साखी राग सिन्धु-109 (खेजड़ली की)
पण पालण पीसणां गंजण, रूंखां राखण हार । जोधाण जालम तप्यो, अजमल जी अवतार
कवि: गोकुलजी
कवि परिचय — गोकुलजी
गोकुलजी का जन्म संवत् 1700-1790 मध्य जीवन काल था। ये संत जोलियावाली गांव के निवासी थे। कवि गोकुलजी अपने समय के प्रतिनिधि कवि थे। इन्होनें इन्दव छन्द अवतार स्तुति होम की स्तुति आदि अनेक छन्दों की रचना की थी तथा इनके द्वारा दो साखियों की रचना हुई थी। प्रसिद्ध खेजड़ली खड़ाणे के प्रत्यक्ष दृष्टा कवि थे। इन्होनें साखी खेजड़ली में तीन सौ तिरेसठ लोगों के बलिदान की कथा कही है। यह इनकी बहुत ही प्रामाणिक तथा ऐतिहासिक रचना है। यहां पर इनकी दोनों साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।
पण पालण पीसणां गंजण, रूंखां राखण हार । जोधाण जालम तप्यो, अजमल जी अवतार ।१।
जोधपुर के शासक अजीतसिंह प्रण का पालन करने वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले तथा वृक्षों की रक्षा करने वाले प्रतापी शासक हुए ।१।
इण कलि मां अजमल सो, कोई राणो हुवो न राव । तप मेट्यो तुरकां तंणो, कीया अमर पसाव ।२।
अजीतसिंह के शासन काल में उनके समकक्ष कोई राजा या राव नहीं हुआ । उन्होंने यवनों (मुसलमान शासकों) के प्रभाव को मिटाया तथा अपने राज्य का विस्तार किया ।२।
वन राख्यां वैरी गंज्या, जालम किया जेर । पतिशाही ऊपर तप्यो, थिर थाण अजमेर ।३।
उन्होंने वनों की रक्षा की, शत्रुओं का दमन किया तथा दुष्ट लोगों को नियंत्रित किया । अजमेर के हाकिम (सफीखाँ) पर चढ़ाई करके उसे जीत लिया ।३।
पतशाही रो पेखणों, पिसणां पूरी साल । प्रतापी पोहमी हुवो, अरि गंजण अजमाल ।४।
जो शासक राजा जोधपुर की तरफ बुरी नजर से देखा करते थे, उन्हें रौंद डाला । उनके दिल में (अजीतसिंह) शूल की तरह चुभा करते थे । ऐसा प्रण का पालन करने वाला, दुश्मनों का नाशक, प्रजा पालक राजा अजीतसिंह हुआ ।४।
हाकिम मति हरजी हड़ी, देखरी कीवो दाव । डाकर कर डंड मांगस्यां, इण विध करो उपाव ।५।
अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह राज गद्दी पर थे तब उसके मंत्री गिरधरदास भण्डारी ने राजा की बुद्धि का हरण कर लिया । मौका देखकर दांव खेला । उसने राजा से कहा कि महाराज ! राज्य में धन का अभाव है । विश्नोईयों से दंड के रूप में धन मांगना चाहिये । ऐसा उपाय किया जाना चाहिये ।५।
विरच कह्यो बाढ़स्यां, करस्यां वणी विणांस । पण राखो तो पैसा दो, दाखै गिरधरदास ।६।
राजा की आज्ञा लेकर गिरधरदास ने विश्नोइयों से कहा 'राजा की आज्ञा है, हम वृक्षों को काटेंगे तथा वनों का विनाश करेंगे । अगर (पेड़ों को नहीं कटने देने का) प्रण रखना हो, तो (दंड स्वरूप) धन देना होगा ।६।
