साखी उमाहो राग धनाश्री 80
बाबो जंबूदीपे प्रगट्यो, चोचक हुवो उजास । आप दीठो केवल कथै, जिहिं गुरू की हम आस
कवि: वील्होजी
कवि परिचय — वील्होजी
वील्होजी का जन्म विक्रम संवत् 1589 में हुआ था। निर्वाण संवत् 1673 निश्चित रूप से ज्ञात है। वील्होजी के सम्बन्ध में सुरजन जी, केशोजी,परमानन्द जी, गोविन्दराम जी, तथा साहबराम जी आदि सभी ने लिखा है। संवत् 1601 में मुकाम मन्दिर में शब्दवाणी का सस्वर पाठ श्रवण करके वील्होजी छोटी आयु में आकर्षित हुए थे और नाथोजी के शिष्य बन गये थे। नाथोजी ने जाम्भोजी द्वारा दी हुई वस्तुऐं वील्होजी को सप्रेम भेंट दी थी। और पंथ का स्वामी यही होंगे यह पहचान कर ली थी। नाथोजी तथा उदोजी तापस से ज्ञान श्रवण किया और शब्दवाणी तथा साखियां नियम धर्म कण्ठस्थ करके पूर्णतया तैयार हो गये तब संवत् 1611 में विधिवत् साधु दीक्षा प्रदान की थी। साधु परंपरा वंशावली से ऐसा ही ज्ञात हुआ है। साधु दीक्षा लेकर समाज में भ्रमण प्रारम्भ किया। अनेक स्थानों में सत्संग करते थे। लोगों को समझाते थे, साखी शब्द गायन में बड़े ही निपुण थे। स्वयं भी साखियों की रचना करते थे। वील्होजी ने अनेक आख्यान कथाओं की भी रचना की है। तथा अनेकानेक हरजसों की रचना करके गा करके सुनाते थे और अपने शिष्यों को भी प्रेरित किया करते थे। साहित्य लेखन का कार्य वील्होजी ने ही प्रारम्भ किया था। अपने शिष्य सुरजन जी एवं केशोजी को नये साहित्य की रचना करने की प्रेरणा देते थे। वील्होजी मण्डली सहित धर्म प्रचारार्थ भ्रमण किया करते थे परन्तु लोग उनकी बातों पर ध्यान कम ही देते थे। तब वील्होजी जोधपुर के राजा सूरसिंह के राज दरबार में पहुंचे और राजा के कहने पर जेष्ठ के महीने में मरूभूमि में बाजरी का सिट्टा, काकड़ी एवं मतीरा अपनी सिद्धि के बल पर दिया था। जिससे प्रभावित होकर राजा ने वील्होजी की प्रार्थना पर सिपाही, खूंटा, कोरड़ा यानि दण्ड देने का अधिकार दिया था। वील्होजी गांव-गांव में पहुंचे और लोगों को साम, दाम, दण्ड भेद से समझाया और पंथ की टूटी हुई मर्यादा को पुनः जोड़ा। वील्होजी ने ही मुकाम का आसोजी मेला तथा चेत्र अमावस्या का जाम्भा मेला प्रारम्भ करवाया था। जब समाज में प्रथम बार आकर समिलित हुए थे तब उनके चक्षु खुल गये थे ये चर्म चक्षु तथा ज्ञान चक्षु भी यह उनके जीवन का प्रथम चमत्कार था। तभी वील्होजी ने अपने उद्धार की प्रार्थना इस साखी द्वारा बड़े ही कारूणिक रूप से की है यह प्रथम उनकी साखी नीचे दी जा रही है-
बाबो जंबूदीपे प्रगट्यो, चोचक हुवो उजास । आप दीठो केवल कथै, जिहिं गुरू की हम आस ।१।
