साखी राग भंवरो कणां की-107
जां थलियां देव जी भंवरो अवतरियो, जां थलिया छै गाढ़े नूर । भक्तां रे मन चान्दणों, दिलमां उग्यो सूर
कवि: रामूजी खोड़
कवि परिचय — रामूजी खोड़
रामूजी खोड़ का जन्म संवत् 1675-1700 के बीच अनुमानित है। ये धवा के रहने वाले सद्गृहस्थ बिश्नोई थे। संवत् 1700 में कापड़ हेड़ा में अनुचित कर छुड़वाते हुए स्वेच्छा से युद्ध करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। रामोजी दूल्हे बने जा रहे थे, उसी समय दूल्हन की जगह मृत्यु को ही वरण किया था। इस घटना से पूर्व ही यह साखी बोली थी। इस साखी में जाम्भोजी के प्रति अगाध प्रेम भरा हुआ है। स्वर्ग प्राप्ति की अपार खुशी दिखाई देती है स्वर्ग सुख के सामने सांसारिक भोग तुच्छ हो जाते है। सभी साखियों में यह साखी अत्यन्त महत्वपूर्ण मान्य है। गायक जन बड़े ही प्रेम से यथा अवसरों पर गायन करते है। श्रोता तथा गायक दोनों को ही प्रेम में विभोर कर देने वाली यह रामोजी की साखी है। केशोजी ने तथा साहबरामजी ने रामोंजी की कथा विस्तार से लिखी है।
जां थलियां देव जी भंवरो अवतरियो, जां थलिया छै गाढ़े नूर । भक्तां रे मन चान्दणों, दिलमां उग्यो सूर ।१।
हे भंवरा ! हे मधुप ! हे जीवात्मा ! जिस सम्भराथल पर देवजी विष्णुजी ने अवतार लिया है । उस थल देश से देवाधिदेव को अत्यधिक प्रेम था भक्त जनों के मन में ज्ञान का प्रकाश हुआ है क्योंकि अति निकट दिल हृदय में ही सूर्योदय हो चुका है । मन बुद्धि अपना कार्य प्रकाश में ही करेंगे । इसलिये पुण्य का कार्य ही सम्पन्न होगा ।१।
अलीयल डालो भंवरो रम रह्यो, रह्यो दिसावर छाय । बाग बिहूंणों भंवरो क्यों रहे, फूल रह्यो कुमलाय ।२।
हे भंवरा ! तूं हरि हरि डालियों में ही क्यों भटक रहा है तथा दसों दिशाओं में अपने को चक्र में डाल रहा है । यहां हरि डालियों में फूल कहां है ? फूलों के रस की प्राप्ति यदि करनी है तो बागों में पहुंच जाओ वहां अनेक खिले हुए सुगन्धित फूल मिलेंगे । वहां पर फूल बिना ग्राहक के कुम्हला रहे है । यहां तूं हरि डालियों में ही भटक रहा है । हे जीव ! तेरी भी वही दशा है तूं भी संसार के शुष्क विषयों में भटक रहा है किन्तु आगे स्वर्ग में अति सुख है । उस सुख की प्राप्ति का प्रयत्न करें ।२।
आवो आवो भंवरा घर चिणां, आयो सांवणीयांरो मास । भीजण लागी पांखड़ी, छीजण लागो मास ।३।
हे भंवरा ! आओ आगे बढ़ें पहले रहने के लिये घर बनायें क्योंकि आगे श्रावण का महीना आ रहा है श्रावण में वर्षा होगी तो पंखें भीग जायेगी फिर उड़ न सकेगा उसी प्रकार से हे जीव ! तुम्हारा भी बुढ़ापा आ रहा है इस अवस्था में आने से पूर्व ही यदि कुछ उपाय करना है तो कर ले क्योंकि तेरी आयु व्यतीत हो रही है । हाथ पांव आदि कार्य नहीं कर सकेगे इसलिये अपने आगामी घर जानें की तैयारी कर लें ।३।
घण गरजै दावण खिंवै, चातक मने उदास । सर छलिया सरिता बह, रटत पीयास पीयास ।४।
श्रावण के महीने में गर्जना होती है । बिजलियां चमकती है घने कजरारे बादल छा जाते है तथा मूसलाधार वर्षा होती है तालाब जल से भर जाते है, नदियां बहने लगती है चारों ओर जलाकार ही हो जाता है । फिर भी चातक पक्षी उदास ही रहता है । स्वाति नक्षत्र की बूंद पाने के लिये रटन लगाता है परमात्मा उसकी भी आशा पूर्ण करते है उसी प्रकार हे जीव ! तुम्हें भी चातक की भांति परमात्मा की प्राप्ति के लिये रटन लगानी चाहिये जब एक पक्षी की आशा पूर्ण हो जाती है तो तुम्हारी क्यों नहीं हो सकती ? सांसारिक विषय भोगों की तरफ से मुंह मोड़कर परमात्मा की तरफ वृति लगाना होगा ।४।
