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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह79 / 156

साखी राग आसा-79

जन्म हारिबे दीन विगूता

कवि: वील्होजी

कवि परिचय — वील्होजी

वील्होजी का जन्म विक्रम संवत् 1589 में हुआ था। निर्वाण संवत् 1673 निश्चित रूप से ज्ञात है। वील्होजी के सम्बन्ध में सुरजन जी, केशोजी,परमानन्द जी, गोविन्दराम जी, तथा साहबराम जी आदि सभी ने लिखा है। संवत् 1601 में मुकाम मन्दिर में शब्दवाणी का सस्वर पाठ श्रवण करके वील्होजी छोटी आयु में आकर्षित हुए थे और नाथोजी के शिष्य बन गये थे। नाथोजी ने जाम्भोजी द्वारा दी हुई वस्तुऐं वील्होजी को सप्रेम भेंट दी थी। और पंथ का स्वामी यही होंगे यह पहचान कर ली थी। नाथोजी तथा उदोजी तापस से ज्ञान श्रवण किया और शब्दवाणी तथा साखियां नियम धर्म कण्ठस्थ करके पूर्णतया तैयार हो गये तब संवत् 1611 में विधिवत् साधु दीक्षा प्रदान की थी। साधु परंपरा वंशावली से ऐसा ही ज्ञात हुआ है। साधु दीक्षा लेकर समाज में भ्रमण प्रारम्भ किया। अनेक स्थानों में सत्संग करते थे। लोगों को समझाते थे, साखी शब्द गायन में बड़े ही निपुण थे। स्वयं भी साखियों की रचना करते थे। वील्होजी ने अनेक आख्यान कथाओं की भी रचना की है। तथा अनेकानेक हरजसों की रचना करके गा करके सुनाते थे और अपने शिष्यों को भी प्रेरित किया करते थे। साहित्य लेखन का कार्य वील्होजी ने ही प्रारम्भ किया था। अपने शिष्य सुरजन जी एवं केशोजी को नये साहित्य की रचना करने की प्रेरणा देते थे। वील्होजी मण्डली सहित धर्म प्रचारार्थ भ्रमण किया करते थे परन्तु लोग उनकी बातों पर ध्यान कम ही देते थे। तब वील्होजी जोधपुर के राजा सूरसिंह के राज दरबार में पहुंचे और राजा के कहने पर जेष्ठ के महीने में मरूभूमि में बाजरी का सिट्टा, काकड़ी एवं मतीरा अपनी सिद्धि के बल पर दिया था। जिससे प्रभावित होकर राजा ने वील्होजी की प्रार्थना पर सिपाही, खूंटा, कोरड़ा यानि दण्ड देने का अधिकार दिया था। वील्होजी गांव-गांव में पहुंचे और लोगों को साम, दाम, दण्ड भेद से समझाया और पंथ की टूटी हुई मर्यादा को पुनः जोड़ा। वील्होजी ने ही मुकाम का आसोजी मेला तथा चेत्र अमावस्या का जाम्भा मेला प्रारम्भ करवाया था। जब समाज में प्रथम बार आकर समिलित हुए थे तब उनके चक्षु खुल गये थे ये चर्म चक्षु तथा ज्ञान चक्षु भी यह उनके जीवन का प्रथम चमत्कार था। तभी वील्होजी ने अपने उद्धार की प्रार्थना इस साखी द्वारा बड़े ही कारूणिक रूप से की है यह प्रथम उनकी साखी नीचे दी जा रही है-