वील्होजी कहते है कि बाबो स्वामी श्री विष्णु इस जम्बु द्वीप में प्रगट हुए है। उनके प्रगट होने से चारों दिशाओं में प्रकाश हो गया है, तथा अन्धकार की निवृति हुई है। जैसा सतगुरु जाम्भोजी ने अनुभव किया था वैसा ही कथन किया है, ऐसे गुरुदेव की हम शरण में हैं। तथा उन्हीं की हमें आशा भी है ।१।
बलिजाऊं जांभे रे नाम नें, साधां मोमणां रो प्राण अधार । थे जांरे हिरदै वसो, तेरा जन पहुंता पार ।२।
जाम्भोजी के नाम पर मैं न्योछावर होता हूं, बार-बार प्रणाम करता हूं। ऐसा दिव्य नाम साधु भक्तों के प्राणों का आधार है। इन्हीं नाम पर मेरे भी प्राण टिके हुए है। हे देव ! आप जिसके भी हृदय में निवास करेंगे वही जन संसार सागर से पार हो जायेगा ।२।
संभराथल रली आंवणां, जित देव तणों दीवाण । परगटियो पगड़ो हुवो, निश अंधियारी भाण ।३।
धन्य है वे लोग जो सभी मिलकर सम्भराथल आये है जहां हरि कंकेहड़ी के नीचे स्वयं देव का आसन था। जिस प्रकार से सूर्योदय हो जाने पर रात्रि का अंधकार मिट जाता है और प्रातः का प्रकाश आता है उसी प्रकार से जगत को श्रीदेव ने प्रकाशित किया ।३।
एकलवाई थल खड़यो, करत सभी मुख जाप । स्वयंम्भू का सिवरण करै, जो जपै सो आप ।४।
सम्भराथल पर स्वयं अकेले ही रहकर स्वयंभू का स्मरण करते तथा जो भी उनके पास आता वह भी ऐसा ही जप सीखता एवं करता था। जिस स्वयंभू का जप करते वे तो स्वयं आप ही थे ।४।
भूख नाहीं तिसना नांही, गुरू मेल्ही नींद निवार । काम क्रोध व्यापै नहीं, जिहिं गुरू की बलिहार ।५।
जिनको कभी भी भूख प्यास तृष्णा आदि खट् ऊर्मियां नहीं सताती थी। तथा काम क्रोध भी अपना प्रभाव नहीं दिखा सकते थे। ऐसे द्वन्द्वों से रहित सतगुरु देव की मैं शरण हूं ।५।
भगवीं टोपी पहरंतो, गहि कंथा दस नाम । झीणी बाणी बोलंतो, गुरू बरज्यो वाद विराम ।६।
जिन्होनें भगवीं टोपी पहन रखी थी। तथा शरीर पर चोला भी दसनाम सन्यास का धारण कर रखा था। एवं झीणी बाणी तत्व दर्शाने वाली, मधुर वाणी बोला करते थे। तथा वाद-विवाद व्यर्थ के झगड़ों को मिटाने वाले ऐसे सतगुरु की मैं शरण हूं ।६।
सिकन्दर परमोधियो, परच्यो महम्मद खान । राव राणा निव चालिया, संभल केवल ज्ञान ।७।
अहंकार में मुग्ध दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी को हक की कमाई का उपदेश देकर सद्मार्ग का अनुयायी बनाया तथा उसी प्रकार से नागौर के सुबेदार महमदखां को भी अपनी लीला से परचाया। और भी अनेकों रावण राणां नम्र भाव होकर सद्मार्ग पर चले थे। क्योंकि कैवल्य ज्ञान देकर के उन्हें समझाया था ।७।
मध्यम से उत्तम किया, खरी घड़ी टकसाल । कहर क्रोध चुकाय कै, गुरू तोड़यो माया जाल ।८।
जो लोग मध्यम थे उनको उत्तम किया। उनतीस नियम रूपी मर्यादा को बिल्कुल युक्ति युक्त तथा सत्य बताया। उन लोगों के कलह क्रोध मिटाकर गुरु ने माया जाल को तोड़ दिया ।८।
सीप वसै मंझ सायरा, ओपत सायर साथ । रैणायर राचे नहीं, चाहे बूंद स्वान्त ।९।
