथा साखियां नियम धर्म कण्ठस्थ करके पूर्णतया तैयार हो गये तब संवत् 1611 में विधिवत् साधु दीक्षा प्रदान की थी। साधु परंपरा वंशावली से ऐसा ही ज्ञात हुआ है। साधु दीक्षा लेकर समाज में भ्रमण प्रारम्भ किया। अनेक स्थानों में सत्संग करते थे। लोगों को समझाते थे, साखी शब्द गायन में बड़े ही निपुण थे। स्वयं भी साखियों की रचना करते थे। वील्होजी ने अनेक आख्यान कथाओं की भी रचना की है। तथा अनेकानेक हरजसों की रचना करके गा करके सुनाते थे और अपने शिष्यों को भी प्रेरित किया करते थे। साहित्य लेखन का कार्य वील्होजी ने ही प्रारम्भ किया था। अपने शिष्य सुरजन जी एवं केशोजी को नये साहित्य की रचना करने की प्रेरणा देते थे। वील्होजी मण्डली सहित धर्म प्रचारार्थ भ्रमण किया करते थे परन्तु लोग उनकी बातों पर ध्यान कम ही देते थे। तब वील्होजी जोधपुर के राजा सूरसिंह के राज दरबार में पहुंचे और राजा के कहने पर जेष्ठ के महीने में मरूभूमि में बाजरी का सिट्टा, काकड़ी एवं मतीरा अपनी सिद्धि के बल पर दिया था। जिससे प्रभावित होकर राजा ने वील्होजी की प्रार्थना पर सिपाही, खूंटा, कोरड़ा यानि दण्ड देने का अधिकार दिया था। वील्होजी गांव-गांव में पहुंचे और लोगों को साम, दाम, दण्ड भेद से समझाया और पंथ की टूटी हुई मर्यादा को पुनः जोड़ा। वील्होजी ने ही मुकाम का आसोजी मेला तथा चेत्र अमावस्या का जाम्भा मेला प्रारम्भ करवाया था। जब समाज में प्रथम बार आकर समिलित हुए थे तब उनके चक्षु खुल गये थे ये चर्म चक्षु तथा ज्ञान चक्षु भी यह उनके जीवन का प्रथम चमत्कार था। तभी वील्होजी ने अपने उद्धार की प्रार्थना इस साखी द्वारा बड़े ही कारूणिक रूप से की है यह प्रथम उनकी साखी नीचे दी जा रही है-
विज्ञानी आतम थके, आलोच्यो मन मांय । जां जां जुग में जीवणों, ते दिन दुख में जाय ।१।
यह साखी तिलवासणी में बिश्नोई बन्धुओं द्वारा दिये गये आत्म बलिदान को उजागर करती है वे लोग वृक्षों की रक्षार्थ बलिदान हुए थे। उसी घटना का विस्तार साखी द्वारा किया गया है। आत्म ज्ञानी महापुरूषों नें मिलकर विचार किया कि जब तक जगत में जीवन रहेगा तब तक दुख में ही समय व्यतीत हो जायेगा ।१।
सिरे मतो खोखरी कियो, झड़े न जोई काय । पंथ सतगुरु को लाजवै, जे कोई इणि परि थाय ।२।
सर्वप्रथम खोखर भक्त तैयार हुआ और भरी सभा में कहने लगा-यदि इस बार कोई आगे बढ़कर अपने प्राणों की बलि देकर वृक्षों की रक्षा करेगा तो सतगुरु का पंथ लज्जित नहीं होगा अन्यथा गुरु की मर्यादा टूट जायेगी ।२।
खिवणी धनि-धनि तोहि नं, नेतू नैण सधीर । राह कारण रूखां ऊपरै, वां सूपिया शरीर ।३।
धन्य खिवणी तथा नेतू नैण को जिन्होनें धैर्य धारण करके रूखों की रक्षा करने के लिये अपने प्राण सौंप दिये ।३।
वन संघार्यो भाटियां, कुबधी कागा जोय। जिण ऊपर मोटो खड्यो, सुरगे पहुंतो सोय ।४।
कुबधी कुचाली कौवों जैसे भाटियों ने वन का संहार किया। उनसे वन को बचाने के लिये मोटे ने अपने प्राणों का बलिदान दिया और स्वर्ग में पहुंच गया ।४।
खोखर नै मोटो कहै, नहचै राखो चित । तज काया जित जाइये, जहां सुख बना है नित ।५।
खोखर से मोटे ने कहा कि मन चित को निश्चल एकाग्र करो। शरीर को छोड़कर आप जहां जाओगे वहीं नित्य सुख की प्राप्ति होगी ।५।
पहले नांव श्री विसन को, सिंवरूं सिरजण हार । जिण ओ पंथ चलावियो, खरतर खंडा धार ।६।
अब आगे इस घटना का सविस्तार से वर्णन करते हुए कवि प्रथम तो श्री विष्णु का स्मरण करते है। विष्णु ही सर्व सृष्टि का सृजनहार है। उन्हीं विष्णु ने ही जाम्भोजी के रूप में आकर बिश्नोई पंथ की स्थापना की है। यह पंथ खांडे की धार सदृश तीखा तेज है ।६।
बिश्नोई बसे तिलवासणी, सतलोक सुर जांण । राह चलावै सतगुरु तणों, मानें गुरु की कांण ।७।