भंडारी भ्रमै मतै, विण वादर वे काम । सिर सुपा रौखां सटै, टुकड़ो न द्यां दाम ।७।
(विश्नोई लोगों ने जवाब दिया) कि भंडारी (गिरधरदास) तुम भ्रम में मत रहना, बिना काम का व्यर्थ का विवाद मत कर । वृक्षों के बदले हम अपना शीश सौंप देंगे तथा (दंड के रूप में) एक रूपया भी नहीं देंगे ।७।
दाग लगे जो दांम द्यां, पंथ मां पुरणो होय । पण राख्यां पांणी चढ़ै, कलंक न लागै कोय ।८।
अगर हम दंड (दांण) के रूप में धन दें, तो कलंक लग जाए, पंथ (विश्नोई पंथ) में नीचे माने जाएंगे । लेकिन अगर हमने प्रण का पालन किया तो हमारा मान-सम्मान बढ़ेगा, किसी प्रकार का कलंक नहीं लगेगा ।८।
चालै चाल वणी करी, तसकर घात्यो तांण । साख पड्यां सिर सुंपस्यां, पहलां किसा वखांण ।९।
भंडारी वृक्ष काटने को उद्यत हुआ । चोरों की तरह वन में प्रवेश किया । विश्नोई स्त्री-पुरुषों ने कहा कि जरूरत पड़ी तो पेड़ों के लिये सिर सौंप देंगे । पहले बड़ाई करने से क्या होता है ।९।
सतरासौ सतीयासीयै, दसवीं मंगलवार । भादव सुद सादु खड़या, खरतर खांडै धार ।१०।
इस प्रकार संवत् १७८७ भादवा माह के शुक्ल पक्ष की दसवीं मंगलवार को ३६३ सज्जन लोगों ने आत्म-बलिदान किया । उनके लोगों ने अपने धर्म नियमों का पूर्ण रूपेण निर्वहन किया ।१०।
कुण पोहमी पंण मेटसी, धरम सटे कुण धीज । पण राख्यों विश्नोइयां, राठोड़ां री रीझ ।११।
ऐसा कौन राजा धरती पर पैदा हुआ है, जो विश्नोईयों को प्रण से डिगा दें तथा धर्म से विमुख कर दें । इस प्रकार अपनी दृढ़ता से विश्नोईयों ने राठौड़ राजाओं का कोप भाजन बनते हुए भी अपने प्रण (प्रतिज्ञा) अर्थात् धर्म की रक्षा की ।११।
साखी राजा रै मन रीझ, मन मां मतो उपायो । हाकम सू कर हेत, विध सूं वैग बुलायो । बुलाय विध सूं बात पूछी, जस कीजो जै अपजस जुवो । पाज पुन री बांधिये, नरपति कैहै कीजै निवों । निवों त करस्यां नींव थरपां, ज्ञान खोजो नरपति । बामण सरवण व्यास भोजग, पूछिया जोगी जति ।१।
राजा ने प्रसन्न होकर मन में विचार किया । हाकिम (गिरधरदास भंडारी) को अपना हितैषी मानकर उसकी वृक्ष काटने की बात पर निर्णय करने के लिये विद्वानों की (जल्दी ही) बैठक बुलाई । विद्वानों को बुलाकर राजा ने कहा कि हमको वही कार्य करना चाहिये, जिससे यश की वृद्धि हो तथा अपयश न हो, पुण्य की मर्यादा (पाज) बांधी जा सके, नम्रता को बढ़ावा मिले । नम्रता ही (धर्म की) नींव है । हमें नींव की स्थापना करनी होगी । राजा ने (गिरधरदास भंडारी के प्रस्ताव पर विचार करके उसका) समाधान खोजने के लिये (भिन्न-भिन्न विद्वानों) ब्राह्मणों, श्रमणों, व्यासों, भोजकों, योगियों एवं यतियों से सलाह पूछी ।१।