सीप समुद्र के अन्दर ही रहती है तथा समुद्र का जल भी उसके साथ ही रहता है किन्तु वह सीप समुद्र के जल को ग्रहण नहीं करती परन्तु उसे तो स्वाति नक्षत्र में वर्षा के जल की बूंदों की ही आशा है तथा उसकी आशा वह पूर्ण भी होती है। उसी प्रकार से वील्होजी कहते है कि मेरी भी आशा हे देव आपकी तरफ ही है। मेरी आशा भी अवश्य ही पूर्ण होगी तथा मोती बनकर फलदायक होगी ।९।
जल सारे विण माछला, जल बिण मच्छ मर जाय । देव थे तो सारो हम बिना, तुम बिन हम मर जाय ।१०।
जल तो मछली बिना भी रह सकता है परन्तु जल के बिना मछली मर जायेगी। उसी प्रकार से हे देव ! आप तो हमारे बिना रह सकते है किन्तु हम आपके बिना मछली की भांति मर जायेंगे ।१०।
वोहो जल बेड़ी डुबंता, बूझे नहीं गंवार । केवल जंभे बाहरो म्हानें, कौण उतारे पार ।११।
संसार समुद्र का जल तो अधिक है और साधना रूपी नौका तो बहुत छोटी है तथा नाजुक भी है। फिर अपने ही बल बूते पर कैसे पार उतर सकेंगे। इतनी कमजोरी होते हुए भी मूर्ख लोग पार उतरने का उपाय नहीं पूछते है। हे देव ! हमें तो केवल आप पर ही भरोसा है। आप ही पार उतार सकोगे। आपके अतिरिक्त और कोई हमारा सहायक नहीं है ।११।
हंसा रो मान सरोवरां, कोयल अम्बाराय । मधुकर कमल रै करे तेरा, साधु विसन के नाम ।१२।
हंसों का सम्मान तो मान सरोवर पर ही है दूसरी जगहों पर तो बगुला ही समझा जायेगा। कोयल का सम्मान आम के बागों में ही है अन्यत्र तो वह कौवा ही समझी जायेगी। भंवरों का सम्मान भी कमल के फूलों पर ही है अन्य स्थानों पर तो वह एक सामान्य कीट ही समझा जायेगा। उसी प्रकार से भक्तों का सम्मान भी विष्णु के नाम स्मरण एवं भक्ति भाव से है अन्यथा उनमें क्या विशेषता है ।१२।
जल बिना तिसना न मिटे, अन्न बिन तिरपत न थाय । केवल जंभे बाहरो म्हानें, कोण कहे समझाय ।१३।
जल के बिना प्यास नहीं मिटती और अन्न के बिना तृप्ति नहीं होती। उसी प्रकार से हे देव ! आपके बिना भी हमारी ज्ञान पीपासा नहीं मिट सकती, हमें भूले भटके हुए लोगों को कौन समझायेगा ।१३।
पपीयो पीव पीव करे, बोली सह पीयास । भूमि पड़ियो भावे नहीं, बूंद अधर की आस ।१४।
पपइया पक्षी भी वर्षा ऋतु में पीऊ-पीऊ की रटन लगाता है। उसकी बोली में प्यास की ही रटन होती है। भूमि पर तो जल भरा हुआ था परन्तु उसको नहीं पीता, स्वाति नक्षत्र की अधर बूंद की ही आशा रखता है। तथा उसकी इच्छा पूर्ण भी होती है उसी प्रकार से हे देव ! हम भी सांसारिक वासनाओं को छोड़कर आपकी ही इच्छा करते है ।१४।
ठग पोहमो पाहण घणां, मेल्ही दूनी भूलाय । पाखण्ड कर परमन हड़े, तहां मेरो मन न पतियाय ।१५।
