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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह106 / 156

सोहलो राग खंभावची-106

जिभिया जपले जंभ सवेरा, आज सम्भराथल आनन्द अपारा

कवि: माखनजी

कवि परिचय — माखनजी

माखनजी का जन्म 1650-1750 मध्य अनुमानित है। ये नगीना के रहने वाले साधु थे। इनके द्वारा रचित राग खंभावची में गेय यह एक सोहलो प्राप्त हुआ है जो प्रायः प्रभात समय में प्रेम से गाया जाता है।

जिभिया जपले जंभ सवेरा, आज सम्भराथल आनन्द अपारा ।टेर।

हे जिभ्या ! प्रातः सांय संध्या बेला में जाम्भोजी द्वारा बताये हुए विष्णु का जप कर ले । आज सम्भराथल पर अपार आनन्द हो रहा है ।१।

सुर तेतीसूं रहत सनमुख, आगे उधोजन करत उचारा । देव घणां सब हिलमिल गावै, इन्द्र बधावा मंगलचारा ।२।

तेतीस कोटि देवता सदा ही देवजी के सामने हाथ जोड़े हुए खड़े रहते है ऐसे गुरुदेव से ऊदोजी अनेक प्रश्न पूछ रहे है । गुरुदेव सभी को यथा योग्य उतर दे रहे है । सभी देवता हिलमिल कर स्तुति कर रहे है तथा देवराज इन्द्र भी बधाइयां बांटते हुए मंगलाचार कर रहे है क्योंकि देवता को विपुल आहुति यज्ञ द्वारा मिलने लग गयी है इसलिये धन्यवाद कर रहे है ।२।

जैसे दणियर उदय होत है, तिमर तूटत होत उजारा । मुनिजन वेद पढ़त है ब्रह्मा, धिन-धिन लोहट भाग तुम्हारा ।३।

जिस प्रकार से सूर्योदय होनें से अन्धकार भाग जाता है उसी प्रकार से श्री देव के ज्ञान से अज्ञान भाग गया है सर्वत्र प्रकाश फैल चुका है । ब्रह्मा सहित मुनिगण वेद मन्त्रों की ध्वनि कर रहे है । लोहट जी को बार-बार धन्यवाद दे रहे है उनके भाग्य की सराहना कर रहे है ।३।

खोड़स अरू षट् नरपति आये, बड़े-बड़े भूपति भूप भुजारा । हरष भये सबदों की धुन सुण, परसत कर कर प्रीत पियारा ।४।

सोलह तथा छः कुलमिलाकर बाइस राजा लोग दर्शनार्थ आये है जो बड़े से बड़े भूपति सम्राट है । शब्दों की ध्वनि सुन करके हर्षित हो रहे है । प्रेम भाव से एक दूसरे के गले लग रहे है आपसी शत्रुता भूल चुके है, अत्यधिक प्रेम भाव उमड़ रहा है ।४।

अवगत नाथ अयोध्या के पति, तुम ही वृजपति नन्द कुमारा । आज सम्भराथल आये हो स्वामी, नव खंड पृथिवी खेल पसारा ।५।

हे देव ! आप ही अयोध्या के पति राम हो या वृजपति नन्दकुमार श्री कृष्ण ही हो । आज पुनः यहां सम्भराथल पर आये हो । यहां पर नव खण्डों वाली सम्पूर्ण पृथ्वी पर खेल पसारा किया है ।५।

झिगमिग जोति विराजै संभू, कंचन नगरी अनूप किवारा । तीन लोक जांकी महिमा गावै, पावत माखण मोख दवारा ।६।

आप विराजमान होते है तो मानों ज्योति की तरह झिगमिग करते हुए प्रकाशमान होते हो । आपकी यह सम्भरा नगरी बड़ी ही विचित्र एवं रम्य है । स्वर्णमयी नगरी यह आपकी है । जिसके अनुपम हीरे मोती जड़े हुए किवाड़ है उसमें प्रवेश तो कोई भाग्यशाली ही कर पाता है । तीनों लोक आपकी महिमा का बखान कर रहे है । माखनजी कहते है कि जो भी आपकी महिमा का बखान करेगा वह मोक्ष को प्राप्त अवश्य ही होगा ।६।