पढ़िया पुस्तक वांच, धोरी धरम बतायौ । हाकम रे मन जोर, दिल में दाय न आयो । दाय न आयो दूज राखी, पाप कुल रो प्राणियो । राज कुल री रीत मेटे, करै भूंडी वांणियो । सादर सुणियो श्याम सांचा, महर कर मोटा धणी । विसनुं दोषी भसम होसी, वाद कर वाढ़ी वणी ।२।
पढ़े लिखे लोगों ने शास्त्रों को पढ़कर यह बताया कि (पेड़ों को न काटना ही) ईश्वर ने धर्म बताया है । किन्तु हाकिम (गिरधरदास भंडारी) के मन में बड़ा घमण्ड था । (उसको विद्वानों की सलाह) मन में अच्छी नहीं लगी । (विद्वानों की सलाह) पसंद न आने पर उनको (राजा से) भेद रखा (अर्थात् छिपा लिया, कहा नहीं) । (भंडारी ऐसा इसीलिये कर रहा था, क्योंकि वह) पापी कुल में पैदा हुआ प्राणी था, वह राजा के कुल की मर्यादा मिटा रहा था, वह बनिया बड़ा बुरा काम करने जा रहा था । (जब भंडारी ने राजा को अपने पक्ष में कर लिया, तो सभी विद्वानों ने परमात्मा से प्रार्थना की) हे श्याम ! हमारी विनती सुनो, हे मालिक कृपा करो । (विद्वानों ने कहा) विष्णु भगवान का गुनाहगार (गिरधरदास) नष्ट हो जायेगा । जो वाद-विवाद करके वनों को काट रहा है ।२।
आबां हर री वार, चेलो चोगस लागो । वरण मिल्या बोहो भांत, तमक्यां करस्यां तागो । तागो तो करस्यां नहीं डरस्यां, ध्यान मन ऐसो धरो । मान तज्या क्यूं मान रयसी, सिर सुंपां साको करो । कीयो साको हुयो साकत, भड़क भड़वो भाजसी । सार वयसी सीस पड़सी, लांणतीया तद लाजसी ।३।
अनेक वर्ण (गौत्र) के बहुत से लोग एकत्रित होने लगे । आत्म बलिदान होने को तैयार थे । (वृक्षों की रक्षा करेंगे) प्राण त्याग देंगे, डरेंगे नहीं, ऐसा मन में ध्यान करते हुए (आगे बढ़े) । (अपनी धर्म-मर्यादा का) मान त्यागने से (अपना) स्वाभिमान कैसे रहेगा । इसलिये हमें सिर सौंपकर साका (आत्म बलिदान) करना चाहिये । हम लोग मरने के लिये तैयार रहेंगे, अपने को कठोर बना लेंगे, तो वह दुष्ट (भंडारी) (आयेगा) तो भी भाग जायेगा । शस्त्र चलेंगे तथा सिर कटकर गिरेंगे (तब ये कर) मांगने वाले (लांणतिया) लज्जित होंगे ।३।
सिर सुपै सुचीयारा, गोष्ट करै गुरभाई । खरतर खांडै धार, अणदे तेग समाई । तेग समाई हुवो तागो नर नारी, नीसचै खड़या । वणीयाल वीर तो चढ़ी वांनी, पण राख्यो पातग झड़या । झड़या पातक हेत करकै, दुःख मेट्यो दाळद हड़यो । भलै वणी नै बुरो ताक्यो, दिन दसवै चाचो खड़यो ।४।
गुरु भाई (विश्नोई-बन्धु) मिलकर विचार-विमर्श करने लगे कि इस समय प्राणों के बलिदान के अलावा कोई उपाय नहीं है । सर्वप्रथम अणदे (भादू) ने बलिदान का बीड़ा उठाया । उनके बाद अनेक स्त्री पुरुष अपना आत्म बलिदान देने को तत्पर हो गए । वीर (अमृतादेवी) वणियाल (शहीद होने के) बांने (विवाह के समय की वह रस्म जिसमें दुल्हा-दुल्हन को घी पिलाकर हल्दी लगाकर बिठाया जाता है) बैठ गई । उसने अपने प्रण की रक्षा की और पापों को मिटा दिया । प्रेम सहित धर्म की रक्षा के लिये तैयार हुई, इसलिये पाप मिट गए । दुःख मिट गए तथा दरिद्रता भी समाप्त हो गई । (इधर गिरधरदास भंडारी ने) फिर वनों को (काटने का) बुरा विचार किया । वृक्षों को काटना शुरु किया, (जिसका विरोध करते हुए) दसवें दिन चाचोजी (वणियाल) ने अपना बलिदान दे दिया ।४।
