कवि परिचय — गोकुलजी
गोकुलजी का जन्म संवत् 1700-1790 मध्य जीवन काल था। ये संत जोलियावाली गांव के निवासी थे। कवि गोकुलजी अपने समय के प्रतिनिधि कवि थे। इन्होनें इन्दव छन्द अवतार स्तुति होम की स्तुति आदि अनेक छन्दों की रचना की थी तथा इनके द्वारा दो साखियों की रचना हुई थी। प्रसिद्ध खेजड़ली खड़ाणे के प्रत्यक्ष दृष्टा कवि थे। इन्होनें साखी खेजड़ली में तीन सौ तिरेसठ लोगों के बलिदान की कथा कही है। यह इनकी बहुत ही प्रामाणिक तथा ऐतिहासिक रचना है। यहां पर इनकी दोनों साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।
तेतीसां प्रतिपाल, धरणी धर असी धरो । भव भंजन भूपाल, सतगुरु जी कृपा करो । सतगुरु जी कृपा करो, अड़बड़िया आधार । बारां इकवीसां मिलै, लंघे भवजल पार । भव भंजण भक्ति कीजै, कटे जम का जाल । जुग चौथे जोड़ी मिले, तेतीसां प्रतिपाल । धरणी धर असी धरो ।१।
प्रहलाद पंथी तेतीस करोड़ का पालन पोषण करने वाले, धरती के आधार स्वरूप श्री विष्णु ने ही ऐसा दिव्य रूप धारण किया है । संसार के भय को मिटाने वाले भूपालक सतगुरु देव हमारे पर भी कृपा करो । हे सतगुरु देव ! कृपा करो हमारा सहारा गड़बड़ा गया है । इस समय आप ही हमारे मात्र एक सहारे हो । तीन युगों में पार पहुंचे हुए तेतीस करोड़ से बारह करोड़ जाकर मिल चुके है जिन्होनें भी भव भंजन श्री विष्णु की भक्ति की थी वे तो पार पहुंच गये । वे तो यमराज के जाल से मुक्त हो गये । इस चौथे युग में भी सतयुग जैसा भक्त विराजमान है वे ही वहां तक पहुंच सकेंगे तेतीसों का पालन करने वाले इस धरती पर आये है ।१।
सतयुग कोल संभाल, म्हारो श्याम सपियर आवियो । आवियो आप अलेख, भगता रे मन भावियो । भगतां रे मन भावियो नै, गुरु भला बहोड़ा भेद । बाड़ै हुंता बिछड़या, उरे होती घणी उमेद । होती घणी उमेद उर में, पीव सोई पावियो । सतयुग कोल संभाल, पूरे गुरु परचावियो । म्हारो श्याम सपियर आवियो ।२।
बाबे परच्या पात सुपात, परच्या बामण बाणिया । सोध्या जीव सुजीव, सुमति दे सुमार्ग आणियां । सुमति दे सुमार्ग आणियां नै, मनो मेल्ही भ्रान्ति । राजा रायक भाट भोजक, परच दीठा पांति । भ्रान्ति मेल्ही हुवा भाई, जे गुरु ज्ञान पिछाणियो । बाबे परच्या पात सुपात, परच्या ब्राह्मण बाणियां । सुमति दे सुमार्ग आणियां ।३।
सतयुग में प्रहलाद से कवल किया था उसको पूर्ण करने के लिये ही हमारे प्यारे श्याम विष्णु ही यहां पर आये है । आप स्वयं अलख निरंजन आये है भक्तों को बहुत ही प्यारे है । सतगुरु देव भक्तों को ज्ञान ध्यान भक्ति का रहस्य बताया है और भ्रम की निवृति की है । वे ही भक्त थे जो प्रहलाद पंथी कहलाते थे । इस समय वे लोग अपने को भूल चुके थे उन्हें सचेत किया जिससे हृदय में प्रेम की गंगा प्रवाहित होने लगी । हृदय में मिलन की बहुत