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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह40 / 156

साखी छन्दां की-40

कलयुग तीर्थ थापियो, भाग परापति पावियो

कवि: रायचन्द सुथार

कवि परिचय — रायचन्द सुथार

कवि रायचन्द सुथार - 23, जन्म 1525-1610 इनके बारे में जम्भसार में परिचय मिलता है। ये हजूरी कवि थे। जाम्भोजी के साथ में रहते थे। भजन गायन करते थे। इनके द्वारा रचित छः साखियां प्राप्त है। सभी महत्वपूर्ण एवं गेय है। प्रथम साखी यह जाम्भोलाव तालाब की है।

कलयुग तीर्थ थापियो, भाग परापति पावियो देश फलोदी मंझ थप्यो, पाप न रहसी परसियां । जाय परसो विसन तीर्थ, सिर सूं माटी काढ़ियो । तेरा हुवै पहला पाप खंडत, सुरग में सुख लाडियो। कह रायचन्द सत्य जांणो, पाप न रहसी प्राणियां । अवतार जम्भ नरेश नै, कलि मंझ तीर्थ थापियां ।१।

गुरु जाम्भेश्वर जी ने कलयुग में आकर दिव्य तीर्थ जाम्भोलाव की स्थापना की है। यह इस देश के लोगों के लिये गंगा के समान ही है परन्तु कोई भाग्यशाली ही इस तीर्थ की महिमा को समझेगा तथा स्नान स्पर्श करेगा। यह तीर्थ फलोदी देश की भूमि में थरपा गया है जो भी स्पर्श करेगा उसके सभी पाप निवृत हो जायेंगे। इसलिये हे भक्तों ! ऐसे तीर्थ में अवश्य ही पहुंचो तथा दर्शन स्पर्श करो एवं तालाब की मिट्टी सिर पर रखकर निकालो। तुम्हारे पिछले जन्मों के पाप खण्डित हो जायेंगे तथा स्वर्ग में सुख प्राप्त कर सकोगे। रायचन्द कहते है कि यह सिद्धान्त सत्य मानों कि पापी जनों के पाप नहीं रह सकेंगे। जाम्भेश्वर जी इस समय मानवों के स्वामी है। उन्होनें ही अवतार लेकर इस फलोदी देश में तीर्थ की स्थापना की है ।१।

जिस भूमि पाण्डवां जिग रच्यो, तहां सूत फिराइये। जहां सहदेव जी तीर्थ थाप्यो, जीवड़ा काजै न्हाइये। जीव काजै काढ़ माटी, पाल पै परवाहिये । तेरा हुवै आवागवण खंडत, मुक्ति निहचय पाविये। कह रायचंद सत्य जाणों, उस तीर्थ में जाइये। जिस भूमि पाण्डवां जिग रच्यो, जहां सूत फिराइये ।२।

इस भमि पर पाण्डवों ने वनवास काल में निवास किया था और अनेकों यज्ञ की रचना की थी। उन्होनें इस भूमि की पवित्रता को जाना था। आप भी जानिये और यहां आकर सूत फिराइये। अर्थात् कपड़ा तालाब के चारों तरफ बिछाकर दान कर दीजिये यही यहां का महात्म्य है यहां पर प्रदान किया हुआ वस्त्र दान अनन्त गुणा फल देता है। ऐसा द्रोपदी ने यहां वस्त्र दान दिया था। जिससे द्रोपदी का चीर अनन्त गुणां बढ़ गया था। यहां पर सहदेव जी ने अपनी विद्या के बल से पता लगाया था और इस तीर्थ की स्थापना की थी। ऐसे तीर्थ में अवश्य ही स्नान कीजिये। इस जीव की भलाई के लिये तालाब से मिट्टी निकालें और ले जाकर पाल पर डालें। तुम्हारे सभी अवगुण खण्डित हो जायेंगे तथा मुक्ति की प्राप्ति होगी। रायचन्द जी कहते है कि यह सत्य वार्ता है अवश्य ही समझो और ऐसे तीर्थ में जाओ। जिस भूमि में पाण्डवों ने यज्ञ रचा था वही जाकर सूत फिरावे, वस्त्र दान दे ।२।

सो पुनि अड़सठ तीर्थ थाप्यो, विसन तालाब सत जाणिये। जिस द्वारिका किसन रहे, मुक्ति हुवै गुरु बाणियें। गुरु वचने मुक्ति लाभे, उस तीर्थ में जाइये । काशी बदरी और हर की पैड़ी, जाणि गंगा न्हाइये। कह रायचन्द सत्य जांणो, कांय भूला मन हठे। विसन तालाब तुम सत्य जांणो, और तीर्थ अड़सठे ।३।

वही जाम्भोलाव अड़सठ तीर्थों का फल देने वाला है। जिसकी स्थापना कलयुग में स्वयं विष्णु ने की है ऐसा अवश्य ही जानें। जिस द्वारिका में कृष्ण रहे थे जिससे वह तीर्थ बन गया उसी प्रकार जाम्भोलाव पर भी स्वयं भगवान विष्णु ने निवास किया था। इसलिये यह भी द्वारिका की भांति तीर्थधाम है। यहां पर गुरुवाणी का श्रवण होगा जो मुक्ति देने वाली है। गुरु के वचनों का पालन करने से मुक्ति मिलती है ऐसे दिव्य तीर्थ में अवश्य ही जाना चाहिये। काशी, बद्रीनाथ, हरि की पैड़ी की भांति ही यहां पर भी इसे गंगा मानकर स्नान करें। रायचंद जी कहते है कि इस बात को सत्य मानों। क्यों मनहठ के वशीभूत होकर भूल गये हो। इस जाम्भोलाव को विष्णु का ही तालाब मानकर स्नान कीजिये अड़सठ तीर्थों का फल मिलेगा ।३।

कलियुग परचो हाल लहो, कबूलो माटी निसारणी। अंधा लोयण मिले सही, इच्छा करै मन बांझड़ी। बांझ इच्छा विसन पुरै, उस तीर्थ निश्चय जाइये। निसार माटी करो पूजा, निवत साधु जिमाइये। साथरी गुरु को इसो तीर्थ, जाय कंध निवाइये। कर जोड़ि रायचंद कहै, विनती हाल परचो पाइये ।४।

इस कलयुग में तो साक्षात् परचा देने वाला यह तालाब है। पहले मिट्टी निकालने की प्रतिज्ञा करो। आपका संकल्प पक्का होगा तो निश्चय ही आपकी इच्छापूर्ति होगी। आपके दुखों की निवृति हो सकेगी क्योंकि यहां पर आकर संकल्प से मिट्टी निकालने से अन्धों को आंखें मिली है और बांझड़ी को पुत्र की प्राप्ति हुई है। इस प्रकार से अनेक इच्छाओं की पूर्ति करने वाले इस तीर्थ में अवश्य ही आइये। तालाब की मिट्टी निकालिये। विष्णु मन्दिर में हवन कीजिये तथा साधु संतों को निमन्त्रण देकर भोजन कराइये। यह गुरु की साथरी है इसकी लीला अपरंपार है। यहां अवश्य ही नम्रता से सिर झुकाइये। हाथ जोड़कर रायचंद जी कहते है कि इस समय यहां पर अनेक दिव्य चमत्कार हो रहे है ।४।