करै जका करतार, सुरां सार समावो । अकरम हुवो अपार, वैगा वार न लावो । वार न लावों हुवो वेगा, पाछां खिस्यां तो पण घटै । ऊदो सार समाहं आयो, सिर सुपां रूंखां सटै । सीस सुपां नहीं कंपा, मरण हूं मत को डरो । होय हो तब कौल गुरु कै, सिर सुंपां साको करो ।५।
वीर अपना बल समेटकर, ईश्वरीय करनी को स्वीकार कर (आगे बढ़े) । बहुत अनर्थ हो चुका है । अब (सामना करने में) देर नहीं करनी चाहिये, इस समय पीछे हट गये तो हमारा प्रण चला जाएगा । ऐसा घोष सुनाई दिया । उदोजी नामक वीर अपना सम्पूर्ण बल समेटकर आगे आए, अपना शीश पेड़ों की रक्षार्थ कटवा दिया । अपना सिर कटवाते समय भी नहीं डरे । लोगों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा भाईयों ! मरने से मत डरना । गुरु जम्भेश्वर भगवान के वचनों का पालन करने का जब समय हो, तो सिर सौंपकर (कटवाकर) साका (आत्मबलिदान) करना चाहिये ।५।
कर मन कोल करार, कान कंथ नीवायो । किसनै रे मन कोड, सिर पर सिर दज आयो । सिरदज आयो सांम धायो, साख राखी सिर दीयो । दैराज दरगै दाद पाई, जीव तग्यो जस लीयो । लीयो जस जिण जीव काजै, आथ उरसूं परहरी । ग्यांन गुरु कै ध्यान धरीयो, सुरत सुरगे संचरी ।६।
मन में पक्का इरादा करके कानोजी नामक वीर ने आकर अपना शीश बलिदान देने के लिये झुकाया । किसना नामक वीर के मन बड़ा उत्साह था, लाशों पर चलकर आया । श्याम गुरु जम्भेश्वर भगवान को याद किया । उनके वचनों का पालन किया और सिर (बलिदान) दिया । ईश्वर की चौखट (स्वर्ग) में शाबासी प्राप्त की । अपना जीवन अर्पण करके यश प्राप्त किया । जिस जीवन के कारण उन्होंने यश प्राप्त किया, उस जीव आत्मा को हरि (परमात्मा) को सौंपने आए । उन वीरों ने अपने गुरु जम्भेश्वर भगवान के बताए ज्ञान से ईश्वर का ध्यान किया । उनकी जीव आत्मा (सुरत) स्वर्ग में पहुंची ।६।
सुरगे सुख अपार, मन की तिसनां भागी । कीयौ वचन कबुल, दांमी देह त्यागी । देह त्यागी भरम भागो, सोभ देसां सांभली । किरपा हुई कुलोभ छूटो, पण राख्यो पुगी रली । रली पुगी सांम आयो, मंनवंछ कारज सारीया । सीध साधु वीवांण चढ़िया, प्रभु पार उतारीया ।७।