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

जन्म हारिबे दीन विगूता ।टेर।

करि कृपण कहिये बिश्नोई, धर्म नेम तां बूत न होई ।

धर्म जुहै नै चालै जूता।

जीव कारण जमैं न आवै, आप भूला ओर भुलावै ।

गुरु का ज्ञान न जागे सूता।

घुर हर करै धरणी रूखालै, केटक गुरु की कौल न पालै ।

दीसन्ता नर लखणें कूता।

आपण खारा करै खुंवारी, कहै बात न लहै बारी ।

माया मेल्ह गर्व मां सूता।

जो संतानै सदा घटि जुकै, काग कलह कदहूं नहिं चूकै ।

रूदि करै खरभ ज्यों रूता।

कूड़ न डरै कड़कता बोलै, भव विण भार अथर्वण तोलै ।

वेद भेद बिना भड़कै ज्यूं भूता।

गुरु आखर पारख नां जाणै, सिर आयो सैतान बखाणै।

धूते धूत मिल्या ठग धूता।

आप अपरच गति ना परचावै, ठाले ऊपर रीतो नावै ।

अचगल बोल कहै विपरीता।

हुंकार्या आंटा भाजे, चोरी जारी करत न लाजै ।

शर्म नहीं माई पूता ।

जप तप शील सभाय यह पूरा, दान दया सत संजम सूरा ।

वील्ह कहै मन इन्द्रिय जीता, जन्म जीत जिण पार पहुंता ।।

दीन दुखी होकर वे विश्वासी लोग जन्म की बाजी को हार गये। वे लोग अपने को बिश्नोई तो कहते है किन्तु नियम धर्म पालन तथा दान करने में कृपणता करते है। वहां उन लोगों के पास नियम धर्म की कोई वस्तु नहीं है। ऐसे लोग धर्म के मार्ग में जुड़कर नहीं चलते। अपने जीवन की भलाई के लिये जागरण सत्संग में नहीं जाते तथा अपने आप तो भूले हुए है तथा दूसरों को भी भुलावे में डाल देते है। वे लोग गहरी निन्द्रा में सोये हुए है। गुरु के ज्ञान से जागने वाले नहीं दिख रहे है। सच्ची झूठी हांक मारते है। दूसरों को डराते है। कहा भी है "घुरै घुरावै करै इवाणी" धरती को अपनी मान करके रखवाली करते है यदि कोई सच्ची बात कहे तो उसे ग्रहण नहीं करते। ऐसे लोग कुत्ते के लक्षण वाले होते है। स्वयं अपने आप तो दोष अवगुणों से भरे हुए है परन्तु दूसरों को नीचा दिखाने के लिये निंदा करते है। अपने सामने किसी दूसरे को तो तिनके के समान भी नहीं समझते। माया महल के गर्व में अचेत होकर शयन करते है। जो व्यक्ति संत पुरूषों को सदा ही घटिया कहता है, उन्हें सम्मान नहीं देता। सदा ही कौवे की भांति कांव-कांव करते हुए कलह करने से नहीं चूकता तथा गधे की भांति कभी रूदन भी करता है, केवल लोग दिखावा करता है। कभी भी झूठ बोलने से डरता नहीं है और वह कुवचन भी कड़क कर बोलता है। पास में धन अर्थ सांसारिक वस्तुएँ न होनें पर भी सम्पूर्ण संसार को तोलने का अभिमान करता है। वेदों का भेद जाने बिना भूतों की तरह भड़क जाता है। धैर्य नाम का गुण नहीं है। गुरु के बताये हुए शब्दों का महत्व तो नहीं जानता किन्तु सिर पर चढ़ा हुआ शैतान ही बोलता है। धूर्त से धूर्त मिल जाता है और ठग विद्या से लोगों को ठगता है। स्वयं अज्ञानी है तो उसका कथन दूसरे को ज्ञानी कैसे बना सकता है। जिस प्रकार से खाली घड़े को भरने के लिये उसके उपर दूसरा खाली घड़ा उल्टा करके भरने की कोशिश करना है तो वह खाली घड़ा दूसरे खाली घड़े को भर नहीं सकेगा और न ही अज्ञानी जन दूसरे को ज्ञान दे सकेगा तथा जब खल व्यक्ति झूठ कपट भरे वचन से भ्रमित करने की कोशिश करेगा तो उसे ज्ञान से दूर अवश्य ही ले जायेगा। हुंकार करते हुए अहंकार में कड़ककर चलते है तथा चोरी जारी करते हुए तनिक भी लज्जा नहीं आती है। माता-पिता, बहन-भाई की मर्याद शर्म भी नहीं है। ऊपर बताये हुए लक्षणों से भिन्न व्यक्ति जो जप तप शील प्रेम तथा पंथ के नियमों का पूर्णतया पालन करने वाला तथा दान दया सत्य संयम तथा सूरवीर है। वील्होजी कहते है कि इस प्रकार से जिन्होनें इन्द्रियों को जीत लिया है ऐसे ही भाग्यवान ने जीवन की बाजी को जीता है। वही संसार सागर से पार पहुंचा है।