ही इच्छा थी इसलिये परम प्रिय देव को प्राप्त कर लिया सतगुरु का कवल संभालकर पूरे गुरु ने सन्मार्ग का अनुयायी बना दिया । श्री गुरु देव ने पात्र सुपात्र की परीक्षा करके अपनाया । जिनमें ब्राह्मण बनियां आदि परिचित हुए, सन्मार्ग के अनुयायी बने । सुजीवों को खोज करके तथा उन्हें सुमति मार्ग पर चलाया सुमति प्राप्त करके सुमार्ग पर चलने से मानसिक भ्रान्तियां मिट गई राजा रायक भाट भोजक सभी प्रकार के लोग आये और ज्ञान से परिचित होकर पंक्ति लगाकर बैठ गये अर्थात् सभी बिश्नोई बनकर एक ही पंक्ति में आ गये उन्होनें गुरु के ज्ञान की पहचान की थी इस प्रकार से गुरु देव ने परीक्षा कर के सुपात्रों को सुमति देकर सन्मार्ग का अनुयायी बनाया ।३।
कोड़ा रो तारणहार, वाचा पालण आपणी । पवण छतीसूं पार, पहुंचावो पूरा धणी । पहुंचावो पूरा धणी, पवण छतीसूं पार । एक लवाई थल खड़यो, भगवी टोपी धार । कुलह वेद पुराण बखाण, बानो देव पूठो पार । अवतरयो इण कांम कलि में, क्रोड़ा रो तारण हार । वाचा पालण आपणी ।४।
करोड़ों को पार उतारने वाले तथा अपने वचनों को पूर्ण करने वाले गुरुदेव के रूप में आये है । हे देव ! हम तीन वर्ण के लोगों को पार उतार दीजिये इसी समय आप अकेले भगवीं टोपी पहने हुए सम्भराथल पर खड़े दिखाई दे रहे है अर्थात् सचेत होकर सभी को देख रहे है तथा परीक्षा कर रहे है स्वकीय कुल वेद पाठ पुराणों का व्याख्यान आदि को छोड़कर कैवल्य ज्ञान दे रहे है । इसलिये ही कलयुग में देव ने अवतार धारण किया है जो करोड़ों को पार उतार देंगे यही उनकी प्रतिज्ञा है ।४।
आस करण अरदास, पार ब्रह्म सूं दाखियो । प्रीति पहलो की पालिये, पति बानै की राखिये । पति बानै की राखिये, कृत जुग री कांण । लेखो न लीजै दया कीजै, भेख आपणों जांण । सन्मुख न्हालो कोल पालो, सुणों श्याम सधीर । दास गोकुल आस थारी, सत जांणो गुरु पीर । पत बानै की राखियो ।५।
परब्रह्म परमात्मा से यही हमारी आशा एवं प्रार्थना भी है अपनी हार्दिक भावना हम और किससे कहें । हे देव ! पहले वाली प्रीति का ही पालन करें हमनें आपकी ही आशा पर आपका ही भगवां वेश धारण किया है इसकी मर्यादा रखें इस बाने की लज्जा रखें यह सतयुग की ही परंपरा है । हे देव ! आप हमारे कर्मों का हिसाब-किताब न पूछिये क्योंकि उसमें तो हम जबाब नहीं दे सकेंगे हमारे कर्म कोई ज्यादा अच्छे भी नहीं है । आप हमारे पर दया कीजिये अपना ही भेख अपना ही शिष्य मानकर हम सभी आपके ही है और आप एक मात्र हमारे सहारे है आप हमारे सामने एक बार दर्शन देकर कृतार्थ अवश्य ही कीजिये । अपने वचनों को स्मरण कीजिये । हे श्याम सधीर हमारी प्रार्थना सुनो दास गोकुल विनती करते हुए कहते है कि हमें तो आपकी ही आशा है, यह मैं सत्य ही कहता हूं । हमारे तथा आपके बाने की रक्षा अवश्य ही करेंगे ।५।