स्वर्ग में अपार सुख है । शहीद हुए वीरों के मन की तृष्णाएं मिट गई । श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान के वचन 'जीव दया पालणी, रूंख लीलो नहीं घावै' को स्वीकार करके दांमी (अणदेजी भादू की पुत्री) ने अपना आत्म बलिदान दिया । शरीर का बलिदान करते ही भ्रम मिट गया । दांमी की प्रशंसा दूर दराज के क्षेत्रों तक फैली, ईश्वर की कृपा हुई, लोभ (तृष्णा) समाप्त हो गया । जम्भेश्वर भगवान के वचनों का पालन करके दांमी स्वर्ग में पहुंची । स्वर्ग में पहुंचने पर अगवानी करने श्याम भगवान आए, उन्होंने शहीदों के मनवांछित कार्यों को पूर्ण किया । सिद्ध और साधु लोग (ईश्वरीय) विमान में चढ़े, ईश्वर ने उन्हें भवसागर से पार उतार दिया ।७।
बै यूं दाख वैण, राजी रण वट आवो । चीमां जलम सुधार, रतन काया धीन पावो । पावो त काया तजो माया, मन को मोह निवारीयो । फेर ओ तन काम केहै, परभु पंथ कूं सारीयो । वीरख पड़िया ऋखी खड़ीया, पंथ की पारख पड़ी । तागांळां सुं तेग बांधी, हाकम नै हतीया चड़ी ।८।
वे सभी लोग इस प्रकार कह रहे हैं कि हमें खुशी-खुशी युद्ध भूमि में आना चाहिये । चीमां अणदेजी भादू की पुत्री ने भी अपना बलिदान देकर जन्म सुधार लिया । चीमां धन्य है जिसने इस नाशवान शरीर को छोड़कर दिव्य रतन काया प्राप्त की, उसने काया प्राप्ति की मोह माया को त्याग दिया, सांसारिक मोह को छोड़ दिया । फिर यह शरीर किस काम का जो प्रभु (जाम्भोजी) के पंथ (धर्म-नियमों) को पूर्ण न कर सके । वृक्ष तो सही सलामत बच गए, लेकिन ऋषि रूपी महापुरुषों ने आत्म बलिदान दे दिया । इस घटना से पंथ की परीक्षा हुई, जो प्राण त्यागने को तैयार खड़े थे । उनसे हाकिम ने विरोध मोल लिया । हाकिम (गिरधरदास भंडारी) के सिर पर खून सवार हो गया ।८।
हतीया करै हैरान, कुबधी कुबध कमाई । चेले रे मन ओर, चोगस चाल चलाई । चाल चलाई हुवो तागो, आस क्यूं ओ सैस लै । वड़ अवसर खड्यो मांझी, चाच पहुंतो चोसलै । खड्ग धारा खेल मांडियो, ओर आयो मारीयो । ग्यान गुरु के ध्यान धरीयो, प्रभु पंथ कुं सांरीयो ।९।
यह नरसंहार हैरान करने वाला था । फिर भी उस कुमति व्यक्ति ने दुष्टतापूर्ण यह कार्य किया । तदुपरांत भी राजा के हाकिम गिरधरदास के मन में कुछ और ही षडयंत्र चल रहा था, उसने चालाकीपूर्ण हमला किया । उस भंडारी के चाल चलते ही आत्म-बलिदान (तागो) हुआ । इस बड़े अवसर (आत्म बलिदान के अवसर) पर घर के मुखिया (चाचोजी) ने भी बलिदान दिया । चाचोजी युद्ध भूमि के बीचो-बीच पहुंचे, तलवार का खेल प्रारम्भ हुआ और उन्होंने स्वयं को बलिदान कर दिया । गुरु जाम्भोजी के ज्ञान को आत्मसात कर उनका ध्यान किया । ईश्वर ने उन्हें भवसागर से पार किया ।९।
करता करै ज सार, राज करै कुफराणा । हरिजन पहुंतो पार, विधि सूं बात वखांणा । बात वखांणा सत जाणां, पण राखो पूरा धणी । पापियां नै तुरंत पहुंचो, तागाला तीखी अणी । अणी तीखी सुरंगी सर पर, तके आखर क्यूं ओसरे । पाछां खिसियां तो पण घटे, तंत लीया तागा करै ।१०।