बिश्नोई लोग तिलवासणी गांव में बसते है। ऐसा गांव है मानों सतलोक में देव निवास हो रहा है। वे लोग सतगुरु के बताये हुए मार्ग पर चलते है और गुरु की कांण मर्यादा का पालन जी जान से करते है ।७।
जपै नांव विसन को, खरतर क्रिया सूर । राखे रूख सूंभाव सूं, नगरी इधको नूर ।८।
विष्णु का नाम जप करते है और खरी क्रियाऐं पालन करने में सूरवीर है। वे लोग बड़े ही प्रेम से रूखों की रक्षा करते है। सभी ग्राम के लोगों में आपस में प्रेम भाव है। वैसा भी रूखों के प्रति भी है ।८।
खेजड़लै किरपो बसै, भाटी गोपालदास । संक न मानै किरपो देवरी, बन रो करे विणास ।९।
उधर खेजड़लै ग्राम में किरपो रहता था। गांव तिलवासणी और खेजड़ला भाटी गोपालदास के अधिकार में था। गोपालदास का अनुचर किरपो तिलवासणी जाकर वृक्ष काटने लगा। किरपे ने किसी भी नियम धर्म मर्यादा देव की शंका नहीं मानी और वन को काटना प्रारम्भ का दिया ।९।
बाढ़े रूख सुहावणां, किरपो करै सिंघार । आई खबर जमात में, सुरपुर हुई जे सार ।१०।
सुहावने रूंखों को किरपो काटने लगा। ऐसा रूख काटने की खबर बिश्नोई जमात में पहुंची तो मानों देव लोक में पहुंचने का संदेशा आया हो ।१०।
जमाती आलोचिया, मरणों इण पर थाय । इणि अवसर चुको मति, नेकी रहै न कांय ।११।
जमात के बन्धुओं ने विचार किया कि इन रूखों के बदले मरना निश्चित है। हे भाइयों ! अब चूकना नहीं है यदि चूक गये तो ऐसे ही वृक्ष कटते रहेंगे, अपनी मान-मर्यादा सभी कुछ मिट जायेगी ।११।
पांचो पीथो परगट्यां, नगरी मां सिरदार । चाल र खेजड़ले गया, भाटी के दरबार ।१२।
उन जमात में पांचो और पीथो थे। ये दोनों गांव के सरदार मुख्य थे। ये दोनों आगे आये और तिलवासणी से चलकर खेजड़ले गांव भाटी गोपालदास के दरबार में पहुंचे और घटना से अवगत कराया ।१२।
पोह फाटी पगड़ो हुयो, संता सारे न्हाण । सूरबीर अब कर गहो, जल्दी बांण कुबण ।१३।
वहां उनकी विनती को हठी गोपालदास ने नहीं सुनी। वे दोनों निरास होकर वापिस आ गये। उन्होनें जमात को एकत्रित करके सभी कुछ बतला दिया। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ही संत भक्तों ने स्नान और संध्या हवन करके वन रक्षार्थ शस्त्र लेकर जहां पर वन काटा जा रहा था वहीं पर पहुंच गये ।१३।
पहली मूंही खिवणी खड़ी, सत सूं घणों करार । विष्णु भक्त मोटो खड़यो, गुरु सूं हेत पियार ।१४।
वहां पर हिंसा खून खराबी टालने के लिये तथा वन की रक्षा के लिये सर्वप्रथम खिंवणी ने अपना सिर वृक्ष के लगा दिया और किरपे ने बिना कुछ दया दिखलाये झटिति सिर को काट डाला। सिर कट गया किन्तु वृक्ष नहीं कटने दिया। खिवणी पीछे नहीं हटी क्योंकि सत्य की शक्ति साथ में थी। सतगुरु से प्रेम रखने वाला मोटा भक्त दूसरी बार कुल्हाड़े के आगे सिर दे दिया और वहीं कट गया किन्तु वृक्ष नहीं कटने दिया ।१४।
इहि उपर नेतू खड़ी, चाली जलम सुधार । सुरगां बेड़ो उतरयो, जिण चढ़ि पहुंता पार ।१५।
तीसरी बार नेतू ने अपना बलिदान दिया और अपना जन्म सुधार करके स्वर्ग में चली गई। इन तीनों के लिये ही स्वर्ग से विमान आया और उस पर चढ़कर स्वर्ग में पहुंच गये ।१५।
हरख सुंदरी मन मोहवणी, सुरपुर साध सुजांण । जामण मरण वहां नहीं, सुख अधिकेरो जांण ।१६।
आगे वहां स्वर्ग में सदा सुख ही सुख है। वहां के निवास अत्यन्त सुन्दर मनमोहक तथा प्रेम से भरे हुए है। ऐसे सज्जनों के समीप रहने का आनन्द ही आनन्द है। वहां पर जन्म-मरण का चक्कर भी नहीं है ।१६।
जुगे जुगे ही अवतरयो, साध संत परमाण । वील्है भणै गति सांभलो, साधां तणां बखाण ।१७।
वह परमात्मा ही इस प्रकार से युगों-युगों में अवतार लेता है। इसमें साधु संत ही प्रमाण है। वील्होजी कहते है कि समय व्यतीत हो रहा है इस समय को, जीवन को समझो और सचेत हो जाओ। यही साधु सज्जनों का कथन है ।१७।