कवि परिचय — रायचन्द सुथार
कवि रायचन्द सुथार - 23, जन्म 1525-1610 इनके बारे में जम्भसार में परिचय मिलता है। ये हजूरी कवि थे। जाम्भोजी के साथ में रहते थे। भजन गायन करते थे। इनके द्वारा रचित छः साखियां प्राप्त है। सभी महत्वपूर्ण एवं गेय है। प्रथम साखी यह जाम्भोलाव तालाब की है।
जांभेश्वर अवतार लियो, सब धर्मा करि निवासा ।१।
गुरु जाम्भेश्वर जी ही विष्णु के अवतार है। संसार के जितने भी धर्म है वे सभी उन्हीं में ही निवास करते है अर्थात् सभी धर्मों का समूह है ।१।
जिण सप्त पताले थंभिया, थंभिया धरणी आकासा ।२।
उस परमेश्वर ने सप्त पाताल, धरती, आकाश आदि सभी को अपनी सता से अधर कर रखा है, रोक रखा है इनकी स्थिरता परमात्मा की सता से ही हो रही है ।२।
चार चक परमोधियां, उजल नगर के वासा ।३।
चार चक यानि चारों तरफ बसने वाले लोगों को जागृत किया है। उन्हें सचेत करके प्रकाशमय लोक में ले जाने के लिये तैयार है ।३।
कै भीगा कै कोरा रहिया, सब पाणी की आसा ।४।
सभी लोग जल की आशा लगाये हुए बैठे है अर्थात् जल ही जीव है। जीवन जीने की आशा से जीवन जी रहे है। किन्तु इनमें कोई तो भीग चुका है तथा कोई सूखा ही है। अर्थात् कुछ लोग तो जीवन जीने की विधि प्राप्त कर चुके है। तथा कुछ लोग अब तक न तो जीवन जीने की कला ही सीख सके है और न ही कुछ प्राप्त ही कर सके है ।४।
खरां ले अर्थ लगावियां, काम न आवै खोटा ।५।
जो व्यक्ति खरी कमाई करता है वह कमाई ही उसे फल देगी। खोटी कमाई उसके लिये सहायक सिद्ध नहीं होगी ।५।
ते क्यूं चढ़इयां, वै नफा न जाणै तोटा ।६।
वे लोग धन-व्यापार में क्यों लगते है जो हानि लाभ के बारे में कुछ भी नहीं जानते अर्थात् वे जन क्यों अपना जीवन व्यर्थ के कार्य में झोंक देते है यदि उन्हें शुभ या अशुभ का कुछ ज्ञान नहीं है। ऐसे लोगों का परिश्रम व्यर्थ ही जाता है ।६।
जीभ लपट दिल वायसीयां, वै कारण किरिया खोटा ।७।
वे लोग जो अपने जीवन के मूल्यों को नहीं समझते ऐसे लोगों की जिभ्या लम्पट अर्थात् बकवादी है। बिना विचारे बोलते है तथा उनका दिल कौवे की भांति चंचल तथा काला कुमार्गी है। ऐसे लोग जो भी करेंगे वह कार्य खोटा यानि पाप पूर्ण धोखा वाला ही होगा ।७।
राह गुरु की वै मानैं नाही, वै फिरै कांधै का मोटा ।८।
वे लोग गुरु का बताया हुआ मार्ग तो नहीं मानेंगे किन्तु अखाद्य भोजन खाकर के शरीर तथा कन्धा स्थूल मोटा कर लेते है। ऐसे ही स्थूल शरीर को ढोते हुए भटकते है ।८।
राह गुरु की मांनियो थे, गिणियो विसन सगाई ।९।
हे लोगों ! आप लोग गुरु का बताया हुआ पंथ स्वीकार करो तथा सदा ही विष्णु के साथ ही अपना सम्बन्ध तन-मन-धन से जोड़ो ।९।
जंवरै जीवड़ा जाण सी वा, तेरा खपर रूधेला आई ।१०।
यम के दूत तुम्हें अवश्य ही पहचान लेंगे और तुम्हारा सिर फोड़ कर तुम्हें ले जायेंगे ।१०।
साखण न सैण न बहण न भाई, ना उत पिता न माई ।११।
आगे वहां पहुंचेगा तो तुम्हारे सहायक माता-पिता, बहन-भाई आदि कोई नहीं होंगे ।११।
भगवत लेखो मांगसी वा, क्रिया विण अपणां नाई ।१२।
वहां पर जब तुम्हारे से हिसाब मांगा जायेगा तो बिना शुभ कर्म किये कुछ भी नहीं बता सकेगा। केवल शुभ कर्म ही गवाही के लिये साथ में जाते है। वही अपना निजि धन है ।१२।
ना कुछ कारण ना कछू किरिया, अहलौ जलम गमाई ।१३।
हे प्राणी ! तुमनें यहां संसार में आकर न तो कुछ शुभ कर्म ही किये है और न ही धार्मिक अनुष्ठान पूजा पाठ ध्यान उपासना आदि ही किये तो यह जन्म व्यर्थ में ही खो दिया ।१३।
जाम्भेश्वर विसन ही, जिण आ सुरगे बाट बताई ।१४।
गुरु जाम्भोजी तो साक्षात् विष्णु ही है। जिन्होनें स्वर्ग में जाने के लिये बिश्नोई पन्थ रूपी कला-मार्ग बताया है ।१४।
बाटे भूल्या पड़िया उजड़, बसती कहूं न पाई ।१५।
यदि कोई मार्ग भूल जाये और उजड़ ही चलता रहे तो वह कभी भी अपने गन्तव्य स्थान बस्ती में नहीं पहुंच सकता उसी प्रकार से गुरुदेव के बताये हुए मार्ग को जिन्होनें छोड़ दिया वह कभी भी अपने सच्चे घर बैकुण्ठ धाम को नहीं पहुंच सकेगा ।१५।
बसती बारां इकवीसां मिलै, हमारे गुरु भाई ।१६।
दुनिया रोलै भोलै पड़िया, आगे क्यूं हथाई ।१७।
वहां वस्ती स्वर्ग में तो हमारे गुरुभाई इक्कीस करोड़ पहुंच चुके है। तीन युगों में प्रहलाद हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर के साथ वे हमारे भाई है उनसे हमें भी मिलना है। दुनिया तो बावली हो चुकी है अपना कर्त्तव्य कर्म भूल चुकी है। उसके तो सामने सदा ही एक हथाई अर्थात् व्यर्थ की बातें ही रहती है उनसे ही फुरसत नहीं है ।१७।
कह रायचन्द आपो परमोधो, क्यूं परचै दुनि सवाई ।१८।
रायचन्द जी कहते है कि तुम्हें दुनिया के लोगों से क्या लेना देना है। अपना सुधार स्वयं ही करो। यह दुनिया तो अपने से सवाई है अर्थात् दो कदम आगे है हमारी बात क्यों सुनने वाली है ।१८।