इस दुनिया में ठग बहुत ही है जो अनेक प्रकार से पत्थर आदि की मूर्तियां बनाकर लोगों को उन्हीं पर सिर पटकने को कहते है और उनसे चढ़ावा लेकर अपना पेट भरते है। ऐसे लोगों ने दुनिया को भ्रम में डाल दिया है। पाखण्ड करके दूसरे के चित को हरण कर लेते है, उन लोगों को अपने वश में करके अपनी इच्छानुसार चलाते है, वील्होजी कहते है कि मेरा मन तो उन पर कभी विश्वास नहीं करता ।१५।
काच कथीर नें राचही, विणज्या मोती हीर । मेरो मन लागो श्याम सूं, गूदड़ियो गूणों को गहीर ।१६।
काच कथिर रूप पाखण्डों में वील्होजी कहते है कि मेरा मन नहीं रचता। इन्हें छोड़कर सत्य ज्ञानरूपी हीरों का व्यापार ही करना है। मेरा मन तो श्याम श्री भगवान से ही लगा हुआ है जो गूदड़ियों मोटा चोला तथा गरीबी वेश में रहते हुए भी गुणों का खजाना है ।१६।
निर्धनियां धन वाल्हमो, किरपण वाल्हो दाम । विखियां नें वाली कामणी, तेरा साधु विसन के नाम ।१७।
निर्धन आदमी को तो सबसे प्यारा धन ही है। तथा कृपण व्यक्ति को भी रूपये प्यारे है। विषयी व्यक्ति के लिये युवती प्यारी है। उसी प्रकार से हे देव ! आपके साधु को तो विष्णु का नाम ही प्यारा है ।१७।
धन्यरे परेवा बापड़ा, थारो वासो थान मुकाम । चूण चुगे गुटका करे, सदा चितारे श्याम ।१८।
धन्य वे प्यारे कबूतर आदि पक्षी जो सदा ही मुकाम के मन्दिर के छाजे पर रहते है। वहां पर चूण चुगते है और श्याम परमात्मा का नाम स्मरण करते हुए गुटरगूं कर रहे है ।१८।
अम्बाराय बधावणां, आनन्द ठामो ठाम । श्याम उमाहो मांडियो, पोह कियो पार गिराम ।१९।
वील्होजी को यहां चारों तरफ खड़े हुए सघन वृक्ष आम के बागों की स्मृति दिलवा रहे है इसलिये कहा- "अम्बाराय बधावणां" चारों तरफ सघन वृक्ष मानों स्वागत करते हुए दिखाई दे रहे है। सर्वत्र आनन्द ही आनन्द छाया हुआ है इस आनन्द के क्षण में हे श्याम ! मैनें यह उमाहो बोला है। क्योंकि मेरे अन्तिम शरण आप ही है ।१९।
बोल्यो गुरू उमाहड़ो, करमन मोटी आस । आवागवण चुकाय के, म्हानें द्यो अमरापुर वास ।२०।
हे गुरुदेव ! मैने यह उमाहो रूपी प्रार्थना आपके ही सामने की है। यह प्रार्थना मैनें बहुत बड़ी इच्छा लेकर की है। बार-बार जन्म मरण के चक्कर से छुड़वा करके हमें अमरापुरी में सदा के लिये निवास प्रदान कीजिये ।२०।
अवसर मिलिया मोमणा, भल मेलो कब होय । दुःखी विहावै तुम बिना, हर बिन धीर न होय ।२१।
हे भक्तों ! यह सुअवसर प्राप्त हुआ है फिर न जानें कब यह मिलन हो या न भी हो इसलिये इस समय को चूकना ठीक नहीं है। परमात्मा की प्राप्ति के बिना तो दुखी ही जीवन बिताना होगा। हरि बिना तो धैर्य धारण नहीं हो पाता ।२१।
काहे के मन को धणी, काहे के गुरू पीर । वील्ह भणे विश्नोइयां, आपां नाम विसन के सीर ।२२।
किसी के तो कोई स्वामी होगा किसी के कोई गुरु पीर होगा, वील्होजी कहते है कि हे बिश्नोइयों ! अपना तो विष्णु के नाम में ही सीर संस्कार है। इसलिये विष्णु का ही जप करें ।२२।