सभी के स्वामी परमात्मा सार असार के कर्ता है । लेकिन इस समय राज्य करने वाले नास्तिक लोग है । प्रभु के लोग आत्म बलिदान होकर उनके पास पहुँचे, ईश्वर से घटना का सही वृतांत सुनाया । हे मालिक ! हमारा प्रण पूरा करो, पापी लोगों का शीघ्र नाश करो । जो लोग अपने शरीर को सूली पर चढ़ाने को तैयार है, उनकी रक्षा करो । जब आपकी (ईश्वर की) शक्ति हमारे साथ है, तब हम उदास क्यों होवें, पीछे हटने पर तो प्रण टूट जाएगा । हमने तत्व लिया है, बलिदान होने को तैयार है ।१०।
तागाळा सुं ताण, काल्हा कदेह न कीजै । जैकारां जैनांण, दुख दे दांण न लीजै । दांण न लीजै मांन दीजै, वरण सतायो रानीयै । सरब सदामद साख पारख, रीत रकम न भानीयै । आपो त मारै वेग सारै, दया पालै देखतां । तीन सौ तेसठ उपर, पंथ पुरो पेखतां ।११।
जब इस घटना की सूचना राजा अभयसिंह को पहुंची तो उन्होंने हाकिम गिरधरदास भण्डारी की निन्दा करते हुए कहा कि मूर्ख ! जो लोग बलिदान होने को तैयार खड़े हो, उनको कभी जिद करके नहीं जीता जा सकता, यह घटना इसका प्रमाण है । कभी भी प्रजा से दुःख देकर कर नहीं लेना चाहिये । ऐसे लोगों से कर नहीं लेकर उल्टे मान देना चाहिये । सर्वस्व शक्ति लगाकर किसी की परीक्षा लेना मर्यादा रूपी कोष को समाप्त करना है । जो अपना बलिदान देकर भी धर्म की रक्षा करते हैं, दया (धर्म) का पालन करते हैं, ऐसे इस घटना में बलिदान हुए तीन सौ तिरेसठ लोगों पर सम्पूर्ण बिश्नोई पंथ गर्व करता है ।११।
ओ तागो संसार, जुग मैं जोर वखाणा । सत मानै सुरतांण, राजा राव वखाणा । राव वखांणा सत जांणा, जीव काया रा जुवो । खरा खोटा रा भेद लाधै, खेजड़ली खलकट हुवो । मूल मरणो अमर नांहीं, मोमणां कीयौ मतो । खड्या खांडै चड्या चंवरी, करै अपछर आरतो । जात कुळ की तात नीसचै, पंथ पर काजै मील्यो । गुण ग्रंथ गोकल कहै साखी, खेजड़ली खळकट सांभल्यो ।१२।
यह आत्म बलिदान संसार में बहुत सराहा गया । इसको राजा-प्रजा सभी सत्य का मार्ग मान रहे हैं । राजा, राव सभी ने इस घटना का बखान किया है । इन साहसी लोगों ने जीव और शरीर की भिन्नता दिखा दी, कौन सच्चे धार्मिक तथा कौन पाखंडी है, इसका भेद खेजड़ली में इकट्ठे होकर (विश्नोईयां) ने कर दिया । धर्म निष्ठ लोगों ने यह निश्चय किया कि मरना तो सत्य है लेकिन अमर होना नहीं । वे वीर तलवारों से बलिदान होकर बलिवेदी रूपी चंवरी में बैठे हैं, अप्सराएं उनकी आरती कर रही है । अपनी जाति, कुल का कुछ भी निश्चय नहीं किया और विश्नोई पंथ के परोपकारार्थ इकट्ठा हुए । पेड़ों की रक्षार्थ शहीद हुए लोगों के गुणों की माला गूंथकर संत कवि गोकलजी यह साखी कह रहे हैं । खेजड़ली में इस प्रकार की अविस्मरणीय घटना घटी ।१२।