तोड़ो तोड़ो भंवरा पींजरो, भांज करो चकचूर । मोमण स्वर्गे नावड़या, तूं कांय रहीया मंजूर ।५।
हे भंवरा ! मोह माया रूपी नकली पिंजरे को तोड़कर चकना चूर कर डालिये कहीं नामोनिशान भी नहीं रहे । अन्य भक्त जन थे वे तो पार पहुंच चुके, तुम्ही क्यों बेबश हो रहे हो । तुम स्वयं ही बन्धन में पड़ रहे हो ।५।
भंवरा एक सनेसड़ो, मोमणां नैं थे कहियो जाय । पींजर नांही प्राणीयां, थाई दिस लहिया होय ।६।
हे भंवरा ! यह एक ज्ञान वर्धक संदेशा सभी भक्तों को जाकर कहना कि जिस मोह माया रूपी पिंजरे को तुम सत्य समझते हो वह वास्तव में सत्य नहीं है तोड़ा जा सकता है । क्योंकि तुम भी उस परमात्मा के अंश हो जैसी परमात्मा की ज्योति है वैसी तुम्हारी भी तो है । राख में ढ़की हुई अग्नि को प्रगट कर दीजिये ।६।
हीरा बिणजो साधो मोमणों, भले न चढ़िस्यां हाथ । म्हे जपस्यां निस्तारसो, रमस्यां झूलरिये रे साथ ।७।
हे साधो मोमणों ! हीरों का व्यापार करो यदि इस बार चूक गये तो दुबारा फिर यह अमूल्य मानव तन नहीं मिलेगा, हमें ऐसी ही जप साधना करनी चाहिये । जिससे इस जन्म में ही संसार सागर से पार उतर जायेंगे । उन्हीं पार पहुंचे हुए पवित्र आत्माओं के साथ ही रमण करें ।७।
स्वर्गे सौरभ अतिघणी, मोर रही वणराय । चंपो मरवो केवड़ो, भंवर रह्या रंगलाय ।८।
हे भंवरा ! आगे स्वर्ग में अत्यधिक सुगन्ध वाले फूल खिले हुए है जिससे सम्पूर्ण वातावरण महक रहा है । सम्पूर्ण वन में कोपलें निकल चुकी है उनसे आने वाली पराग मन को मोहित कर देती है । वहां पर चंपा मरवा केवड़ा आदि के फूल खिल रहे है । वहीं पर अनेकों जीव आनन्द मगन हो रहे है । हे जीव ! तेरे को तो वहीं पर चलना चाहिये । यहां सूखे ठूंठों में क्या रखा हुआ है । 'जिहिं ठूंठड़िये पान न होता ते क्यूं चाहत फूलूं' ।८।
मेलो गुरू पहलाद सुं, मेलो हरिचन्द राय । मेलो पांचे पाण्डवे, धन्य कुन्ता दे माय ।९।
हे जीव ! वहां पर आगे तुम्हें गुरु प्रहलाद से मिलन होगा तथा हरिश्चन्द्र पांचों पाण्डवों तथा कुन्ती माता से भी मिलन होगा जो सभी धन्यवाद के पात्र है, उनसे मिलने के लिये तैयारी करें ।९।
जां बूठो तां बाहीयो, जारां सुपह सुवाया खेत । ते जन भंवरा नीपजां, जारां जम्भगुरू सुं हेत ।१०।
हे भंवरा ! जहां पर भी वर्षा होती है वहीं पर जाकर खेती करें । यही गुरु देव का आदेश है । खेती भी उसी की ही सवायी फलीभूत होती है । अर्थात् जहां पर भी साधना निर्विघ्न पूर्ण हो वहीं पर ही जाकर साधना रूपी खेती करें । उसी को ही सिद्धि मिलती है । खेती भी उसी की ही निपजती है सच्चाई ईमानदारी से परमात्मा के अर्पण करता है ठीक उसी प्रकार से साधना भी उसी की ही फलीभूत होती है जो परमात्मा गुरुदेव के समर्पित होकर श्रद्धा से करता है ।१०।
कर सुकरत स्वर्गे गया, ते जन पहुंता पार । बीनतड़ी रामो कह, म्हारी आवागवण निवार ।११।
जिस व्यक्ति ने भी सुक्रत किया है वही स्वर्ग में पहुंचा है, जरा मरण से छूट गया है । रामोजी विनती करते हुए कहते है कि हे देव ! हमारा जन्म मरण से छुटकारा दिला दीजिये, यही हमारी इच्छा है ।११।